संदेश

सावित्रीबाई फुले लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सिद्धार्थ रामू का आलेख 'सावित्रीबाई फुले: भारत की पहली आधुनिक नायिका का जीवन और संघर्ष'

  जन्मदिन (3 जनवरी) पर  'सावित्रीबाई फुले: भारत की पहली आधुनिक नायिका का जीवन और संघर्ष'  सिद्धार्थ रामू हिन्दू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परम्परा में शूद्रों और महिलाओं को एक समान माना गया है। अतिशूद्रों (अछूतों) को इंसानी समाज का हिस्सा नहीं माना गया। उन्हें इंसान का दर्जा तक नहीं दिया गया। निर्णयसिंधु में उद्धृत एक स्मृति में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि- स्त्रीशूद्राश्चय सधर्माणः [1] (अर्थात् स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं) भागवतपुराण के अनुसार स्त्री तथा शूद्रों को वेद सुनने का अधिकार नहीं है। दोनों को शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है। हिन्दू धर्मग्रंथों में साफ़ तौर पर कहा गया है कि- स्त्रीशूद्रौ नाधीयताम् [2] (अर्थात् स्त्री तथा शूद्र अध्ययन न करें) ऐसा नहीं है कि महज अध्ययन के मामले में स्त्रियों और शूद्रों को समान माना गया था। क़रीब सभी मामलों में शूद्रों और स्त्रियों को समान माना गया। विवाह संस्कार को छोड़ दिया जाए, तो अन्य सभी संस्कारों के मामले में स्त्रियों को शूद्रों के समकक्ष रखा गया है। दोनों को संपत्ति के अधिकार से वंचित किया गया है। मनुस्मृति में साफ़ त...

सुधा अरोड़ा का आलेख 'स्त्री शिक्षा और स्त्री समता की पहली पैरोकार : सावित्री बाई फुले'

चित्र
 ​ सावित्री बाई फुले  इस दुनिया को बेहतर बनाने में कई लोगों ने सराहनीय भूमिकाएँ निभाई हैं। समाज के सबसे निचले माने जाने वाले दलितों के उद्धार के लिए सावित्री बाई फुले अपने पति जोतिबा राव फूले के साथ आजीवन कार्य करती रहीं। वे भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जिया जिसका मूल उद्देश्य स्त्रियों की स्थिति को बेहतर बनाना था। इस क्रम में उन्होंने विधवा विवाह, छुआछूत उन्मूलन, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओ को शिक्षित बनाने के लिए अनथक प्रयत्न किया। वे एक कवियत्री भी थीं। उन्हें मराठी की आदि कवियत्री के रूप में भी जाना जाता है।अनंत महादेवन की फिल्म "फुले" पहले जोतिबा फुले के जयंती दिवस 11अप्रैल 2025 को सिनेमा घर में आने वाली थी पर सेंसर की आपत्ति के कारण उसका प्रदर्शन रोक दिया गया। अब वह आज 25 अप्रैल 2025 को रिलीज हो रही है। सुधा अरोड़ा ने 2004 में "कथादेश" में "औरत की दुनिया" नामक स्तंभ की शुरुआत की थी। इस शृंखला की शुरुआत उन्होंने सावित्री बाई फुले से ही की थी। हाल ही में सुधा...