परांस-7 : शाश्विता की कविताएं
कमल जीत चौधरी मनुष्य इस ब्रह्माण्ड का श्रेष्ठ जीव है। लेकिन अपनी श्रेष्ठता के मद में वह तमाम ऐसे काम भी करता जा रहा है जिसमें अमानवीयता कहीं अधिक है। सामाजिक और नैतिक ही नहीं बल्कि पर्यावरणीय स्तर पर भी मनुष्य ने तमाम दिक्कतें पैदा की हैं। ऐसे में वाकई मनुष्य होने के नाते हमारी जिम्मेदारियां अलग किस्म की हैं। शाश्विता अपनी एक कविता में लिखती हैं "हमारे सम्मुख यह मौलिक ज़िम्मेदारी है/ प्रेत होती मानसिकता से/ समस्त वायुमंडल का शोधन करना/ प्रेत हो जाने की हर सम्भावना को/ मूलतः विरेचित करना/ प्रत्येक दिशा में भटकते दिशाहीन प्रेत को/ सम्पूर्ण विश्वास के साथ मानवीय सम्बोधन देना/ प्रेम की सच्ची सत्ता के साथ प्रेत-प्रतिकूलता को/ विजयी स्पर्श देना"। शाश्विता की इधर की कविताओं में दर्शन का प्रभाव बढ़ा है। दर्शन अनुभवों का एक ऐसा आईना हमारे सामने रख देता है जो हमें चिन्तन मनन करने के लिए प्रेरित करता है। अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को ...