प्रणय कृष्ण का आलेख 'अन्ना और संसद'
प्रणय कृष्ण प्रणय कृष्ण 'अन्ना और संसद' 'जिसे आप पारलियामेंटों की माता कहते हैं वह पारलियामेंट तो बाँझ और बेसवा है. ये दोनो शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं. मैंने उसे बाँझ कहा. क्योंकि अब तक उस पारलियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया . अगर उस पर जोर दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे ऐसे उसकी कुदरती हालत हैं. और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्री मंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती हैं, आज उसका मालिक अस्क्विथ है तो कल वाल्फ़र होगा परसों कोई तीसरा.' गाँधी के उपरोक्त उद्धरण को यहाँ रखते हुए इसे न तो मैं सर्वकालिक सत्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ, न अपनी ओर से कुछ कहने के लिए, बल्कि इंग्लैंड की तब की बुर्जूआ पारलियामेंट के बारे में गाँधी के विचारों को ही आज के, बिलकुल अभी के हालात को समझने के लिए रख रहा हूँ. अभी भी प्रधानमंत्री इस बात पर डंटे हुए हैं कि अन्ना का आन्दोलन संसद की अवमानना करता है और इसलिए अलोकतांत्रिक है....