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कार्तिकेय शुक्ल की कविताएं

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  कार्तिकेय शुक्ल आज हम ऐसे समय में रह रहे हैं जिसमें हमारा अपना निजी कुछ भी नहीं है। हमारी वे बातें भी सार्वजनिक हैं जिन्हें निहायत निजी होना चाहिए। हर जगह सी सी टी वी कैमरे हम पर अपनी आँखें गड़ाए हुए हैं। हम जिस सोशल मीडिया से जुड़े हैं वह भी हमारी निजता में ऐसे सेंध लगाती है कि हमें इसका अहसास तक नहीं होता। हमसे बिना पूछे हमसे सम्बन्धित जानकारियां बेच कर सार्वजनिक कर दी जाती हैं। इस सार्वजनिकता ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है। मोबाइल के साथ साथ आधार कार्ड, पैन कार्ड जैसे कई दस्तावेज ऐसे हैं जिसके चलते जालसाज हमें हाउस अरेस्ट कर मनमानी कर सकते हैं। अब तो हम सरकार की नीतियों का विरोध भी नहीं कर सकते। अन्यथा उसके कोपभाजन के शिकार बन सकते हैं। कार्तिकेय अपनी कविता में लिखते हैं : 'अब सब के सब निगरानी में हैं/ मनुष्य ही नहीं मनुष्येतर भी/ जो आवाज़ उठाने की ज़हमत करते हैं/ उन्हें कोई किसी रोज़ कहीं/ नदी-नाले में बहता देखता है/ और दबी आवाज़ में कहता है/ सब पानी में हैं'। कार्तिकेय नवोदित कवि हैं। उनके पास लिखने के लिए बेहतर विषय हैं। कहन का तरीका है। कहा जा सकता है कि इस कवि में संभाव...