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विमल कुमार से बातचीत

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  विमल कुमार  हर रचनाकार यह चाहता है कि उसको सम्मान और प्रतिष्ठा मिले। इस क्रम में  रचनाकार के अवदान को रेखांकित करने के लिए  पुरस्कार देने की परम्परा शुरू की गई। लेकिन पुरस्कारों का तो अपना अलग ही गुणा  गणित होता है। अब तो रचनाकार स्वयं ही पुरस्कार पाने के लिए तमाम तरह के कवायदों में जुट जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि रचनाकार जब आम जनता के दुःख दर्द और समय के विडंबनाओं की बात करता है तो वस्तुत वह खुद ही विपक्ष की भूमिका में खड़ा हो जाता है। हमारा हिन्दी समाज भी प्रायः उन्हीं लेखकों के लेखन पर गौर करता है जो किसी न किसी पुरस्कार से सम्मानित होते हैं। यह अलग बात है कि बात तो रचना केंद्रित ही होनी चाहिए। कुछ रचनाकार अपवाद भी हैं।लेकिन ऐसे बहुत कम हैं। शायद ही कोई पुरस्कार हो जो अब निर्विवाद हो। रचनाकार भी पुरस्कारों का लोभ छोड़ने का साहस दिखा नहीं पाते। हाल ही में बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा कवि विमल कुमार को चार लाख रुपए का दिनकर सम्मान देने की घोषणा की। लेकिन विमल कुमार ने विनम्रतापूर्वक यह सम्मान लेने से मना कर दिया। हमारे यहां ऐसा साहस बिरले रचनाकार ही द...

विमल कुमार की रपट 'क्या हिंदी साहित्य का भविष्य युवाओं के हाथ में है?'

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  कृष्णा सोबती का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर देश भर में कार्यक्रमों के आयोजन का सिलसिला आरम्भ हो गया है। इस क्रम में एक महत्त्वपूर्ण आयोजन रज़ा न्यास द्वारा किया गया।हिन्दी के युवा लेखकों को प्रेरित, प्रोत्साहित करने के लिए रजा न्यास 'युवा' नामक कार्यक्रम का प्रतिवर्ष आयोजन करता है। इस कार्यक्रम की एक रपट कवि आलोचक विमल कुमार ने हमें उपलब्ध कराई है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  विमल कुमार की रपट 'क्या हिंदी साहित्य का भविष्य युवाओं के हाथ में है?' 'क्या हिंदी साहित्य का भविष्य युवाओं के हाथ में है?' विमल कुमार 21 वीं सदी की एक चौथाई बीत गयी है। साहित्य के लिए 25 साल कम नहीं होते। बीसवीं सदी के प्रथम 25 वर्षों को याद करें तो आपको हिंदी नवजागरण का दूसरा चरण याद आएगा जब महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1903 में 'सरस्वती' पत्रिका निकाली और लेखकों का एक समूह सामने आया। चाहे बाल मुकुंद गुप्त हों,  मैथिली शरण गुप्त हों, प्रेमचन्द, गुलेरी, रामचन्द्र शुक्ल, राजबाला घोष, गणेश शंकर विद्यार्थी, विशम्भर नाथ शर्मा कौशिक, जयशंकर  प्रसाद, निराला, पंत, सुदर्शन, राज...

विमल कुमार का आलेख 'राष्ट्रनिर्माण में तवायफ़ गायिकाओं की भूमिका'

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  किसी भी राष्ट्र के अपने विविध आयाम होते हैं। भौगोलिकता भले ही नक्शे पर एक राष्ट्र को प्रदर्शित कर देती है लेकिन उसकी निर्मिति में साहित्य, संस्कृति के साथ साथ कई नाम और अनाम लोगों का भी बड़ा हाथ होता है। तवायफ का नाम सुनते ही हमारे मन मस्तिष्क में एक वितृष्णा का भाव सहज रूप से जन्म ले लेता है लेकिन एक पल ठहर कर जब हम उन परिस्थितियों की तहकीकात करते हैं तब सिहरन ही नहीं होती अपितु अपने समय और समाज की संवेदना पर भी कोफ़्त होती है। गीत संगीत के उदय और विकास में इन तवायफों की एक बड़ी भूमिका रही है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की किताब 'वैशाली की नगर वधू' से भला कौन परिचित नहीं होगा। इस कड़ी में कई और रचनाएं भी दिखाई पड़ती हैं। इधर अब इन तवायफों की राष्ट्र निर्माण में भूमिकाओं के बारे में हुए शोध से कई नई एवम महत्त्वपूर्ण बातें सामने आ रही हैं। इतिहासकार  बेंगलुरु के विक्रम संपत ने 'गौहर जान : लाइफ एण्ड टाइम्स ऑफ ए म्यूजिशियन' नामक एक शोधपरक किताब लिखी है जो न केवल गौहर जान की एक सुंदर जीवनी है बल्कि जिससे इतिहास के कई अधूरे पहलुओं के बारे में भी जानकारी...