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प्रज्ञा के उपन्यास पर अरुण होता की समीक्षा 'अप्रतिरोध्य संघर्षशीलता और अदम्य जिजीविषा :काँधों पर घर'

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  प्रज्ञा इधर के हिन्दी कहानीकारों और उपन्यासकारों में प्रज्ञा ने अपने लेखन से पाठकों और आलोचकों का ध्यान आकृष्ट किया है। हाल ही में प्रज्ञा का तीसरा उपन्यास ‘काँधों पर घर’ इलाहाबाद के लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उपन्यास की पृष्ठभूमि दिल्ली है लेकिन केन्द्र में वह निम्न मध्यम वर्ग ही है जो सामान्य जीवन जीते हुए उस वास्तविक भारत का निर्माण करता है, जिसके लिए दुनिया भर में उसकी ख्याति रही है। इस उपन्यास की समीक्षा लिखी है हमारे समय के चर्चित आलोचक अरुण होता ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा के उपन्यास पर अरुण होता की समीक्षा 'अप्रतिरोध्य संघर्षशीलता और अदम्य जिजीविषा :काँधों पर घर'। 'अप्रतिरोध्य संघर्षशीलता और अदम्य जिजीविषा : काँधों पर घर'                                                        अरुण होता  विगत पचीस वर्षों में हिंदी कथा-साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा गया है। चार पीढ़ियों के कथा-सृजन से हिंदी कथा साह...