रंजीता सिंह 'फलक' की कविताएं
रंजीता सिंह 'फलक' पितृसत्तात्मक समाज की यह त्रासदी है कि वह स्त्रियों को वह सम्मान नहीं दे पाता जिसकी वे अधिकारी होती हैं। इसकी वजह वह पुरुषवादी मानसिकता है जिसमें स्त्रियों को दोयम दर्जे का मान लिया जाता है। लेकिन सच तो यही है कि इस समाज के संचालन में स्त्रियों की भूमिका उतनी ही अहम है, जितनी कि पुरुषों की। रंजीता सिंह फलक अपनी एक कविता में उचित ही लिखती हैं 'किसी ऐसे शहर में मैंने/ बेधड़क चलना शुरू किया था/ जहाँ स्त्री को स्त्री की तरह देख पाने की भी/ सलाहियत नहीं रख पाए थे वहाँ के पुरुष'। ऐसे बंद समाज में स्त्रियों से ही सारे शील, संकोच, मर्यादा, नैतिकता की उम्मीद की जाती है। उन स्त्रियों को जो लीक से अलग हट कर अपनी राह चुनती हैं उन्हें तमाम किस्म के फिकरे सुनने पड़ते हैं। लेकिन यह दुनिया एकांगी नहीं है। यहां दुष्ट हैं तो सज्जन लोग भी दिख जाते है। रंजीता लिखती हैं 'किसी पुरुष के वात्सल्य भरे/ हाथ ने ही मुझे सँभाला/ हर आघात में/ उन चंद पुरुषों ने ही मुझे सिखाया/ कि दुनिया सिर्फ भीड़ नहीं/ और स्त्री होना कोई अपराध नहीं'। कवयित्री के हृदय में वह प्रेम है जो अ...