कैथरिन मेन्सफील्ड की कहानी 'नाशपाती का पेड़'


कैथरिन मेन्सफील्ड


जीवन को जीने का सबका अपना अलग तरीका होता है। इसका कोई एक ढांचा नहीं होता। इसीलिए सब इसे अपने अंदाज में जीने की कोशिश करते हैं। कैथरीन मैन्सफील्ड नैसर्गिक रूप से स्वच्छंद स्वभाव वाली महिला कहानीकार थीं। परंपरागत रूप से स्त्रियों का अनिश्चित भविष्य वाला जीवन उन्हें पसन्द नहीं था। इस विचार ने ही उनमें विद्रोह का बीज-वपन कर दिया। खुद कैथरीन भी अपने जीवन को अपेक्षित मोड़ न दे सकीं जिससे उनका स्वभाव असंतुलित और जीवन अव्यवस्थित रहा। आरंभ में जीवन की कठोरताओं ने उसकी रचनाओं को भी कटुता तथा तीखे व्यंग्य से पूर्ण बनाया। सोलह साल की उम्र में ही अपनी स्कूली दोस्त को लिखे पत्र में उसकी स्वाभाविक स्वतंत्रता की स्पष्ट झलक मिलती है: मैं किस कदर चाहती हूँ कि सभी स्त्रियों का एक निश्चित भविष्य हो- क्या तुम नहीं चाहती? बैठे-बैठे एक अदद पति का इंतजार करने के ख्याल से ही मुझे सख्त नफरत है, लेकिन बहुतेरी लड़कियाँ तो ऐसे ही सोचती हैं। ... तुम्हारी इस ख्वाहिश के बारे में पढ़ कर मैं मुस्कुरा उठी कि तुम अपनी तकदीर खुद बनाना चाहती हो- ओह, कितनी ही बार मैंने खुद भी ऐसा ही महसूस किया है। मेरी ललक है कि मैं परिस्थितियों को अपने वश में कर सकूँ। काफी बाद में चेखव के प्रभाव से उसने लेखन के साथ लेखक के जीवन में भी अच्छाई का महत्व समझा। कैथरीन आधुनिकतावादी कहानीकार थी तथा अपनी रचनाओं की भावात्मक शैली एवं प्रयुक्त प्रतीकात्मकता को यथासंभव यथार्थवादिता से किनारा नहीं करने देती थी। इसके साथ ही उसकी रचनाओं में आद्यन्त विद्यमान पठनीयता भी अतिरिक्त वैशिष्ट्य प्रदान करती है। कवि श्रीकान्त वर्मा ने कैथरिन मेन्सफील्ड की कहानी 'नाशपाती का पेड़' का अनुवाद किया था जो धर्मयुग के जुलाई 1959 अंक में प्रकाशित हुआ था। मनोज मोहन ने अपने पुराने खजाने से इसे खोज कर पहली बार के लिए भेजा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कैथरिन मेन्सफील्ड की कहानी 'नाशपाती का पेड़'।


कहानी

'नाशपाती का पेड़'


कैथरिन मेन्सफील्ड 

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद : श्रीकान्त वर्मा)


प्रस्तुति : मनोज मोहन


आयु तीस हो जाने पर भी कभी-कभी बर्था यंग के जीवन में ऐसे क्षण आते थे, जब उसकी इच्छा होती थी कि वह चलने के बजाय दौड़े, फुटपाथ पर और सड़क पर नृत्य की लय में चरण उठाने का प्रयत्न करे, स्कर्ट को हिलाये और घुमाये, हवा में कोई चीज़ उछाले और फिर उसे लोक ले या फिर अपने आप केवल हँसती हुई खड़ी रहे।

अगर आपकी आयु तीस है और अपने ही रास्ते पर मुड़ते हुए अगर एकाएक सुख-विशुद्ध सुख—की भावना आपको इस तरह अभिभूत कर ले, जैसे आपने ढलती दोपहर की धूप का एक टुकड़ा निगल लिया हो और वह आपकी छाती में जल रहा हो और प्रत्येक अँगुली में, एड़ी में, रंध्र-रंध्र में चिनगियों का एक फव्वारा छूट रहा हो, तो आप क्या करेंगे?

आह! क्या बिना पिये और बेढंग हुए, उसे अन्य किसी विधि व्यक्त नहीं किया जा सकता? सभ्यता कितनी बेहूदी है। अगर एक दुर्लभ सितार की तरह इसे डिब्बे में ही रखना है, तो इस शरीर का उपयोग ही क्या?

'नहीं, जो मैं ठीक-ठीक कहना चाहती हूँ, वह सितार के बारे में नहीं है।' सीढ़ियों पर दौड़ते हुए और अपने बैग में कुंजी ढूँढ़ते हुए, —जिसे उसने हमेशा की तरह आज भी बिसरा दिया था, —और डाक का डिब्बा ठकठकाते हुए उसने सोचा, 'मेरा मतलब यह नहीं, क्योंकि — धन्यवाद, मेरी!' उसने हाल में प्रवेश किया। 'नर्स लौट आयी?'

'जी हाँ, मादाम!'

'और फल आ गये?'

'जी हाँ, मादाम! हर चीज़ आ गयी।'

'फल डाइनिंग रूम में ले आओ। ऊपर जाने से पहले मैं उसकी व्यवस्था कर दूँ।'


डाइनिंग रूम में साँझ का झुटपुटा-सा था और सर्दी थी, तथापि बर्था ने अपना कोट उतार कर फेंक दिया। उसे कोट का चुस्त आलिंगन एक क्षण भी सह्य नहीं था और ठंडी हवा उसके बाहुओं पर बिछलने लगी। 

लेकिन उसके वक्ष में अभी भी वह चमकदार उजली जगह थी और उससे प्रसृत होता नन्हीं चिंगारियों का वह फव्वारा; वह लगभग असह्य था। अग्नि के तीव्र होने के भय से उसमें साँस लेने का भी साहस नहीं था और फिर भी वह गहरे लम्बे-लम्बे साँस ले रही थी। ठंडे आइने में अपना प्रतिबिम्ब देखने का भी साहस उसमें नहीं था और फिर भी उसने देखा और पाया कि वह बड़ी-बड़ी और काली-काली आँखों और फड़फड़ाते होठों वाली एक मुस्कान भरी प्रसन्न स्त्री है और उसके आसपास एक ऐसा आभास जैसे वह किसी ऐसी दिव्य घटना की प्रतीक्षा कर रही हो, जिसकी अनिवार्यता से वह अवगत हो!


मेरी एक ट्रे पर फलों के साथ एक गिलास और एक अत्यन्त मनमोहक नीली तश्तरी ले आयी, जिसमें एक अद्भुत धवलता थी—जैसे वह दूध-धुली हो।

'बत्तियाँ जला दूँ, मादाम?'

'नहीं, धन्यवाद। मुझे ऐसे ही अच्छी तरह दिखायी दे रहा है।'

स्ट्राबेरियों के बीच सजे हुए थे कुछ सेब और सन्तरे! पीली नाशपातियाँ सिल्क की तरह चिकनी, श्वेत फूलों से आच्छादित कुछ श्वेत अंगूर और एक बड़ा नारंगी रंग का गुच्छा! यह गुच्छा उसने डाइनिंग रूम के नये गलीचे से मैच करने के लिए ख़रीदा था। उसने दूकान में ही सोचा था, 'कुछ नारंगी रंग के भी ख़रीदने चाहिए, ताकि गलीचे और टेबल में असमानता न हो।' और उस समय उसे इस बात में कुछ सच्चाई नज़र आयी थी।

इनका कार्य सम्पन्न कर चुकने और इन गोल-गोल उजली वस्तुओं के दो पिरामिड बना चुकने के उपरान्त, उसका प्रभाव देखने के लिए वह टेबल से कुछ दूर खड़ी हुई—और वह सचमुच अद्भुत लगा। लगा कि मद्धिम आलोक में टेबल पिघल गया हो और ग्लास, तश्तरी और नीला पात्र हवा में तैर रहे हों। उसकी वर्तमान मनःस्थिति में उसे यह इतना सौन्दर्य-पूर्ण लगा कि... वह हँसने लगी।

'नहीं, नहीं मैं उत्तेजित नहीं हो रही हूँ।' और उसने अपना बैग और कोट उठाया और शिशु कक्ष की ओर लपकी।

नन्हीं 'बी' को स्नान कराने के उपरान्त भोजन कराती हुई नर्स एक छोटी टेबल पर बैठी थी। बच्ची ने एक नीली ऊन की जाकेट और एक फ्लैनल गाउन धारण किया था और सुन्दर काले केश सँवर कर एक नन्हीं चोटी में बँधे थे। उसने अपनी माँ को देखा और मचलने लगी।

'नहीं, मेरी मुन्नी! एक अच्छी लड़की की तरह भोजन कर लो।' नर्स ने एक ऐसे ढंग से मुँह बिचकाते हुए कहा, जिससे बर्था परिचित थी और जिसका अर्थ था कि वह कमरे में एक और ग़लत क्षण में आ गयी है।

'यह ठीक रही, नैनी?'

'यह दोपहर भर कुछ प्रसन्न रही।' नैनी फुसफुसायी, 'हम बगीचे गये और वहाँ पर एक कुर्सी पर बैठे और इसे प्राम से उतारा और एक बड़ा-सा कुत्ता साथ आया और अपना सिर जाँघ पर रख दिया और इसने उसके कान खींचे। काश! आपने उसे देखा होता!'


वर्धा ने पूछना चाहा, क्या उसे एक अपरिचित कुत्ते के कान खींचने की अनुमति देना ख़तरनाक नहीं था? किन्तु वह यह न पूछ सकी। वह अपने हाथ बगल में किये खड़ी उन्हें देखती रही, मानों गुड़िया लिये हुए एक धनी बालिका के सामने एक नन्हीं ग़रीब बच्ची खड़ी हो। बच्ची ने उसे एक बार देखा और फिर ऐसी मोहक मुस्कान मुस्कायी कि बर्था से यह कहे बिना नहीं रहा गया 'ओह, नैनी! मुझे उसे भोजन कराने दो और इस बीच तुम स्नान का सामान जुटाओ।'

'मगर मादाम! भोजन कराते समय उसे इस गोद से उस गोद करना उचित नहीं होगा।' नैनी ने अभी भी फुसफुसाते हुए कहा 'इससे वह अस्थिर हो जाती है; बहुत संभव है वह मचल जाए।'

बकवास! अगर बच्चे को एक दुर्लभ सितार की तरह डिब्बे में बन्द नहीं रखना है, बल्कि एक परायी गोद में रखना है, तो सन्तान की आवश्यकता ही क्या है?'

'नहीं, उसे मुझे दो।'

अपमानित नैनी ने बच्ची को उसकी गोद में दे दिया।

'और भोजन के बाद उसे उत्तेजित मत कीजिएगा। आप ऐसा करती हैं मादाम! और उसके बाद मुझे भोगना पड़ता है।'

शुक्र है खुदा का। स्नान के तौलिये लिये हुए नैनी कमरे के बाहर चली गयी।


बच्ची उसकी ओर झुकी तो बर्था ने कहा, 'मेरी लाडली, अब कहीं जाकर मैंने तुझे पाया है।'

चम्मच के लिए अपने ओंठ भींचती और उसके बाद हाथ हिलाती वह मजे से भोजन करती रही। कभी वह चम्मच नहीं छोड़ती और कभी जब बर्था चम्मच भर चुकती तो वह उसे चन्दा मामा को दे देती।

जब सूप समाप्त हो गया, तो बर्था अँगीठी की ओर मुड़ी। 'तू बड़ी प्यारी है।' उसने अपनी बच्ची के पुष्ट शरीर को चूमते हुए कहा, 'तू सचमुच बड़ी प्यारी है। तू मुझे सुहाती है।'

और सचमुच उसने नन्हीं 'बी' को इतना प्यार किया—उसने आगे अपनी गर्दन झुकायी और उसकी अद्भुत सुन्दर एड़ियाँ अँगीठी के प्रकाश में चमक कर जैसे पारदर्शी हो उठीं—कि सुख की उसकी समग्र अनुभूति पुनः लौट आयी और एक बार फिर वह नहीं समझ सकी कि इसे कैसे व्यक्त किया जाए? इसका क्या हो?

विजय गर्व में लौटती और अपनी नन्हीं 'बी' को सँभालती नैनी ने कहा, 'आपका फ़ोन है।'

वह नीचे लपकी। हैरी था।

'ओह! बर्था तुम हो। सुनो, मुझे देर हो जाएगी, मैं टैक्सी लूँगा और जल्द-से-जल्द आने का प्रयत्न करूँगा। पर तुम डिनर दस मिनट में लगा दो—लगा दोगी? और सब ठीक है?'

'हाँ, बिल्कुल ठीक है। ओह, हैरी!"

'हाँ?'

उसे क्या कहना था? उसके पास कहने को कुछ न था। वह केवल एक क्षण के लिए उसका स्पर्श चाहती थी। वह चीख कर यह भी नहीं कह सकी: 'क्या आज का दिन दिव्य नहीं था?'

'क्या हुआ?' पतली आवाज़ आयी।

'कुछ नहीं।' बर्था ने कहा और यह सोचते हुए रिसीवर लटका दिया कि सभ्यता बेहूदी से भी कुछ कितनी अधिक है!


उनके अतिथि डिनर पर आ रहे थे। एक सुखी दम्पती नार्मन नाइट्स—पति एक थियेटर आरम्भ करने जा रहा था और पत्नी गृह-सज्जा में दिलचस्पी लेती थी; नवयुवक एडी वारेन—जिसने अभी हाल में ही अपनी कविताओं का एक छोटा-सा संग्रह प्रकाशित किया था और जिससे हर कोई भोजन का आग्रह कर रहा था तथा बर्था की एक खोज—पर्ल फल्तन। मिस पर्ल फल्तन क्या करती हैं, बर्था को ज्ञात नहीं था। उनकी भेंट एक क्लब में हुई थी और बर्था उसे चाहने लगी थी, जिस तरह वह हर रहस्यमय स्वभाव वाली सुन्दर नारी को चाहने लगती थी।

मज़ा यह था कि उन दोनों में भेंट-मुलाक़ात और बातचीत कई बार हो चुकी थी, पर वर्षा के सामने वह अभी तक खुली न थी। एक सीमा तक तो मिस फल्तन अद्भुत स्पष्टवादिनी थी; मगर वह सीमा तो वहाँ थी ही और उसके आगे वह नहीं बढ़ती थी।

क्या उसके आगे भी कुछ है? हैरी कहता, 'नहीं।' उसे सुस्त क़रार देता और कहता, वह समस्त सुन्दर महिलाओं की तरह उमंगहीन है और उसका मस्तिष्क शायद कुछ जटिल भी है।' लेकिन बर्था उससे कभी भी सहमत नहीं होती और अभी तक किसी भी शर्त पर सहमत नहीं थी।

'नहीं, हैरी! वह एक ओर सिर झुका जिस मुद्रा में बैठती है, उसके पीछे अवश्य कोई न कोई राज है और मुझे यह पता लगाना है कि वह क्या है?'

'बहुत सम्भव है, इसका कारण उसका अच्छा हाजमा हो।' हैरी कहता।

उसने बर्था पर इस प्रकार के उत्तरों की झड़ी लगाने का नियम बना लिया था—'पत्थर का जिगर है मेरी जान।' या 'विशुद्ध गैस्ट्रिक तकलीफ़' या 'गुर्दे की बीमारी' और इसी तरह। कुछ विभिन्न कारणों से बर्था को यह पसन्द आता और उसकी यह चीज़ उसे अत्यन्त प्रिय लगती।

वह ड्राइंगरूम में गयी और अँगीठी सुलगायी; फिर कुशन— जिन्हें मेरी ने लापरवाही के साथ यहाँ-वहाँ बगरा रखा था— एक के बाद एक उठाती हुई कुर्सियों और कोचों पर फेंका। इससे समूचे वातावरण में परिवर्तन आ गया, कमरा जैसे जीवित हो उठा। आख़िरी कुशन एकाएक उसने अपने वक्ष से चिपका स्वयं को जैसे चकित-सा कर दिया— वह उसे अपने वक्ष पर भरपूर चिपकाये बल्कि दबाये रही। लेकिन इससे उसके वक्ष की आग नहीं बुझी। आह! बल्कि बढ़ गयी।


ड्राइंग रूम की खिड़की एक बगीचे की ओर एक बालकनी में खुलती थी। दूर कोने में दीवार के सामने एक पतला नाशपाती का पेड़ था, सम्पूर्ण खिला हुआ, बौराया; वह नीले-हरे आकाश की पृष्ठभूमि में शान्त तन्मय खड़ा हुआ था। बर्था ने इतनी दूर से भी अनुभव किया कि उसमें एक भी अविकसित कलीया मुर्झाया पत्ता नहीं है। नीचे बगीचे में फूलों से लदे हुए लाल-पीले ट्यूलिप जैसे झुटपुटे पर झुके हुए था। एक भूरी बिल्ली पेट के बल लॉन पर सरक रही थी और उसकी छाया— एक काली बिल्ली—उसका अनुसरण कर रही थी। वे इतनी सधी हुई और चौकन्ना थीं कि बर्था को एक विचित्र-सी कँपकँपी हुई।

'बिल्लियाँ भी कैसी सरकने वाली जीव हैं! वह हकलायी और खिड़की से हट गयी और चहलक़दमी करने लगी।

उष्ण कमरे में जाँक्विल की गंध कितनी तीव्र थी! बहुत तीव्र! ओह, नहीं! और फिर भी मानो गंध में नहाती हुई वह कोच पर पसर गयी और अपनी हथेली से अपनी पलकें दबायीं।

मैं बहुत खुश हूँ—बहुत।' वह बुदबुदायी।

और उसने अपनी पलकों पर अपने जीवन के प्रतीक के रूप में उस सम्पूर्ण खिले पुष्प-लदे नाशपाती के पेड़ को देखा।

सचमुच उसे किसी चीज़ का अभाव नहीं था। वह युवा थी। हैरी और वह, दोनों ही एक-दूसरे को हमेशा की तरह प्यार करते थे और दोनों का जीवन आनन्द से व्यतीत हो रहा था और वे एक सुखी दम्पती थे। उनकी एक प्यारी बच्ची थी। उन्हें पैसे की चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी। उनके पास यह अत्यन्त सन्तोषजनक मकान और उद्यान था। और मित्र—आधुनिक, रोमांचक मित्र, लेखक और चित्रकार और कवि या सामाजिक प्रश्नों के प्रति जागरूक लोग ठीक वैसे ही जैसी उन्होंने कामना की थी। और उन‌के पास पुस्तकें थीं और संगीत था और उसे एक अद्भुत नन्हा सा ड्रेसमेकर उपलब्ध हो गया था और उनका रसोइया सर्वोत्तम आमलेट बनाता था...।


'बकवास!' वह उठ बैठी, किन्तु उसने चक्कर-सा अनुभव किया—नशा! वह निश्चय ही वसन्त ऋतु रही होगी।

हाँ, वह वसन्त ही था। वह इतनी थक चुकी थी कि कपड़े बदलने भी ऊपर नहीं जा सकी।

श्वेत वस्त्र, मूँगों की एक माला, हरे जूते और मोज़े। यह सोद्देश्य नहीं था। ड्राइंग-रूम की खिड़की पर खड़े होने के घंटों पहले ही उसने यह योजना बनायी थी।

हाल में पंखुरियाँ हौले से चरमरायीं और उसने मिसेज नार्मन नाइट को चूमा, जो सबसे दिलचस्प कोट उतार रही थी और उसके बार्डर पर और सामने काले बन्दरों का एक जुलूस था ।

'...क्यों? मध्य वर्ग इतना मनहूस क्यों है—क्यों उसके पास हास्य की इतनी भी प्रतिभा नहीं। प्रियवर यह सुखद संयोग ही है कि मैं यहाँ ज़रा भी हूँ—नार्मन इसका कारण है। मेरे प्रिय बन्दरों ने जुलूस को इस तरह अव्यवस्थित किया कि वे एक हो गये और अपनी आँखों मुझे चबा डाला। वह हँसा नहीं। उसने इस बात का आनन्द नहीं लिया कि मैंने उसे प्यार किया। नहीं वह देखता रहा और मुझे उबाता रहा।'

'लेकिन सबसे मज़ा तो तब आया' नार्मन ने कछुआ-कवच जैसा एक बड़ा-सा एकनेत्रीय चश्मा आँख पर दबाते हुए कहा, 'मैं यह बयान करूँ तो तुम्हें आपत्ति तो नहीं होगी, फेस? (अपने घर में और अपने मित्रों के बीच वे एक-दूसरे को फेस और मग कहा करते थे) सबसे मज़ा तो तब आया जब वह भरपेट भोजन कर चुकने के उपरान्त अपने बगल की महिला की ओर मुड़ी और बोली, 'क्या तुमने बन्दर कभी नहीं देखा?'

'ओह, हाँ!' मिसेज नार्मन भी हँसी में शामिल हो गयी। 'क्या वह भी गहरा मज़ाक नहीं था?'

और इससे भी मजेदार बात यह थी कि अब कोट उतार देने पर वह स्वयं एक कुशाग्र बंदरिया की तरह दिखायी दे रही थी—जिसने वह पीले सिल्क की पोशाक भी केले के कटे-छँटे छालों से बनायी थी और उसकी अम्बर ईयररिंग...वे झूलती हुई नन्हीं-नन्हीं फलियों की तरह थीं।

'यह पतन है—एक शोकजनक पतन!' नन्ही 'बी' के पैराम्बुलेटर के सामने रुकते हुए मग ने कहा । 'जब हाल में पैराम्बुलेटर प्रवेश करता है... और शेष उद्धरण को जैसे उसने हवा में हिला दिया।

घंटी बजी। वह क्षीण और पांडुर (हमेशा की तरह) एडी वारेन था; जैसे मुसीबत का पहाड़ सिर पर लादे चला आ रहा हो।

'मैं उचित स्थल पर पहुँचा हूँ, न?' उसने कहा।

'हाँ। मेरा ख़्याल है, ठीक ही जगह पर।' बर्था ने दमकते हुए कहा।

'टैक्सीचालक के साथ मुझे भयंकर अनुभव हुआ; वह अत्यन्त भयंकर था। मैं उसे अवरुद्ध ही नहीं कर पाया। मैं जितनी आवाज़ें देता, वह उतनी ही तीव्र गति से हाँकता और इस चंद्रिका चर्चित रजनी में यह बर्बर आकृति का विशाल मस्तक लघुयान पर झुका हुआ था...।"

एक बहुत बड़ा सिल्क स्कार्फ़ उतारते हुए वह सिहरा। बर्था ने देखा कि उसके मोज़े भी सफ़ेद थे, अत्यन्त आकर्षक।

'लेकिन कितना भयावह।' वह चिल्लायी।

'हाँ, सचमुच वह भयावह ही था।' एडी ने ड्राइंग रूम में उसका अनुसरण करते हुए कहा। मैंने स्वयं को शाश्वतता में एक कालाऽतीत टैक्सी का संचालन करते हुए देखा।'

वह नार्मन नाइट दम्पती से परिचित था। असल में वह उनके लिए एक नाटक लिखने जा रहा था, मगर इसी बीच योजना समाप्त हो गयी।

'हैलो, वारेन! नाटक कैसा चल रहा है?' नार्मन नाइट ने अपना चश्मा गिराते हुए और अपनी नज़र को एक क्षण के लिए चश्मे से परे सतह पर साधते हुए कहा।

और मिसेज नार्मन नाइट ने कहा, 'ओह, मिस्टर वारेन! मोज़े कितने सुन्दर हैं?' 'आपको पसन्द हैं जान, परम सुख हुआ।' उसने अपने पैर पर दृष्टिपात करते हुए कहा। 'चन्द्रोदय के साथ ही वे और भी श्वेत हुए जान पड़ते हैं।' और वह क्षीण, उदास और युवा मुख बर्था की ओर मुड़ा। 'आकाश में एक चन्द्रमा हुआ करता है, आप जानती हैं?'

उसने चिल्लाना चाहा, 'हाँ, मैं जानती हूँ—अक्सर—अक्सर !!'

वह सचमुच अत्यन्त आकर्षक व्यक्ति था। लेकिन क्या फेस आकर्षक नहीं थी, जो इस समय अपने केले के छालों में अँगीठी के सामने बैठी हुई थी और सिगरेट पीता और गुल झाड़ता मग क्या कम आकर्षक था... 'दूल्हा कहाँ रुका हुआ है?'

'लो, वह आ गया।'

एक आवाज़ के साथ सामने का द्वार खुला और बन्द हो गया। हैरी चिल्लाया, 'हैलो, लोगों! अभी पाँच मिनट में आया।' और वहाँ ऊपर उसका गुंजन सुनायी पड़ा। बर्था मुस्कान न रोक सकी। वह जानती थी कि उसे गहरे दबाव के छोटे काम करना कितना पसन्द है। आख़िर पाँच मिनट होते क्या हैं? लेकिन वह स्वयं को प्रदर्शित करेगा कि पाँच मिनट बहुमूल्य समय है और फिर वह ड्राइंग रूम में आयेगा, अत्यन्त सधा हुआ।

हैरी में जीवन के प्रति ऐसा ही उत्साह था। ओह! उसे उसकी यह चीज़ कितनी पसन्द थी और संघर्ष के प्रति उसका जोश — सामने आयी हर वस्तु को अपनी शक्ति और साहस की चुनौती मानना — यह भी वह समझती थी तब भी, जबकि इसके कारण वह अल्पपरिचित लोगों के बीच कुछ हास्यास्पद हो जाता था... क्योंकि ऐसा क्षण आता था, जब वह युद्ध-क्षेत्र की ओर लपकता था, जबकि वहाँ कोई युद्ध नहीं होता था...। वह हँसती और बातचीत करती रही और पूरी तरह भूल चुकी थी, जबकि वह आया (जैसी कि उसने कामना की थी) और बताया कि पर्ल फल्तन नहीं आयीं।

मैं सोचती हूँ कि कहीं मिस फल्तन भूल तो नहीं गयीं?'

'मेरा ख़्याल है।' हैरी ने कहा, 'क्या वह फ़ोन पर उपलब्ध हैं?'

'ओह! बाहर एक टैक्सी है।' और बर्था स्वामित्व की कुछ वैसी ही भावना से मुस्कुरायी, जैसे कि वह अपनी नयी और रहस्यमय खोजों—महिलाओं— के बीच मुस्कराया करती थी।

'वह टैक्सियों में रहती हैं।'

'अगर वह ऐसा करती है तो वह चर्बिया जाएगी।' हैरी ने डिनर के लिए घंटी बजाते हुए एक निर्जीव-सा उत्तर दिया।' 'सुन्दर महिला के लिए एक भयंकर ख़तरा!'

'हैरी—नहीं?' बर्था ने हँसते हुए उसे चेतावनी दी।

हँसते हुए और बातचीत करते हुए आराम से वे प्रतीक्षा करते रहे और फिर एक ऐसा ही नन्हा-सा क्षण आया, जब चाँदी से लदी हुई मिस फल्तन ने मुस्कुराते हुए एक ओर अपना सिर थोड़ा-सा झुकाये हुए प्रवेश किया। उसके पीले सुन्दर केश एक चाँदी के फीते में बँधे हुए!

'मुझे देर हो गयी?'

'नहीं, बिल्कुल नहीं।' बर्था ने कहा, 'आइए' और उसने उसका हाथ पकड़ा और उन्होंने डाइंनिग रूम में प्रवेश किया।


उस ठंडी बाँह के स्पर्श में वह क्या कुछ था, जिसने बर्था के सुख की उस आग को धधकाना शुरू कर दिया, जिसका क्या हो, वह नहीं जानती थी।

मिस फल्तन ने उसकी ओर नहीं देखा, लेकिन वह शायद ही कभी किसी की ओर सीधे देखती थी। उसकी भारी पलकें उसकी आँखों को ढँके हुए थीं और हल्की-सी मुस्कान उसके ओठों पर इस तरह खिंचती और मिट जाती, मानों उसका काम देखना नहीं, सुनना था। लेकिन बर्था ने सहसा ही जाना—उन्होंने एक-दूसरे को अत्यन्त परिचित नज़रों से देखा, मानों एक-दूसरे से कहा: 'तुम भी?' —कि भूरी प्लेट पर सुन्दर लाल सूप हिलाते हुए पर्ल फल्तन अपने अन्दर वही अनुभव कर रही थी, जो वह कर रही थी।

और अन्य लोग फेस और मग, एडी और हैरी, —उठते और गिरते हुए उनके चम्मच—अपने नेपकिन से अपने ओंठ पोंछते हुए, रोटियाँ तोड़ते हुए, ग्लास और काँटों से संगीत उत्पन्न करते हुए और बातचीत में मग्न।

'मैंने उसे आल्फा शो में देखा था। अत्यधिक भाग्यवादी नारी। उसने न केवल अपने बाल कटा दिये थे, बल्कि ऐसा लगता था कि उसने अपनी टाँगें, अपनी बाँहें और अपनी गरदन और अपनी नाक भी काफ़ी कटा ली थी।'



'क्या वह माइकेल ओट के साथ अत्यन्त...?' 'वह व्यक्ति, जिसने 'लव इन फाल्स टीथ' लिखा था।'

'वह मेरे लिए एक नाटक लिखना चाहता है—एकांकी—और उसमें एक ही पात्र है। वह आत्महत्या का निश्चय करता है। वह सभी तर्क प्रस्तुत करता है कि उसे ऐसा क्यों करना चाहिए और क्यों नहीं करना चाहिए और जैसे ही वह उसे करने या न करने का निश्चय करता है—पर्दा गिरता है। ख़्याल बुरा नहीं है।'

'वह उसे क्या नाम देने जा रहा है? - 'पेट की गड़बड़ी'?'

'मेरा विचार है, मैं यह ख़्याल किसी छोटी-सी फ्रेंच पत्रिका में पढ़ चुका हूँ, जो इंग्लैंड में बिल्कुल अपरिचित है।'

'नहीं, उन्होंने इसमें भाग नहीं लिया। वे उसे अंत्यन्त प्रिय थे। उसे उन्हें अपने टेबल पर भोजन और मद्यपान कराना अत्यन्त प्रिय था। असल में वह उनसे कहना चाहती थी कि उनका सम्पर्क कितना सुखद था और वे कैसे बढ़िया समूह का निर्माण करते थे। वे एक दूसरे के साथ किस तरह चुटकियाँ लेते थे और कैसे वे उसे चेखव के एक नाटक की याद दिलाते थे।

हैरी भोजन का मज़ा ले रहा था।

भोजन और लाब्सटर के सफ़ेद मांस के लिए अपनी उद्दाम लालसा और मिस्री नर्तकियों के हरे और ठंडे पपोटों जैसी हरी पिस्ता-बर्फ के सम्बन्ध में बात करना उसका स्वभाव और विशेष रूप से दिखावा तो नहीं ही था, लेकिन कुछ ऐसा था, जिसके कारण वह इनको चर्चा कर रहा था।

जब उसने बर्था की ओर देखा, तो कहा, 'बर्था, सूप बहुत बढ़िया है। बर्था बच्चों की सी प्रसन्नता में रो पड़ी होती।

आह! आज रात उसके मन में सारी दुनिया के प्रति स्नेह क्यों उमड़ रहा था? हर चीज़ अच्छी थी—ठीक थी। जो कुछ भी हो रहा था वह मानों सुख के उसके लबरेज कप को और भी भर रहा था।

और फिर भी उसके मन में छिपा हुआ कहीं नाशपाती का पेड़ था। बेचारे स्नेही एडी की चाँदनी में वह अब तक रजत हो चुका होगा—ठीक मिस फल्तन की तरह, जो अपनी इतनी पतली और पीली अँगुलियों में एक नारंगी उलट-पलट रही थी कि उनसे एक आभा फूटती-सी नज़र आ रही थी।

वह यह नहीं समझ पा रही थी कि उसने मिस फल्तन के मूड को इतने ठीक-ठीक और इतने तत्काल कैसे पहचान लिया! क्योंकि उसे क्षण भर को भी यह शक नहीं हुआ कि वह गलत है और अभी आगे उसे क्या करना है? कुछ भी नहीं।

'मैं समझती हूँ, यह अक्सर औरतों के बीच हुआ ही करता है, पुरुषों के बीच कभी नहीं।' बर्था ने सोचा। 'लेकिन में इधर ड्राइंग रूम में काफी तैयार कर रही हूँ और इसी बीच शायद वह इशारा करेगी।'

इसका अर्थ क्या था, वह स्वयं नहीं जानती थी और इसके बाद क्या होगा, इसकी कल्पना वह नहीं कर सकी।

यह सब सोचते हुए उसने स्वयं को बात करते और हँसते हुए देखा। उसे बात करनी पड़ती थी, क्योंकि वह हँसना चाहती थी।

'या तो में हँसू या मर जाऊँ।'

लेकिन जब उसने अपने बाडिस के सामने कोई चीज़ खोंसने—मानों उसने वहाँ फलियों का एक छोटा-सा गुप्त-गोदाम रखा हो—की फेस की हास्यास्पद आदत पर दृष्टिपात किया, तो उसे अपनी हथेलियों पर चिकोटी काटनी पड़ी, ताकि वह अधिक न हँस जाए।

आख़िर यह समाप्त हुआ। और बर्था ने कहा, 'आइए, अब मैं आपको नयी काफी-मशीन दिखाऊँ।'

'हमें नयी काफी-मशीन 15 दिन में एक बार ही उपलब्ध होती है।' हैरी ने कहा। इस बार फेस ने उसकी बाँह पकड़ी। मिस फल्तन ने अपना सिर झुका लिया और उनका अनुसरण किया।

ड्राइंगरूम में अँगीठी बुझ चुकी थी और एक छोटी-सी लाल आँच शेष थी, जिसे फेस ने, 'शिशु फिनिक्सों का घोंसला' कहा।

'क्षण भर के लिए बत्तियाँ मत जलाओ। कितना अच्छा लग रहा है।' और वह फिर अँगीठी के पास झुक गयी। वह हमेशा ठंडी ही रहती थी... 'अवश्य ही अपने लाल फ्लैनल जाकेट के बिना, बर्था ने सोचा।

उसी क्षण मिस फल्तन ने इशारा किया।

'आपके यहाँ बगीचा है!' उस ठंडी उनिद्र आवाज़ में कहा।

यह उसके लिए इतना आल्हादवर्द्धक था कि बर्था केवल उसकी आज्ञा का पालन ही कर सकती थी। उसने कमरा पार किया, परदे हटाये और उन लम्बी खिड़कियों को खोल दिया।

'वहाँ', उसने साँस ली।

और दोनों औरतें पतले खिलते हुए तरु को देखती अगल-बगल खड़ी हुई। यद्यपि वह एक मोमबत्ती की लौ की तरह शान्त था, लगता था कि वह फैल रहा है, अँगुलियाँ उठाये हुए स्वस्थ हवा में सिहर रहा है और ज्यों-ज्यों वे उसे देखतीं, लगता वह और ऊँचा हो रहा है, और ऊँचा हो रहा है, और ऊंचा हो रहा है; प्रायः उस गोल रजत चन्द्रमा की कोर को छू रहा है।

वे बड़ी देर तक वहाँ खड़ी रहीं। दोनों ही जैसे दिव्य अलोक के उस वृत्त में कैद थीं, एक दूसरे को पूरी तरह जानतीं, वे जैसे किसी अन्य लोक की प्राणी थीं और यह सोच रही थीं कि वे इस सुख के कोश का क्या करें, जो उनके वक्ष में जल रहा था और उनके केशों और हाथों से रजत फूलों के रूप में चू रहा था।

हमेशा के लिए—एक क्षण के लिए? और मिस फल्तन बुदबुदायी, 'हाँ, बिलकुल ऐसा ही।' या बर्था स्वप्न देख रही थी? 

और तब बत्तियाँ जला दी गयीं और फेस ने काफी बनायी और हैरी ने कहा, 'माई डीयर मिसेज नाइट, मेरी बच्ची के बारे में मत पूछो। मैं उसे कभी नहीं देखता। मुझे उसमें तब तक ज़रा भी दिलचस्पी नहीं होगी, जब तक कि उसे कोई प्रेमी नहीं मिल जाता।' और मग ने क्षण भर के लिए अपनी दृष्टि वनस्पति कक्ष से हटायी और फिर उसे चश्मे से ढँक लिया और एडी वारेन ने काफी पी और जुगुप्सा की मुद्रा में कप रख दिया, मानों उसने मकड़े को पिया और देखा हो।


'जो मैं करना चाहता हूँ, वह यह है...। मैं नवयुवकों के सामने अपना प्रदर्शन देना चाहता हूँ। मैं समझता हूँ, लन्दन में प्रथम श्रेणी के अलिखित नाटक भरे पड़े हैं। मैं उनसे जो कहना चाहता हूँ, वह यह है... लो यह रहा थियेटर। आओ, और आगे बढ़ो।'

'माई डियर, तुम जानते हो, मैं जैकब नथान्स के लिए एक कमरे की सज्जा करने जा रही हूँ। ओह, कुर्सियों के फ्राइंग पेन के आकार के पृष्ठभाग तथा परदों में किनारे-किनारे आलू-चिप के प्यारे-प्यारे कसीदे के साथ मुझे तली हुई मछली की योजना पूरी करना कितना प्रिय लगता है।'

'हमारे नवयुवक लेखकों के साथ कठिनाई यह है कि वे अभी भी बहुत ज़्यादा रोमांटिक हैं। समुद्री-बीमारी का शिकार हुए और कै किये बिना आप समुद्र के अभ्यस्त नहीं हो सकते। तो उनमें यह झेलने का साहस क्यों नहीं है?'


'एक लड़की के बारे में एक भयावह कविता, जिस पर एक छोटे से जंगल में एक नासिकाविहीन भिखारी द्वारा आक्रमण किया गया था...।'

मिस फल्तन सबसे नीची और गहरी कुर्सी में धँस गयी और हैरी ने सबकी ओर सिगरेट बढ़ाया। उसके सामने चाँदी का डिब्बा हिलाते और 'इजिप्शियन? टर्किश? वरजीनियन? सब मिले जुले हैं' कहता हुआ वह जिस तरह खड़ा था, उससे बर्था ने अनुमान किया कि वह न केवल उसे बोर कर रही थी, बल्कि वह उसे सचमुच नापसन्द कर रहा था और जिस तरह मिस फल्तन ने कहा, 'नहीं धन्यवाद! मैं सिगरेट नहीं पिऊँगी' उससे वह इस नतीजे पर पहुँची कि उसे भी इससे पीड़ा पहुँची है।

'ओह, हैरी। उसे नापसन्द मत करो। उसके विषय में तुम्हारी धारणा ग़लत है। वह अद्भुत है, अद्भुत। और इसके अलावा जिसका मेरे निकट इतना महत्त्व हो, उसके प्रति तुम इतनी उदासीनता कैसे अनुभव करते हो? रात को सोते समय मैं तुम्हें बताऊँगी कि क्या होता रहा है! हमने किस चीज़ को साथ-साथ भोगा है!'

अन्तिम शब्द कहते हुए बर्था के मन में एक विचित्र और लगभग भयावह विचार ने प्रवेश किया और यह प्रायः अंधा और मुस्कान भरा विचार उसके मन में फुसफुसाया, शीघ्र ही ये लोग चले जाएँगे, घर शान्त हो जाएगा— शान्त। बत्तियाँ बुझा दी जाएँगी और तुम दोनों अँधेरे कमरे में अकेले रहोगे— उष्ण शय्या...।'

वह अपनी कुर्सी से उछल पड़ी और पियानो की ओर दौड़ी।

'कितने दुख की बात है, कोई बजाता नहीं।' वह चिल्लायी, 'कितने दुख की बात है, कोई नहीं बजाता ।' जीवन में पहली बार बर्था यंग ने अपने पति की कामना की।

आह ! उसने प्रेम किया है— निश्चय ही वह उससे हर तरह प्यार करती रही है। लेकिन इस तरह कभी भी नहीं और उसे यह भी लगा कि वह कुछ भिन्न भी था। उन्होंने अक्सर इस पर बातचीत की थी। पहले-पहल वह यह सोच कर बहुत घबराती थी कि वह इतनी निर्जीव है, लेकिन कुछ दिनों के बाद इससे उसे कोई परेशानी नहीं हुई। उन दोनों के सम्बन्ध एक-दूसरे के साथ बहुत साफ़ थे। आधुनिक होने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही था।

लेकिन अब—कैसी जलन के साथ! और वह शब्द उसकी जलती हुई देह में पिराने लगा। क्या सुख की भावना की परिणति यही है? लेकिन तब, तब...।



'माई डियर', मिसेज नार्मन नाइट ने कहा, 'तुम हमारी शर्म से परिचित हो। हम समय और ट्रेन के शिकार हैं। हम हैम्पस्टीड में रहते हैं। कैसी बढ़िया जगह है!'

'मैं तुम्हारे साथ हाल में चलती हूँ।' बर्था ने कहा। 'तुम्हारा सामीप्य मुझे प्रिय रहा है। लेकिन ट्रेन तुम्हें नहीं छोड़नी चाहिए। ट्रेन छूटना अच्छा न होगा।'

'नाइट, जाने के पहले व्हिस्की तो पीते जाओ।' हैरी ने कहा।

'नहीं, मित्र, धन्यवाद।'

बर्था ने हाथ मिलाते हुए उसका हाथ दबाया।

'नमस्कार' वह ऊपर की सीढ़ी से चिल्लायी, मानों अनुभव कर रही हो कि उसका यह व्यक्तित्व उनसे हमेशा के लिए विदा ले रहा है।

जब वह ड्राइंग रूम में वापिस आयी, तो और लोग जा रहे थे।

'तो आप मेरी टैक्सी में चल सकते हैं?'

अपने भयावह अनुभव के उपरान्त एक बार फिर अकेले ड्राइव नहीं करना चाहता।'

'सड़क के नुक्कड़ पर आपको टैक्सी मिल सकती है। कुछ गज से अधिक नहीं चलना पड़ेगा आपको।'

'यह जान कर चिन्ता कम हुई। मैं अपना कोट पहन लूं।'

मिस फल्तन हाल की ओर बढ़ीं और बर्था हैरी के पीछे थी।

'लाइए, मैं आपकी सहायता करूँ।' बर्था जानती थी कि वह अपनी रुक्षता पर पश्चात्ताप कर रहा है—उसने उसे जाने दिया। कैसा अद्भुत है यह—प्रवृत्तिचालित—कितना सरल!!

और, एडी और वह दोनों अँगीठी के निकट अकेले रह गये।

'पता नहीं आपने बिल्क की नयी कविता, 'टेबल द हात', देखी है या नहीं!' एडी ने नम्रता के साथ कहा, 'अद्भुत है। पिछले संकलन में है। आप के पास कोई प्रति है? मैं आपको अवश्य दिखाना चाहूँगा। वह एक अद्भुत सुन्दर पंक्ति से आरम्भ होती है—'हमेशा टमाटर सूप ही क्यों?'


'हाँ,' बर्था ने कहा। और वह चुपचाप ड्राइंग रूम के द्वार के सामने के टेबल की और बढ़ी और एडी ने चुपचाप उसका अनुधावन किया। उसने वह छोटी सी पुस्तिका उठायी और उसे दे दी; वे मौन रहे।

वह पुस्तक देखता रहा और इस बीच उसने अपनी गरदन हाल की ओर की। और उसने देखा... मिस फल्तन का कोट हैरी की बाहों में और मिस फल्तन ने अपनी पीठ उस ओर की और अपना सिर झुकाया। उसने कोट उछाला। अपने हाथ उसके कंधों पर रखे और तेजी के साथ उसे अपनी ओर किया। उसके होठों ने कहा, 'मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ।' और मिस फल्तन ने चन्द्ररश्मियों-सी अपनी अंगुलियाँ उसके गालों पर रखीं और अपनी नींद भरी मुस्कान मुस्कायी। हैरी के नथुने फड़के और उसके होठों पर मरोड़ पड़ी और वह फुसफुसाया, 'कल' और अपनी पलकों से मिस फल्तन ने उत्तर दिया, 'हाँ'।

'यह यहाँ है।' एडी ने कहा, 'हमेशा टमाटर सूप ही क्यों?' इसमें अनुभूति की सच्चाई कितनी गहरी है ! क्या आप ऐसा नहीं सोचतीं? टमाटर सूप भयंकर रूप से शाश्वत है।'

'अगर आप चाहें' हैरी ने हाल में ज़ोरों से कहा, 'मैं आपके लिए द्वार पर गाड़ी के लिए फ़ोन कर सकता हूँ।'

'ओह, वह जरूरी नहीं।' मिस फल्तन ने कहा और बर्था के पास आयी और अपनी पतली अँगुलियाँ उसकी ओर बढ़ायीं।

'नमस्कार। बहुत-बहुत धन्यवाद।'

'नमस्कार।' बर्था ने कहा। मिस फल्तन ने उसका हाथ कुछ अधिक देर तक हाथ में रखा। 'आपका प्रिय नाशपाती का पेड़!' और वह जा चुकी थी और उसके पीछे एडी, जैसे काली बिल्ली भूरी बिल्ली का पीछा कर रही हो।

'अब मैं दूकान उठाता हूँ।' हैरी ने ठंडे से स्वर में कहा।

'आपका प्रिय नाशपाती का पेड़... नाशपाती का पेड...' बर्था उन लम्बी खिड़कियों की ओर दौड़ पड़ी।

'ओह!! अब क्या होने जा रहा है?' वह चिल्लायी।

लेकिन नाशपाती का पेड़ पहले ही सा प्यारा था और पहले ही सा फूलों से लदा हुआ और पहले ही सा शान्त !!!


श्रीकान्त वर्मा 


प्रस्तुति


मनोज मोहन

मोबाइल : 8851259407


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