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अनिता गोपेश के उपन्यास ‘कुंजगली नहिं सांकरी’ का एक अंश

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  अनिता गोपेश   स्त्री पुरूष समानता का आदर्श अब तक एक सपने सरीखा ही रहा है। पितृ सत्ता हमारे समाज के जड़ में कुछ इस तरह फैली हुई है कि इस अवधारणा के समर्थक भी अक्सर घर के अन्दर अपने पुरुष रूप में पाए जाते हैं। स्त्री जो प्रायः हर बात के लिए दोषी ठहरा दी जाती है , करे भी तो क्या। वह अपने जीवन में लगातार धोखा खाने , अपमान सहने के लिए , जैसे अभिशप्त होती है। यही नहीं , अगर स्त्री अपने इच्छानुसार अपना जीवन जीने का कदम उठाती है , तो यह भी दुनिया को सहन नहीं हो पाता। कुछ ऐसे ही परिवेश को समेटते अनिता गोपेश का उपन्यास ' कुंजगली नहिं साँकरी ' हाल ही में ‘ लोकभारती प्रकाशन , इलाहाबाद ’ से आया है। अनिता गोपेश का यह उपन्यास उस बनारस पर केन्द्रित है   जो अपने अलबेलेपन के लिए ख्यात है। कुंजगली केवल वृंदावन में ही नहीं होती , बल्कि यह बनारस में भी हो सकती है। अनिता इसी मौलिक सोच और भावभूमि पर आगे बढ़ते हुए एक ऐसी आदर्श स्थिति की परिकल्पना करती हैं , जो हाल फिलहाल यूटोपिया जैसा ही लगता है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है अनिता गोपेश के उपन्यास ' कुंजगली नहिं साँकरी ' का एक अंश...