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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का आलेख 'नेहरू जी से दो बातें'

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  सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला  मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है 'साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है'। लेकिन राजनीतिज्ञों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार कर पाना कठिन होता है। आजकल तो राजनीति उलटी धारा बहाने में लगी हुई है। साहित्यकारों को भी राजनीतिज्ञों के पीछे पीछे चलने में अब कोई गुरेज नहीं। पुरस्कार, पद, प्रतिष्ठा पाने की हसरत जो न करा दे। बहरहाल सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला अपने अक्खड़पन के लिए विख्यात रहे हैं। एक बार ट्रेन में ही उनकी मुलाकात उस समय के ख्यात लोकप्रिय नेता जवाहर लाल नेहरू से हुई। हिन्दी भाषा और साहित्य पर बातचीत के क्रम में निराला जी ने पण्डित नेहरू को काशी में दिए गए उनके इस बयान की याद दिलाई कि 'हिन्दी में दरबारी ढंग की कविता प्रचलित हैं।' और बेबाकी से इसका प्रतिवाद करते हुए कहा , "पण्डित जी, यह मामूली अफ़सोस की बात नही कि आप-जैसे सुप्रसिद्ध व्यक्ति इस प्रान्त में होते हुए भी इस प्रान्त की मुख्य भाषा हिन्दी से प्रायः अनभिज्ञ है। किसी दूसरे प्रान्त का राजनीतिक व्यक्ति ऐसा नहीं। सन् 1930 क...

शिवदयाल का आलेख 'शक्ति की मौलिक कल्पना'

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  निराला मानव जीवन के साथ युद्ध भी शुरू से ही आबद्ध दिखाई पड़ता है। इसीलिए प्राचीन धर्म ग्रंथों और मिथकों तक में इसकी अनुगुंज सुनाई पड़ती है। रामायण महाकाव्य राम रावण के युद्ध की ही कहानी है। सत्ता के नशे में मदमत्त रावण राम की पत्नी सीता का ही हरण कर लेता है। राम इस अन्याय का प्रतिकार करते हुए पहले शान्ति से इस मामले को सुलझाना चाहते हैं लेकिन रावण को अपनी शक्ति पर अभिमान है। ऐसे में वह राम की भला कैसे सुने। अन्ततः राम रावण के बीच भीषण युद्ध होता है। राम लड़ाई लड़ते हुए रावण के विजय के प्रति आशंकित हैं। इसी क्रम में नैराश्य के शिकार भी होते हैं। तब जामवन्त उन्हें शक्ति की मौलिक कल्पना के लिए आह्वान करते हैं। युद्ध में शक्ति की इस मौलिक कल्पना का बड़ा महत्त्व होता है। इसी कथ्य पर निराला ने अपनी विख्यात कविता 'राम की शक्ति पूजा' लिखी जिसकी आलोचकों ने अपनी अपनी तरह से व्याख्याएं की हैं। इसका सन्दर्भ भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से भी जुड़ता है जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन के पश्चात अंग्रेजी शक्ति से लड़ाई शिथिल पड़ती दिखाई पड़ती है। कवि आलोचक शिवदयाल ने निराला की इस कविता की तहों को खोल...

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी 'कला की रूप-रेखा'

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  निराला जी महाकुम्भ एक विशिष्ट और बड़ा आयोजन है। इसमें बेहतर लोग तो आते ही हैं, कुछ संकीर्ण प्रवृत्ति के लोग भी आते हैं जो अपनी ओछी हरकतों से बाज नहीं आते। मेले में आए लोग ठगी के शिकार भी होते हैं। कुछ लोग अपना मालो असबाब गंवा बैठते हैं। कुछ ऑटो रिक्शे वाले मौके का बेहिसाब फायदा उठाते हैं और मनमाना किराया वसूल करते हैं। मनुष्य का यह स्वभाव भी है और ऐसा हमेशा होता रहा है। महाप्राण निराला ने एक संस्मरणात्मक कहानी लिखी है जिसमें वे एक मद्रासी व्यक्ति के सब गंवा बैठने का जिक्र करते हैं और अन्ततः अपने स्वभाव के अनुरूप ठंड से बचाने के लिए उसे अपनी चादर दे देते हैं। कहानी में कुम्भ का यह संक्षिप्त जिक्र मिलता है लेकिन एक आयाम की तरफ इशारा तो करता ही है। यह कहानी निराला जी के संकलन  "सुकुल की बीबी" में संकलित है जो लखनऊ से प्रकाशित होने वाले 'माधुरी' मासिक के नवम्बर 1936 में प्रकाशित हुआ था। यह कहानी हमने 'निराला रचनावली' के भाग 4 से साभार लिया है। तो आइए आज महाकुम्भ विशेष के अन्तर्गत पहली बार पर हम पढ़ते हैं  महाप्राण निराला द्वारा "मद्रासी" कुम्भ यात्री क...