सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का आलेख 'नेहरू जी से दो बातें'
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है 'साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है'। लेकिन राजनीतिज्ञों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार कर पाना कठिन होता है। आजकल तो राजनीति उलटी धारा बहाने में लगी हुई है। साहित्यकारों को भी राजनीतिज्ञों के पीछे पीछे चलने में अब कोई गुरेज नहीं। पुरस्कार, पद, प्रतिष्ठा पाने की हसरत जो न करा दे। बहरहाल सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला अपने अक्खड़पन के लिए विख्यात रहे हैं। एक बार ट्रेन में ही उनकी मुलाकात उस समय के ख्यात लोकप्रिय नेता जवाहर लाल नेहरू से हुई। हिन्दी भाषा और साहित्य पर बातचीत के क्रम में निराला जी ने पण्डित नेहरू को काशी में दिए गए उनके इस बयान की याद दिलाई कि 'हिन्दी में दरबारी ढंग की कविता प्रचलित हैं।' और बेबाकी से इसका प्रतिवाद करते हुए कहा , "पण्डित जी, यह मामूली अफ़सोस की बात नही कि आप-जैसे सुप्रसिद्ध व्यक्ति इस प्रान्त में होते हुए भी इस प्रान्त की मुख्य भाषा हिन्दी से प्रायः अनभिज्ञ है। किसी दूसरे प्रान्त का राजनीतिक व्यक्ति ऐसा नहीं। सन् 1930 क...