सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'लेखकीय दुनिया की आबोहवा'


सेवाराम त्रिपाठी


साहित्य, संस्कृति हो या राजनीति आजकल जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों और प्रतिमानों की गिरावट सहज ही देखी जा सकती है। राजनीतिक मूल्यों और प्रतिबद्धताओं में गिरावट से सहज ही इस बात को समझा जा सकता है, जो हमेशा नेतृत्वकारी भूमिका में होती है। प्रेमचंद ने साहित्य को आगे चलने वाली उस मशाल के रूप में देखा जो राजनीति तक को दिशा दिखाती है। लेकिन लगता है वह दौर बीत गया। साहित्य में भी पतनशीलता की यह प्रवृत्ति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। जिनके कन्धों पर समाज को दिशा दिखाने की जिम्मेदारी थी वे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भाड़ बनने की होड़ में लग गए हैं। पद, पुरस्कार और सम्मान पाने के लिए लेखक किस तरह की जोर जुगत लगाते हैं इससे लगभग सभी वाकिफ़ हैं। एक समय था जब प्रकाशक लेखकों को रॉयल्टी प्रदान किया करते थे। आज छपने की होड़ इस कदर है कि लेखक रॉयल्टी शब्द से ही अपरिचित हैं। प्रायः अपना पैसा लगा कर ही तथाकथित लेखक अपनी किताबें छपवा रहे हैं। ऐसे लेखकों का सिरदर्द होता है जगह जगह पर किताबें भेजना जिससे उस किताब की चर्चा हो सके। ये लेखक इस प्रयास में भी लग जाते हैं कि कोई पुरस्कार झटक लिया जाए। आजकल जिधर देखो, चार छः पुरस्कार देने वाले मिल ही जाते हैं। अधिकांश मामला सेटिंग गेटिंग का होता है। सेवाराम त्रिपाठी उचित ही लिखते हैं कि 'भक्का-भदइयाँ पहले भी थे और अब भी हैं। अब तो उनका पूरा का पूरा फ़ौज-फाटा भी है और विभिन्न प्रकार के करतब भी देखे जा सकते हैं। यह सब कुछ नेपथ्य में नहीं है बल्कि एकदम खुल्लम-खुल्ला है और बेशर्मी की सभी सीमाओं को फलांगते हुए देखा जा सकता है।' वैसे भी यह करतब कर पाना सबके बस की बात नहीं। दुखद यह है कि कुछ ख्यातनाम लेखक भी इस तरह के करतब को पर्दे के पीछे करते रहते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'लेखकीय दुनिया की आबोहवा'।


आलेख

'लेखकीय दुनिया की आबोहवा'


सेवाराम त्रिपाठी 


आज के दौर का सच यह है कि लेखक और कलाकार को अपना मूल्यांकन-विश्लेषण करना चाहिए, साथ ही आत्मालोचन और आत्मावलोकन भी। उसे अपनी हैसियत और वास्तविकताओं का भी सूक्ष्मता के साथ अवलोकन करना चाहिए। एक जगह मानदेय के लिए मानधन का इस्तेमाल किया गया है, निश्चय ही एक नया शब्द है। लेकिन हर हाल में खूब प्रचलित शब्द है मानदेय। रायल्टी भी एक जाना-पहचाना शब्द है। हालांकि दोनों में मूलभूत फ़र्क भी है। देखिए, पूर्व में लेखकों कलाकारों की क्या प्रतिष्ठा हुआ करती थी, लेकिन थी उन्हीं की जो ‘जेनुअन' लेखक थे। भक्का-भदइयाँ पहले भी थे और अब भी हैं। अब तो उनका पूरा का पूरा फ़ौज-फाटा भी है और विभिन्न प्रकार के करतब भी देखे जा सकते हैं। यह सब कुछ नेपथ्य में नहीं है बल्कि एकदम खुल्लम-खुल्ला है। और बेशर्मी की सभी सीमाओं को फलांगते हुए देखा जा सकता है।

सभी लेखकों की प्रतिष्ठा न तब थी और न अब है और न ही आगे हो सकती है। सरोकारविहीनता ने इसे  ग्रस लिया है। यथार्थ यह है कि इसे निर्लज्जता का एक तरह से रोना-धोना ही कहा जा सकता है। लेखक की स्वायत्तता और औकात का हिसाब-क़िताब भी होते रहना चाहिए। लेखक को कभी किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। लेखकों-कलाकारों की दुनिया सन्नाटों की दुनिया नहीं होती। वो जनजीवन से जुड़ाव और लगाव की विराट परिप्रेक्ष्य वाली दुनिया भी होती है। प्रश्न है कि क्या व्यापक परिप्रेक्ष्य और फलक में यही स्थितियाँ आज भी नहीं हैं? जिनसे हमारा रोज़-रोज़ सामना होता है। ये बातें हमेशा नए-नए रूपों में अभिव्यक्त होती रहती हैं। लेकिन नया कुछ नहीं। हाँ, कहन का तरीका और भंगिमाएं जुदा हो सकतीं हैं। साहित्य कोई सतही परचून की दुकान नहीं है। लेखकों-कलाकारों को अपने भीतर भी वृहत्तर रूप से झाँकना चाहिए। केवल दोषारोपण करने से क्या हासिल हो सकता है? लेखन के उसूल और मूल्य भी होते हैं। प्रश्न यह भी है कि साहित्य न तो मनोरंजन की चीज़ है और न किसी तरह के दिखावे की दुनिया ही। लेखन बेहद जिम्मेदारी, सरोकार और मूल्यों की दुनिया है। लेखन बाज़ार की चमक-दमक से किसी भी सूरत में नहीं चल सकता। अपने आपको आत्मार्पित करना होता है। उसूलों से समझौता कर के कोई सच्चा लेखक नहीं बन सकता। क्योंकि साहित्य संस्कृति की दुनिया में भी बहुत कुछ अनकहा घटता है। राजनीति के इलाके भर में चोंचलेबाज़ी नहीं होती। यहाँ भी अवसरवाद और सुविधावादी मनोविज्ञान की न जानें कितनी परतें हैं।

शिकायतों की बाढ़ आई हुई है। इस दौर में साहित्य-संस्कृति की दुनिया सत्ता व्यवस्था की नज़रों से एकदम बाहर भी है और पर्याप्त उपेक्षित भी। यहाँ असहमति के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। विज्ञापन और थोड़ी सी सहायता और मदद उन्हीं को मिलती है जो सत्ता-व्यवस्था और बाज़ार के सामने चारण-बंदीजन-भाट और पालतू बन चुके होते हैं। बाक़ी को तो कोई गंभीरता से नहीं लेता और न कोई खरी को ही पूछता। ज़ाहिर है कि सच्चा लेखन सुविधावाद की फिसलपट्टी से नहीं चल सकता। न वो किसी प्रतिष्ठान-सत्ता-व्यवस्था के रहमों-करम से जीवंत रह सकता। लेखन व्यापार कतई नहीं है। वह जीविका का साधन हो सकता है, लेकिन वह बहुत अंशों में तपस्यान है। इसलिए जिसे आत्मा पर बंधन महसूस होते हों, तो वह छोड़ कर चला जाए। लेखक किसी खास का गुलाम भी नहीं हो सकता, जो ऐसे होते हैं वो लेखक की कोटि में नहीं आ सकते। 

व्यक्तिगत रूप से कुछ कहना नहीं चाहता था। लेकिन अब तो यही हो रहा है। सोचता हूँ कि कुछ अरज मैं भी कर दूँ। हरिशंकर परसाई, कमला प्रसाद जी के साथ मिल कर हम लोग ‘वसुधा' पत्रिका निकालते थे, लेकिन लेखकों और अन्य का व्यापक सहयोग मिलता था। मित्रता के सहयोग का एक गंभीर वातावरण हुआ करता था। अब तो एक विशेष खेमा सत्ता - व्यवस्था का और उनके हामियों का भी हो गया है। उनकी संसाधन और प्रबंधन लीला भी बहुत सजी धजी है जिसमें एक कृत्रिम प्रक्रिया और कुशल प्रबंधन का भारी भरकम मेला लगा है और दक्षिणी मनोविज्ञान के विराट वैभव का चक्का घूम रहा है। पूर्व में यदा कदा कुछ विज्ञापन भी मिल जाते थे। लोगों का सहयोग मिल जाता था। हमारी यह भी हैसियत नहीं थी कि लेखकों-कलाकारों को कोई मानदेय दे सकें।दे ही नहीं सकते थे। लघु पत्रिकाओं की लगभग यही स्थिति होती थी। आर्थिक तंगहाली से बाहर निकल आना हमारे बस में नहीं था। व्यावसायिक घरानों से निकलने वाली पत्रिकाएं ही लेखकों कलाकारों को पारिश्रमिक दे पाती हैं।



युग बदलता है तो सब कुछ बदल जाया करता है। इसके लिए क्यों छाती पीटना? क्या हम उसी आज़ादी, जनतंत्र, संविधान, सिस्टम और स्थितियों में हैं। राजनीति प्रायः पूरी तरह से खोखलेपन के पंजों में है। वह किसी भी सूरत में समाज सेवा से बाहर हो गई है। साहित्य संस्कृति के परचूनिए तब भी थे और अब तो न उनके पास कोई मूल्य हैं और न कोई नैतिक-बोध। लेखन को उन्होंने एक विशेष प्रकार का धंधा बना दिया है। परसाई जी ने कभी कहा था कि- ‘जब लाभ थूकता है तो उसे हथेली पर लेना पड़ता है’। किताबों के प्रकाशक कोई देवता नहीं है। देवताओं की दुनिया एकदम उजड़ गई है। हम उन्हें खांटी मनुष्य के रूप में विकसित होते हुए देखना चाहते हैं। वो भी वृहत्तर संदर्भों में बाज़ार की महत्वाकांक्षी परियोजनाएं देखते हैं और उसकी कीमियागिरी भी। आख़िर क्यों नहीं देखना बरतना चाहिए? प्रायः अधिकांश लेखक भयानक विज्ञापनबाज़ी में उतरे हुए हैं। यह भी एक विचारणीय दुनिया है। घटिया और घटियोत्तम तथा हद दर्जे की औसत किस्म की किताबें शान के साथ विज्ञापित हो रही हैं और उन्हें पुरस्कार-सम्मान और अलंकरण धूमधाम से मिल रहे हैं। अच्छी किताबें छपने के बाद उनके लेखक किन्हीं खास जिक्रों में नहीं होते हैं। लुगदी के चलन ने जनपक्षधर साहित्य और कलाओं को हाशियों की तरफ़ धकेल दिया है। यह लुगदा-लुगदी मनोविज्ञान का विचित्र समय है। जब विचारों की कमीं होती है, तभी शब्दों का आडम्बर खड़ा किया जाता है।

साहित्य को हमनें एकदम बाज़ार बना दिया है और लेखन की दुनिया में न जाने कितने प्रकार की फिसलपट्टियां क़ाबिज़ हो गई हैं, जिनको उपकृत करने की या अपना हामी बनाने की भी कुछ सुविधासंपन्न मनोविज्ञान ने अपनी मुहिम जारी  कर रखी है। वैसे देखा जाए तो लंपटगिरी कहाँ नहीं है? लेखन की दुनिया में भी बड़े झोल हैं। चमक-दमक और यश प्राप्ति की ललक पैदा हो चुकी है। वास्तविक और जेनुअन साहित्य, संस्कृति, सामाजिकता और रचनात्मकता की कुछ बुनियादी समस्याएं होती हैं। साहित्य संस्कृति के मसले किसी एक दिन, माह और वर्ष के मसले नहीं होते। साहित्य, संस्कृति का यथार्थ धीरे-धीरे अपने पँख फैलाता है और उसके अर्थ भी वृहत्तर संदर्भों-रूपों में खुलते हैं। कभी कबीर ने इंगित किया था- 

“हद तपे सो औलिया, बेहद तपे सो पीर 

हद बेहद दोनों तपे, ताको नाम कबीर।”

लेखन की दुनिया में कई चीज़ें हैं और कई मसले भी। अचानक विजय दान देथा का एक आलेख स्मरण आ रहा है, उसका शीर्षक है- ‘मेरो दरद न जाने कोय'। इस आलेख के माध्यम से हम साहित्य संस्कृति और लेखन की वास्तविकता और गरिमा को हम पूरी तरह से नहीं बल्कि कुछ-कुछ समझ सकते हैं। उसका एक अंश पढ़ें- “आज दिन तक जिस किसी लेखक को पढ़ने में आनंद आया, वे सभी मेरे गुरु हैं। किसी से कम सीखा तो किसी से ज़्यादा। और जिन्हें पढ़ कर झुंझलाहट हुई। उन्होंने भी गुरु के ही समान अपना कर्तव्य निभाया। उनसे यह सीखने को मिला कि क्या नहीं लिखना चाहिए। मेरे बदले उन्होंने बदनामी का सेहरा अपने सर बाँध कर मुझे सर्वथा बचा लिया। उपकृत हूँ उनका भी। पर आजकल तो लेखकों की बजाय स्वयं प्रकृति ही गुरु बनने की  खातिर ज़्यादा व्यग्र नज़र आती है। पत्थरों के पास हो कर गुज़रता हूँ तो वे टोक कर कहते हैं-ऐसी भी क्या हड़बड़ी है? हमारी बात भी तो सुनते जाओ। वह दिन अब दूर नहीं, जब हर पत्थर से ही एक अहल्या प्रकट होगी और सारे इंसान पत्थर बन जाएंगे। आधे तो बन ही चुके हैं। बीज  मुस्कुरा कर कहते हैं- हीरे की डिबिया में बरसों तक सुरक्षित रहना हमारी सार्थकता नहीं है- पूर्णतया विनष्ट हो कर ही हम पल्लवित हो सकते हैं। अस्तित्व को सर्वथा मिटाने में ही हमारे जीवन की सिद्धि है। न, अभी रुको। हम पर कुछ लिखने के लिए तुम्हारी कलम उतनी समर्थ नहीं हुई।” (लेखक और आज की दुनिया, पृष्ठ - 42)

मुझे लगता है कि जो अपना सही मूल्यांकन विश्लेषण नहीं करता। उसी में एक विशेष किस्म की भड़भड़ाहट और महत्वपूर्ण होने/बनने की भयानक तमन्ना होती है। यह हाल लेखन भर का नहीं है। कभी एक फ़िल्म आई थी- 'मेरा नाम जोकर'। वो इतनी जल्दी फ़िल्मी परदों से उतरती चली गई लेकिन जब उसे ठीक से समझा गया तो वो बेहद क्लासिकी की दुनिया में शुमार हो गई है। उसका दिन-ब-दिन महत्व बढ़ता जा रहा है। लेखन की दुनिया में भी यही घटता है लेकिन महत्व के मारे लोगों का सलीका ही कुछ और होता है। सच्चा लेखन कभी भी नेपथ्य में नहीं जा सकता और न कभी असंगत ही हो सकता। 

लोक में देर अंधेर की मसल यूँ ही नहीं प्रचलित है। तथ्य यह है कि असली लेखकों, कलाकारों की दुनिया के बरक्स एक नक़ली लेखन की दुनिया भी है। इस दौर में प्रशंसा की फ़ैक्ट्री से बधाई जारी है। मुझे लगता है कि असली लेखकों की दुनिया हमेशा अपने जन सरोकारों को गंभीरता से दर्ज़ करती रहेगी। जन जीवन के यथार्थ और संकटों को भी। लेखक, कलाकार अपने समय, समाज को कैसे देखता और संबोधित करता है, दुनिया वही है। हाँ, उसका विकास क्रम परिवर्तित होता रहा है। दुनिया को देखने का नज़रिया बदलता रहता है। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक नज़्म हमें निरंतर ऊर्जावान बनाती है और नए सिरे से सोचने-समझने की शक्ति प्रदान करती है -

“अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे 

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे 

  और भी  दुःख  हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा

  राहत और भी हैं वस्ल की  राहत के सिवा

  मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग।’



सम्पर्क 


मोबाइल : 07987921206

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