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शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य रचता मैला आंचल'

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फणीश्वर नाथ रेणु  भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समवेत भारतीय जन के संघर्ष की कहानी रही है। इस संग्राम में सभी वर्गों ने अपनी भूमिका अपने अंदाज में निभाई। मजदूरों किसानों की भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन सबको मिला कर ही भारत माता की वास्तविक तस्वीर साकार होती है। फणीश्वर नाथ रेणु अपने उपन्यास मैला आंचल में भारत माता के उस तस्वीर को सामने रखते हैं जिसके बारे में हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सोचा तक नहीं था। शिवदयाल लिखते हैं कि "रेणु के कथा साहित्य के मूल में भूमि है। मैला आंचल में भी रेणु जी भूमि की अवस्थिति, भूगोल, उसकी जैविक संपन्नता और मनुज समाज का ऐसा समग्र चित्र खींचते हैं कि मानो उसका भी मानवीकरण कर देते हैं। कहीं-कहीं इस कोशिश में मनोहरी भू-दृश्य भी उपस्थित करते हैं। ऐसी धरती के प्रति अगाध प्रेम उपजता है जिसका मोह छुड़ाए नहीं छूटता।" मिट्टी से मनुष्य का प्रेम पुरातन है जिसे रेणु जी अपने इस उपन्यास में पुनर्रचित करते हैं। आज रेणु जी की पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य ...

शिवदयाल का आलेख 'जीवन में नयी अर्थवत्ता की खोज'

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  फणीश्वर नाथ रेणु  हिन्दी साहित्य में फणीश्वर नाथ रेणु अपने किस्म के अलग कहानीकार हैं। मौलिकता उनकी रचनाओं का प्राण तत्त्व रहा है। यह मौलिकता उनकी कहानियों के कथ्य से ले कर भाषा एवम शैली तक में सहज ही देखी जा सकती है। उनके बारे में शिव दयाल उचित ही कहते हैं कि 'वे अपने पात्रों को जमीन से जस का तस उठाते हैं उनकी कमियों और खूबियों के साथ, और मनकों की तरह कथा में पिरो देते हैं - अपने समय के सच को उद्घाटित करने के लिए।' 3 फरवरी को उनका जन्मदिन था। उनके जन्मदिन पर कल हमने कुमार वीरेन्द्र का आलेख प्रस्तुत किया था। आज उसी कड़ी में प्रस्तुत है शिवदयाल का  आलेख 'जीवन में नयी अर्थवत्ता की खोज'। एक आदिम रात्रि की महक ... 'जीवन में नयी अर्थवत्ता की खोज'                                    शिवदयाल      रेणु की मौलिकता की खूब चर्चा होती है। उनकी मौलिकता की थाह लेने के लिए शायद उन्हें कभी प्रेमचंद तो कभी बांग्ला कथा-परम्परा से जोड़ने की कोशिश की जाती है, और इस पर विवाद भी खूब होता रहा...

कुमार वीरेन्द्र का आलेख 'पतियाइए कि रेणु इलाहाबाद में रहे थे'

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  1921 में फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मशताब्दी वर्ष पूरे देश में मनाया गया। कई पत्रिकाओं ने रेणु जी पर अपने महत्त्वपूर्ण अंक प्रकाशित किए। अकादमिक जगत में भी रेणु जी की रचनाधर्मिता पर तमाम चर्चाएं आयोजित की गईं। इलाहाबाद तब साहित्य का गढ़ माना जाता था। इस इलाहाबाद से भी रेणु का अपना एक खास रिश्ता था। कुछ समय उन्होंने इलाहाबाद में भी बताया था। रेणु के इलाहाबादी जुड़ाव पर एक शोधपरक नजर डाली है युवा आलोचक कुमार वीरेन्द्र ने। कल रेणु जी का जन्मदिन था। हम पहली बार की तरफ से उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आज कुमार वीरेन्द्र का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं कुमार वीरेन्द्र का आलेख 'पतियाइए कि रेणु इलाहाबाद में रहे थे'। 'पतियाइए कि रेणु इलाहाबाद में रहे थे'                             कुमार वीरेन्द्र कुछ लोग कुछ दिनों के लिए कुछ जगहों पर कुछ-कुछ ऐसे रहते-बसते हैं कि वे जगहें और उनका बहुत कुछ उन प्रवासियों को बेचैन किए रहती हैं। यह बेचैनी जीवन भर अंदर-अंदर धधकती-भभकती रहती है।...