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रवि नन्दन सिंह का आलेख श्रीनरेश मेहता का विकट जीवन संघर्ष'

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      नरेश मेहता  आमतौर पर समाज किसी भी व्यक्ति की सफलता ही देखता है। उस सफलता के पीछे उसके संघर्षों की भूमिका कितनी रही है, इसे प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है।  श्रीनरेश  मेहता साहित्य में जाना माना नाम है। लेकिन शैशव काल से ही जीवन का जो संघर्ष आरम्भ हुआ वह काफी समय तक चलता रहा। कई रचनाकार तो ऐसे ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने आजीवन संघर्ष किया। उत्कृष्ट रचनाएं लिखी लेकिन जीते जी  वह सम्मान प्राप्त नहीं कर पाए जिसके वे वास्तविक तौर पर हकदार थे। नरेश जी को जीवन के आखिर में साहित्यिक सम्मान, पहचान और स्वीकृति मिल गई। स्वतन्त्र लेखन करने का निर्णय ले पाने का साहस सब कहां कर पाते हैं। रेडियो की लगी लगाई नौकरी छोड़ कर स्वतन्त्र लेखन करने का निर्णय लेना कोई रचनाकार ही कर सकता है। अपनी आत्मकथा में नरेश जी लिखते हैं "धीरे-धीरे मुझे अपने पर से जैसे विश्वास उठता जा रहा था कि स्वतंत्र लेखन करने का मेरा निर्णय क्या सही था? और यदि सही नहीं था तो अब क्या होगा? लौटने के लिए पीठ ओर कहीं कोई भूमि दूर-दूर तक नहीं थी। दिल्ली में लोगों ने इस आत्मघाती निर्णय के लिए कि...