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प्रतुल जोशी का आलेख 'कोसी का घटवार' : प्रेम की वेदना और युद्ध के अवसाद से उपजी रचना

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कोई भी रचनाकार अपनी रचनाओं के दम पर लम्बे समय तक पाठकों के मन मस्तिष्क में अपनी जगह बनाए रखता है। रचनाकार की एक दो रचनाएँ ऐसी होती हैं जो उसके लेखकीय व्यक्तित्व का प्रतीक बन जाती हैं। प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी इसके अपवाद दिखाई पड़ते हैं। उनके पास एक नहीं बल्कि कई ऐसी कहानियाँ हैं जिनका जिक्र उनके नाम के साथ किया जाता है। 'कोसी का घटवार', 'दाज्यू', 'बदबू', 'मेंटल', 'नौरंगी बीमार है' जैसी कालजई कहानियों की याद तत्काल ही आती है। इनमें भी प्रमुख तौर पर 'कोसी का घटवार' कहानी की याद आती है जिसका अंदाजे बयां एक क्लासिकल कहानी का है। कहानी लिखते समय उस समय का परिवेश भी उसमें दर्ज हो जाता है जो कहानी को विश्वसनीय बनाती है। इस कहानी के कथा सूत्रों को पकड़ने का प्रयास कई आलोचकों ने किया है। प्रतुल जोशी ने कहानी के उन कथा सूत्रों की तहकीकात करने की कोशिश की है जो 'कोसी का घटवार' कहानी लिखे जाने में सहायक बने। अपने आलेख में वे लिखते हैं 'इस बहुचर्चित कहानी की लोकप्रियता को समझने के लिए आज से 78 वर्ष पूर्व के भारत देश में जाना पड़ेगा। यह व...

प्रतुल जोशी का आलेख 'पिता के बारे में पढ़ते हुये'

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  शेखर जोशी  जिन बातों को हम अपने घर परिवार में साझा नहीं कर पाते, उन्हें हम अपने दोस्त मित्रों से बेहिचक साझा कर लेते हैं। अप्रतिम कथाकार शेखर जोशी ने नवीन जोशी से अपने जीवन और लेखन की उन बातों को साझा किया जो उनके परिवार जनों को भी नहीं पता। नवीन जोशी ने अपनी किताब    "शेखर जोशी : कुछ जीवन की, कुछ लेखन की" में इन महत्त्वपूर्ण स्मृतियों को सहेज रखा है। इस किताब को पढ़ते हुए शेखर जी के पुत्र प्रतुल जोशी ने एक उम्दा आलेख लिखा है जो परिकथा के जनवरी-अप्रैल 2025 अंक में प्रकाशित हो चुका है। आज शेखर जी का जन्मदिन है। हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  प्रतुल जोशी का आलेख 'पिता के बारे में पढ़ते हुए'। पिता के बारे में पढ़ते हुए प्रतुल जोशी कोई भी पुत्र अपने पिता को जन्म से ही जानता है। पिता यदि एक साधारण गृहस्थ हो तो उन्हें जानना भी आसान हो सकता है। लेकिन पिता ने यदि अपने जीवन में कुछ असाधारण किया हो, तो कई बार पिता के व्यक्तित्व के सभी पक्षों को जानना पुत्र के लिये भी सम्भव नहीं होता। ऐसे में किसी अन्य स्रोत से अपने पिता के बारे में जानन...

शेखर जोशी की वसीयत 'ओलियागाँव के लिए कुछ सपने'

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  इस जीवन की अपनी एक सीमा है। कहा जा सकता है कि जन्म लेना और अन्त होना यह जीवन की अनिवार्य विशिष्टता है। यही इस जीवन की खूबसूरती भी है। लेकिन मनुष्य अपने विशिष्ट कार्यों के जरिए खुद को अमर कर लेता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि शेखर जोशी एक बेजोड़ कहानीकार थे। उनका व्यक्तित्व उन्हें असाधारण बना देता था। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने अपनी एक वसीयत लिखी।  शेखर जी की यह वसीयत नवीन जोशी द्वारा लिखी गई  'शेखर जोशी: कुछ जीवन की कुछ लेखन की' किताब में संकलित है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शेखर जोशी की वसीयत 'ओलियागाँव के लिए शेखर जी के कुछ सपने'। 'ओलियागाँव के लिए शेखर जी के कुछ सपने' नवीन जोशी  अपने नब्बेवें जन्म दिन से करीब दो-ढाई महीने पहले शेखर दाज्यू ने अपनी वसीयत लिखी थी- 'मन की बात' शीर्षक से। मई-जून में वे बेटी कृष्णा के पास पुणे में थे। कोविड का हलका झटका लगा था लेकिन उबर आए थे। तभी यह 'मन की बात' लिखी गई। आँखों की बीमारी के कारण लिखना आसान नहीं था। तीस जून (2022) से लिखना शुरू किया और थोड़ा-थोड़ा कर के छह जुलाई तक पूरा किया। ब...

शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा'

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  शेखर जोशी जीवन के यथार्थ के अप्रतिम कहानीकार हैं शेखर जोशी। गलता लोहा उनकी ऐसी ही एक कहानी है। समाज के दो अलग अलग समुदायों से आने वाले बच्चे जब एक साथ जीवन की शुरुआत करते हैं तब उन्हें अहसास होता है यथार्थ बोध का। अलग बात है कि दोनों का यह यथार्थ बोध बिल्कुल अलग यानी कि निहायत अपनी तरह का है। धनराम जो समाज के शिल्पकार तबके से आता है स्कूल में ही शिक्षकों के उस भेदभाव का शिकार होता है जो भारतीय समाज की क्रूर हकीकत है। दूसरी तरफ मोहन जो ब्राह्मण जाति का है अपने ऊपर थोपी गई उस इच्छा पर खरा नहीं उतर पाता जिसका सपना उसके पिता ने पाल रखा था। तमाम ठोकरें खाने के बाद उसका झूठा अभिमान लोहे की तरह ही गल जाता है। आज हमारे प्रिय कथाकार शेखर जोशी का जन्मदिन है। उनकी स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी कहानी। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा'। 'गलता लोहा' शेखर जोशी  मोहन के पैर अनायास ही शिल्पकार टोले की ओर मुड़ गए। उसके मन के किसी कोने में शायद धनराम लुहार के ऑफ़र की वह अनुगूँज शेष थी जिसे वह पिछले तीन-चार दिनों से ...

शेखर जोशी की कहानी 'सिनारियो'

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  शेखर जोशी पहाड़ वैसे तो सैलानियों को सहज ही आकर्षित करता है लेकिन पहाड़ का जीवन कितना त्रासद होता है यह पहाड़ वाले ही जानते हैं। इस त्रासदी के अतिरिक्त पहाड़ के लोगों को गरीबी की त्रासदी से भी रोज ही जूझना पड़ता है। कई घर ऐसे हैं जिनके लिए आग जुटा पाना भी कठिन काम है। माचिस की तीलियों को रगड़ कर फट से आग जला लेने वाले लोगों को शायद ही इस असमर्थता पर विश्वास होगा, लेकिन यह यथार्थ है। उस पर भी तुर्रा यह कि सरूली जब किसी बड़े घर से कलछूल में आग ले कर आ रही होती है तो शेखर जी के ही शब्दों में 'पैर में लगी ठोकर या जमे हुए तुषार की चुभन कि सरुली अपना सन्तुलन खो बैठी और उसकी करछुल उलट गयी। उस बड़े मकान से माँग कर लाये हुए अंगारे तुषार भीगी धरती पर बिखर गये थे। सरुली झुक कर नंगी अँगुलियों से उन्हें उठा-उठा कर फिर करछुल में रखने लगी। शायद उनकी आँच बुझ चुकी थी। लेकिन कहीं कोई उम्मीद शेष रही होगी कि सरुली करछुल को मुँह के निकट ला कर फूँकने लगी और साथ ही उसके पैर भी घर की ओर बढ़ते रहे।' आखिर सरुली की फूंक से बुझने को हो आई आग फिर जल उठती है और उसका चेहरा दीप्त हो उठता है। यानी कि जहां उम...