शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'पहल पत्रिका : हिंदी साहित्य में वैचारिक हस्तक्षेप की एक सशक्त परंपरा'
पहल का पहला अंक साहित्यिक पत्रकारिता की जब भी बात की जाएगी 'पहल' का नाम अनिवार्य तौर पर लिया जाएगा। अपने समय में 'पहल' ऐसी जरूरी पत्रिका बन गई थी जिसे हर रचनाकार और साहित्यिक सरोकारों से जुड़ा हर व्यक्ति पढ़ना और देखना चाहता था। इसमें छपना हर रचनाकार का सपना होता था। साहित्यिक पत्रकारिता सामान्य पत्रकारिता से अलग होती है। इसकी चुनौतियां अलग होती हैं। केवल कविता, कहानी, आलेख और समीक्षा बटोर कर उसे एक जिल्द में छाप देना बहुत आसान काम होता है, जैसा कि आज की हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाएं कर रही हैं। लेकिन साहित्यिक पत्रिका का मूल उद्देश्य होता है : ऐसी रचनाएँ छापना जो पाठकों को उद्वेलित करे, अपने समय के सरोकारों से परिचित कराए, प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना की तरफ मोड़ दे और लीक से अलग हट कर चलना सिखाए। 'पहल' इन सारे प्रतिमानों पर हमेशा खरी उतरी। सम्पादक ज्ञानरंजन की संपादकीय प्रतिबद्धता को इस बात से समझा जा सकता है कि इस पत्रिका के सम्पादन के लिए उन्होंने खुद का अपना लेखन निर्ममता से स्थगित कर दिया। और अन्त में जब उन्हें ऐसा लगा कि वे बढ़ती उम्र के चलते पहल के प्रति न...