सुजीत कुमार सिंह का आलेख 'पचहत्तर के विभूति नारायण राय और जोकहरा का पुस्तकालय'
जोकहरा का पुस्तकालय किताबें इसलिए महत्त्वपूर्ण होती हैं कि यह किसी भी व्यक्ति के जीवन और सोच को बदल कर रख देती हैं। सामंती मानसिकता के चलते दुर्भाग्यवश उत्तर भारत में पढ़ने की संस्कृति का विकास ही नहीं हो पाया। घरों में पुस्तक के नाम पर 'रामचरितमानस' जरूर मिल जाती है लेकिन इसे भी लोग अक्सर लाल-पीले कपड़े में लपेट कर अगरबत्ती दिखाने तक सीमित कर देते हैं। इस जड़ स्थिति को बदलने के क्रम में विभूति नारायण ने जोकहरा में पुस्तकालय की स्थापना की। अपने प्रयासों से विभूति जी ने निहायत ही पिछड़े जोकहरा को साहित्यिक केन्द्र के रूप में बदल दिया। सुजीत कुमार सिंह विद्यार्थी जीवन से ही इस पुस्तकालय से जुड़े रहे हैं और उनकी मिली जुली स्मृतियां हैं। अपने संस्मरण में सुजीत लिखते हैं : ' विभूति नारायण राय चाहते तो यह पुस्तकालय इलाहाबाद या आज़मगढ़ जैसे शहर में स्थापित कर सकते थे। कुछ पढ़े-लिखे लोग आलोचना करते थे कि विभूति जी को जोकहरा में पुस्तकालय नहीं खोलना चाहिए था। लेकिन भारत के गांव अब भी बहुत ही पिछड़े हुए हैं। तैंतीस साल पहले इस तरह का स्वप्न देखना और उसे साकार करना एक तरह की क्रांति ह...