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भाविनी त्रिपाठी की कहानी 'नेवले'

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भाविनी त्रिपाठी भाविनी त्रिपाठी बी टेक द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं । उनमें गहरे साहित्यिक संस्कार भरे हुए हैं । उनकी कहानियाँ पढ़ कर आप सहज ही इसका अंदाजा लगा सकते हैं कि भाविनी में भविष्य का एक संभावनाशील रचनाकार संचित है । 'नेवले' कहानी के माध्यम से भाविनी ने उन तत्वों को उजागर करने की कोशिश किया है जो छुपे रुस्तम होते हैं । ऐसे लोग मौके की ताक में रहते हैं और अवसर मिलते ही अपनी क्रूरता दिखाने से नहीं चूकते । ' पहली बार' पर आप पहले भी भाविनी की कहानियाँ पढ़ चुके हैं । आइए आज हम पढ़ते हैं उनकी एक और नयी कहानी 'नेवले' ।     नेवले भाविनी त्रिपाठी तुम्हारा प्रथम स्पर्श अब भी स्मृति-पटल पर अंकित है... सर्वथा सुरक्षित। कैसे भुला सकती हूँ मैं उस दिन को , उस सुबह को , जब तुम आई थी , मेरे घर से अधिक मेरे दिल में। याद है मुझे जेठ की वह सुबह। आसमान साफ था। सूर्य , किसी गाँव के सबसे बूढ़े व्यक्ति की तरह , अपना तेज सब पर बरसाता , प्रकृति के कण-कण के क्रिया-कलापों का निरीक्षण कर रहा था। हवा अपने हाथों के कंगन बजाती कभी किसी पेड़ को छेड़ती तो कभी...

भाविनी त्रिपाठी की लघु-कथा 'तस्वीर'

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साहित्यकार की चौकस निगाहें चारों तरफ रहती हैं। न जाने कौन सी घटना उसे अपने लिखे जाने के लिए बेचैन कर दे। अभी हाल ही में सोलह दिसंबर को पूरी दुनिया तब स्तब्ध रह गयी जब तालिबानी आतंकवादियों ने पेशावर के आर्मी स्कूल पर धावा बोल कर 132 मासूम बच्चों को मार डाला। समूचे विश्व में इस पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई और प्रायः सबने आतंकवाद के इस क्रूर चेहरे से जूझने का संकल्प लिया। भाविनी त्रिपाठी जो छात्रा बी 0 टेक 0 की द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं, भी इस घटना से काफी उद्वेलित हुईं। पहली बार की इस युवतम रचनाकार ने ‘तस्वीर’ नाम की अपनी यह ताजातरीन लघु-कहानी जब मुझे सुनाई, तो मैं इनकी संवेदनाओं से हिल सा गया। कहानी के अन्त तक आते-आते हम सिहर से जाते हैं। आप कहानी पढ़ कर इसका अंदाजा खुद लगा सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं भाविनी की यह लघु-कहानी।                       तस्वीर भाविनी त्रिपाठी   उस अंधेरे कमरे   में सूर्य की किरणें आरजु़ओं की सुराखों के सहारे आहिस्ता-आहिस्ता पैठ रहीं थीं। कलीम के कु़छ-कुछ फटे हुए दस्तानों से...

भाविनी त्रिपाठी की लघु कहानी विडम्बना

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बालपन से ही लड़कियों को यह एहसास हो जाता है कि वे इस दुनिया में बिल्कुल अलग हैं। समाज जैसे नचाये उन्हें नाचना है। उन्हें कोई सवाल नहीं करना है बल्कि सवालों के जवाब देना है। भाविनी अभी बी टेक की छात्रा हैं लेकिन इनकी रचनात्मक निगाह ने बड़ी सूक्ष्मता से स्त्री जीवन की विडम्बना की तहकीकात की है। इन्होने अपनी लघु कहानी 'विडम्बना' के जरिये इस दृश्य को बखूबी उभारा है। तो आईये पढ़ते हैं भाविनी की यह कहानी।         विडम्बना भाविनी त्रिपाठी सिर का घूँघट सम्हाले, रूपा घर की बड़ी बहू होने का उत्तरदायित्व निभाने का अथक प्रयास कर रही थी। ननद का ब्याह हो तो एकमात्र  भाभी के कार्यभार का अनुमान लगाना कठिन नहीं। कभी रसोई में आगन्तुकों के जलपान का प्रबन्ध करती, तो कभी दौड़ कर हलवाई की माँगें पूरी करती। कभी नाईन पूजन-सामग्री माँगती तो कभी मोहल्ले की औरतें बन्ना-बन्नी गाने में सहयोग चाहतीं। बेचारी बडी देर से चाहती कि एक बार ननद उर्मिला के पास जा कर उसका भी हाल पूछ आये, पर अवकाश ही न मिलता था। कुछ ही देर में उर्मिला की सहेलियाँ आ पहुँचीं। रूपा अगले कुछ देर स...