पंखुरी सिन्हा का यात्रा वृत्तान्त 'इतिहास के पन्नों में रचा बसा एक शहर-एल्वस'

 

पंखुरी सिन्हा 


पंखुरी सिन्हा आजकल पुर्तगाल में हैं। इसी क्रम में उन्होंने वहां के खूबसूरत शहर एल्वस की यात्रा की। एल्वस अपने शानदार किलों और कथीड्रल के लिए ख्यात है। आमतौर पर बात जब शहर के किलेबंदी की आती है तो हम एक किले के बारे में जानते हैं लेकिन एल्वस की किलेबंदी पांच स्तरीय है जिसे पंखुड़ी फाइव स्टार सुरक्षा व्यवस्था का नाम देती हैं। अपने यात्रा संस्मरण में वे लिखती हैं 'एल्वस में महल के अलावा कुल 5 किले हैं, जिनमें मुख्य दो हैं फोर्ते दे नौसा सेन्होरा दा ग्रासा, और फोर्ते दे सैंता लूज़िया! ये दोनों किले 5 सितारा सुरक्षा वाले किले हैं, जिनके चारों ओर वही स्टार शेप्ड दीवारों का जादुई नक्शा है। नौसा सेन्होरा शहर के ऊपर, पहाड़ पर है। लेकिन सैंता लूज़िया शहर की दीवारों के करीब है! जब अगली सुबह दीवारों के एक खूबसूरत जंजाल से निकल कर दूसरे में दाखिल होती हुई किले की आदमकद दीवारों तक पहुँची तो किसी मध्ययुगीन इतिहास की किताब के बीच से गुज़रने का सा एहसास हो रहा था।' यह यात्रा संस्मरण इस तरह लिखा गया है जैसे हम खुद एल्वास से हो कर गुजर रहे हों। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंखुरी सिन्हा का यात्रा वृत्तान्त 'इतिहास के पन्नों में रचा बसा एक शहर-एल्वस'।


यात्रा वृत्तान्त 

'इतिहास के पन्नों में रचा बसा एक शहर-एल्वस'


पंखुरी सिन्हा 


एल्वास संभवतः पुर्तगाल का सबसे अधिक किलाबन्द शहर है, जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं 'फोर्टिफाइड'! और मैं वहाँ बिना किसी रिसर्च के सीधे पहुंच गई। सिर्फ इतना पढ़ा था कि एल्वास का किला स्टार शेप्ड है- फाइव स्टार सुरक्षा व्यवस्था है एल्वस की! और रोमांचित हो गई थी। शहर में दाखिल होना ही अनेकों खूबसूरतियों से रुबरु होना था - सबसे पहले सामने खड़ा, साथ चलता मिला था एमोराईरा का अकुआ डक्ट! चार पांच परतों का बना-गोल घुमावदार! उसके खत्म होते ही शुरू हो गई थी पीली दीवार, 'सिटी वाल' मैंने सोचा था लेकिन वैसी साधारण नहीं कि शहर के चारो ओर की दीवार, एक घेरा भर बल्कि तिकोनी, नुकीली, और शहर पर छतनार, किसी फूल के अपने पंख बिखेर देने की तरह! होटल में अपना सामान रख, मैं निकली तो शाम ढलने ढलने को थी, मैंने लपक कर फौरन पूछा, 'काश्तेलो'? अर्थात कासल अर्थात महल?


गली से आगे मुड़ते ही, मेरे सामने एल्वस का खूबसूरत कथीड्रल था, अपने रंग, पत्थरों और वास्तु शिल्प में अनूठा! दरअसल, कथीड्रल एक खूबसूरत अहाते के उस पार था, जिसमें अनेकों खूबसूरत दुकानें और ऐतिहासिक इमारतें थीं। टूरिस्म ऑफिस भी। कासल इस अहाते के पार और आगे था, सो मैं बिना रुके चलती गई। इस अहाते के पार एक और अहाता था! ज़्यादा नहीं तो इतना ही खूबसूरत! और थोड़ा अलग! अप्राचीन! बीच में एक पुरानी पिलरी! और एक सिरे पर बहुत खूबसूरत खिड़की वाला एक प्राचीन, कहें मध्ययुगीन द्वार! ये खिड़कियाँ ऐसे होती हैं कि आर्च अथवा दरवाज़े के ऊपर, इतनी अदा से बैठी होती हैं कि निहारते मन नहीं भरता! और इस ऐतिहासिक अहाते को पार करते ही, बहुत खुले प्रांगण से शहर की परत दर परत दीवारों का एक और अनोखा नज़ारा था। इन्हीं दीवारों के एक सिरे पर खड़ा था एल्वस का प्रस्तर कासल! दृढ़प्रतिज्ञ और चिंतामग्न! दरवाज़ा दिन भर खुला रह कर बन्द हो चुका था लेकिन कासल अपनी भव्य उपस्थिति का जो ठोस, पुख्ता ऐलान कर रहा था उससे पार पाना मुश्किल था।


एल्वास एक्वाडक्ट (एक्वेडुटो दा अमोरेरा)


मैं काफी देर तक उस सम्मोहन में बंधी खड़ी रही! दोनों ओर अर्थात आगे और पीछे लगभग एक पठारी घाटीनुमा खुले मैदान थे, जिनमें शहर की दीवारों का क्रिस क्रॉस जाल मनोरम जादू बिखेर रहा था। और उन दीवारों के पार दोनों ओर मैं देख पा रही थी, दो अलग आलिशान किले! और तब मुझे हड़बड़ी में की गई अपनी भूल का अहसास हुआ। मैंने कहा था कासल, अर्थात महल, अधिकांश शहरों, गाँवों में एक काश्तेलो अर्थात कासल जिसके इतिहास में किले का सा इतिहास होता है। इसलिए पहाडों के ऊपर स्थित किलों को देखना, लगभग तो नहीं लेकिन कुछ कुछ उस शहर के इतिहास से रूबरू होना, उससे गुज़रने जैसा महसूस हो रहा था। शताब्दियों पहले के बस किले ही बचे थे, बाकी शहर में शहर का इतिहास आधा मिलता है, बाकी उसे लिखित और और जगहों पर ढूँढना होता है। बहुत से ऐसे किले मिले, जिनके बारे में बाहर कुछ कुछ लिखा मिला, ऐसा दूरदराज के गांवों में भी हुआ, और बहुत से शहरों में ऐसे किले मिले, जिनके बारे में कुछ भी नहीं लिखा था, या टूट गया था या तोड़ दिया गया था या धूप और बारिश ने लिखे हुए को आमूल-चूल मिटा दिया था।


ग्वार्दा और विसेऊ के बीच स्थित एक प्यारे शहर शेलरिको दे बेईरा के किले का कुछ ऐसा ही किस्सा है! किला काफी खूबसूरती से शहर के ऊपर खड़ा है, लिखा हुआ खंभा भी खड़ा है, लेकिन बारिश और धूप की कृपा ऐसी बरपी है कि एक एक अक्षर मिट गया है, उड़ गया है। जबकि दीवारें सब ठीक-ठाक हैं, और restoration अर्थात मरम्मत का काम भी बहुत पहले का नहीं लगता, ऊँची, लम्बी, हरी घास के बीच लोहे की सीढ़ियां हैं जिन पर चल कर मैने भी आँगन के बीच के कठिन उबड़-खाबड़ रास्तों को पार किया-बात का सार यह है कि वह महल, बस शाही आवास नहीं, अपने में एक किला समेटे हुए भी लगता था। ग्वार्दा ही नहीं समूचे पुर्तगाल के अनेकों किलों के साथ यह बात है-जैसे ब्रगैंजा के अभूतपूर्व किले को लीजिये-जो पहले ही मिलिटरी म्युज़ियम के भीतर स्थित है और जिसके इतिहास में राज्य का इतिहास कूट कूट कर भरा है!


Forte de Nossa Senhora da Graça


किन्तु, ऐल्वस की तो कथा ही अलग है! एल्वस में महल के अलावा कुल 5 किले हैं, जिनमें मुख्य दो हैं फोर्ते दे नौसा सेन्होरा दा ग्रासा, और फोर्ते दे सैंता लूज़िया! ये दोनों किले 5 सितारा सुरक्षा वाले किले हैं, जिनके चारों ओर वही स्टार शेप्ड दीवारों का जादुई नक्शा है। नौसा सेन्होरा शहर के ऊपर, पहाड़ पर है। लेकिन सैंता लूज़िया शहर की दीवारों के करीब है! जब अगली सुबह दीवारों के एक खूबसूरत जंजाल से निकल कर दूसरे में दाखिल होती हुई किले की आदमकद दीवारों तक पहुँची तो किसी मध्ययुगीन इतिहास की किताब के बीच से गुज़रने का सा एहसास हो रहा था। इन दीवारों की खूबसूरती के पार था, आदमकद दरवाज़ा किले का! इस दरवाजे के पार, दीवारों का एक घेरा और है, जिसके बाद स्थित है पीले रंग का यह किला! दरवाज़े के भीतर, एक सैनिक संग्रहालय है जहाँ मध्य काल से लेकर 19वीं शताब्दी तक के हथियारों की वृहत प्रदर्शनी है, एक मुख्य केन्द्रीय प्रांगण, गवर्नर के घर, और एक ऐतिहासिक चैपल के साथ साथ!


दरअसल, दीवारों की घेरेबंदी के पार बल्कि ठीक उसके बीच स्थित इस किले के सौंदर्य को शब्दों में उतारना कठिन है। और दरअसल, इस सौंदर्य के ठीक रुबरु होना ही मुश्किल है। इसको न ऐन सामने खड़े हो कर देखा जा सकता है, न ही दूर से! केवल ठीक उँचाई के कुछ कोणों से इसका वह असल रूप सामने आता है। भीतर तो सुन्दर है ही, किन्तु बाहर खड़े होने पर इसकी बनावट और बनाने वाले की कल्पना दोनों के बारे में ढेरों सवाल जागते हैं।


Forte santa Luzia


किले का निर्माण 17वीं शताब्दी की उस अवधि में हुआ, जिसे पुर्तगाली इतिहास में restoration काल कहा जाता है। 1641 में मताएश दे एल्बाकर्की, काऊंट ऑफ़ अलेग्रेट, restoration युद्ध के दौरान सेना के वरिष्ठ अफसर, ने किले की चौकोर रूप रेखा खींची और उसी साल, सेबास्तियो फ्रायस ने इसमें एक पंचकोणीय सुरक्षा व्यवस्था जोड़ते हुए इसके आकार और इसकी क्षमताओं में बहुत इजाफा किया। यहां restoration शब्द की गहराई से व्याख्या ज़रूरी है, क्योंकि अमूमन restoration काल से भारतीय इंग्लैंड के उस समय को इंगित समझते हैं जो 1649 में राजा की हत्या और कॉमनवेल्थ की स्थापना के बाद crown का restoration काल है और जो 1660 से 1688 तक चला। लेकिन, पुर्तगाली इतिहास में restoration का समय 1640 से 1668 के उन 28 सालों को कहते हैं जब पुर्तगाल और कास्तील के बीच लगातार युद्ध चला। इस युद्ध को पुर्तगाली इतिहास में restoration का युद्ध इसलिए कहते हैं क्योंकि इसने पुर्तगाल में 1580 से ले कर 1640 तक चलने वाले होब्सवर्ग राजवंश के स्पेनी शासन का अन्त कर, 1668 की लिस्बन सन्धि के बाद, पुर्तगाली राजा को दुबारा गद्दी पर बिठाया। ये राजा थे पुर्तगाल के छठे अफोंसो, जिन्होंने स्पेन के चार्ल्स द्वितीय के साथ लिस्बन सन्धि पर हस्ताक्षर कर पुर्तगाल को दुबारा आज़ाद किया। यह लड़ाई हालाकि पुर्तगाल में अनेकों जगहों पर लड़ी गई, लेकिन एल्वस में हर कहीं जैसे युद्ध की छाया है, एक बीते युद्ध की, गुजरी हुई सैन्य परम्परा की, जो उसे बहुत खास बनाती है। सैंता लूज़िया का किला एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ सा खड़ा दिखता है।


स्पेन की सरहद और बादाजोज़ शहर दोनों 30 किमी से भी कम दूरी पर हैं, इस बात को लगातार महसूसा जा सकता है। आज के इस आधुनिक दौर में, इन दूरियों का अर्थ बिल्कुल बदल चुका है लेकिन उस 17वीं सदी की लड़ाई में कई बार इस किले की घेरेबंदी हुई। किन्तु, किले पर कभी कब्ज़ा नहीं हो पाया और यह आज भी पुर्तगाली अस्मिता के शाश्वत बयान की तरह, बुलंद खड़ा है।


Forte da Piedade


एल्वस के चार और किलों, फोर्ते दा पिएदाद, फोर्ते दे साओ फ्रांसिस्को, फोर्ते दे साओ ममीद और फोर्ते दे साओ पेद्रो के साथ यह एल्वस को एक अभेद्य गढ़ बनाती सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा था! ज़ाहिर सी बात है कि, एल्वस के खूबसूरत सिटी वॉल्स भी इस सरहदी इन्तज़ामात का हिस्सा थे। आज भी एल्वस एक सीमा प्रहरी शहर के रूप में जाना जाता है। गौरतलब है कि आज एल्वस के ट्रेन स्टेशन से बादाजोज़ की खूबसूरत यात्रा, बड़ी आसानी से मात्र 15 मिनट में पूरी की जा सकती है। और एल्वस से मात्र 1 किमी दूर, मोन्त दा ग्रासा नामक पहाड़ी पर स्थित है दूसरा बड़ा किला--सेन्होरा दा ग्रासा, जिसका ओफिशिअल नाम कोंद दा लिपे या ला-लिपे का किला है। सैंता लूज़िया की तरह ही, इसका निर्माण भी इसी restoration की लड़ाई के दौरान हुआ और 2012 में ये दोनों किले UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित हुए। 


Forte of sao Francisco 


किला सेन्होरा की 5 सितारा योजना दरअसल दुहरी है, और किले की 5 सितारों वाली दीवार के पार, सुरक्षा की एक परत और है, जिसकी आरी तिरछी नुकीले कोण बनाती, सैनिक तैनात करने वाले टावर खड़े करती, दीवारें 5 से भी अधिक संख्या में दिखाई देती हैं। 


Forte De Nossa Senhora da Graca


सेन्होरा दा ग्रासा का इतिहास 1668 की लिस्बन सन्धि तक ही सीमित नहीं, बल्कि उसके बाद 1756 से 1763 तक के सात वर्षीय युद्ध में, जिसमें यूरोप की लगभग सभी ताकतें शामिल थीं, और जिसकी कुछ लड़ाईयां उत्तरी अमेरिका से ले कर भारतीय प्रायद्वीप तक लड़ी गई, भी इस किले ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसके बाद, 1801 में वार ऑफ़ ऑरेंजेज़ में और फिर 1811 में पेनिनसुलर वार में भी इस किले का पुर्तगाली सुरक्षा में महती योगदान रहा।


इतने समृद्ध इतिहास वाले किले के पास खड़े होना ही, अपने आप में एक विलक्षण अनुभव था। आप कितना भी देखें, कितना भी चलें, कुछ न कुछ हमेशा बच जाएगा एल्वस नाम के शहर में और आप खुद को कहता पाएँगे अगली बार! अव्वल तो वो दरवाज़े, जो उन दीवारों के मोहक घेरों से आपको अंदर बाहर करते हैं, जिनके साथ साथ चलते, आप शहर के भीतर कहीं भी पहुँचते हैं--वो दरवाज़े अपने आप में एक पर्यटन स्थल हैं! एक दरवाज़े से हो कर, दूसरे में प्रवेश करते, कितनी ही बार मैं रुकी, अचम्भित हुई, 'कहाँ से कहाँ पहुंची?', - इतिहास की एक पट्टी, इधर भी है, उधर भी- खूबसूरत ये दरवाज़ा भी है, वो भी- जून के महीने में- शहर एल्वस, प्रान्त पोर्तालेग्रे की तीखी तेज़ धूप में---फोटो-वीडियो नोट्स बनाती- इधर से उधर हुई- किन्तु, दीवारों का न एकबारगी ओर समझ आया, न छोर! एल्वस की दीवारें ऐसी नहीं हैं, जिन्हें आप देख कर, जिनके बीच चल कर एकबारगी समझ जाएँ! न समझना भी भ्रमण का एक विकल्प है, किन्तु समझ लेना उससे ज़्यादा सुंदर भ्रमण !


दीवारों के बारे में महत्वपूर्ण यह है कि वे किलों से पुरानी हैं। महल भी किलों से पुराना है। महल दरअसल, पुर्तगाल के चौथे राजा साँचो द्वितीय द्वारा 13 वीं शताब्दी की शुरुआत में बनवाया गया। हालाकि, एक थ्योरी इसके मूरिश किला होने के बारे में भी है- अर्थात पुर्तगाल के 'रेकॉन्क्वेस्ट' से पहले, इस्लामिक आक्रमण और शासन के दौरान बने होने की थ्योरी! यह द्वंद्व पुर्तगाल के अनेकों किलों के आसपास है- जबकि मौंतमोर के किले पर साफ़ मूरिश मुहर लगी है, इस बहुत महत्वपूर्ण तथ्य के साथ कि इस्लामिक आक्रमण के पूर्व यहाँ ईसाई सभ्यता थी और यह हिस्सा कभी रोमन साम्राज्य का हिस्सा था! जो भी हो, महल के आज बुलंद खड़े होने की कथा- राजा सांचो द्वितीय की देख रेख से शुरू होती है - जिनका राज्य काल 1223 से 1248 तक का रहा! राजा सांचों के उत्तराधिकारी राजा दिनिस प्रथम (1279-1325) ने बाकायदा महल के इर्द गिर्द एक शहर बसाने के लिए, चार्टर जारी किया। उसके बाद के तमाम राजाओं ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था में इजाफ़ा करते हुए, उसे वह अस्त्रधारी शहर बनाया जो वह आज है!


दीवारों को महल से ही शुरू करें, दीवारों की भूल भुलैय्या दुहरी नहीं, दरअसल तिहरी है! सबसे बाहरी घेरा, जो सबसे बाद में, राजा फर्नान्दो (1367-1383), द्वारा जोड़ा गया, और बाद के राजाओं, जुआऊँ द्वितीय और मैनुएल प्रथम द्वारा जिसे लगातार पुख्ता किया गया- उसमें शुरुआती दौर में कुल बाईस वाच टावर थे, और ग्यारह दरवाज़े, जो बाद में, 17 वीं शताब्दी के परिष्कारों के बाद घट कर तीन रह गए- एवोरा, ओलिवेंसा और साओ विसेंते!


अन्य कई दरवाज़ों के साथ साथ, ओलिवेंसा नामक दरवाज़े से गुजरने का मुझे अवसर मिला और मैं पक्के तौर पर कह सकती हूँ कि यह तस्वीर से भी अधिक खूबसूरत है! आलिशान संगमरमरी दरवाज़ा नक्काशीदार, जिसपर कई जानवरों समेत अन्य मोटिफ बने हैं। इन दीवारों का कुछ हिस्सा, शहर के बढ़ते आकार में समाहित भी हो गया अथवा कर लिया गया! ग्वारदा के पास सेड्या नामक एक प्यारे से शहर का किस्सा यह है कि किले की दीवार के नाम पर ज़रा सा, लगभग सौ मीटर लम्बा टुकड़ा बचा है बाकी सारा तोड़ कर लोग अपने घर ले गये, अपने अपने घर बनाने की खातिर! यह किस्सा मुझे सेड्या के ही, एक उम्रदराज़ व्यक्ति ने बताया! बहुत सम्भव है कि दीवारों के बीच से आधे अधूरे गायब हो जाने के कारण, इनकी बनावट और संरचना को देख कर समझने में थोड़ी कठिनाई होती हो! लेकिन शुक्र, उस बचे हुए हिस्से का है जो एक नज़र में बताती है कि दीवार पुख्ता थी और अब भी पुख्ता है!


सबसे बाहरी और सबसे भीतरी दीवारों के बीच की दीवार के भी कुछ हिस्से शहर के भीतर विलीन हो चुके हैं लेकिन बचे हुए हिस्सों की खूबसूरती कायम है--दरवाज़ों समेत! इस दीवार में चार आदमकद दरवाज़े हैं--- फेरादा गेट, न्यू गेट अथवा गेट ऑफ़ द इंकारनेशन, सैंटिआगो गेट, और बिशप गेट! इनमें से बिशप गेट से मैं निश्चित रूप से गुज़री हूँ, मुझे लगता है कि सैटिआगो समेत कुछ और से भी! विडंबना यह है कि इतनी मिहनत और मुश्किल से बनाये अपने वीडियो भी ढूँढ़े नहीं मिलते ऑनलाइन-  कि क्या लम्हा था जब मैं खड़ी थी इस फाटक के मुहाने पर! ऐसे में एक बार फिर समझ आती है, लिखे और संभाले हुए शब्दों की महिमा! और एक विडंबना यह भी है कि शायद लिखे हुए शब्द न संभाल पाएं या बयान कर पाएं, वो एहसास जो ऐसे एक फाटक से दाखिल हो कर दूसरे से निकलने में होता है--मानो आप साक्षात समय की यात्रा कर रहे हों- एक किस्म का टाइम ट्रेवल !


सबसे भीतरी दीवार शहर के सबसे ऊँचे बिंदु पर है - और उसके पुरातन, प्राचीन द्वारों में से दो आज तक बचीं हैं- एल्काकोवा गेट और मिरादिएरो गेट! ध्यान रहे कि ये एल्काकोवा द्वार उसी गाँव के नाम पर है जहाँ सेन्होरा दा ग्रासा का बड़ा किला है, और एल्काकोवा शब्द ही दरअसल अरबी का है, जिसका मतलब है किला ! यहाँ इन दरवाज़ों से दिखने वाले नज़ारे भी बहुत महत्वपूर्ण हैं - बहुत सम्भव है कि गेट गाँव की ओर का नज़ारा दिखाता हो!


ये दीवारें फैलते फैलते काफी दूर तक फैली हुई हैं- जिन्हें हम सिटी वाल्स कह रहे हैं, उनका तिहरा घेरा महल से शुरू हो कर शहर की पुरानी सीमा पर जहाँ खत्म होता है, उससे थोड़ी ही दूर सैंता लूज़िया किले की दीवार का दुहरा तिहरा घेरा शुरू होता है!


फिर, यहाँ स्थित आलिशान और आदमकद अक्वा डक्ट, इसका निर्माण 1537 में शुरू हुआ और एक लम्बे पेचीदगियों से भरे संघर्ष के बाद लगभग 1620 के आसपास पूरा हुआ, जब एल्वस शहर में पहली बार पानी आया, और सबसे पहले चर्च ऑफ मैडेलिना के फव्वारे तक पहुंचा! 23 जून 1622 में, फोन्ते दा मिसरेकॉरदिया (चैरिटी चर्च), के साथ साथ, इस अक्वा का बाजप्ता उ‌द्घाटन हुआ। इसका नाम एमोराईरा का एक्वा इसलिए है क्योंकि यह आठ किलोमीटर दूर स्थित नामक गाँव से एल्वस के गैरिसन टाउन में पानी लाने का काम किया करता था। इसके इर्द-गिर्द और आसपास चले बिना, कतई शहर न छोडियेगा! पुर्तगाल के वैसे ही बहुत खूबसूरत हैं, यह संभवतः उनमें सबसे बड़ा और सबसे खूबसूरत भी है।

एक बन्दूकधारी सैनिक भी मिलेगा डाउन टाउन की राह में, और राजा सान्चो द्वितीय की मूर्ति एक्वा डक्ट की राह में! बावजूद इस तरह इतिहास के पन्नों में रचे बसे होने के, एल्वस एक जीता जागता आधुनिक शहर है। खूबसूरत दुकानें, रेस्तराँ, लोग, और हर कहीं कुछ न कुछ अवशेष उस समृद्ध अतीत का, जो एल्वस को प्रान्तीय, सरहदी शहरों का सरताज बनाता है। मसलन, सरेराह एक मिलिटरी टावर अपने पूरे परिचय के साथ स्वागत में खड़ा हुआ! हिस्टॉरिक सेंटर से ज़रा आगे बढ़ते ही मिलने वाला 'आई लव एल्वस' का लाल दिल वाला साइन, आप को अपने लिखे अनुरूप मनवा देगा, यकीन मानिये !



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