विमल कुमार से बातचीत
विमल कुमार हर रचनाकार यह चाहता है कि उसको सम्मान और प्रतिष्ठा मिले। इस क्रम में रचनाकार के अवदान को रेखांकित करने के लिए पुरस्कार देने की परम्परा शुरू की गई। लेकिन पुरस्कारों का तो अपना अलग ही गुणा गणित होता है। अब तो रचनाकार स्वयं ही पुरस्कार पाने के लिए तमाम तरह के कवायदों में जुट जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि रचनाकार जब आम जनता के दुःख दर्द और समय के विडंबनाओं की बात करता है तो वस्तुत वह खुद ही विपक्ष की भूमिका में खड़ा हो जाता है। हमारा हिन्दी समाज भी प्रायः उन्हीं लेखकों के लेखन पर गौर करता है जो किसी न किसी पुरस्कार से सम्मानित होते हैं। यह अलग बात है कि बात तो रचना केंद्रित ही होनी चाहिए। कुछ रचनाकार अपवाद भी हैं।लेकिन ऐसे बहुत कम हैं। शायद ही कोई पुरस्कार हो जो अब निर्विवाद हो। रचनाकार भी पुरस्कारों का लोभ छोड़ने का साहस दिखा नहीं पाते। हाल ही में बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा कवि विमल कुमार को चार लाख रुपए का दिनकर सम्मान देने की घोषणा की। लेकिन विमल कुमार ने विनम्रतापूर्वक यह सम्मान लेने से मना कर दिया। हमारे यहां ऐसा साहस बिरले रचनाकार ही द...