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रवीन्द्र नाथ टैगोर का आलेख 'सभ्यताओं का संकट'

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    गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का अध्ययन व्यापक था। साहित्य में तो उनका दखल था ही, वे राजनीतिक रूप से भी हमेशा जागरूक दिखाई पड़े। गांधी जी समेत स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रणी नेताओं से उनका विमर्श चलता रहता था। इसी क्रम में  उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण आलेख भी लिखे। सभ्यताओं के साथ मनुष्य का विकास होता गया लेकिन इन का एक वीभत्स सच यह भी है कि नैतिकता और मनुष्यता के लिए जगह निरन्तर कम होती जाती है। टैगोर ने सभ्यताओं के इस संकट पर विचार करते हुए एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवीन्द्र नाथ टैगोर का आलेख 'सभ्यताओं का संकट'। टैगोर कुछ समय से बीमार चल रहे थे। वे शांतिनिकेतन छोड़ कर कलकत्ते जाने की तैयारी कर रहे थे, और शायद यह जानते भी थे कि वे अपने प्यारे विश्वविद्यालय में अब नहीं लौट सकेंगे। बंगाली नव वर्ष पर उन्होंने विश्वभारती में अपने आस-पास हो रही हत्याओं और तबाहियों पर अपना क्षोभ व्यक्त किया। द्वितीय विश्व युद्ध के चरम क्षणों में दिया गया उनका यह आखिरी भाषण था। इन कारणों से यह बेहद मर्मस्पर्शी और दमदार है : इतिहास से मोह भंग हो चुके इंसान का इंसानों...