ममता कालिया के साथ अनुज की एक बातचीत
ममता कालिया के साथ बात करते हुए अनुज साहित्य लेखन कल्पनाजनित होते हुए भी काफी कुछ अनुभवजनित होता है। यह अनुभव व्यक्तिगत होते हुए भी तमाम ऐसी भूमिकाएँ समेटे हुए होता है कि पाठक को उसमें अपना जीवन संघर्ष दिखाई देने लगता है। ममता कालिया का एक उपन्यास है 'दौड़'। यह हमारे समय, समाज और संस्कृति को इस तरह बयां करता है कि हमारा वर्तमान दृश्यमान हो उठता है। हमारा यह समय भी तो आपाधापी का ही है। यह आपाधापी इस तरह की है कि इसमें अपनों तक के लिए कोई जगह नहीं है। यह उपन्यास कॉर्पोरेट जगत की उस बेरहमी और निष्ठुरता को उद्घाटित करता है जिसमें मनुष्यता के लिए कोई जगह ही नहीं है। आप जब तक दौड़ में हैं जिन्दा हैं। दौड़ से बाहर होते ही आप दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंके जाते हैं। इसकी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए ममता जी बताती हैं 'मेरे बेटे अनु ने जब एमबीए किया और जॉब शुरू की, तो वह अपने अनुभव बताता था। उसने 25 नौकरियाँ बदलीं। वह कहता था कि कॉर्पोरेट जगत में अगर जहाज डूबने वाला हो, तो सबसे पहले वह छोड़ना चाहिए। कॉर्पोरेट संस्कृति बहुत 'कट-थ्रोट' है। वहाँ कोई किसी का सगा नहीं है। वही...