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ममता कालिया के साथ अनुज की एक बातचीत

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  ममता कालिया के साथ बात करते हुए अनुज साहित्य लेखन कल्पनाजनित होते हुए भी काफी कुछ अनुभवजनित होता है। यह अनुभव व्यक्तिगत होते हुए भी तमाम ऐसी भूमिकाएँ समेटे हुए होता है कि पाठक को उसमें अपना जीवन संघर्ष दिखाई देने लगता है। ममता कालिया का एक उपन्यास है 'दौड़'। यह हमारे समय, समाज और संस्कृति को इस तरह बयां करता है कि हमारा वर्तमान दृश्यमान हो उठता है। हमारा यह समय भी तो आपाधापी का ही है। यह आपाधापी इस तरह की है कि इसमें अपनों तक के लिए कोई जगह नहीं है। यह उपन्यास कॉर्पोरेट जगत की उस बेरहमी और निष्ठुरता को उद्घाटित करता है जिसमें मनुष्यता के लिए कोई जगह ही नहीं है। आप जब तक दौड़ में हैं जिन्दा हैं। दौड़ से बाहर होते ही आप दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंके जाते हैं। इसकी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए ममता जी बताती हैं 'मेरे बेटे अनु ने जब एमबीए किया और जॉब शुरू की, तो वह अपने अनुभव बताता था। उसने 25 नौकरियाँ बदलीं। वह कहता था कि कॉर्पोरेट जगत में अगर जहाज डूबने वाला हो, तो सबसे पहले वह छोड़ना चाहिए। कॉर्पोरेट संस्कृति बहुत 'कट-थ्रोट' है। वहाँ कोई किसी का सगा नहीं है। वही...

जीवन की धूल फांकने से बनता है लेखक - ममता कालिया

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किसी भी लेखक का लेखन तमाम आयाम लिए हुए होता है। उसमें अनुभव की भूमिका प्रमुख होती है। अनुभव का कोई विकल्प भी नहीं होता। यह उम्र बीतने के साथ संघर्षों के क्रम में ही प्राप्त होता है। लेखक के अनुभव उन युवाओं के लिए प्रेरक साबित होते हैं जो लेखन की दुनिया में कुछ करने की लालसा लिए होते हैं। ममता कालिया हमारे समय की वरिष्ठतम लेखिका हैं। हाल ही में उनको हिन्दी के लिए साहित्य अकादमी सम्मान प्रदान किया गया। हिन्दू कालेज के हिंदी विभाग के वार्षिकोत्सव 'अभिधा 2026' में ममता जी ने 'लेखक से भेंट' कार्यक्रम में ममता जी ने अपने लेखन के सफर का प्रारंभिक विवरण साझा किया। इस क्रम में कालिया ने युवाओं को अज्ञेय की मानक भाषा, जिसमें तत्सम शब्दों के साथ तर्क एवं अर्थ दोनों जीवन में खोल देते हैं, का अध्ययन करने को कहा। लेखन के लिए उन्होंने अनुभव, अनुभूति एवं कल्पना का सहारा लेने पर बल दिया। डायरी लेखन को लेखन की ओर आसानी से बढ़ने का साधन बताया क्योंकि डायरी में कभी-कभी ऐसे सुबोध वाक्य लिख जाते हैं जो आगे चल कर बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं।  इस अवसर की एक रपट हमें लिख भेजी है  कैलाश सिंह र...

मार्कण्डेय जी के बारे में ममता कालिया से शालिनी बाजपेयी की बातचीत

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कथाकार मार्कण्डेय का अपना एक अलग सादगी भरा व्यक्तित्व था। सही मायनों में वे एक रचनाकार थे। उनमें संवेदनशीलता के साथ साथ सहृदयता भी थी। उनका अपना एक पाठक वर्ग था। रचनाकारों खासकर नयी पीढी के साथ वे सहज ही अपना तादात्म्य स्थापित कर लेते थे। 'कथा' पत्रिका का सम्पादन करते हुए अनेक रचनाकारों को सामने लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य मार्कण्डेय जी ने किया। जब भी कथा के किसी नए अंक को लाने की योजना बनती, वे कुछ रचनाकारों का नाम चयनित कर लेते। उनमें ममता कालिया का नाम आवश्यक रूप से शामिल होता। ममता जी भी मार्कण्डेय जी के लेखन की मुरीद हुआ करतीं। मार्कण्डेय जी का कथा के लिए लिखने का आग्रह इतना अपनत्व और साधिकार भरा होता कि कोई भी इंकार नहीं कर पाता। पिछले वर्ष 'कथा' के मार्कण्डेय अंक का अतिथि सम्पादन कवि बसंत त्रिपाठी ने किया था। इस अंक में मार्कण्डेय जी के बारे में शालिनी बाजपेई ने ममता कालिया से एक विशेष बातचीत की थी। मार्कण्डेय जी की पुण्यतिथि पर विशेष आयोजन के क्रम में आज हम इस बातचीत को प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने कथा के मार्कण्डेय अंक से साभार लिया है। तो आइए आज पहली बार पर हम...

यश मालवीय की टिप्पणी 'पंचमी के चाँद की तरह ही रोशन यादों का चिराग'

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  इलाहाबाद इसलिए आज भी एक जीवन्त शहर है क्योंकि यह मूलतः रचनाकारों का शहर है। रचनाओं में इसकी धड़कन को सहज ही महसूस किया जा सकता है।  एक से बढ़ कर एक नायाब रचनाकारों के तोहफे इस शहर ने समय समय पर दिए हैं। इनमें कई रचनाकार ऐसे हुए हैं जिन्हें पुरस्कार मिलना चाहिए था। नहीं मिला तो भी ये रचनाकार अपनी रचनाओं के बूते जिन्दा हैं। ये ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें पुरस्कृत कर कोई भी सम्मान खुद गौरवान्वित महसूस करता और गरिमा से भर जाता।  इन्हीं इलाहाबादी रचनाकारों की कड़ी में एक  नायाब नाम ममता कालिया का है।  ममता कालिया को आखिरकार साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल ही गया। यह पुरस्कार उन्हें काफी पहले मिल जाना चाहिए था लेकिन जोड़ तोड़ के जमाने में जब पुरस्कार अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं, साहित्य अकादमी सम्मान ने उनसे मिल कर अपना ही मान बढ़ाया है। ममता कालिया और इलाहाबाद एक सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। एक के बिना दूसरे का वजूद ही नहीं। शारीरिक तौर पर आज वे भले ही नोएडा में रहती हों, मन तो उनका पल पल इलाहाबाद में ही रमता है। वे आज भी उतनी ही इलाहाबादी हैं जितना रानीमंडी या मेंहदौरी क...