सिनीवाली शर्मा का उपन्यास अंश 'देह को तो देह की आवश्यकता होती है'
स्त्री का पुरुष और पुरुष का स्त्री के प्रति आकर्षण जैविक या कह लें प्राकृतिक होता है। भारतीय मिथकों में ऐसे तमाम वृत्तान्त भरे पड़े हैं। महर्षि च्यवन के बारे में किंवदंती है कि वे वृद्धावस्था में युवती सुकन्या के प्रति न केवल आकर्षित हुए, बल्कि उससे शादी भी कर ली। लेकिन उस उम्र का क्या, जिसकी नियति ही है लगातार ढलते जाना। लेकिन दांपत्य सुख को पाने की इच्छा के चलते वे उस यौवन को पाने की कोशिशें करने लगे जिससे वे अपने को परिपूर्ण पा सकें। महर्षि च्यवन की यह किंवदंती हमें और भी जानने के लिए कुरेदती रहती थी। इसी बीच सिनीवाली शर्मा का उपन्यास 'हेति' प्रकाशित होने वाला है जिसमें इस किंवदंती को बड़े रोचक ढंग से औपन्यासिक स्वरूप प्रदान किया गया है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं सिनीवाली शर्मा का उपन्यास अंश 'देह को तो देह की आवश्यकता होती है'। 'देह को तो देह की आवश्यकता होती ही है!' सिनीवाली शर्मा अब मेरे शरीर में शिराओं के स्थान पर असंख्य सर्प करवट लेने लगे। रुधिर के स्थान पर विष प्रवाहित होने लगा। मैं... मैं भी एक मनुष्य हूँ, हाँ साधारण, अतिसाधारण मनुष्य हूँ। इस गरल...