इस्मत चुग़ताई की कहानी 'जड़ें'
इस्मत चुग़ताई किसी भी पेड़ का तना, डालियां, पत्तियां, फूल और फल अपनी जड़ों को कहां भूल पाते हैं। जड़ों से ही उनके अस्तित्व की तस्वीर बनती है। लेकिन भारत के विभाजन के समय सब कुछ बेमानी हो गया। लोग अपनी जड़ों को छोड़ कर ऐसे मुल्क की तरफ निकल पड़े, जो कहने के लिए तो उनका था, लेकिन विडंबना की बात यह कि वहां उनको जानने पहचानने वाला कोई नहीं था। विश्व इतिहास का सबसे भयावह खून खराबा हुआ और एक नया मुल्क पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर नुमाया हुआ। कहते हैं इतिहास जहां चुप्पी साध लेता है, साहित्य वहां से आगे बोलना शुरू कर देता है। भारत विभाजन के वे वाकए जो इतिहास में दर्ज नहीं हो पाए, वे साहित्य में दर्ज हैं। इस्मत चुग़ताई की कहानी जड़ें बेजोड़ कहानी है जिसमें बंटवारे की अनुगूंज स्पष्ट सुनी जा सकती है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं इस्मत चुग़ताई की कहानी 'जड़ें'। 'जड़ें' इस्मत चुग़ताई सब के चेहरे फ़क़ थे घर में खाना भी न पका था। आज छठां रोज़ था। बच्चे स्कूल छोड़े घरों में बैठे अपनी और सारे घर वालों की ज़िंदगी वबाल किए दे रहे थे। वही मार-कुटाई, धौल-धप्पा, वही उधम और क़लाबाज़ियाँ जैसे 15 ...