विमलेश त्रिपाठी की कहानी 'पर्दा'
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| विमलेश त्रिपाठी |
एक ही स्थिति परिस्थिति के बारे में अलग अलग लोगों का दृष्टिकोण अलग अलग होता है। यह मत विभिन्नता मनुष्य जाति की खास पहचान है। इसी से वाद विवाद संवाद की परिस्थितियां पैदा होती हैं। साहित्य इसे रेखांकित करने का काम करता है। विमलेश त्रिपाठी हमारे समय के सुपरिचित कहानीकार हैं। अपनी कहानी पर्दा में वे अस्पताल के बोझिल वातावरण में जीवन के वैचारिक टिक टिक को रेखांकित करते हैं जो दिमाग की घड़ी में हर पल उमड़ता घुमड़ता रहता है। विमलेश लिखते हैं 'वह बोतल में बंद जिन्न की तरह महसूस करती है कि उसे नाविक नहीं बचा पाएगा या समुद्र उसे नहीं ले जाएगा। उसकी इच्छाएँ धीरे-धीरे जीवित रहने से मृत्यु की ओर स्थानांतरित होती जातीं और फिर बस जीवन काट लेने भर पर टिक जातीं। जीने के अर्थ के बारे में कोई सवाल नहीं, ईश्वर से भी कोई संकेत नहीं, अनुभव में लिपटे दर्द में छिपा कोई संदेश भी नहीं। बस किनारे से जीवन को देखने वाले किसी व्यक्ति का अस्तित्व। वह अपने किनारे के दृश्य को उन डेली सोप धारावाहिक से भरती है, जिन्हें वह देखती है, एक खत्म करती है और दूसरा शुरू करती है। वह डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों या परिवार के सदस्यों के दौरे के कारण दृश्य और पूरे एपिसोड मिस कर देती है। साथ ही अस्पताल में अचानक होने वाली मौतें उसे कुछ पलों के लिए झकझोर देती हैं और उसे कई दिनों तक सोने के लिए मजबूर कर देती हैं।' अस्पताल का जीवन इतना बोझिल होता है कि एक समय बाद हम उस जीवन से मुक्ति की कामना ही करने लगते हैं जो इस सारी सोच के मूल में है। इस कहानी को हमने रचना समय के कहानी महाविशेषांक से साभार लिया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विमलेश त्रिपाठी की कहानी 'पर्दा'।
कहानी
पर्दा
विमलेश त्रिपाठी
इस कमरे में जीवन के सारे रेशे उलझे हुए हैं। सारे हवाओं के द्वार बंद कर दिये गये हैं। सांस तक लेना मुश्किल हो रहा है। मौत की ऐसी गंध है जिसे अनदेखा करना संभव नहीं है। मिलने के लिए आने वाले आगंतुक इससे एक बार घबरा जाते हैं। सिवाय उस आगंतुक के जिसकी नसें कमरे के दूसरे छोर पर लेटी उस महिला से हर हफ़्ते मिलने की थकान से तन गई हैं – वह जब भी आता है, आधे घंटे से कम समय में ही ऊब और खालीपन से भर जाता है।
दीवार पर एक टीवी लटकी हुई है। स्क्रीन पर कल से ही बॉडी बिल्डरों-से दिखने वाले पुरुष उछल-कूद करते रहे हैं और अब ऑब्स्टकल रेस में भाग ले रही महिलाएँ हैं। वे ऊँची-ऊँची छलांगें लगाती हैं लेकिन उनकी कोई हड्डी नहीं टूटती। कमरे के एक तरफ़, बाईं और दाईं ओर दो आँखें घूम रही हैं उनके सामने देखने के लिए सफ़ेद दीवार के अलावा कुछ नहीं है। दूसरी तरफ़, स्क्रीन पर नज़र रखने वाली एक और जोड़ी आँख डेलीसोप का इंतज़ार कर रही हैं और रिमोट कंट्रोल के बटन दबाने की हर कोशिश के साथ ही दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं।
इतने सारे बटन हैं और इतने सारे हाथ जो उन्हें दबाते हैं।
उसे यह सोच कर एक मद्धिम-सा मज़ा जरूर आता है कि उस टीवी के साथ उसकी बहुत सारी समानताएँ हैं। जैसे एक तो यही कि दोनों के लिए ही बटन दबाने वाले हाथ कम नहीं है। बटन दबा कर वह बिस्तर को ऊपर उठाती है, नीचे करती है, भोजन देने वाली नली से भोजन का पेस्ट निचोड़ती है। रिमोट की देह पर चमकता एक हरा बटन कभी-कभी उसे प्रकाश और जीवन की झलक दिखाता है - कृतज्ञता के लिए एक ही जगह। वह भी तब तक जब तक कि उसकी चमक धीमी गति से चलने वाली उस नर्स द्वारा अवरुद्ध नहीं हो जाती है।
उस नर्स को इतना समय क्यों लग रहा है? धिक्कार है! वह इतनी धीमी कैसे हो सकती है? जब धारावाहिक शुरू होने वाला होता है तभी उसे मुझे नहलाने की फुरसत क्यों मिलती है? बीस मिनट से वह अपने साथी को कल रात की पार्टी के बारे में बता रही है। उसने क्या खाया और क्या नहीं खाया। किसने खुले कपड़े पहने थे और किसने संत की तरह। और मुझे उसकी यह अनरगल बात सुननी पड़ती है और उसके थूक को अपने चेहरे पर सहना पड़ता है और उसके भारी हाथ से उसे पोंछने को कहना पड़ता है। मैं चाहती हूँ कि वह मेरे चेहरे को एक बार भी न देखे जबकि वह इसे आटे की तरह गूंथ रही है। मेरा सबसे बड़ा डर कि मैं शो का एक और दृश्य मिस करने वाली हूँ। यह मेरे लिए जीवन को देखने की एक मात्र बची हुई खिड़की है और वह कुतिया मुझे वह भी नहीं करने देगी।
वह अभी भी अपने विशाल शरीर और गोल पेट के साथ स्क्रीन के दृश्य अवरुद्ध कर रही है। क्या उसने कुछ वजन कम किया है? शायद हाँ या शायद ना भी। पता नहीं, पर उसका नितंब अभी भी बहुत बड़ा है। चलो अब भगवान के लिए अपना भारी नितंब तो हटाओ मैं बड़े पिछवाड़े को पसंद नही करती – मुझे बहुत तेज गुस्सा आ रहा है। अगर मेरे पैर मेरी बात मानते, तो मैं उसके पीछे बहुत जोर से लात मार देती। भगवान की कसम!
दूसरी तरफ, उस आदमी को हमेशा से ही बड़े नितंब पसंद थे। वही जो हर हफ्ते एक आगंतुक की तरह आता है और निराश-थके कदमों से वापिस लौट जाता है। मुझे यकीन है कि उसे अब भी पसंद है। इसमें क्या ही बदलाव हुआ होगा।
बड़े नितंब हों या न हों, उसके बिस्तर के दाईं ओर की बड़ी खिड़की से स्क्रीन के एक बड़े हिस्से को अस्पष्ट कर देने के लिए पर्याप्त रोशनी आती है। उसे नहीं पता कि उस खिड़की के बाहर क्या है, लेकिन उसे लगता है कि यह सुंदर होना चाहिए। सुबह की कोमल आवाज़ें उसे यह बताती हैं। सबसे अधिक संभावना किसी छिपे हुए बगीचे की है जिसके आँचल में बहुत सारे प्रेमियों और एकांत चाहने वालों की कहानियाँ हैं। पर्दे भी तो इसी का संकेत देते हैं, क्योंकि वे विभिन्न रंगों और आकारों की तितलियों से सजे हैं। परदे पर झूलती हुईं मृत तितलियाँ अपने-अपने बिस्तरों में असहाय पड़ी हुई महिलाओं को सांत्वना देती हैं।
मसलन इस कमरे में दो दीर्घकालिक रोगी हैं। उसके अलावा छोटी उम्र की एक और महिला है जिसका चेहरा देखने के लिए वह मुड़ तक नहीं सकती। कभी-कभी जब कोई आलसी नर्स लापरवाही से उसके बिस्तर के कवर को मोड़ती है तो वह अपनी आँखों के सबसे किनारे कोने से उस महिला के पीले पैर की उंगलियों की एक झलक भर देखती है। ऐसा लगता है कि वे उसकी देह से एकदम अलग हैं।
अब वह कछुए की तरह अपनी पीठ पर लेटी हुई है कि पता नहीं शायद कभी उठे ही नहीं।
अपने पैरों की उंगलियों को छुए हुए उसे कई साल हो गए हैं। काश उसे पता होता कि वे कितनी ठंडी हैं।
कई साल हो गए हैं और वह अब भी इतनी मरी नहीं है कि उसे दफना दिया जाए और ज़िंदा लोगों की दुनिया से निकाल फेंका जाए। हालाँकि वह उसकी नाक में लगी नली से निकाले जा रहे बलगम से मौत की खड़खड़ाहट सुनती है। वह शिद्दत से चाहती है कि आलसी और अपने काम से बोर हो चुकी नर्सों में से कोई एक उत्साह का संचार करे ताकि सामने खड़ी वह मोटी और भारी नर्स जल्दी-जल्दी काम कर के निकल जाए और स्क्रीन के सामने खड़ी ना हो। लेकिन वे सभी की सभी उस औरत को एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ घुमाने और उसके स्राव को साफ करने के लिए अपना अदम्य साहस बचाए रखती हैं, जिस तरह से उन्होंने नर्सिंग स्कूल में बेजान पुतलों पर अभ्यास किया होगा।
पाँच या उससे कम या अधिक। मसलन कई साल से उसे नर्सों और डॉक्टरों के निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया है। अब तक उसके पास आधी नर्सिंग की डिग्री, आधी डॉक्टर की डिग्री और अपने रोग के निदान की एक सटीक और दुर्लभ समझ आ गई है।
यह एक दुर्लभ वायरस था जिसने एक सुबह उसे जकड़ लिया और उसे मौत की खाई के किनारे पर खींच कर ले आया, फिर उसे वहीं लटका कर छोड़ गया। सांस लेने के लिए वेंटिलेटर, गले में छेद, फीडिंग ट्यूब और बिस्तर पर बहुत कुछ जरूरी न होने के बावजूद भी उसे एक दोस्ताना आवाज़ सुनाई देती है जो उसकी बेबसी पर तरस खाती है।
उसका दिल अभी भी धड़क रहा है। लेकिन उसका दिमाग अपना कोई भी काम ठीक-ठीक करने से इनकार कर चुका है।
“अपरिवर्तनीय क्षति” - यह शब्द उसे अब हँसाता है। उसे याद है कि उसने कितनी ही बार अपने बच्चों से कहा था कि हर चीज को ठीक किया जा सकता है: मसलन उनके खिलौने जो कमरे में बिखरे हुए हैं, उनके बहुत खराब ग्रेड जो अच्छे हो सकते हैं, उनके खराब बाल जिन्हें करीने से कटवाया जा सकता है और धूप में यूँ ही आवारों की तरह घूमने से खुद को रोका जा सकता है।
लेकिन बेकार हो गए अंगों के बारे में उसे कभी भी पता नहीं था क्योंकि वह मधुमक्खी की तरह उन्हीं लोगों के बीच घूमती रहती थी और प्रत्येक दिन के अंत में उन्हीं में से एक अपने पति के बगल में गिर जाती थी और वह था कि हमेशा अपनी मर्दांगी के चरम पर ही रहता था।
वह सुनती है और देखती है और याद रखती है और भूल जाती है। वह सवालों को लटका कर छोड़ देती है। दूसरे लोग जो उसके अतीत और स्थिर वर्तमान के बारे में जानते हैं, उन्हीं के आधार पर उसकी ओर से उत्तर देते हैं। यही प्रायः होता है स्थिर और अविकल।
वह कल भी और एक साल पहले भी पाँच साल पहले जैसी ही थी। वह वैसी ही रहेगी, जब तक कि कोई किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना न छोड़ दे। लेकिन व्यक्तिगत रूप से वह चिकित्सा सांख्यिकी में विश्वास करती है। वह खुद को इस बात से कभी विचलित नहीं होने देती कि स्वर्ग में ऊपर वाला क्या सोच रहा है या क्या नहीं। लेकिन वह किसी को चमत्कारों पर विश्वास करने के अधिकार से वंचित नहीं करेगी।
बिस्तर के पास खड़ा डॉक्टर उसके पति से बात करता है, हल्के से हंसता है, अपनी लिखी हुई बातों को उसकी फाइल में लिखता है, एक युवा नर्स को चिकोटी काटता है और दूसरी एक को आँख मारता है। वह नर्सों को परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ता। खास तौर पर मोटी और नई नर्सों को। वे शायद ही कभी आपत्ति जताती हैं।
लेकिन जब उसकी बारी आती है तो वह उसकी प्रतिक्रिया को परखने के लिए सिर्फ दो बार उसके गाल पर चिकोटी काटता है।
एक और मेडिकल आँकड़ा। बस।
सालों से उसका पति चमत्कार का इंतज़ार कर रहा है। वह चाहता तो उस बोरियत से समझौता कर लेता जो दस साल की शादी और तीन बच्चों के बाद उन दोनों के जीवन में घुसने लगी थी लेकिन वह उसके शरीर में कुछ ऐसा ढूँढ़ता रहता जिससे वह उत्तेजित हो सके, जबकि वह हर सुबह अपने स्त्रीत्व को रसोई की शेल्फ पर रख देती और दिन भर के कामों में व्यस्त रहते हुए उसे वहीं छोड़ कर भूल जाती।
दिन के कभी न खत्म होने वाले काम और थकी हुई देह को जम्हाई लेती हुई वह बिस्तर पर खींच ले जाती और अपने बगल में लेटे हुए आदमी और बच्चों को अपने दिन भर के संघर्षों के बारे में बताते हुए सो जाती। जबकि उसका पति सुंदर पड़ोसी महिलाओं या बड़े नितंबो वाली किसी विधवा की सस्ती कामुक कल्पना में खो जाता।
वह बार-बार अपने असीम प्रेम की याद दिलाता और उस याद को थामे रखने का एक तरीका भी खोज ही लेता कि कैसे उसने सबको एक साथ रखा और एक शांत पोखर की तरह विवाह के बंधन को निभाया। वह निस्संदेह कुछ अधिक सहानुभूति के साथ काम करता और बच्चों के बारे में उसकी बातें सुनता। कुछ भी इतना अच्छा तो होता कि जीवन की एकरसता में थोड़ी जीवंतता बची होती न कि इस कमरे में हर समय मौत की एक निराश और और दमघोंटू गंध फैली रहती।
एक हफ़्ते पहले, उसकी आँखों ने एक और चमत्कार देखा। वह तब तक नकारती रही जब तक कि उसने इसे छिपाने की जरूरत नहीं समझी।
"मैं थक गया हूँ," उसके पति ने कहा।
"बहुत थक गया हूँ मैं। अब और नहीं सह सकता। तुम इस दुनिया को क्यों नहीं छोड़ देती? चुपचाप यहाँ लेटी हुई हो। कोई भी फर्क नहीं पड़ेगा। मैं भी तुम्हारी तरह मौत और मौत के बीच झूल रहा हूँ और यह ठीक नहीं है। कुछ भी पहले जैसा नहीं है। अब तुम बिल्कुल भी अपनी जैसी नहीं दिखती।"
उसके बच्चे भी अब उसे नहीं पहचानते, कमीने! वे उसके चेहरे की ओर क्यों नहीं देखते? उसे उनकी आँखें याद आती हैं, जब वे उसे अपने दिन भर की शैतानियों के बारे में बताते तो कैसी चमक उठती थीं।
उसे छोटी इला की गंध याद आती है। आह! वह अपनी छोटी उंगलियों से उसके चेहरे को छूती थी, उसके हर इंच को चूमती थी। अब वह हमेशा अपने साथ लाए हुए स्केचपैड पर तितलियाँ बनाने में इतनी व्यस्त रहती है कि कभी उसके चेहरे की ओर नहीं देखती। कभी-कभी वह उसके पैरों की उंगलियों पर ध्यान देती है; वह उन्हें ऐसे गुदगुदाती जैसे वे उसकी नहीं हैं। काश वह उसके पैरों की उंगलियों को सूँघ पाती। या उन्हें काट पाती! हे भगवान, वह कितनी बड़ी हो गई है!
“तुम्हारे बच्चे तुम्हारा नाम मुश्किल से याद रखते हैं। मैं उन्हें महीने में एक बार यहाँ खींच कर लाता हूँ। हाँ, उन्हें खींच कर लाता हूँ! क्या तुम्हें पता है कि उन्हें अपने साथ आने के लिए राजी करना मेरे लिए कितना मुश्किल है? ‘तुम्हारी माँ से मिलने के लिए सिर्फ़ पंद्रह मिनट’, मैं कहता हूँ! उनकी आँखें मेरा मज़ाक उड़ाती हैं। ‘हमारी माँ? लाश की तरह पीठ के बल सो रही वह महिला इतिहास की किताबों में दर्ज़ है।’ यही उनकी आँखें मुझे बताती हैं। और मैं समझे बिना नहीं रह पाता। गुज़रते दिन तुम्हारी यादों को मिटा रहे हैं। वे अब पहले जैसे छोटे बच्चे नहीं रहे। अब तुम उनके बारे में क्या जानती हो? तुम उनके पहले प्यार, उनके ग्रेजुएशन या उनकी शादी में कभी नहीं रहोगी। यह एक सच्चाई है। मैं क्रूर नहीं हो रहा हूँ। मैं बस थक गया हूँ। बहुत थक गया हूँ।”
पति की आवाज में बेबसी और चिड़चिड़ापन है वह उत्तर खोजती हुई बड़बड़ाती है :
“और तुम? तुम उनके बारे में क्या जानते हो? क्या तुम वाकई उनकी आँखों की भाषा को उसी तरह समझते हो जैसे मैं समझती हूँ? क्या तुम जानते हो कि उनमें से प्रत्येक को अपने खाने में कितना नमक पसंद है? रौनक को अपने खाने के ठंडा होने का इंतज़ार करना पसंद है, रोहित को साफ़ कांच की प्लेट में खाना पसंद है और इला को सफेद प्लेट पसंद है। क्या तुम्हारे पास अभी भी सफेद प्लेट है या तुमने एक सुबह स्कूल का खाना बनाते समय उसे तोड़ दिया था? मेरी लाल नाइटी के बारे में क्या? मुझे यकीन है कि तुम उसे भी भूल गए हो। तुम्हें वह पसंद थी, लेकिन मैंने उसे पहनना बंद कर दिया था। तीन जन्मों ने मेरे स्त्रीत्व को खत्म कर दिया, उसे बर्बाद कर दिया। क्या तुम कभी मेरे बारे में सपने देखते हो? मैं हर रात तुम्हारे बालों को सहलाती थी, ताकि तुम मेरे कंधे पर सो जाओ। उफ्फ..... तुम पुरुष हो यह मैं कैसे भूलती जा रही हूं.... मनुष्यता का समय तो दरअसल कभी था ही नहीं। नहीं।”
नर्स टीवी बंद कर देती है कि कमरे के बीच में एक काली स्क्रीन लटका कर चली जाती है। वह दोनों मरीजों को आराम करने देना चाहती है कि रात की शिफ्ट की गपशप के लिए अपने कान की ऊर्जा बचाए रखना चाहती है। मशीनों की भुनभुनाहट को छोड़ कर कमरे का दबावपूर्ण सन्नाटा दोनों महिलाओं को अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे जीवन के किसी अर्थ या एक निश्चित कोण से देखे गए किसी छद्म जीवन की निरर्थकता पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय देता है बावजूद इसके वे चाहें तो कभी-कभी एक दूसरे के पैर की उंगलियों को देख सकती हैं।
वह बोतल में बंद जिन्न की तरह महसूस करती है कि उसे नाविक नहीं बचा पाएगा या समुद्र उसे नहीं ले जाएगा। उसकी इच्छाएँ धीरे-धीरे जीवित रहने से मृत्यु की ओर स्थानांतरित होती जातीं और फिर बस जीवन काट लेने भर पर टिक जातीं। जीने के अर्थ के बारे में कोई सवाल नहीं, ईश्वर से भी कोई संकेत नहीं, अनुभव में लिपटे दर्द में छिपा कोई संदेश भी नहीं। बस किनारे से जीवन को देखने वाले किसी व्यक्ति का अस्तित्व। वह अपने किनारे के दृश्य को उन डेली सोप धारावाहिक से भरती है, जिन्हें वह देखती है, एक खत्म करती है और दूसरा शुरू करती है। वह डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों या परिवार के सदस्यों के दौरे के कारण दृश्य और पूरे एपिसोड मिस कर देती है। साथ ही अस्पताल में अचानक होने वाली मौतें उसे कुछ पलों के लिए झकझोर देती हैं और उसे कई दिनों तक सोने के लिए मजबूर कर देती हैं। आखिरकार उसने उन छूटे हुए दृश्यों के हिस्सों को एक खेल में बदल दिया है। वह जिस भी शो को देखती है, उसमें आत्मविश्वास के साथ वापस आती है, कथानक को उलट-पुलट कर देती है, नायकों को उनकी अपनी भूमिकाओं के बारे में भ्रमित करती है।
थका हुआ आगंतुक एक शाम मिलने आता है, जबकि एक सप्ताह के लिए दूर रहने के बाद वह उसकी उम्मीद नहीं कर रही होती है। वह उसके पास देर तक खड़ा रहता है और उसकी आँखों में देखता रहता है।
“तुमने क्या कर दिया?” वह अंत में पूछता है।
“सब कुछ बदल गया है। एक साल, फिर दो, फिर पाँच! क्या तुम कल्पना कर सकते हो? ...और ये भयानक मशीनें! और बदबू! ..मौत की बदबू मुझे मार रही है।
“प्लीज चुपचाप चली जाओ। मैं चव्वालीस साल का हूँ। मेरी ज़िंदगी मेरे पास से गुज़री जा रही है। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुम बस चली जाओ। बच्चे बड़े हो रहे हैं। और मैं काम, घर और अस्पताल के बीच अपने दिन बर्बाद कर रहा हूँ। हर बार जब मैं तुमसे मिलने आता हूँ, तो मैं अपनी कमीज़ से चिपकी मौत की गंध के साथ लौटता हूँ। यह असहनीय है! मैं इसे अपने बिस्तर में भी महसूस करता हूँ। यह अब बिस्तर नहीं बल्कि बीमार कल्पना का रंगमंच है। या साँस लेती हुई कब्र। क्या मैं कभी तुम्हारे बारे में सपने देखता हूँ? कितनी बार मैं तुम्हारा हाथ अपनी छाती पर रख कर सो जाता हूँ और जागने पर पाता हूँ कि यह एक कटे हुए हाथ में बदल गया है। एक मरा हुआ हाथ। यह.. सब.. मर.. चुका.. है।”
“मैं तुम्हारे आने से पहले डेली सोप का इंतज़ार कर रही थी। आज आखिरी एपिसोड है। हालाँकि मैं धीमी गति से चलने वाली नर्स की वजह से शायद इसे पहले ही मिस कर चुकी हूँ। तुम मेरे हाथ के बारे में पूछ रहे हो? तुम इसे ले सकते हो। मुझे अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।”
वह उसकी ओर पीठ कर के चला जाता है। वह देखती है कि एक नरम हाथ उसके बालों को सहला रहा है, फिर उसे सांत्वना देने के लिए उसके कंधे पर आता है, उसे लगभग खींचता हुआ बाहर ले कर चला जाता है। एक विजयी महिला की आँखें दरवाजे के पार उसे देखती हैं। क्या वह उसका अपना कटा हुआ हाथ था? उसे कल पता चलेगा जब नर्स उसके उलटे हुए कछुए की तरह के शरीर को साफ करते हुए उसकी बाँहें ऊपर उठाएगी।
“तुम मुझे चूमते क्यों नहीं? तुमने अब तक मेरा हाथ भी नहीं छुआ है।
अपना हाथ मेरे चेहरे पर रखो।
मुझे ठंड लग रही है। मुझे अंधेरे से डर लग रहा है।
पर्दा किसने गिरा दिया? क्या रात हो चुकी है?’’
दिन की बची हुई रोशनी के धागों में वह एक तितली को खुली खिड़की से फिसलते हुए और पर्दे पर उतरते हुए देखती है - एक मृत तितली के आलिंगन में।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
विमलेश त्रिपाठी
बक्सर, बिहार के एक गाँव हरनाथपुर में सत्तर के दशक में जन्म। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में। प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर, बीएड। कलकत्ता विश्वविद्यालय से केदारनाथ सिंह की कविताओं पर पीएच.डी। कविताओं और कहानियों का अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। पिछले 14-15 वर्षों से अनहद कोलकाता वेब पत्रिका http://www.anahadkolkata.com का संचालन एवं संपादन।
अब तक छः कविता संग्रह, तीन कविता संचयन, दो उपन्यास, दो कहानी संग्रह और एक आलोचना की पुस्तक प्रकाशित।
‘कंधे पर कविता’ संग्रह दैनिक जागरण बैस्ट सैलर सूची 2018 में तीसरे पायदान पर शामिल। उपन्यास 'हमन हैं इश्क मस्ताना' पाठकों के बीच बहुचर्चित।
हाल ही में चुनी हुई कविताओं का मराठी अनुवाद 'कवितापेक्षा दीर्घ उदासी' नाम से प्रकाशित और चर्चित।
भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार ( कहानी संग्रह ‘अधूरे अंत की शुरूआत’ के लिए) , भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, सूत्र सम्मान एवं स्पंदन कृति सम्मान सहित अन्य कई महत्वपूर्ण पुरस्कार।
अभिनय, गायन एवं स्क्रिप्ट लेखन में विशेष रूचि।
संपर्क:
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