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बाल कृष्ण पाण्डेय की पाँच गज़लें

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बालकृष्ण पाण्डेय बाल कृष्ण पाण्डेय की पाँच गज़लें बालकृष्ण पाण्डेय एक सजग-सचेत रचनाकार हैं। शोरोगुल से दूर रह कर बराबर रचनाशील रहते हैं। आलोचनात्मक गद्य के अलावा इन्होंने कुछ कहानियाँ, कविताएँ और गज़लें लिखी हैं। आज हम इनकी ताजातरीन ग़ज़लों से आपको रु–ब–रु करा रहे हैं। तो आइए पढ़ते हैं बाल कृष्ण पाण्डेय की गज़लें।                   एक                बिखर डाल से फूल गया है। सब उसके प्रतिकूल गया है।। सूख चुके हैं आम बाग के। उगता द्वार बबूल गया है। गंगा मंदिर सत्य अहिंसा उसके लिए फिजूल गया है। खुशियों में भी रोते-रोते , जो हँसना भी भूल गया है। खादी-खद्दर की साजिश में , झूठा जुर्म कबूल गया है। बेमौसम बारिश में फँस कर , वह फंदे पर झूल गया है। दो वही घिसा पैमाना फिर से। सारा ताना बाना फिर से।। पाँच साल तक रहे गुमशुदा। चालू आना जाना फिर से।। आँख चढ़ाये रहे फेर मुँह। हिला हाथ मुसकाना फिर से।। अकड़ हुई गुम पाँव गाँव में। बने हु...