लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'
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| लकी राजीव |
प्रेम मनुष्य के अंतरतम की गहन अनुभूति है। यह किसी भी तरह के बन्धन को स्वीकार करने से इनकार कर देता है। जाति, धर्म हो या उम्र प्रेम के लिए ये कभी सीमाएँ नहीं बना पाते। लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता' में यह प्रेम नायक को सहज ही कुछ इस तरह अपने आगोश में ले लेता है कि वह पारोमिता को अपने नजदीक महसूस करने लगता है। लेकिन उसकी उम्र उसे इस राह में आगे बढ़ने से रोकती है। इस कहानी में वह सहज प्रवाह है जो पाठकों को लगातार बाँधे रखता है। यह कहानी 'अन्विति' के कहानी विशेषांक से साभार ली गई है और लेखिका को 'सविता कथा सम्मान 2027' के लिए चुना गया है। लेखिका को पहली बार की तरफ से बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'।
'पारोमिता'
लकी राजीव
आज तीसरे दिन भी काम वाली बाई ने सुबह सुबह फ़ोन करके बता दिया था, "अभी भी फीवर है मेरे को, एडजश करो न आज भी साहब"।
एक ये क्रिया 'एडजस्ट' मुझे बहुत अच्छी तरह आती है, इसीलिए अक्सर मुझसे करवा भी ली जाती है। मैंने घड़ी देखी, आठ बज कर पांच मिनट..। डेढ़ घंटे में कॉलेज के लिए निकलना है, उससे पहले बहुत सारा काम करना पड़ेगा, एक नज़र बर्तन के ढेर पर डाली..। दो दिनों के बासी, बजबजाते बर्तन.. रसोई की बेहद बुरी हालत, हर कमरे के फर्श पर कुछ चिप चिप सा लगा हुआ। मैंने गंदगी मापने की कोशिश की, क्या था जो सबसे ज़्यादा सफाई माँग रहा था?
"हैलो.. हाँ, वाचमैन से बोलना, कोई मेड दिखे तो भेजे घर पर तुरंत" सोसायटी मैनेजर को फ़ोन करके मैंने सारी फैली हुई गंदगी की तरफ़ से आँखें मूँद ली..। इस समय इन सबसे ज़्यादा मेरा दिमाग़ सफ़ाई माँग रहा था। एक पेन किलर पानी से गटकी और फोन खोल कर जवाब लिखना शुरू किया,
"दीदी, मेरी बात समझना..। हर समय मेरी शादी की रट लगाने से मैं शादी के लिए तैयार नहीं हो जाऊंगा..। आप सब लोग हर फंक्शन में एंजॉय करने नहीं, बल्कि मुझे टारगेट करने आते हो, मुझे ऐसा लगता है। कोलकाता वाली शादी में नहीं आ पाऊंगा, रीज़न बता दिया है।"
सेंड करते ही दिमाग हल्का हो गया था, बल्कि साफ़!
दीदी के साथ क्या इश्यू है, मुझे खुद भी नही पता, माँ-पापा के जाने के बाद वो मेरी माँ, पापा सब बन चुकी थीं।
"चालीस के हो गए हो सुयश..। प्रोफेसर हो, सेटल्ड हो, किस बात का वेट कर रहे हो।"
"हां, तो चालीस साल तक कुँवारा प्रोफेसर रहना कौन सी धारा में जुर्म गिना जाता है?"
"मतलब ऐज होती है किसी भी बात की।"
"हाँ, जैसे कि लड़ने की, जितनी जल्दी शादी कर लो, उतना ज़्यादा टाइम मिलेगा लड़ने का। राईट?"
मज़ाक में कही बात दीदी की ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई से जा कर मैच हो गयी थी और महीने भर का अबोला छिड़ गया था। किसी तरह मना कर उनको जैसे ही ठीक किया, वो फिर लड़की ढूँढ़ने वाले ट्रैक पर वापस आ गयी थीं...। कितने ही सवाल मुझसे पूछे जाते थे, मेरे पास किसी भी सवाल का जवाब नहीं था, सिवाय एक के। घर में जब भी पूछा जाता ,"कोई है पसंद?" तो मन से आवाज़ आती, "कोई थी पसंद" ..और उसके बाद कोई और अच्छा नहीं लगा। लगातार डोरबेल बजने की आवाज़ से मैं चौंका।
"घर तो बहुत बास मार रहा साब...। कितने दिन की छुट्टी पर गयी है आपकी बाई? परमानेंट काम करने का है कि बस आज का।" वॉचमैन की भेजी हुई मेड काम करने से पहले सब कुछ सुनिश्चित कर लेना चाहती थी।
"अभी तो बस आज का कर दो, फ़िर बताता हूँ..। सोसायटी में और कहाँ काम करती हो?"
"पारोमिता मैडम के यहाँ, इसी बिल्डिंग में..। एक दिन का काम होगा तो दो सौ रुपया होगा... चलेगा आपको?
काम समझा कर मैं, अपने कमरे में चला आया था, करीब आधे घंटे बाद बाहर आया तो घर का हुलिया बदला हुआ था..। इस तरह तो मेरी मेड ने कभी घर साफ़ नहीं किया।
"सब चकाचक कर दिया साब, बहुत गन्दा काम करती आपकी बाई..। ये देखो, कब की भिंडी पड़ी थी फ्रिज के नीचे"
मैंने तारीफ़ की निगाहों से घर देखते हुए, पर्स से सौ सौ के तीन नोट निकाल कर उसकी ओर बढ़ाते हुए 'थैंक्स' कहा।
"अगली बार श्यामा नहीं आई, तो आपको बुलाऊंगा, फोन नंबर दे दो आप।"
"आपके यहाँ श्यामा आती है क्या साब?" वो नोट पर्स में रखती हुई चौंकी, "वो तो रोज़ आ रही सोसायटी में, आपके यहां ही छुट्टी मार रही.., मेड लोग न, फैमिली वालों के यहाँ नहीं छुट्टी मारती, आप जैसे लोग के यहां ही..।"
मेरे अकेले होने का एक और नुकसान गिना कर वो चली गयी थी। कॉलेज जाने से पहले मैंने सोसायटी ऑफिस जा कर उसकी बात की पुष्टि करनी चाही।
"पिछले तीन दिनों का सीसीटीवी फुटेज चाहिए, मेन गेट का, सुबह करीब सात बजे का।"
श्यामा सिर्फ एक दिन सचमुच वाली छुट्टी पर थी, यानी परसों..। कल और आज वो आई थी, नई वाली मेड का ऑब्जर्वेशन गलत नहीं था। "आप जैसे लोग" दिमाग़ में घूमता रहा, कार चलाते हुए भी मेरी हँसी रुकी नहीं..। सिंगल होना एक अलग प्रजाति है, मुझे पता ही नहीं था।
कॉलेज पहुंचते ही नीतेश ने एक कार्ड आगे बढ़ा दिया,
"आना है आपको।"
मैंने कार्ड पढ़ा, नीतेश वेड्स सुरुचि..। बात यहां तक आ जायेगी, मुझे नहीं लगता था। नीतेश ने हाल में ही कॉलेज ज्वाइन किया था, मैथ्स का प्रोफेसर, हिन्दी लेक्चरर के प्यार में पड़ कर सारी गणित भूल चुका था।
"सब कुछ इतनी जल्दी..। बट काफी छोटी नहीं है सुरुचि?"
"पांच साल का डिफरेंस है, हार्डली मैटर्स"। नीतेश को ये सवाल शायद अच्छा नहीं लगा, उसके कंधे को थपथपा कर मैं आगे बढ़ आया था। कॉलेज इलेक्शन के चलते पढ़ाई होनी नहीं थी, थोड़ी देर बैठ कर, घर वापस आ गया।
"वो जो मेड सुबह भेजी थी तुमने.. उसका फोन नंबर दे दो।" गेट पर वॉचमैन से पूछा तो उसने, मुझे ऐसे घूरा जैसे मुझसे कोई पाप हो गया हो।
"उसका नंबर मेरे पास क्यों होगा सर? ..किसी और घर में करती होगी, वहां से लीजिए..। पारोमिता मैडम के यहां करती है, उनसे पूछिए"
"फ्लैट नंबर? "
"नाइन ज़ीरो टू"
एक बार को तो मैं हड़बड़ा गया, मेरी ही फ्लोर के किसी फ्लैट का नंबर बता रहा था.. और मैं ये नाम पहली बार सुन रहा था, नहीं.. दूसरी बार!
"यस" दरवाज़ा खुलते ही सेफ्टी चेन के अंदर से कोई झांका, सिर्फ चेहरे का एक हिस्सा दिखा।
"आप पारोमिता हैं?
"यस"
"मैं डॉक्टर सुयश, इसी फ्लोर पर कॉर्नर वाले फ्लैट में..। मेड का फोन नंबर चाहिए था।"
"जस्ट अ सेकंड"
चेन दरवाज़े से हटी और पारोमिता मैडम अपने पूरे वजूद के साथ मेरे सामने आ खड़ी हुईं। मुश्किल से बाईस तेईस साल, या फिर उससे भी कम उम्र की पतली-दुबली लड़की, कॉटन का ढीला ढाला काफ्तान पहने हुए...। कमर तक फैले लंबे खुले बाल, बड़ी बड़ी आँखों के बीच पतली सी नाक और चेहरे पर अपनी उम्र से ज़्यादा संजीदगी लिए मेरी ओर हैरत से देखते हुए बोली,
"मुझे नहीं पता था इस फ्लोर पर कोई डॉक्टर भी है।"
"नहीं, मैं वो वाला नही, पीएच. डी. वाला डाक्टर हूं, प्रॉफ।"
"ओह.. गॉट ईट.., नंबर लिख लीजिए"
एक छोटी सी मुस्कान के साथ 'बाय', बस इतनी ही रह जाती पारोमिता के साथ जान-पहचान, अगर संगीता मेड की एंट्री मेरे घर में न होती। जिस दिन से संगीता ने मेरे यहां 'परमानेंट' काम करना शुरू कर दिया था ठीक उसी दिन से मेरे घर की नीरसता भी खत्म होने लगी थी।
लगातार बोलना, उसका अवगुण भी मान सकते थे, गुण भी।
"एक चपाती और लो न साब, अच्छे से खाने का.. फिर काम पे जाने का।" मनुहार करके खिलाना और फिर तुरंत उससे जुड़ा एक किस्सा सुनाना,
"ऐसे ही पारोमिता मैडम भी इत्तू सा खाती है, चिड़िया जैसा, एक दिन पता है साब क्या हुआ...।"
हर दिन लगभग चार-पांच किस्सों के बीच एकाध किस्सा ही मैं मन से सुनता था..। बाकी सब में हूं हां कह कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहता था।
"पारोमिता मैडम बहुत डेंजर है साब, कल अपनी मम्मी से खूब लड़ाई की फ़ोन पर, फिर मेरे ऊपर बिना बात गुस्सा करती रही"
उस दिन वो अपनी मैडम से चिढ़ी हुई थी, बर्तनों की उठापटक गवाह थी।
"आज सुबह कितने बार बेल बजायी, गेट भी नहीं खोला, मैं भी आज दूसरी चाभी घर पे ही छोड़ आयी।"
खाना खाते हुए मैं एक बार ठिठका, फिर टाल गया। इसकी आदत है बढ़ चढ़ कर किस्से सुनाने की, पता नहीं कितना सच, कितना झूठ.. बात को झूठ समझ कर टाल जाना बेहतर है, सच लग जाती है तो प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। संगीता काम करके जा चुकी थी, मैं बस घर से निकल कर ताला ही लगा रहा था कि वो भागती हुई मेरी तरफ आती दिखाई दी।
"साब..देखो न, मेरी मैडम को क्या हुआ है, हिल ही नहीं रही, ये..ये.. चाभी ले के आई मैं घर से।, खोला तो मैडम सोफे पर लेटी थी, वैसी ही है तब से।"
डरी हुई अनीता के पीछे-पीछे तेज़ी से मैं बढ़ा, बाहर लिविंग रूम के सोफे पर वो ऐसे लेटी हुई थी जैसे सालों बाद सोई हो।
"थोड़ा पानी छिड़क कर देखा?"
"हां साब, किया ना.. देखो।"
पारोमिता के चेहरे, गले पर बड़ी बूंदे साफ दिख रही थीं। बिना एक भी पल गंवाए मैंने एंबुलेंस को फोन लगाया और अगले आधे घंटे के अंदर हम तीनों हॉस्पिटल में थे। डॉक्टर मेरा परिचित निकला, मुझे थोड़ी देर बाद केबिन में ले गया,
"कोई खतरे की बात नहीं है, है तो सुसाइड अटेम्प्ट ही..। इतनी ज़्यादा क्वांटिटी में सेडेटिव्स ली गई है... आप इसके अंकल हैं? "
डॉक्टर ने मेरी ओर देख कर सवाल किया..
"नहीं, नेबर हूँ..। दो फ्लैट्स छोड़ कर रहती है, मेरी ज़्यादा जान पहचान भी नहीं है।"
मामले से हाथ झाड़ते हुए उस समय तो मैं पीछे हट लिया था.. लेकिन उसको हॉस्पिटल में अकेला छोड़ कर मैं वापस घर नहीं आ पाया। संगीता मुझे चाभी थमा कर थोड़ी देर में चली गई थी, मैं वहीं रुका रहा, दवाएं चलती रहीं...। शाम तक वो घर जाने लायक हो गई थी।
"डॉक्टर से मिल लो जा कर, फिर तुमको घर ड्रॉप कर देता हूँ।"
इससे ज़्यादा बात, उस बेवकूफ़ लड़की से मैं कर भी नहीं सकता था। गोलियाँ खा कर मरने में कौन सी समझदारी है, यहाँ लोग हर दिन एक लड़ाई लड़ कर भी ज़िंदा रहते हैं.. तन से भी, मन से भी।
"थैंक्स..." कार में बैठने के थोड़ी देर बाद उसने कहा।
"किस बात का थैंक्स..। कोई भी किसी को मरता देखेगा, तो बचा लेगा" मेरा रूखा स्वर मुझे अच्छा लग रहा था। पारोमिता नज़रें झुका कर, नाखून खुरचती रही।
"वो डॉक्टर ने कहा कि आपकी वजह से पुलिस केस नहीं बना, नहीं तो।"
मैं बिना जवाब दिए, कार चलाता रहा। बिल्डिंग की पार्किंग में कार खड़ी कर मैंने उसकी ओर देखा, कि अब उतरो भी...। उसने झिझकते हुए कहा,
"मुझे चक्कर आ रहा है, आप संगीता को फोन करके बुला दीजिए प्लीज़ "
मैंने दो-तीन बार फोन ट्राय किया, संगीता ने फोन उठाया ही नहीं... पार्किंग में मेरी नज़रें घूमीं, कौन कौन है यहां जो मुझे इस समय देख रहा होगा, कोई भी नहीं था.. सीट पर वॉचमैन तक नहीं था।
"मैं हेल्प करता हूं, रुको"
उसकी साइड का दरवाज़ा खोल कर मैंने अपना हाथ आगे किया, कांपती हथेली ने मेरे हाथ को कस कर पकड़ लिया..।
"आराम से" मैंने थोड़ा और आगे बढ़ रहा कर अपने और उसके बीच की दूरी कम की, धीरे धीरे चलती हुई वो लिफ्ट तक आई और मेरे कंधे पर सिर रखकर निढाल हो गई। गनीमत ये कि लिफ्ट में कैमरा नहीं था, नहीं तो कल तक मेरी ये समाज सेवा, ब्रेकिंग न्यूज़ में तब्दील हो चुकी होती।
"आपके पास फ्लैट की चाभी है?" आंख बंद किए किए वो बुदबुदाई, मैंने हां कहा..।
कहने को तो उसके घर पर मैं छोड़ आया था, लेकिन कुछ था जो मेरे साथ चला आया था। उसके बालों की खुशबू मेरे कंधे पर और बड़ी बड़ी आंखों में फैली उदासी, मेरे पीछे-पीछे मेरे घर तक आ गई थी। इस बेवकूफ लड़की को अकेले इस तरह छोड़ देना, ठीक था क्या? फिर कुछ कर लिया तो? ना चाहते हुए भी थोड़ी देर बाद उसके दरवाज़े पर खड़ा, मैं बेल बजा चुका था।
"मेरा फोन नंबर लिख लो..। कुछ ज़रूरत लगे तो।"
एक कागज़ पर फोन नंबर लिख कर मैंने थमा दिया था, अब ठीक लग रही थी लेकिन आंखें अभी भी भारी थीं।
"एक फेवर चाहिए था सुयश।"
सीधे सपाट शब्दों में लिया गया मेरा नाम! उम्र के इतने अंतर के बाद "सुयश जी" या "प्रोफेसर सुयश" या फिर "सर" ठीक रहता ना!
"मुझे दवा लेनी है..। उससे पहले मुझे कुछ खाना है, कुछ अरेंज कर दीजिए प्लीज़।"
मेरी चिंता थोड़ी कम हुई..। लड़की खाना खा कर दवा खाना चाहती है, जिंदगी इसमें वापस लौट रही है, अब इसको अकेले छोड़ा जा सकता था।
"डोर खुला रखो, अभी आ रहा हूं"
फ्रिज में सुबह का खाना रखा था, जा कर थमा आया।
बड़ी बड़ी मासूम आंखें कृतज्ञता से छलक आईं या किसी और वजह से.. वो पता नहीं। मेरा मन थोड़ा नर्म हुआ।
"ठीक से खा के सो जाओ..। लाइफ़ बहुत कीमती होती है, इसकी वैल्यू करो।"
आंख में भरे आंसू, गाल पर लुढ़क आए।
"गुड नाईट " कह कर मैं अपने फ्लैट पर चला तो आया लेकिन अपनी नींद वहीं छोड़ आया। कितना आसान है, किसी को कमज़ोर मान कर, उससे नाराज़ हो जाना..। कितना मुश्किल है, उसके भीतर चल रही उथल पुथल को महसूस कर पाना। सुबह बहुत देर से आंख खुली, वो भी तब जब संगीता ने डोर बेल बजा बजा कर तूफान ला दिया।
"क्या साब.. कैसे सोए थे आप..। कल मैडम का डोर नहीं खुला, आज आपका..। मैं कितना डरी, पता है।"
"अभी कैसी हैं तुम्हारी मैडम?" मैंने जम्हाई लेते हुए पूछा।
"एकदम ठीक हैं..। आपके बारे में कितना पूछ रही थीं, आपका काम, फैमिली ..सब कुछ। मैंने बताया सब ठीक ठीक, सही सही..।"
संगीता अपने फॉर्म में वापस आ चुकी थी।
"क्या बताया ठीक ठीक?" मैंने जानना चाहा कि इसको कितना पता है मेरे बारे में ठीक ठीक, जो बता भी आई।
"बताया मैंने कि बेचारे साब की फैमिली है ही नहीं।"
मन किया इसको अभी काम से निकाल दूं। बेचारे साब, फैमिली नहीं, ये सब है क्या? संगीता से उलझता इससे पहले डोर बेल फिर से बजी।
"गुड मॉर्निंग! अंदर आ सकती हूं?" कल वाली बेसुध लड़की आज तरोताजा मेरे सामने खड़ी थी; खिला हुआ चेहरा, चमकती आंखें, धुले बालों से टपकता पानी..।
"प्लीज़, कम इन..संगीता! देखो, कौन आया है।"
संगीता की उपस्थिति का ज़िक्र मैंने माहौल को सहज बनाने के लिए किया था।
"आपके बर्तन वापस करने के लिए आई थी, खाली बर्तन ठीक नहीं लगता तो ये ले आई.. दम आलू, बंगाली स्टाइल..।"
मुस्कुराती हुई जो लड़की आज प्राण वायु से भरी हुई, मुझे साथ लाया खाना दिखा रही थी..। वही लड़की परसों जान देने पर उतारू थी।
"बैठो ..चाय चलेगी?"
"आपको लेट नहीं होगा कॉलेज के लिए?" बड़ी बड़ी पलकें सवाल पूछते हुए उठीं।
"संडे को मेरा कॉलेज बंद रहता है" मैं हँस दिया। वो भी मुस्कुरा दी। मुस्कुराहट ख़ालिस नहीं थी, उदासी की मिलावट थी उसमें।
"मुझे कुछ बात करनी थी आपसे..। लेकिन इसके जाने के बाद" वो रसोईं की ओर इशारा करके फुसफुसायी। संगीता के जाने तक, हम इधर उधर की बातें करते रहे। मैंने अपनी फैमिली के बारे में, कॉलेज के बारे में बताया, उसने एक तक मुझे देखते हुए बहुत ध्यान से सुना।
फिर थोड़ी देर बाद बोली, "पापा बंगाल से और मम्मी यूपी से, इसलिए हिंदी इतनी अच्छी है मेरी। फैशन डिजाइनिंग की हुई है, मेरा बुटीक है यहां पर। कहीं जॉब ज्वाइन करने से अच्छा मुझे लगा कि मेरा अपना बुटीक होना चाहिए..। दो टेलर हैं, दो असिस्टेंट हैं। अच्छा सेटअप है, आना कभी आप।"
"इतनी कम ऐज में इतना कुछ, गुड..।" मैंने चाय का घूँट भरते हुए शाबासी दी।
संगीता का काम हो चुका था, बाहर निकल कर उसने दरवाज़ा भेड़ा ही था कि पारोमिता बोल पड़ी।
"इतनी कम ऐज में और भी कुछ देख लिया। बहुत जल्दी माँ पापा का डिवोर्स हो गया। पापा ने तुरंत शादी कर ली..। मैं तब से माँ के साथ रही, फिर मम्मी ने ये फ्लैट ले कर दिया.. अब माँ भी शादी कर रही है।"
आंखें फिर से भर आईं। मुझे संगीता का बताया सब याद आया, पारोमिता की माँ से लड़ाई हुई थी, उसके बाद वो नींद की गोलियां...।
"चलो नाश्ता करते हैं.." बात को काट कर मैं नाश्ते पर ले आया। भूखे पेट पर भावुकता दुगुनी रफ्तार से हमला करती है, ऐसा मेरा मानना है। उसके बनाए दम आलू की तारीफ़ करते हुए, हमने साथ नाश्ता किया। उस उदास चेहरे पर वो बात अभी भी अटकी हुई थी,जहाँ से मैं उसको खींच लाया था।
"रखे रहने दो ये सब यहीं.. अभी मैं हटा दूंगा।" नाश्ते के बाद वो टेबल पर रखा सामान हटाने लगी, मैंने रोक दिया।
"एक बात बताओ मुझे..। माँ शादी कर रही हैं, इसलिए तुम मरना चाहती थी?"
वो अपनी कुर्सी पर वापस बैठ गई।
"मतलब अब कोई भी नहीं बचा न मेरे लिए...। वो इतनी सेल्फिश हो सकती हैं, लगा नहीं था।"
"जब पापा ने शादी की, तब भी तुमको ऐसा लगा था?" मैंने उसकी आंखों में आंखें डाल कर पूछा ,वह हड़बड़ा गई।
"उससे मुझे क्या? मैं तो माँ के साथ थी न, वो मुझे अकेला कैसे छोड़ सकती हैं?" आवाज़ ऊँची हो गयी थी, भर्रा भी गयी थी, मैंने हँसते हुए कहा।
"मतलब माँ ने इतने साल तुमको दिए, पापा की तरह तुरंत शादी नहीं कर ली..। ये उनकी ग़लती थी? तुम उनके साथ रही, मतलब अब वो कुछ और अपने लिए नहीं सोच सकतीं? सेल्फिश कौन हो रहा है, माँ या तुम?"
शायद कुछ ज़्यादा ही साफ़ साफ़ मैं बोल गया था। वो कुछ देर बैठी रही, शांत! फिर फ़ोन और चाभी उठा कर चुपचाप घर चली गई। कंकड़ मैंने फेंका था, उथल पुथल मचनी ही थी..। और ये हलचल उसको खुद ही सँभालनी भी थी, मैंने उसको जाने से रोका नहीं। हफ्ते भर तक सन्नाटा छाया रहा, मैंने भी बात करने की कोशिश नहीं की, बस संगीता से हाल-चाल लेता रहा..।
"गुड मॉर्निंग।"
एक दिन सुबह सुबह लिफ्ट के पास खड़ी दिखी, मैंने विश किया, उसने जवाब दिया ही नहीं..। मैं इस बेरुखी पर दंग रह गया। लिफ्ट के अंदर जाते ही मैंने एक बार फिर कहा।
"क्या हाल हैं?"
"आपको इससे क्या फ़र्क पड़ता है?"
वो तुनक गई। लिफ्ट नीचे की ओर सरकती जा रही थी।
"मतलब?" मैंने चौंक कर कहा।
"मैं हफ्ते भर से गुस्सा हूँ..। आपको कोई फ़र्क पड़ा?"
लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पर आ कर रुक चुकी थी। मैं बमुश्किल अपनी हँसी रोकता हुआ बाहर आया, बहुत सारे लोग नीचे खड़े थे। मेरा चेहरा देख कर वो और नाराज़ हो गयी थी, बिना कुछ बोले चली गयी। कार पार्किंग में पहुँच कर मैं बहुत तेज़ हँसा, ये इतने दिनों से गुस्सा थी? और यह बात मुझे मिल कर इस तरह बता भी रही थी? इस मासूम हरकत, इस भोलेपन पर पहले तो मैं बहुत देर तक हँसता रहा फिर कुछ सोच कर गंभीर हो गया..। मैं सचमुच कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ हो गया था उस दिन। दिन भर दिमाग़ में पारोमिता आती रही, उसकी जगह खड़े हो कर देखता तो सच में खुद को बेहद अकेला पाता। शाम को कॉलेज से निकल कर सीधे उसके घर गया।
"सॉरी" दरवाज़ा खोलते ही एक बुके उसकी ओर बढ़ाते हुए मैं मुस्कुरा दिया। वो नाटक करते हुए ठिठकी फिर बुके लेकर खिलखिला उठी।
"आपको आता है ये सब? मुझे लगा केवल लेक्चर देना आता है..।"
पारोमिता ने आगे बढ़ कर धीरे से मुझे हग कर लिया था, मैं अचकचा गया था। स्त्री स्पर्श के साथ मैं इतना सहज नहीं था। कॉलेज में कुलीग से सिर्फ काम की बातें होती थीं..दूर दूर से। ये आज की जेनरेशन कितनी खुली हुई है।
"बैठिए न आ कर" उसने हाथ पकड़ कर मुझे खींचा, ये दूसरा हमला था। मैं अभी तक उस पहली बात से ही मुक्त नहीं हो पाया था।
"किसी दिन बुटीक आना आप..। एक ब्लैक कुर्ते का कपड़ा ले कर रखा है आपके लिए। मास्टर जी को नाप दे देना आप, शायद मैं न हूं उस वक्त वहां...। ये पूरा वीक कहीं और ही जाने वाला है।"
ऐसी कौन सी जगह उसको जाना था, जहाँ के बारे में बताते हुए वो सुस्त हो गई थी।
"कहीं बाहर जा रही हो?"
"हां, मम्मी और वो ..उनका फ्रेंड आ रहे हैं। यहां, तो उनके साथ घूमना होगा थोड़ा।"
"अरे वाह..। यहीं घर पे आ रहे होंगे ना?" मैं खुश था, वो उनकी बात करते हुए इतनी भी असहज नहीं थी।
"नहीं..। यहां नहीं, कहीं और रुकेंगे वो लोग।, मम्मी की फ्रेंड के घर..। मैं भी एक दो दिन वहीं रुकूंगी।"
तो ये नया रिश्ता मैडम कबूल कर चुकी थीं। सारी समस्या खत्म हो चुकी थी। समस्या सिर्फ तब तक रहती है जब तक हम उस सच को अपना नहीं लें ...। अपनाने के बाद वह सच इतना खराब नहीं लगता जितना पहले लगता था।
"नो मोर लेक्चर.. ओके?" मेरा दिमाग पढ़ कर वो समझ गई थी कि कुछ ज्ञान बाहर आएगा..। मैं मुस्कुरा दिया।
"हमारी लड़ाई आज खत्म हुई...। लेट्स सेलिब्रेट इट! कहीं बाहर चलें डिनर पर।"
मैं साफ़ मुकर गया। डिनर पर जाना, आना..साथ में देखकर पूरी बिल्डिंग में बातें बनेंगी।
"थक गया हूं, कुछ यहीं ऑर्डर कर लो। घर पर" बड़ी सफाई से मैं टाल गया। शाम गहराती गई, बातें होती गईं, कुछ मैंने बताया, कुछ उसने..। अचानक वो बोली,
"इसीलिए आपने दोबारा किसी को लाइफ में एंट्री नहीं दी.. क्योंकि पहले वाली ने आपको डिच किया।"
मैं इतने खराब शब्दों में अपने अतीत का परिचय सुन कर क्षुब्ध हो गया था।
"डिच नहीं.. मतलब" सकपकाया हुआ मैं, इस सच का सामना ही नहीं करना चाहता था। थोड़ी देर बाद मैं उखड़ सा गया था।
"अभी चलूंगा, कुछ काम है..। डिनर का भी मूड नहीं है।"
तुरंत वहां से उठ कर मैं घर आ कर खिन्न हो गया था । सच कहते हैं लोग, बहुत ज़्यादा उम्र के अंतर वाले लोगों से ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए..। मैच्योरिटी लेवल मैच ही नहीं करता। अब देखो न, कितनी अजीब बात कह गयी ये लड़की! यही सब सोचते हुए आंख लग गयी, सुबह उठा तो पारोमिता का लंबा सा मैसेज आया था।
"सॉरी सुयश..। इस बार मैं कुछ ज़्यादा ब्लंटली बोल गई, कैसे मनाऊं अब?"
रात की चुभन , रोशनी आने के साथ ही कम हो गई थी। जैसे-जैसे सूरज की रोशनी मेरे कमरे में फैलती जा रही थी, मेरा दिमाग भी उजला करती जा रही थी। 'डिच' शब्द सच था, तभी चुभा था। ये मेरी वो सच्चाई थी, जिसको मैं अब तक स्वीकार नहीं पा रहा था..। मन हल्का लग रहा था, तुरंत जवाब टाइप किया।
"थैंक्स पारोमिता! आय एम ओके नाऊ।"
हल्का मन फिर भारी हो गया, जब जवाब में लाल लाल धड़कते दिल की इमोजी भेज दी गयी! अब ये क्या था? दिमाग़ ने फिर समझाया, तुम पिछले ज़माने में हो, ये आज की जेनेरेशन है..। ये दिल की इमोजी, ये बात बात पर हग करना, इनके लिए सामान्य बात है। इसके बाद और भी कुछ होता रहा, जिसके लिए मैं खुद को समझाता रहा..। अक्सर हम साथ में डिनर करते, वो दिन का हाल बताती कि मम्मी के साथ यहां गई, वहां गई! कभी छोटी बच्ची जैसी उछल पड़ती और कभी कोई गंभीर बात सोचती तो लगता, मुझसे पंद्रह बीस साल बड़ी हो।
"आपके फ्रेंड्स नहीं आते घर पर?" एक दिन अचानक पूछ बैठी थी, मैने याद करते हुए बताया,
"जल्दी बनते नहीं फ्रेंड्स! कॉलेज में नीतेश है, मेरा कुलीग.. उससे बनती थी बट।" कुछ याद करके मैं चुप हो गया था, वो मेरे पास खिसक आई थी।
"बताइए ना प्लीज़, आप लड़ लिए उनसे भी?"
"नहीं.. लड़ा नहीं..। उसकी शादी को ले कर कुछ कह दिया था, शायद वो बुरा मान गया।" अंदर रखी बात मैने बाहर निकल दी।
"ऐसा क्या ख़राब था उसकी शादी में?" पॉपकॉर्न कुतरते हुए उसकी आंखे मुझ पर टिक गईं! असली कारण ना चाहते हुए भी मुझे बताना पड़ा।
"लड़की काफी छोटी है उससे.. उसकी स्टूडेंट है, क्या बेवकूफी है!"
पारोमिता ने पॉपकॉर्न खाना रोक दिया था। उसके चेहरे पर अजीब सा रंग आया और चला गया।
"तो आपके हिसाब से ये गलत है? आपको कभी नहीं अच्छी लगी आपकी कोई स्टूडेंट?"
मैंने हंस कर उसकी बात टाली..। लेकिन वो बार बार यही बात पूछ कर रह गयी! मुझे कहना ही पड़ा।
"किसी को पसंद करने के लिए मेंटल लेवल मैच होना चाहिए न! उम्र का अंतर ऐसा होने ही नहीं देगा.. और सोचो, मेंटल लेवल एक न हो तो कम्फर्ट लेवल भी नहीं होगा.. है ना।"
मुझे बिना जवाब दिए उसने पॉपकॉर्न खाना फिर से शुरू कर दिया था..। कहीं दूर देखते हुए,कुछ सोचते हुए!
"क्या सोचने लगी?" मैंने ही बात शुरू की, उसने वहीं दूर देखते हुए जवाब दिया,
"आपका कुर्ता बनना है..। याद है कि नहीं? कल आ कर नाप दे दीजिएगा मास्टर जी को।"
बुटीक में नाप देने के दो दिनों के अंदर ही काला कुर्ता बन कर आ गया था। देने आयी थी खुद बुटीक की मालकिन।
"पहन के दिखाइए, अभी के अभी " वो बच्चों की तरह मचल उठी थी।
"पहले बताओ, मम्मी के साथ घूमना कैसा रहा?" उस दूसरे शख्स का ज़िक्र मैं जान बूझ कर टाल गया था।
"अजीब सा लगा मुझे..। मतलब वो जो हैं, मम्मी के .. जिनसे वो शादी कर रही हैं, अलग ही हैं एकदम?"
वो समझा नहीं पा रही थी या समझाना नहीं चाह रही थी!
"अलग मतलब?" मैंने कुरेदा, तो उसकी गहरी आंखों में उदासी हटाते हुए एक रोशनी की किरन बाहर आ गई।
"मतलब वो बहुत अच्छे हैं.. सीरियसली! इतना ध्यान रखते हैं मम्मी का.. इतना कि क्या बताऊँ? मम्मी का शुगर लेवल अक्सर लो हो जाता है, इस बात का ध्यान मम्मी से ज़्यादा उनको रहता है.. नो डाउट, तभी तो मम्मी को प्यार हो गया, वो मिठास कम होने ही नहीं देते..। ना बॉडी की, ना उनकी लाइफ की।"
ये सब बताते हुए वो कहीं खो गई थी..। कहीं दूर किसी सड़क पर अकेली चलती हुई..।
"दैट्स ग्रेट!..लाओ अच्छा, कुर्ता दो मेरा।"
उसके सफ़र से खींच कर मैं उसे वापस ले आया। कुर्ता मुझे थमाती हुई वो पता नहीं किस बात पर मुस्कुरा रही थी। मैंने कमरे में जा कर, हिचकते हुए पहना और खुद को शीशे में देख कर चौंक गया, इस तरह के इतने फिट कपड़े मैंने कभी नहीं पहने थे और ये रंग! इससे पहले काला रंग मैंने कभी पहना ही नहीं था..। कुछ ज़्यादा ही अच्छा लग रहा था कुर्ता!
"मुझे तो पसन्द आ गया ये कुर्ता.. शायद मैं हैंडसम भी लगने लगा, है न" मैं कमरे से बाहर आते हुए इतराया, कि वो हँस पड़ेगी..। लेकिन नहीं, वो मुस्कुराई तक नहीं! मुझे देख कर बेहद संजीदगी से बोली,
"आप कब हैंडसम नहीं लगते?"
हमारी आँखें मिलीं.. नहीं, ये वो पाऱोमिता तो थी ही नहीं, जिसे मैं जानता था। ये तो कोई और थी, गहरी काली आंखे लिए वो लड़की, जिसकी आंखों में आज काजल के रंग के सिवा एक और रंग भी था।
"मैडम..बिल प्लीज़" मैंने बात सँभालते हुए कहा!
ये बात जैसे उसने सुनी ही नहीं, धीरे से आगे बढ़ी, मेरे पास आ कर, बहुत पास आ कर रुकी ..गहरी काली, काजल भरी आंखें मेरे चेहरे पर घूमती रहीं, आँखें थक गयी होंगी शायद..। होंठों को ज़िम्मेदारी सौंप कर आँखें मुँद गयीं। मुँदी आंखों वाला चेहरा लिए वो मेरे और पास आई, मेरा दायां गाल चूम कर एक पल को ठिठकी।. फिर लगभग दौड़ते हुए फ्लैट से बाहर चली गयी।
ये क्या था? ये सब उसने किया था, या मैंने करने दिया था? इतने पास हम कब आए? अपराधी बना मैं हिसाब लगाता रहा, इन सबके लिए मैं ही तो ज़िम्मेदार था, वो तो बच्ची है। मुझे सोचना चाहिए था न कि दो लोगों में इतनी नज़दीकी, किसी भावना को जन्म तो देगी ही! अब अनजान बनना ठीक नहीं, बात को टालते हुए कितने दिन रहा जा सकता था? मैंने खुद को कुछ वक्त देना ठीक समझा, फिर रात को मैसेज किया,
"पारोमिता,
मैं समझता हूँ.. ये हो जाता है, इसमें कोई अजीब बात नहीं है..। कॉलेज में भी, मेरी स्टूडेंट्स की फीलिंग्स फील करी हैं मैंने। अट्रैक्शन, इनफैचुएशन कुछ भी कह लो, टाईम के साथ चला जाता है। हमारे बीच उम्र का बहुत फासला है, जिसको हम कभी तय नहीं कर सकते..। पता है, डॉक्टर ने मुझे तुम्हारा अंकल समझा था।। थोड़ा टाइम लो, सब ठीक हो जाएगा।"
मैसेज के जवाब में उसने कुछ भी नहीं लिखा था, हालांकि पढ़ लिया था। मुझे पता था मुझे क्या करना है, इस समय थोड़ी दूरी हम दोनों के लिए ज़रूरी थी..। मेरे पास बहाना था, कोलकाता वाले रिश्तेदार की शादी का। मैं न चाहते हुए भी अगली सुबह वहाँ निकल गया था। शादी की गहमागहमी के बीच मैं भी चेंज फील करूँगा और पारोमिता को भी मौका मिलेगा, मेरे बिना रहने का.. सँभलने का।
"अब आ गए हो, तो एक लड़की से मिल लो, आई है शादी में" दीदी ने पहुंचते ही मुझे फँसा दिया था,उसी जंजाल में।
"मैं रेडी नहीं हूँ, क्यों किसी से मिल कर मना करना..।"
दीदी ने एक सवाल के साथ मुझे घूरा था, तुम रेडी होगे ही कब? लड़की से मिलने की बात टालना मुश्किल नहीं था, मुश्किल था पारोमिता को याद न करना। कोलकाता में जिस लड़की को देखता, मेरे दिमाग़ में पारोमिता चुपचाप चली आती, दबे पाँव! हर लड़की में जैसे वो ही मिलती ज़रा ज़रा करके..। किसी के वैसे ही लंबे बाल होते, किसी की वैसी ही काजल भरी गहरी आँखें!
मैंने सिर झटका, ये लड़की एक मैसेज नहीं कर सकती, इतनी भी क्या नाराज़गी? दोस्ती तो है ही हमारे बीच... खीज कर मैंने एक 'हैलो' लिख कर भेज दिया था, उसको भी पढ़ कर उसने जवाब नहीं दिया था।
"मैं क्यों मर रहा हूँ, इस नकचिढ़ी इमैच्योर लड़की से बात करने के लिए।"
फोन को साइलेंट मोड पर करके जेब में रख लिया, अब अगर ये फोन करेगी भी तो नहीं उठाऊंगा।
"कोई बात है?" दीदी ने आ कर चौंका दिया, "पसीने पसीने हो रहे हो।"
मैं क्या कहता! मुझसे बहुत कम उम्र की लड़की मेरे वजूद पर हावी होती जा रही है और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ, न उसको दूर कर पा रहा हूं, न खींच कर अपने पास ला पा रहा हूँ!
"जाओ, रेडी होकर जल्दी से आ जाओ..। सब बुला रहे हैं।"
कोई रस्म शुरू होने वाली है, कुछ एथनिक लाए हो?"
सूटकेस खंगालते हुए वही काला कुर्ता जैसे उछल कर मेरे सामने आ गया था..। एक बार पूरा कुर्ता छू कर पता नहीं मैंने किसको छुआ था, पारोमिता को या अपने उस हिस्से को जो अभी कुछ दिनों पहले ही अस्तित्व में आया था।
कुर्ता एक ख़ास महक से सराबोर था, पारोमिता की महक..। वही महक जो उसके घर में रहती थी, उसके बुटीक में भी!
"पारोमिता.. मुझे बात करनी है, फ्री होते ही कॉल करो।"
थोड़ी देर पहले का सिर उठाता मेरा ईगो, कुर्ते से आती इस महक के नीचे दब चुका था। कुर्ता पहन कर मैंने खुद को ही भींच लिया, ये लड़की इतना क्यों याद आ रही है? फोन देखा, मैसेज पढ़ लिया गया था, जवाब फिर नहीं आया था..।
"हैलो दीदी, मुझे तुरंत निकलना है। ..कॉलेज में कुछ इश्यू है, आप रूम में आ कर मुझसे मिल लीजिए, वहां भीड़ में नही आऊंगा।"
दीदी को फोन करते करते ही मेरा सूटकेस भी पैक हो चुका था। आधी रात की फ्लाइट बुक की थी, तुरंत निकलना था..।
"तुमको हुआ क्या है सुयश? क्या छुपा रहे हो" दीदी बदहवास भागी चली आई थीं। मेरे पास उनके सवाल का जवाब था ही नहीं।
"कुछ नहीं हुआ है..। ध्यान रखो आप अपना, मिलते हैं फिर।" उनका कंधा थपथपाते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ गया था। काला कुर्ता बन कर पारोमिता मुझमें सिमटी हुई थी...। होटल में, एअरपोर्ट में, फ्लाइट में भी! घर पहुंच कर अपना ताला खोलने की बजाय मेरे कदम 902 नंबर फ्लैट की ओर मुड़ गए थे।
"आप कब आए साब? चलो, बस मैं अब्बी आती" संगीता ने दरवाज़ा खोला था।
"पारोमिता कहां है?" मैंने अंदर झाँकते हुए पूछा,
संगीता ने आधा खुला दरवाज़ा पूरा खोलने की जहमत नहीं उठायी, हाथ नचा कर बोली।
"वो गयी न शादी करने।"
जैसे एक घूँसा आ कर ठीक मेरे सीने पे लगा।! कंधे पर टंगा बैग उतार कर ज़मीन पर रखते हुए मेरे हाथ कांप गए।
"शादी?"
"मैडम की नहीं साब.. उनकी मम्मी की।" पूरे दांत निकाल कर ही ही कर के संगीता हंसने लगी थी। थोड़ी देर और रुकता तो मेरी उससे ही लड़ाई हो जाती, ये क्या तरीक़ा था? शादी करने गई हैं कि बजाय शादी करवाने गई हैं, ये बोलना ठीक था न! एक झटके से अपना बैग उठा कर अपने फ्लैट की तरफ मैं आने लगा था..। कदम सुस्त थे, अभी भी! वो खबर करेंट की तरह क्यों मुझे सुन्न कर गई थी? कोलकाता से जिस हालत में भागा चला आया और यहां जो हुआ, क्या वो मेरी इन्फेचुएशन वाली थ्योरी को गलत साबित करने पर नहीं तुला हुआ था?
अगला पूरा दिन, उसके बाद का पूरा दिन जैसे क़ैद में बीते। कॉलेज से छुट्टी ले कर घर पर पड़ा रहा..। आस पास के किसी दरवाज़े पर दस्तक होती तो चौंक कर देखता, ये दस्तक मेरे दरवाज़े के लिए तो नहीं थी ना! दो रातें बेहद भारी बीती थीं, तीसरी रात मैं हड़बड़ाया हुआ उठ बैठा..। क्या देखा था? सपना ही तो था.. लेकिन इतना ख़राब? एक सुनसान सड़क पर बांहे पसारे मैं खड़ा हूँ, सामने से पारोमिता दौड़ती हुई आ रही है। मैं बांहें थोड़ी और फैला लेता हूँ, लेकिन ठीक तभी पारोमिता अपना रास्ता बदल लेती है।! इतना अजीब सपना? शायद मेरे सारे डर मुझ पर हावी हो कर सपने का रूप ले चुके थे..। तुरंत फ़ोन निकाल कर टाईप करना शुरू किया।
"डियर पारोमिता,
पता है, जब मैं कोलकाता गया, मुझे लगा था मैं तुमसे बच कर भागा हूँ..। लेकिन तुम तो वहाँ भी मौजूद थी। लंबे बालों वाली हर लड़की में तुम ही दिखी, और हर लड़की जो काजल भरी आंखें लिए मेरे पास से गुज़रती..। वो भी तो तुम ही थी। रही सही कसर तुम्हारे कुर्ते ने पूरी कर दी, उसमें तुम्हारी ही महक थी, उसको महसूस करते ही मैं भाग कर आया..। तुम मेरे कितने पास थी, तुम सोच भी नहीं सकती!
मैं ग़लत था, ये इनफैचुएशन नहीं है..। क्या है, बताने के लिए जल्दी वापस आओ, अकेले रहना बहुत मुश्किल हो रहा है।"
ये मैसेज भेजने से पहले मैंने तीन बार पढ़ा..। सब कुछ तो था इसमें..। मेरी बेचैनी शब्दों में सिमटी हुई और उसको पाने की ललक मेरे अनुरोध में फैली हुई! मैसेज भेजने के बाद भी उंगलियां फ़ोन के स्क्रीन पर उसका जवाब खोजती, कुछ टटोलती रहीं..। उसकी प्रोफ़ाइल पिक में उसकी काली आँखें जैसे मुझे देखती हुई, मुझको सम्मोहित करती रहीं!
"साब...साब..डोर खोलो ना साब" पता नहीं कितनी सुबह थी, इतनी सुबह जैसे अभी रात ही हो..। संगीता इस समय दरवाज़ा क्यों खटखटा रही थी?
"साब.. पारोमिता मैडम का सामान चढ़ रहा है, उनके कुछ भांडे-बरतन रहेंगे तो दे दो न।"
सामान चढ़ रहा है? जैसे बिजली का एक नंगा तार आ कर मुझको छू गया था!
"कहाँ.., मतलब सामान किसलिए चढ़ रहा है? वो है कहाँ।"
उसी अस्त-व्यस्त हालत में मैं उसके फ्लैट की तरफ़ बढ़ा..। वो कहीं थी ही नहीं, बस थी उसकी खुशबू..। उसके हर सामान में बसी, जिसको एक एक करके लोग वहां से हटाते जा रहे थे..। पहले सोफा, फिर पलंग,फिर पर्दे..।
मैं जैसे बेहोशी की हालत में अपने घर लौटा, बिस्तर पर पड़ा फ़ोन किसी मैसेज का नोटिफिकेशन दिखा रहा था..।
"सुयश,
मम्मी की शादी हो गई..। और उनके हसबैंड इतने अच्छे हैं कि मुझे उनको पापा कह कर बुलाने का मन करता है! मैंने प्यार देखा,लाइफ में पहली बार..। इन दोनों का प्यार। एक को क्या चाहिए, दूसरे को पता नहीं कैसे पता चल जाता है? किसी को कुछ बुरा लगे तो कह कर और पास आ जाता है, बिना कहे दूर नहीं भाग जाता.. आपकी तरह! आपने क्या लिखा था, मुझसे भाग कर आप कोलकाता चले गए थे..। आपको एक बार भी नहीं लगा कि इस बीच अगर मैंने ज़िंदगी से भागने के बारे में फिर से सोच लिया होता तो? एक बात बताइए, जब तक लंबे बालों और गहरी आंखों वाली लड़कियां नहीं दिखीं, तब तक मैं आपको याद भी नहीं आई न! और अगर.. वो कुर्ता, अगर मेरी महक ना बसी होती, तो आप भाग कर यहां आते भी नहीं न? पता है आपको ,आप उस दिन भी ग़लत थे, आप आज भी ग़लत हैं! जो मुझे महसूस हुआ था वो इनफैचुएशन नहीं था, आज आप जो महसूस कर रहे हैं.. वो प्यार नहीं है। प्यार तो शुगर लेवल मेनटेन कर के ज़िंदगी बढ़ाता है, नींद की गोलियां खरीदने के लिए उकसाता नहीं है...।
मैं कहीं और शिफ्ट हो रही हूँ, वो बिल्डिंग पसंद नहीं आई।
पारोमिता"
मुझे लगा जैसे मेरे शरीर से खून की एक एक बूंद निचोड़ कर कोई मुझे अधमरी हालत में बेड पर पटक गया हो! दूसरी बार, तीसरी बार.. जितने बार वो मैसेज पढ़ता, लगता जैसे उम्र का एक दिन और कम होता जा रहा था! पता नहीं, उसमें लिखा सब कुछ सही था या सब कुछ ग़लत... सच बन कर मेरे साथ वो घट तो रहा ही था। फ्लैट नंबर नौ सो दो खाली हो चुका था, ज़ाहिर सी बात थी, मेरा फ़ोन नम्बर भी ब्लॉक्ड हो चुका था। इस बार कौन सही था, इसका फ़ैसला तो वक्त को करना था.. लेकिन मेरे मन में पल रहा एहसास क्या था, ये मुझे ही तय करना था। चाहता तो बुटीक जा कर बात कर सकता था, उसका पीछा करते हुए कहीं रास्ते में टकरा सकता था..। लेकिन जो कुछ टूटा था, उसको इस तरह जबरदस्ती जोड़ना ही नहीं था। उसको मैं याद करता रहता, उसका भेजा मैसेज पढ़ता, अपने आप को टटोलता तो हर बार खुद को दोषी पाता..। अक्सर सोचता कि मेरे कोलकाता के लिए निकलते ही उसने नींद की गोलियों की ओर नज़र उठा कर देखा होगा, उसकी वो उठी नज़र मेरे दिल के बहुत भीतर तक धंसती जाती..। इतनी कि मैं सांस भी न ले पाता! उस दिन बुटीक के पास वाले कैफे में कितनी देर बैठने के बाद उसकी एक झलक मिली थी..। मेरे अंदर की हिम्मत मुझे उसके पास तक ले ही नहीं जा पायी। बस उसको देखता रहा, उसको महसूस करता रहा..। यही एक काम मेरे पास बचा ही था शायद, चाय पीने बैठता तो लगता बगल में बैठी पारोमिता बिस्किट डुबो कर खा रही है..। फिर बिस्किट के गल कर गिरने पर तेज़ तेज़ हँसने लगी है!
"ये हँसने की बात है या रोने की?" मैंने एक बार उसका डूबता बिस्किट देख कर कहा था, मुझे लगा इस बात पर वो मुँह बना कर कहेगी,
"आपका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत घटिया है" लेकिन वो देर तक बिस्किट को डूबते देखती रही थी, फिर संजीदा होकर बोली थी, "ये हंसने और रोने दोनो की बात नहीं है...। फॉलिंग इन लव जैसी फील आती है मुझे दोनों को देख कर।"
"किन दोनों को देख कर?" मैं हड़बड़ा गया था, वो तिरछी निगाहों से मुझे छलनी करते हुए चिहुंक गई थी।
"अरे! चाय और बिस्किट को देख कर"
तब मुझे उसकी ये बातें जितनी बचकानी लगती थीं, अब उतनी ही रूहानी लग रही थीं..। चाय और बिस्किट लिए मैं कितना कुछ सोचता रहता था, उसी की तरह!
दिन जैसे जैसे बीतते जा रहे थे, लगता था वो मन पर उगी उदासी की परत, काई की तरह जमते हुए ज़िद्दी होती जा रही थी। कितना भी चाहूं खुरच कर वो उदासी छुड़ा दूं, संगीता साफ़ होने ही नहीं देती थी..। हर दिन आ कर पारोमिता की बातें, चाहे मैं सुनना चाहूं या नहीं..।
"आज मैडम से बात हुई..। मैं बोली, मिलना है मेरे को, इस सन्डे जाऊंगी मिलने" जैसी बातें अक्सर करना या फिर "मैडम इधर रहती थी तो कितना अच्छा लगता था न साब..। कितना हंसाती थी मेरे को भी, आपको भी।"
संगीता की ये सारी बातें जैसे मेरा पूरा वजूद समेट कर मुझे पानी से भरे कुएं में फेंक देती थीं। मैं छटपटाता रहता था..। ऊपर चेहरा किए, बचाए जाने के इंतज़ार में! कितना भी टालने की कोशिश करो, संगीता हर दिन आ कर मेरा घाव थोड़ा सा कुरेद कर नमक बुरक ही जाती थी..। कुछ दिन सहता रहा, कुछ महीने सहता रहा, फिर एक दिन डांट कर उसको चुप करा दिया था।
"मैं कुछ काम कर रहा हूं..। प्लीज़ डिस्टर्ब मत करो।"
कुछ दिन लैपटॉप पर बेमतलब उंगलियां चलाते हुए संगीता को बोलने का मौका ही नहीं दिया, फिर एक दिन खुद ही पूछ लिया था।
"कैसी हैं तुम्हारी मैडम?"
संगीता तो मानो भरी बैठी थी, बहुत कुछ बताती रही..फिर अचानक मेरे पास आते हुए बोली, "साब.. आप लोग की लड़ाई हुई है क्या?"
लैपटॉप पर नाचती मेरी उंगलियां थम गई थीं।
"क्यों? लड़ाई क्यों होगी?" किसी तरह मैने उसे टाला, वो जैसे ही किचन में जाने लगी.. मुझे लगा क्यों ही टाला!
"संगीता..इधर आओ, कुछ कह रही थीं क्या तुम्हारी मैडम।"
संगीता ने धीरे से मुंह खोला, "नहीं साब..वो कुछ नहीं बोली, मेरे को लगा..।"
"किस बात से लगा?" मैं अधीर हो गया था। संगीता ने याद करते हुए बताया, "लड़ाई जैसा कुछ नहीं बोलीं लेकिन पूछती हैं आपके बारे में..।"
"तुम तो वहां काम नहीं करती हो ना अब, फिर कैसे पूछती हैं?"
"मेरे से हर दिन फोन पर बात करती हैं, यहीच पूछती कि साब ठीक है ना।"
मुझे लगा मुझे उस दमघोंटू कुएं से हाथ पकड़ कर कोई मुझे ऊपर खींच रहा था, मैं ऊपर आता जा रहा था...।
"तो इस बात से तुमको लगा कि लड़ाई है?" गुत्थी अब भी उलझी हुई थी, संगीता ने ही सुलझाई फिर, "नहीं साब.. वो मेरे को बोली कि साब एड्रेस मांगे तो मत देना, इस बात से लगा।"
मैं पता नहीं कितने दिनों बाद आज खुल कर हँसा था! यही तो थी पारोमिता, इन्हीं बचकानी हरकतों से मेरी ज़िन्दगी आबाद करती हुई। मेरे बारे में पूछताछ करना फिर ये ताकीद कि मुझको पता न चले..। मन किया कि सामने आ जाए तो उसका चेहरा हथेलियों में भर लूं! संगीता मुझे इस तरह हँसते हुए देख कर अवाक थी..। मैंने उसको हाथ के इशारे से पास बुलाया,
"मेरा एक काम करोगी? आज जब मैडम पूछें तो बोलना, साब बहुत बीमार हैं..। बोल देना प्लीज़।"
मुझे पता था, आज मेरी शाम उसको सिर्फ सोचते हुए नहीं बीतेगी, मैं सही था। कई शाम अपनी बालकनी पर टंगे हुए मैंने जिसकी राह देखी थी, वो तेज़ तेज़ कदमों से चलती हुई बिल्डिंग की ओर बढ़ रही थी..। जल्दी से जा कर मैंने एक बार फिर काला कुर्ता पहन लिया था, एक बार फिर वो सवाल पूछना था, मैं हैंडसम लग रहा हूं न?
और इस बार उसका ये सवाल कि आप कब हैंडसम नहीं लगते, खाली नहीं जायेगा..। मैं भी उसकी काजल भरी गहरी आंखें चूम कर पूछ लूंगा, "और तुम कब इतनी प्यारी नहीं लगती कि तुमको प्यार करने से बचा जा सके।"
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