विस्लावा शिम्बोर्स्का
वि स्लावा शिम्बोर्स्का (चित्र- विस्लावा सिम्बोर्सका, गूगल से साभार ) मृत्य पर , बिना अतिशयोक्ति -------------------------- झेल नहीं सकती एक कहकहा ढूंढ नहीं सकती कोई तारा बुनाई , खनाई , खेती का इसे कुछ पता नहीं जहाज बनाने या केक पकाने का तो सवाल ही नहीं लेकिन कहना न होगा कि कल की हमारी सारी तैयारियों पर आख़िरी मुहर उसी की होती है इसे तो कुछ उन कामों का भी शऊर नहीं जो इसी के बिजनेस का हिस्सा है जैसे कब्र खोदना कफ़न बनाना और अपने तशरीफ लाने बाद की साफ़ सफाई जूनून में खून भी करती है हबड़ तबड़ में ढब नहीं, कोई ढंग नहीं , जैसे हम में से हर एक पहिलौठा शिकार हो उस का जरूर, कई निशाने अचूक होते हैं लेकिन चूक भी जाते हैं अनगिनत देखिये देखिये वे टेक- रीटेक खम्भे नोचना कई दफे तो मक्खी तक उडाये नहीं उड़ती इल्लियां तक चकमा दे जाती हैं तितलियाँ बन कर देखिये ये तमाम बिखरी हुयी घुन्डियाँ , फलियाँ , स्पर्शक , मछलियों के पखुड़े, खाइयां , शादियों के मौर , ऊन के रोयें ... आधे अधूरे मन से किये गए नाकाम कामों के निशान हम...