हितेन्द्र पटेल का आलेख 'इतिहास पर पुनर्विचार'


हितेन्द्र पटेल


बंगाल ने आधुनिक भारत में नवजागरण की प्रक्रिया का नेतृत्व किया। राजा राम मोहन रॉय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, राम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द जैसे नाम इस बात की तस्दीक करते हैं।  आगे चल कर सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, चितरंजन दास, सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता आंदोलन से न केवल जुड़ते हैं बल्कि भारतीय आंदोलन की अपरिहार्यता बन जाते हैं। बंगाल ही अकेला ऐसा प्रान्त है जिसे अंग्रेजों ने 1905 में विभाजित कर दिया। इस विभाजन ने राष्ट्रीय आंदोलन को राष्ट्र व्यापी बना दिया। आजादी के समय बँटवारे का दंश भी बंगाल को भुगतना पड़ा। इस तरह स्वतंत्रता के पूर्व या स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय राजनीति में बंगाल की एक अहम भूमिका रही है। 1940 के बाद मुस्लिम लीग ने जहां एक तरफ मुस्लिम राजनीतिक मत को संगठित करना आरंभ किया वहीं दूसरी तरफ हिन्दू महासभा ने यह सोच विकसित किया कि संख्यात्मक बहुमत पर आधारित प्रातिनिधिक लोकतंत्र हिंदुओं के राजनीतिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर सकता। आज़ादी मिलने के बाद भी धार्मिक आग्रहों का यह अलगाव बंगाल के लिए एक बड़ा मुद्दा बना रहा। इतिहास लेखन की प्रक्रिया उतनी इकहरी नहीं होती, जितना दूर से देखने पर दिखाई पड़ती है। उस जटिलता को समझते हुए पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर इतिहास लेखन करने की चुनौतियों से इतिहासकार हितेन्द्र पटेल भलीभांति अवगत हैं। उनका मानना है कि 'राजनीतिक इतिहास इतना महत्वपूर्ण है कि इसे न तो राजनीतिक स्मृति और न ही राजनीतिक मिथकों के भरोसे छोड़ा जा सकता है। इसका पहला दायित्व ऐतिहासिक व्याख्या करना है।' इस मुद्दे पर एक गम्भीर आलेख उन्होंने मूलतः अंग्रेजी में लिखा है जो The Statesman में प्रकाशित हुआ। उस आलेख का हिन्दी अनुवाद खुद हितेन्द्र पटेल ने ही किया है। आज के परिप्रेक्ष्य में इस आलेख को गम्भीरता से पढ़े जाने की जरूरत है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हितेन्द्र पटेल का आलेख 'इतिहास पर पुनर्विचार'।


'इतिहास पर पुनर्विचार'


हितेन्द्र पटेल 


1

'अतीत के अज्ञान का अपरिहार्य परिणाम वर्तमान की गलतफहमी है। लेकिन जो व्यक्ति वर्तमान से पूरी तरह अनभिज्ञ है, वह अतीत को समझने के प्रयास में भी उतना ही व्यर्थ समय व्यतीत कर सकता है।' 

मार्क ब्लॉक, द हिस्टोरियन्स क्राफ्ट।

राजनीतिक इतिहास इतना महत्वपूर्ण है कि इसे केवल राजनीतिक स्मृति या राजनीतिक मिथकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका पहला दायित्व ऐतिहासिक व्याख्या करना है। आधुनिक भारत के कुछ ही क्षेत्रों ने बंगाल की तरह समृद्ध और विविध इतिहास लेखन को जन्म दिया है। पिछली शताब्दी में, इतिहासकारों ने इसके बौद्धिक जागरण, राष्ट्रवाद, क्रांतिकारी राजनीति, कृषि आंदोलनों, सांप्रदायिक संबंधों और विभाजन का विभिन्न दृष्टिकोणों से अध्ययन किया है। राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी, उपसमूहवादी और हाल के विद्वानों ने बंगाल के अतीत की हमारी समझ को व्यापक बनाया है। उनका योगदान अपरिहार्य है।

फिर भी, ऐतिहासिक शोध की प्रगति न केवल नए प्रमाणों की खोज से होती है, बल्कि इसलिए भी होती है क्योंकि इतिहासकार परिचित प्रमाणों से नए प्रश्न पूछना सीखते हैं। इस निबंध का उद्देश्य पूर्व के शोध की उपलब्धियों को चुनौती देना नहीं है, बल्कि यह सुझाव देना है कि बंगाल के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण आयाम अधिक विश्लेषणात्मक ध्यान का पात्र है। उत्तर औपनिवेशिक बंगाल के प्रमुख आख्यानों को आमतौर पर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, वर्ग और विभाजन के इर्द-गिर्द संगठित किया गया है। ये विषय मौलिक बने हुए हैं। ये बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध के दौरान बंगाल के असाधारण राजनीतिक अनुभव के एक बड़े हिस्से की व्याख्या करते हैं। फिर भी, वे इस बात की पूरी तरह से व्याख्या नहीं करते कि राजनीति स्वयं कैसे बदली।

यह कहना आवश्यक है कि उत्तरकालीन औपनिवेशिक बंगाल को राजनीति के संवैधानिक परिवर्तन के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए। 1909 के मोर्ले-मिंटो सुधारों और 1947 के विभाजन के बीच, प्रतिनिधि संस्थाओं ने धीरे-धीरे राजनीतिक जीवन को नया रूप दिया। संवैधानिक सुधारों ने चुनावी प्रतिस्पर्धा को बदल दिया; चुनावी प्रतिस्पर्धा ने राजनीतिक संगठन को पुनर्परिभाषित किया; और प्रतिनिधित्व के बदलते विचारों ने समुदायों द्वारा राजनीतिक सत्ता, लोकतांत्रिक वैधता और संवैधानिक सुरक्षा की कल्पना करने के तरीके को रूपांतरित कर दिया। इस प्रक्रिया ने विचारधारा का स्थान नहीं लिया।

इसने विचारधारा के कार्यक्षेत्र को पूरी तरह से बदल दिया। इस परिप्रेक्ष्य से देखने पर, बंगाल केवल विभाजन का अनुभव करने वाला प्रांत ही नहीं, बल्कि वह प्रमुख प्रयोगशाला भी प्रतीत होता है जहाँ आधुनिक भारत ने लोकतांत्रिक राजनीति के कुछ सबसे कठिन संवैधानिक प्रश्नों का सामना किया: एक अत्यंत बहुलवादी समाज में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कैसे संगठित किया जाना चाहिए? क्या केवल संख्यात्मक बहुमत ही राजनीतिक वैधता प्रदान कर सकता है? क्षेत्रीय पहचान, अल्पसंख्यक विश्वास और लोकतांत्रिक सरकार को एक ही संवैधानिक ढांचे के भीतर कैसे सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए? इन प्रश्नों ने 1920 के दशक से बंगाल में होने वाले हर प्रमुख राजनीतिक विवाद को आकार दिया।


चितरंजन दास 


उन्होंने बंगाल समझौते, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर बहसों, 1937 के चुनावों, 1940 के दशक के संवैधानिक संकटों और 1947 में बंगाल के भविष्य के लिए पेश किए गए प्रतिस्पर्धी प्रस्तावों को प्रभावित किया। उन्होंने चित्तरंजन दास, ए के फजलुल हक, सुभाष चंद्र बोस, एच. एस. सुहरावर्दी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अन्य जैसे विभिन्न नेताओं की राजनीतिक गणनाओं को भी आकार दिया। इस संवैधानिक आयाम को पहचानना न तो मौजूदा इतिहास लेखन को नकारना है और न ही विचारधारा के महत्व को कम करना है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि बंगाल के राजनीतिक विकास को समझने में संवैधानिक परिवर्तन को अधिक महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए। इतिहास एक कथा को दूसरी कथा से प्रतिस्थापित कर के आगे नहीं बढ़ता, बल्कि उन प्रश्नों की सीमा को बढ़ा कर आगे बढ़ता है जिनके माध्यम से अतीत को समझा जाता है।

बंगाल का संवैधानिक परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। यह सुधारों की एक श्रृंखला के माध्यम से धीरे-धीरे हुआ, जिसने न केवल सरकार की संस्थाओं को बल्कि राजनीति की भाषा को भी बदल दिया। इन सुधारों का सामूहिक महत्व किसी एक सुधार से कहीं अधिक था। 1909 और 1935 के बीच बंगाल में एक प्रतिनिधि राजनीतिक व्यवस्था का उदय हुआ, जिसमें संवैधानिक संरचना से जुड़े प्रश्न राजनीतिक व्यवहार को तेजी से प्रभावित करने लगे।


ए के फजलुल हक


1909 के मोर्ले-मिंटो सुधारों ने पहला निर्णायक कदम उठाया। इनका महत्व केवल अलग-अलग निर्वाचक मंडलों की स्थापना तक ही सीमित नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को ही पुनर्परिभाषित करने में निहित था। संवैधानिक राजनीति के लिए अब समुदायों को स्वयं को प्रतिनिधि निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में देखना आवश्यक हो गया था। राजनीतिक वैधता अब केवल व्यापक राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को व्यक्त करने के बजाय संगठित चुनावी हितों की ओर से बोलने की क्षमता पर अधिक निर्भर हो गई थी। 1919 के सुधारों ने इस परिवर्तन को और गति प्रदान की।

प्रतिनिधि संस्थाओं के विस्तार और प्रांतीय विधानमंडलों के बढ़ते महत्व के साथ, संवैधानिक राजनीति सार्वजनिक जीवन के केंद्र में आ गई। लगभग इसी ऐतिहासिक क्षण में, गांधी जी के नेतृत्व ने लाखों आम भारतीयों को राजनीति में शामिल कर के भारतीय राष्ट्रवाद को नया रूप दिया। इतिहासकारों ने इस लोकतांत्रिक क्रांति पर उचित ही बल दिया है। फिर भी, इसके संवैधानिक निहितार्थों पर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक है। जन राजनीति और प्रतिनिधि संस्थाएँ साथ-साथ विकसित हुईं। एक ने भागीदारी का विस्तार किया; दूसरे ने चुनावी और विधायी प्रक्रियाओं के माध्यम से भागीदारी को संरचित किया। बंगाल में इस परस्पर क्रिया का महत्व सबसे अधिक स्पष्ट रूप से देखा गया।

प्रांत की जनसांख्यिकीय संरचना, शक्तिशाली शहरी मध्यम वर्ग, राजनीतिक रूप से जागरूक जमींदार वर्ग, तेजी से संगठित हो रहे किसान वर्ग और कलकत्ता की प्रभावशाली स्थिति ने सुनिश्चित किया कि संवैधानिक सुधारों के दूरगामी परिणाम हों। प्रतिनिधि सरकार ने तुरंत ही कई कठिन प्रश्न खड़े कर दिए। क्या केवल बहुमत का शासन ही राजनीतिक वैधता सुनिश्चित कर सकता है? लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का सामंजस्य अल्पमत के विश्वास के साथ कैसे बिठाया जा सकता है? क्या प्रांतीय स्वायत्तता एक साझा बंगाली राजनीतिक पहचान को मजबूत करेगी या प्रतिस्पर्धी राजनीतिक निष्ठाओं को बढ़ावा देगी?

ये प्रश्न न तो अमूर्त थे और न ही अकादमिक। इन्होंने अगले पच्चीस वर्षों के दौरान हर प्रमुख संवैधानिक विवाद को आकार दिया। इनका उत्तर देने का पहला ठोस प्रयास 1923 के बंगाल समझौते के साथ सामने आया। चित्तरंजन दास के नेतृत्व में परिकल्पित यह समझौता समुदायों के बीच एक राजनीतिक समझौते से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। यह बंगाल की विशिष्ट सामाजिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के भीतर सहयोग के लिए एक संवैधानिक आधार बनाने का प्रयास था। दास ने यह माना कि बंगाल में प्रतिनिधि सरकार तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक संख्यात्मक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ राजनीतिक विश्वास भी न हो। इसलिए, इस समझौते ने लोकतांत्रिक सिद्धांतों को एक बहुलवादी समाज की व्यावहारिक आवश्यकताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया।

हालांकि अंततः इसे स्थायी स्वीकृति नहीं मिली, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व कहीं और है। इसने यह प्रदर्शित किया कि बंगाल के राजनीतिक नेतृत्व ने पहले ही यह समझना शुरू कर दिया था कि प्रांतीय राजनीति की भविष्य की स्थिरता केवल वैचारिक दृढ़ता से नहीं, बल्कि संवैधानिक सामंजस्य से निर्धारित होगी। इस अंतर्दृष्टि पर सामान्यतः जितना ध्यान दिया गया है, उससे कहीं अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। बंगाल समझौता कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। इसने उन कई संवैधानिक दुविधाओं का पूर्वाभास दिया जो अगले दो दशकों में बंगाल की राजनीति पर हावी रहेंगी। प्रतिनिधित्व, सत्ता-साझाकरण और राजनीतिक विश्वास से संबंधित प्रश्न बार-बार विभिन्न रूपों में उभरते रहे, भले ही राजनीतिक गठबंधन बदलते रहे और वैचारिक संघर्ष तीव्र होते गए।


सुभाष चंद्र बोस 


2

1937 के चुनावों ने यह पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि बंगाल में प्रतिनिधिक शासन (Representative Government) के आधार पर स्थिर राजनीतिक सहमति का निर्माण सरल नहीं था। प्रांतीय स्वायत्तता ने लोकतांत्रिक भागीदारी का विस्तार अवश्य किया, किन्तु उसने विद्यमान संवैधानिक व्यवस्थाओं की सीमाओं को भी उजागर कर दिया। चुनावी राजनीति ने प्रत्येक प्रमुख राजनीतिक संगठन को शासन, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सुरक्षा—इन तीनों प्रश्नों पर एक साथ विचार करने के लिए बाध्य किया। जो प्रश्न पहले केवल संवैधानिक स्वरूप के प्रतीत होते थे, वे अब प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रश्न बन चुके थे।

1920 के दशक की संवैधानिक बहसों को 1932 के कम्यूनल अवार्ड और विशेष रूप से 1935 के भारत शासन अधिनियम के बाद एक नई तात्कालिकता प्राप्त हुई। ब्रिटिश नीति-निर्माताओं की मंशा चाहे जो रही हो, इन उपायों ने प्रांतीय राजनीति की प्रकृति को मूल रूप से बदल दिया। प्रतिनिधिक संस्थाएँ अब केवल संवैधानिक प्रयोग नहीं रहीं; वे बंगाल के राजनीतिक भविष्य के निर्धारण का मुख्य मंच बन गईं। चुनावी सफलता के लिए राजनीतिक दलों को अपने व्यापक वैचारिक आग्रहों को स्थायी प्रतिनिधिक गठबंधनों में रूपांतरित करना आवश्यक हो गया।

1937 के प्रांतीय चुनाव इस दीर्घ संवैधानिक विकास की परिणति थे। वे केवल प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत होने वाले प्रथम चुनाव नहीं थे; उन्होंने यह संकेत दिया कि बंगाल एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है।

अब कोई भी राजनीतिक दल पूरे प्रांत का स्वाभाविक प्रतिनिधि होने का दावा नहीं कर सकता था। गठबंधन सरकारें अस्थायी उपाय नहीं, बल्कि संरचनात्मक आवश्यकता बन गईं। कांग्रेस, कृषक प्रजा पार्टी, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा—सभी को अपनी राजनीतिक रणनीति ऐसे संवैधानिक ढाँचे के भीतर पुनर्विचार करनी पड़ी जिसमें केवल जन-आंदोलन ही नहीं, बल्कि राजनीतिक समझौते भी उतने ही महत्त्वपूर्ण थे।

इस परिवर्तन ने राजनीतिक नेतृत्व की प्रकृति भी बदल दी। नेताओं का मूल्यांकन केवल उनके राष्ट्रवादी आदर्शों या वैचारिक प्रतिबद्धताओं से नहीं किया जा सकता था। अब उन्हें उन प्रतिस्पर्धी प्रतिनिधिक दावों के बीच संतुलन स्थापित करना था जिनकी वैधता क्रांतिकारी राजनीति से अधिक संवैधानिक संस्थाओं पर आधारित थी।

1930 के दशक के उत्तरार्ध तक बंगाल के सामने मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं रह गया था कि ब्रिटिश शासन कब समाप्त होगा, बल्कि यह था कि उसके बाद राजनीतिक सत्ता का संगठन किस प्रकार होगा। यही संवैधानिक प्रश्न औपनिवेशिक शासन के अंतिम दशक पर छाया रहा।

1937 के बाद के दशक का वर्णन प्रायः बंगाल में औपनिवेशिक शासन के अंतिम अध्याय के रूप में किया जाता है। मंत्रालय बने और गिरे, द्वितीय विश्वयुद्ध ने राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया, अकाल ने ग्रामीण समाज को झकझोर दिया, लाहौर प्रस्ताव ने संवैधानिक बहस की दिशा बदल दी, सांप्रदायिक हिंसा ने प्रांत को आहत किया और अंततः विभाजन के साथ ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया।

इन सभी घटनाओं का अपना-अपना ऐतिहासिक महत्व है। किंतु यदि इन्हें अलग-अलग देखा जाए तो वह व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया ओझल हो जाती है जिसने इन सबको परस्पर जोड़ रखा था।

इस दशक की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं थी, बल्कि बंगाल के भविष्य के संबंध में प्रतिस्पर्धी संवैधानिक दृष्टियों का उदय था।

1937 के चुनावों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र बंगाल में स्थिर राजनीतिक सहमति उत्पन्न नहीं कर सकता। प्रांतीय स्वायत्तता ने लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ाया, किंतु साथ ही संवैधानिक व्यवस्था की सीमाएँ भी उजागर कर दीं। चुनावी राजनीति ने प्रत्येक प्रमुख दल को शासन, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सुरक्षा के प्रश्नों पर एक साथ महत्त्वपूर्ण  विचार करने के लिए विवश किया।

यह परिवर्तन सभी राजनीतिक धाराओं को प्रभावित कर रहा था।

ए. के. फ़ज़लुल हक़ के लिए प्रतिनिधिक राजनीति का अर्थ था ग्रामीण बंगाल की आकांक्षाओं पर आधारित व्यापक प्रांतीय गठबंधन का निर्माण। कांग्रेस के सामने चुनौती थी कि वह अपने अखिल भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को मुस्लिम-बहुल प्रांत की विशिष्ट संवैधानिक वास्तविकताओं के साथ कैसे समन्वित करे।


श्यामा प्रसाद मुखर्जी 


1940 के बाद मुस्लिम लीग ने क्रमशः भारतीय उपमहाद्वीप के संवैधानिक भविष्य के संदर्भ में मुस्लिम राजनीतिक मत को संगठित करना आरंभ किया। दूसरी ओर, 1940 के दशक में बंगाल में प्रभावशाली होती हिंदू महासभा का तर्क था कि केवल संख्यात्मक बहुमत पर आधारित प्रातिनिधिक लोकतंत्र हिंदुओं के राजनीतिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर सकता।

इन सभी उत्तरों में गहरे मतभेद थे, किंतु वे सभी एक ही संवैधानिक दुविधा से उत्पन्न हुए थे।

द्वितीय विश्वयुद्ध ने इस प्रक्रिया को बाधित नहीं किया; बल्कि उसे और तीव्र कर दिया। युद्धकालीन प्रशासन, साम्राज्यिक सत्ता का क्षरण और बंगाल का भीषण अकाल—इन सबने राजनीतिक पुनर्संरेखण को तेज कर दिया। दशक के मध्य तक संवैधानिक बहस केवल बौद्धिक विमर्श नहीं रह गई थी; वह तत्काल राजनीतिक आवश्यकता बन चुकी थी। ब्रिटिश सत्ता की वापसी अब दूर की संभावना नहीं, बल्कि निकट भविष्य की वास्तविकता बन गई थी। इसलिए केंद्रीय प्रश्न बदल गया। अब प्रश्न यह नहीं था कि संवैधानिक परिवर्तन होगा या नहीं; प्रश्न यह था कि राज (Raj) का स्थान कौन-सी संवैधानिक व्यवस्था लेगी।

इस दृष्टि से देखने पर 1940 के दशक साथ में दिखाई देती हैं। वे केवल सांप्रदायिक पहचान या राष्ट्रवादी रणनीति के विवाद नहीं थीं। वे एक साझा संवैधानिक समस्या के भिन्न-भिन्न उत्तर थीं—साम्राज्यिक सत्ता के समाप्त होने के बाद बंगाल में राजनीतिक अधिकार का संगठन किस प्रकार किया जाए।

1946–47 तक कम-से-कम चार संवैधानिक विकल्प राजनीतिक रूप से संभव दिखाई दे रहे थे।

पहला, एक संयुक्त भारत, जिसके भीतर बंगाल एक अविभाजित प्रांत के रूप में संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बना रहे।

दूसरा, पाकिस्तान, जिसमें मुस्लिम-बहुल बंगाल अपनी जनसांख्यिकीय वास्तविकता के अनुरूप संवैधानिक स्थान प्राप्त करे।

तीसरा, एक स्वतंत्र और अविभाजित संप्रभु बंगाल, जिसका सबसे प्रमुख प्रतिपादन 1947 की अंतिम संवैधानिक वार्ताओं में सामने आया। चाहे इसकी व्यावहारिक सीमाएँ रही हों, फिर भी इस प्रस्ताव ने यह सिद्ध किया कि सत्ता-हस्तांतरण के अंतिम क्षणों तक भारत और पाकिस्तान—दोनों से भिन्न विकल्प गंभीर राजनीतिक चर्चा का विषय बने रहे।

चौथा, बंगाल का विभाजन। इस मत के समर्थकों का तर्क था कि एक ही प्रांत के भीतर राजनीतिक सुरक्षा के परस्पर विरोधी दावों का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसलिए विभाजन कोई आदर्श संवैधानिक समाधान नहीं, बल्कि उपलब्ध विकल्पों में सबसे कम असंतोषजनक विकल्प था।

इसी संदर्भ में फ़ज़लुल हक़, हुसैन शहीद सुहरावर्दी, शरतचंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं का राजनीतिक जीवन ऐतिहासिक रूप से अधिक स्पष्ट हो जाता है। उनके मतभेद निस्संदेह वैचारिक थे, किंतु उतने ही संवैधानिक भी। उन्होंने एक ही ऐतिहासिक प्रश्न के अलग-अलग उत्तर प्रस्तुत किए। उनके मतभेदों को केवल सांप्रदायिकता अथवा राष्ट्रवाद के आधार पर समझना उन संवैधानिक तर्कों की उपेक्षा करना है जिन्होंने उनके राजनीतिक निर्णयों को आकार दिया।

यहीं शायद वह बिंदु है जहाँ बाद की इतिहास लेखन परंपरा को पुनर्विचार की आवश्यकता है।

विभाजन को केवल किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम की विजय या दूसरे की पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसे उस दीर्घकालिक संवैधानिक संकट के परिणाम के रूप में भी समझना चाहिए जिसमें लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विश्वास के बीच संतुलन स्थापित करने के सभी प्रयास क्रमशः अधिक कठिन होते गए।

इसका अर्थ यह नहीं कि विचारधारा, नेतृत्व या राजनीतिक आंदोलन का महत्व कम हो जाता है। बल्कि उन्हें उस संस्थागत संदर्भ में पुनर्स्थापित किया जाता है जिसके भीतर उनका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व निर्मित हुआ।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे इतिहास की संभावनात्मकता (historical contingency) पुनः स्थापित होती है।

1947 के अगस्त से पीछे मुड़ कर देखने पर विभाजन अनिवार्य प्रतीत हो सकता है। किंतु इतिहास प्रायः इतनी निश्चितता के साथ नहीं चलता। उस समय के राजनीतिक अभिनेता पूर्वनिर्धारित परिणामों का सामना नहीं कर रहे थे; वे अनेक संभावनाओं के बीच निर्णय ले रहे थे। उन्होंने जिन संवैधानिक भविष्य की कल्पनाएँ की थीं, वे बाद में सार्वजनिक स्मृति से लुप्त हो गईं—इसलिए नहीं कि वे ऐतिहासिक रूप से महत्वहीन थीं, बल्कि इसलिए कि वे अंततः सफल नहीं हुईं।

उन भूले-बिसरे संवैधानिक विकल्पों को पुनः प्राप्त करना इतिहास की अंतिम परिणति को चुनौती देना नहीं है। वह स्वयं इतिहास को पुनः प्राप्त करना है।


(लेखक और इतिहासकार हितेंद्र पटेल रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हैं।) 

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