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बृजराज सिंह की लम्बी कविता 'वसंत'

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बृजराज सिंह 'वसंत' बृजराज सिंह की ऐसी नयी लम्बी कविता है जिसका वितान व्यापक है. आज कमोवेश स्थितियाँ इतनी जटिल हो गयी हैं कि वसंत जैसा मौसम, जो मूलतः प्राकृतिक है, उस पर भी आम आदमी का कोई न तो हक़ है न ही कोई अधिकार. पूँजीवाद ने हवा से लेकर पानी तक सबको बिकाऊ बना दिया है. जमीन तो पहले ही उनकी हो चुकी है. ऐसे में एक बड़ा संकट है वसंत की खोज करना. तीस वर्ष का हो जाने पर भी कवि जब वसंत नहीं देख पाता तो वह उसकी तहकीकात करता है. लोगों से पूछता है, देखता है और जानने की कोशिश करता है. आज कट्टरता जिस तरह सब जगह अपने पाँव पसार रही है, वह अपने चरित्र में फासीवादी ही नहीं बल्कि   हर जगह से वह  उस लोकतन्त्र को गायब करती जा रही है जो दरअसल मनुष्यता का पर्याय माना जाता रहा  है. कवि ने इस कट्टरता के बढ़ने को देखा-महसूस किया है और कविता में भी यह सहज स्वाभाविक ढंग से आया है. बहरहाल आइए पढ़ते हैं बृजराज सिंह  की यह लम्बी कविता जिसके गहरे निहितार्थ हैं.             बृजराज सिंह  की लम्बी कविता 'वसंत' वसंत  (1) मै...