हरियश राय का आलेख 'आकांक्षाओं, सपनों और अपेक्षाओं से लबरेज़ अमरकांत की कहानियां'
अमरकांत आजादी के बाद आम आदमी की बेहतरी के जो सपने देखे गए थे वे एक एक कर टूटते चले गए। भ्रष्टाचार की जो विरासत हमें अंग्रेजों से मिली थी, वह आजादी के बाद भी बदस्तूर जारी रही। युवाओं के सपने में प्रायः वे पद होते थे ऊंची नौकरशाही से जुड़े होते थे। जाहिर तौर पर इस तरह के पदों को प्राप्त करने के पश्चात व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक हैसियत, मन सम्मान और प्रतिष्ठा काफी बढ़ जाती थी। लेकिन इसका एक स्याह पक्ष यह भी था कि इन पदों पर रहते हुए भ्रष्ट तरीके से कमाई की बहुत संभावनाएं होती थीं। इन पदों को हासिल करने के चक्कर में बेरोजगार युवा अपना दिन रात एक कर देते। परिवार भी इनसे अपनी बड़ी बड़ी उम्मीदें पाल लेता। लेकिन असफलता न केवल उस युवा बल्कि पूरे परिवार के सपनों को चकनाचूर कर देती। अपनी कहानी 'डिप्टी कलेक्टरी' में अमरकांत इस कथा व्यथा को करीने से व्यक्त करते हैं। अमरकांत अपनी कहानियों में कोई निर्णय नहीं देते बल्कि उस मोड़ पर ले जा कर छोड़ देते हैं जहां जा कर पाठक खुद को हतप्रभ महसूस करता है। यह वर्ष अमरकांत का जन्म शताब्दी वर्ष है। इस के अन्तर्गत हम आज पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे ...