गरिमा श्रीवास्तव से प्रज्ञा की बातचीत


गरिमा श्रीवास्तव 


दक्षिण-पश्चिम पोलैंड स्थित ऑशविट्ज़ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन कब्जे में था। यहां की सोलह जर्जर और निर्जन इमारतों को देखने के पश्चात नाज़ी अधिकारियों ने एक जेल बनाने की योजना बनाई। जिस कस्बे में यह स्थित था, उसका नाम ओस्विसीम या ऑशविट्ज़ था। ओस्विसीम के यहूदी निवासियों को मजबूरन परित्यक्त बैरकों का जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण कर के ऑशविट्ज़ प्रथम नामक जेल बनानी पड़ी, जिसमें युद्धबंदियों को रखा जाना था। इनमें से पहले युद्धबंदियों का आगमन मई 1940 में शुरू हुआ। यूरोप भर से यहूदियों और तृतीय रीख के दुश्मनों को जैसे-जैसे निर्वासित किया गया, शिविर की आबादी बढ़ती चली गई। कांटेदार तारों की बाड़ और निगरानी मीनारों से घिरे ऑशविट्ज़ यातना शिविर के काले द्वारों के ऊपर 'Arbeit macht frei' ('काम आपको आज़ाद करता है') लिखा हुआ था। इस शिविर में लगभग ग्यारह लाख लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई।  गरिमा श्रीवास्तव ने अपने उपन्यास "आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा" में बेहद त्रासद और कारूणिक स्थितियों का चित्रण किया है। हालांकि आउशवित्ज़ यातना का प्रतीक है लेकिन उसे एक प्रेम कथा के साथ जोड़ कर गरिमा श्रीवास्तव ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि "क्रूरता का जवाब क्रूरता से नहीं दिया जा सकता; प्रेम ही एकमात्र ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो क्रूरता का सामना कर सकता है।' आउशवित्ज़ केवल मौत का स्थान नहीं, बल्कि मानवता के सबसे अंधेरे क्षण का प्रतीक है। उपन्यास में इसे एक रूपक के रूप में इस्तेमाल किया गया है — स्त्री-जीवन के दमघोंटू, यौन-हिंसा, धर्मांतरण, परित्याग और सामाजिक बहिष्कार के "छिपे हुए आउशवित्ज़" के रूप में। यह सिर्फ नाजी कैम्प तक सीमित नहीं; बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, भारत विभाजन, और समकालीन समाज में स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा को भी इसी छत्रछाया में देखा गया है।" चर्चित कहानीकार प्रज्ञा ने गरिमा श्रीवास्तव से "आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा" की रचना प्रक्रिया के बारे में एक महत्त्वपूर्ण बातचीत की है। यह बातचीत न केवल इस उपन्यास को जानने के लिए जरूरी है बल्कि इसी के हवाले से कई और बातें सामने आयी हैं जो इस दुनिया की हकीकत को जानने समझने के लिए जरूरी है। आज प्रज्ञा का जन्मदिन है। प्रज्ञा को जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। हमने इस बातचीत को परिकथा के हालिया अंक से साभार लिया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गरिमा श्रीवास्तव से प्रज्ञा की बातचीत। 

 

साक्षात्कार

गरिमा श्रीवास्तव से प्रज्ञा की बातचीत

 

आउशवित्ज की वैश्विक स्मृति बेहद त्रासद और कारूणिक है। कहा जाता है कि लगभग ग्यारह लाख लोगों को आउशवित्ज में मौत के घाट उतार दिया गया था। आपके उपन्यास का उपशीर्षक ‘एक प्रेम कथा’ उस स्मृति में एक अलग तरह का हस्तक्षेप करता है। (हालांकि उपन्यास में प्रेम करती स्त्रियों का जीवन सुखमय नहीं है।) सबसे पहले मैं आपसे इस शीर्षक के विषय में जानना चाहती हूँ कि आउशवित्ज ‘एक प्रेम कथा’ क्यों?

गरिमा श्रीवास्तव : "आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा" एक गहन और विडंबनापूर्ण  रचनात्मक हस्तक्षेप है। उपन्यास के शीर्षक में आउशवित्ज़ जैसी जगह (जो होलोकॉस्ट की सबसे भयावह वैश्विक स्मृति है, जहाँ लगभग ग्यारह लाख लोगों की हत्या हुई) के साथ प्रेम और "प्रेम कथा" शब्द का जुड़ना को जोड़ना जानबूझ कर पैदा किया गया किया गया एक रचनात्मक विरोधाभास है।

यह शीर्षक मेरे मानस में प्रेम को क्रूरता के मुकाबले सबसे बड़ा हथियार मानने की रचनात्मक आवश्यकता से उपजा है।  क्रूरता का जवाब क्रूरता से नहीं दिया जा सकता; प्रेम ही एकमात्र ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो क्रूरता का सामना कर सकता है। मार्खेज़ के ‘Love in the Time of Cholera’ उपन्यास को याद कीजिए। इतना ही नहीं, भारतीय साहित्य में 'प्रेमा पुमर्थो महान' कहा गया है। तात्पर्य यह कि प्रेम ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। - आउशवित्ज़ केवल मौत का स्थान नहीं, बल्कि मानवता के सबसे अंधेरे क्षण का प्रतीक है। उपन्यास में इसे एक रूपक के रूप में इस्तेमाल किया गया है — स्त्री-जीवन के दमघोंटू, यौन-हिंसा, धर्मांतरण, परित्याग और सामाजिक बहिष्कार के "छिपे हुए आउशवित्ज़" के रूप में। यह सिर्फ नाजी कैम्प तक सीमित नहीं; बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, भारत विभाजन, और समकालीन समाज में स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा को भी इसी छत्रछाया में देखा गया है।

प्रेम यहां त्रासद और असफल है, लेकिन वही प्रेम पीड़ा को अर्थ देता है। विक्टर फ्रैंकल के उद्धरण की तरह ("दर्द का अर्थ मिलते ही वह दर्द नहीं रह जाता") उपन्यास में प्रेम असफलताओं, अलगाव, यातना और अपराध-बोध के बीच भी जीवन को जीने की शक्ति देता है। प्रतीति-अभिरूप, बिराजित-रहमाना (द्रौपदी देवी), सबीना-रेनाटा — तीनों प्रेमकथाएं असफल/ अधूरी हैं, लेकिन वे ही यातना की गवाही और प्रतिरोध का आधार बनती हैं।

शीर्षक में विडंबना और चुनौती दोनों है : जहां आउशवित्ज़ घृणा, नफ़रत और मर्दवादी राष्ट्रवाद का चरम प्रतीक है, वहीं "प्रेम कथा" जोड़ कर यह पूछा गया हैं — क्या सबसे भयानक क्रूरता के बीच भी प्रेम संभव है? क्या प्रेम उस क्रूरता को चुनौती दे सकता है या सिर्फ सहन करने की शक्ति दे सकता है? इसीलिए कुछ आलोचकों ने इस उपन्यास को "मर्दवाद के राष्ट्रवादी अहाते में प्रेम का ट्रायल" कहा है।

कुल मिला कर शीर्षक में इसलिए "एक प्रेम कथा" है क्योंकि उपन्यास क्रूरतम हिंसा और यातना के बीच प्रेम की संभावना, उसकी असफलता, उसकी पीड़ा और अंततः उसकी मुक्ति और शक्ति को खोजना चाहता है। यह प्रेम रोमांटिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत, प्रतिरोधी और करुणामय है — ठीक वैसे ही जैसे विक्टर फ्रैंकल ने यातना शिविर में जीवन के अर्थ की तलाश की थी।

यह शीर्षक पाठक को झकझोरता है कि जहां मौत और नफरत का बोलबाला हो, वहाँ प्रेम की बात करना कितना असंभव और कितना जरूरी दोनों है।


प्रज्ञा : गरिमा जी यह माना जाता है कि वस्तु अपने रूप का चयन करती है। इस कृति के लिए आपने जो विषय चुना है. यह ऐतिहासिक है, इस पर कोई शोध की किताब भी आ सकती थी। आप यात्रा वृत्तांत लिख सकती थी। संस्मरणात्मक काम हो सकता था पर आपने उपन्यास को ही क्यों चुना?

गरिमा श्रीवास्तव : उपन्यास इसलिए चुना गया क्योंकि विषय की गहराई और संवेदना को केवल तथ्यों या व्यक्तिगत स्मृति के माध्यम से नहीं, बल्कि जीवंत कथा, बहुस्तरीय पात्रों, पत्राचार, चेतना-प्रवाह और काव्यात्मक तत्वों के संयोजन से ही पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता था। शोध-ग्रंथ या यात्रा-वृत्तांत में ऐतिहासिक घटनाएँ सूचना या व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित रह जातीं, जबकि उपन्यास में वे स्त्री-यातना की वैश्विक और स्थानीय परतों को प्रेम की त्रासदी के रूप में पुनर्रचित हो कर पाठक की अंत:संवेदना तक पहुँचती हैं। लेखिका ने स्वयं कहा कि ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय कल्पना से आगे बढ़ कर साहित्यिक कल्पना की आवश्यकता थी, ताकि क्रूरता के बीच प्रेम की मुक्ति-शक्ति और अर्थ की तलाश को तरल अनुभूति में ढाला जा सके। यह विधा ही इतिहास की जकड़बंदी तोड़ कर उन अनछुए पहलुओं को उजागर करती है जिन्हें इतिहास में स्थान नहीं मिलता, और पाठक को केवल जानकारी नहीं, बल्कि झकझोरने वाली करुणा और मानवीय अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। उपन्यास बनने से कृति रुक्ष विवरण से ऊपर उठ कर कलाकृति बन पड़ी, जो संवेदना को गहराई से प्रभावित करती है और बेहतर इंसान बनने की दिशा में ले जाती है।


प्रज्ञा : आमतौर पर साहित्य बहुत जाने-पहचाने और अपने जिए भोगे भूगोल को अपनी रचनात्मकता के केंद्र में रखता है। क्या कारण रहे कि आपने पोलैंड के आउशवित्ज के भूगोल को कथा के केंद्र में रखा? और फिर इसमें एक यहूदी की यंत्रणा को समेटने वाली डायरी भी दाखिल हो गई।

गरिमा श्रीवास्तव : आउशवित्ज़ के भूगोल को कथा के केंद्र में इसलिए रखा गया क्योंकि यह स्थान न केवल होलोकॉस्ट की सबसे भयावह वैश्विक स्मृति है, बल्कि स्त्री-यातना, यौन-हिंसा, मानवता के क्षरण और क्रूरता के चरम रूप का सर्वोत्तम प्रतीक बन जाता है। इसे मैंने एक रूपक के तौर पर  इस्तेमाल किया है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और समकालीन समाज में स्त्रियों के साथ होने वाली दमघोंटू हिंसा को भी उसी छत्रछाया में देखने की अनुमति देता है। मेरा उद्देश्य था कि एक ही क्रूरता की विभिन्न अभिव्यक्तियों को वैश्विक स्तर पर जोड़ा जाए, ताकि पाठक समझ सके कि आउशवित्ज़ केवल एक स्थान या घटना नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन के हर उस दमघोंटू माहौल का नाम है जो यूरोप से ले कर भारतीय समाज तक मौजूद है।

आउशवित्ज़ को केंद्र में रखने का एक और गहरा कारण यह था कि यहाँ की यातना का स्वरूप इतना सार्वभौमिक और अमानवीय है कि प्रेम की त्रासदी और उसकी मुक्ति की शक्ति को उसके मुकाबले में रख कर देखना संभव हो जाता है। मैं फिर कहती हूँ क्रूरता का जवाब क्रूरता से नहीं, बल्कि प्रेम से दिया जा सकता है, और आउशवित्ज़ जैसी जगह पर प्रेम की बात करना जानबूझ कर उठाई गई चुनौती है। इससे कथा का फलक वैश्विक हो जाता है और स्थानीय (बांग्लादेश, कोलकाता, ढाका) अनुभव भी उसी सार्वभौमिक यातना के संदर्भ में अर्थपूर्ण बन जाते हैं।

यहूदी यातना को समेटने वाली डायरी (जो उपन्यास में सबीना के माध्यम से और उसके परिवार की स्मृतियों के रूप में प्रकट होती है) इसलिए दाखिल हुई क्योंकि मैंने स्त्री-दृष्टि से इतिहास को पुनर्रचित करने की कोशिश की है। डायरी और पत्राचार के शिल्प से ऐतिहासिक घटनाएँ व्यक्तिगत, भावनात्मक और तरल अनुभव में बदल जाती हैं, जो शोध-ग्रंथ या इतिहास-किताब में संभव नहीं। सबीना और उसके पति रेनाटा के माध्यम से यहूदी समुदाय की पीढ़ियों तक फैली यातना की छाया दिखाई गई, जो प्रेम, परिवार और धार्मिक स्मृति के साथ जुड़ी हुई है। यह डायरी कथा को बहुस्तरीय बनाती है और पाठक को यूरोपीय आहत स्त्री के मन में प्रवेश करने का अवसर देती है, जिससे पूरी कथा में अनेकस्वरता और गहराई आती है।

आउशवित्ज़ को केंद्र में रखना और यहूदी यातना की डायरी को शामिल करना इसलिए जरूरी था क्योंकि इससे स्त्री-यातना का महाख्यान स्थानीय से वैश्विक स्तर तक फैल जाता है, क्रूरता और प्रेम के बीच का विरोधाभास गहराई से उभरता है, और इतिहास की जकड़बंदी टूट कर आख्यान संवेदना का सर्जनात्मक पाठ बन जाता है। यह चुनाव लेखन के क्रम में महसूस की गयी रचनात्मक बेचैनी और स्त्री-दृष्टि से इतिहास को देखने की जिद का परिणाम है।



प्रज्ञा : गरिमा जी आउशवित्ज एक प्रेम कथा है। कबीर ने प्रेम के विषय में कहा था कि कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहीं/सीस उतारे भुईं घरे सो पैठे घर माहीं। यानी प्रेम की राह कठिन है। जिसमें अनेक बाधाएं हैं। प्रेम की तलाश के संदर्भ में आप लिखती हैं- मैंने डोले हैं विश्वासघात और फरेब और इतने सालों में यदि किसी को परखा है तो अपने धैर्य को, ठोकरें खा खा कर अपने जीवन में गलत और सही का भेद करना सीखा है।" सवाल यह है कि जब प्रेम प्रेम होता है उसे स्त्री करे या पुरुष। इससे क्या कोई अंतर पड़ता है। क्या स्त्री की प्रेमकथा और पुरूष की प्रेमकथा में आप अंतर पाती है? स्त्री की निगाह से जिया गया प्रेम या समय या स्त्री की निगाह से देखा गया भूगोल भिन्न होता है?

गरिमा श्रीवास्तव : आपने कबीर के जिस दोहे का ज़िक्र किया, ठीक इसी संदर्भ में उपन्यास में  प्रेम की तलाश को स्पष्ट किया गया है—प्रेम कोई आसान, मनचाहा या बिना त्याग का रास्ता नहीं है। यह "खाला का घर" नहीं, जहाँ बिना मोल चुकाए प्रवेश मिल जाए; बल्कि समर्पण करके ही उस घर में घुसा जा सकता है। उपन्यास में प्रतीति सेन के शब्द—"मैंने झेले हैं विश्वासघात और फरेब और इतने सालों में किसी को परखा है तो अपने धैर्य को। ठोकरें खा खा कर अपने जीवन में गलत और सही का भेद करना सीखा है"—यही कठिनाई, ठोकरें और आत्म-परीक्षा को दर्शाते हैं।

प्रेम होता है तो स्त्री करे या पुरुष, इससे बहुत फर्क पड़ता है—क्योंकि उपन्यास स्त्री-दृष्टि से प्रेम को देखता है, जहाँ स्त्री का प्रेम अक्सर असफलता, त्याग, यातना और सामाजिक/पितृसत्तात्मक बंधनों से गुजर कर भी जीवित रहता है। उपन्यास में बिराजित सेन या अभिरूप पुरुष जैसे पात्रों के मद्देनज़र स्पष्ट है कि पुरुष का प्रेम सामाजिक लोकलाज, कुल-खानदान की चिंता, या "व्यावहारिक जीवन" के नाम पर पीछे हट जाता है—ये पात्र प्रेम को चुनते हैं लेकिन उसे निभाने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाते। स्त्री के  प्रेम (प्रतीति, रहमाना खातून, सबीना) में अधिक धैर्य, स्मृति और पीड़ा-सहन की क्षमता दिखती है—वह प्रेम को "नासूर" की तरह टीसते हुए भी जीवन से नहीं निकाल फेंकती, बल्कि उससे अर्थ निकालती है। पुरुष अक्सर अपराध-बोध या दूरी चुन लेता है, जबकि स्त्री प्रेम की विफलता के बाद भी स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित करती है और आगे बढ़ती है।

स्त्री की निगाह से जिया गया प्रेम अधिक अंतर्मुखी, आत्मालोचनात्मक और यातना से जुड़ा होता है—यह प्रेम में असफल होने के बाद भी "खुद को संभालना" सीखने की प्रक्रिया है, जहाँ स्त्री अपने "मैं" के कई हिस्सों को महसूस करती है। उपन्यास में प्रतीति का "मेरा ‘मैं’ मुझसे छिटका हुआ पड़ा है" जैसे वक्तव्य को याद कीजिए। पुरुष का प्रेम अधिक बाहरी, कर्तव्य-बद्ध या सामाजिक दबाव से प्रभावित दिखता है—उपन्यास में  बिराजित सेन पत्नी को "भूलुंठित पुष्प" मान कर त्याग देते हैं।

स्त्री की निगाह से देखा गया भूगोल भी भिन्न होता है—आउशवित्ज़ या बांग्लादेश का युद्धक्षेत्र स्त्री के लिए सिर्फ मौत या हिंसा का स्थान नहीं, बल्कि देह पर लड़े गए युद्ध का प्रतीक है, जहाँ बलात्कार, धर्मांतरण, परित्याग और "कलंक" का बोझ सबसे अधिक स्त्री पर पड़ता है। पुरुष का भूगोल अधिक राजनीतिक या ऐतिहासिक होता है, जबकि स्त्री का भूगोल व्यक्तिगत यातना, स्मृति और प्रेम की निरंतर टीस से बुना जाता है—यह "गैस चैंबर" घर-परिवार, समाज और इतिहास के भीतर भी मौजूद होता है। उपन्यास में प्रेम की तलाश स्त्री के लिए अधिक कष्टसाध्य और अर्थपूर्ण बन जाती है, क्योंकि वह ठोकरें खा कर भी धैर्य से "सही-गलत" सीखती है और प्रेम को जीवन का मकसद बनाए रखती है, जबकि पुरुष अक्सर पीछे हट कर अपराध-बोध में जीता है।


इसलिए उपन्यास में प्रेम स्त्री की नजर से अधिक त्रासद, गहन और मुक्तिदायक दिखता है—यह कबीर की तरह "सीस उतारने" वाला प्रेम है, जो यातना के बीच भी मनुष्यता की आस्था बनाए रखता है।



प्रज्ञा : यह तो तय है कि होलोकास्ट की महान विभीषिका को लिखते समय आप तनाव और द्वंद्व से गुजरी होंगी। मैं यह जानना चाहूंगी कि क्या कभी आपको यह लगा कि भाषा इस पीड़ा को दर्ज करने में कहीं नाकाफी है।

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, बिलकुल। होलोकास्ट की विभीषिका को लिखते हुए हर पल तनाव और एक गहरा आंतरिक द्वंद्व बना रहा। यह द्वंद्व सिर्फ भावनात्मक नहीं था, बल्कि भाषा के ही स्तर पर था। कई बार ऐसा लगा कि जो कुछ भी मैं लिख रही हूँ, वह घटना की भयावहता और पीड़ा की गहराई को छू भी नहीं पा रहा। भाषा वाकई नाकाफी लगती थी—क्योंकि जो अनुभव या यातना शब्दों से परे होती है, उसे शब्दों में उतारना एक तरह से उसकी हदों को स्वीकार करना भी है और उसे कम करके दिखाना भी। 

आउशवित्ज़ के उन विवरणों को लिखते हुए—जैसे स्त्रियों के साथ हुई यौन-हिंसा, बालों को काटकर विग बनाने की क्रूरता, या गैस चैंबर की ठंडी व्यवस्थित मौत—मुझे बार-बार लगता था कि ये शब्द सिर्फ घटना का ब्यौरा दे रहे हैं, उसकी आत्मा को नहीं छू पा रहे। भाषा की सीमा यह है कि वह पीड़ा को वर्णन कर सकती है, लेकिन पीड़ा को महसूस नहीं करा सकती। वह यातना के क्षण को दोहरा सकती है, लेकिन उस क्षण में जीवित रहने वाली आत्मा की चीख को नहीं पकड़ सकती। 

फिर भी मैंने हार नहीं मानी। मैंने जानबूझ कर भाषा को काव्यात्मक, तरल और कभी-कभी टूटते हुए रखा—क्योंकि टूटती भाषा ही उस टूटन को कुछ हद तक व्यक्त कर सकती है। बंगाली प्रगीतों, रवींद्र नाथ की पंक्तियों और पत्रों के माध्यम से मैंने कोशिश की कि भाषा सिर्फ सूचना न बने, बल्कि संवेदना का माध्यम बने। विक्टर फ्रैंकल का वह वाक्य जो उपन्यास में आता है—“दर्द जिस क्षण अर्थ प्राप्त कर लेता है, तब वह दर्द नहीं रह जाता”—मुझे बार-बार याद आता था। मैंने सोचा कि अगर भाषा पूरी तरह नाकाफी भी है, तो कम से कम उस पीड़ा को अर्थ देने की कोशिश तो ज़रूर की जा सकती है।

हिन्दी के पाठकों को याद दिलाना चाहूंगी कि विक्टर फ्रैंकल के विचारों का सार यह है कि मानव जीवन का सबसे मूलभूत प्रेरक बल सुख की खोज या शक्ति की प्राप्ति नहीं, बल्कि अर्थ की तलाश है। उन्होंने इसे "विल टू मीनिंग" कहा—अर्थ की इच्छा। फ्रायड ने कहा था कि मनुष्य सुख की तलाश करता है, एडलर ने कहा शक्ति की, लेकिन फ्रैंकल ने कहा कि जब जीवन में अर्थ होता है तो मनुष्य किसी भी पीड़ा को सह सकता है, और जब अर्थ नहीं होता तो सबसे अच्छी स्थिति में भी वह टूट जाता है।

होलोकॉस्ट के यातना शिविरों में उन्होंने खुद देखा कि जो कैदी अपने जीवन को कोई अर्थ दे पाते थे—चाहे वह परिवार की याद हो, भविष्य में कोई अधूरा काम पूरा करने की योजना हो, या दूसरों की मदद करने का छोटा-सा उद्देश्य—वे आश्चर्यजनक रूप से जीवित रहते थे और मानसिक रूप से मजबूत बने रहते थे। वहीं, जिन्हें लगता था कि जीवन अब व्यर्थ हो गया है, वे जल्दी टूट जाते थे। फ्रैंकल ने लिखा कि दुःख का आकार बड़ा या छोटा होना मायने नहीं रखता; महत्वपूर्ण है कि वह दुःख किस अर्थ से जुड़ता है। उन्होंने गैस चैंबर की तुलना में कहा कि गैस जैसे ही किसी बंद कमरे में भरी जाती है, वह पूरे कमरे को भर देती है—चाहे कमरा बड़ा हो या छोटा। ठीक वैसे ही दुःख भी मनुष्य की चेतना को पूरी तरह भर देता है, लेकिन जब उस दुःख को कोई अर्थ मिल जाता है—जैसे बलिदान का अर्थ, प्रेम का अर्थ, या किसी बड़े उद्देश्य का अर्थ—तो वह दुःख, दुःख नहीं रह जाता।

लोगोथेरेपी में फ्रैंकल ने तीन मुख्य रास्ते बताए जिनसे अर्थ मिल सकता है: पहला, कुछ रचनात्मक कार्य करना या कोई योगदान देना; दूसरा, किसी अनुभव—प्रकृति, कला, या प्रेम—में डूब जाना; और तीसरा, जब कुछ भी नहीं बदला जा सकता तो दुःख का सामना करते हुए उसका अर्थ ढूंढना। उन्होंने इसे "ट्रैजिक ट्रायड" भी कहा—पीड़ा, अपराधबोध और मृत्यु—इन तीनों को भी अर्थ दिया जा सकता है।

फ्रैंकल का सबसे प्रसिद्ध वाक्य है : "अंतिम स्वतंत्रता वह है जो कोई नहीं छीन सकता—अपनी प्रतिक्रिया चुनने की स्वतंत्रता।" चाहे बाहरी परिस्थितियाँ कितनी भी क्रूर हों, हम अपनी आंतरिक प्रतिक्रिया को चुन सकते हैं। यातना शिविर में उन्होंने देखा कि कुछ कैदी दूसरों की मदद करते हुए, छोटी-छोटी करुणा दिखाते हुए, या भविष्य की कल्पना कर के अपनी मानवता बचाए रखते थे।

उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे हमें बताते हैं कि संकट में भी हम अर्थ की तलाश कर सकते हैं—चाहे वह प्रेम हो, सेवा हो, या सिर्फ जीवित रहने का साहस। फ्रैंकल का दर्शन आशावाद का नहीं, बल्कि यथार्थवादी आशा का है—यह कहता है कि जीवन हमेशा अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है, भले ही वह अर्थ कितना भी छोटा या दर्दनाक क्यों न हो। यही वजह है कि उनकी किताब और उनके विचार सदियों से लोगों को पीड़ा के बीच भी जीने की ताकत देते रहे हैं।

इतिहास के दौर में बहुत बाद में भारत में जन्म लेने की वजह से मैंने फ्रैंकल की तरह वह विभीषिका नहीं देखी है। बावजूद इसके, लेखन के दौरान कई बार रुकना पड़ा, कई बार रोना पड़ा, कई बार लगा कि शायद यह लिखना ही गलत है—क्योंकि लिख कर क्या हम उस यातना को फिर से जीवित कर रहे हैं? लेकिन फिर यही लगा कि चुप रहना उस यातना को और गहरा अन्याय करना होगा। इसलिए भाषा की नाकाफी को स्वीकार करते हुए भी मैंने लिखा—क्योंकि अधूरी भाषा में भी अगर एक छोटी-सी संवेदना, एक छोटा-सा प्रतिरोध, एक छोटी-सी करुणा जग सके, तो वह अधूरापन भी सार्थक हो जाता है।

यह उपन्यास लिखना मेरे लिए सिर्फ कथा रचना नहीं था, बल्कि उस पीड़ा के सामने खड़े हो कर खुद को परखना भी था। और हाँ, भाषा नाकाफी थी—पर फिर भी मैंने उसे इस्तेमाल किया, क्योंकि चुप्पी से ज्यादा नाकाफी कुछ नहीं।


प्रज्ञा : भाषा से जुड़ा हुआ मेरा अगला सवाल आपसे है कि स्त्री भाषा को आप किस रूप में देखती है? क्या अंतर पैदा होता है किसी अभिव्यक्ति में जब एक स्त्री व्यक्त करती है और एक पुरूष व्यक्त करता है?

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, स्त्री भाषा को मैं एक नदी की तरह लेती हूँ—जो कभी उफान मारती है, कभी शांत बहती है, कभी बाढ़ आ कर सब कुछ उजाड़ देती है, लेकिन हमेशा अपनी गहराई में छिपी धाराओं से भरी रहती है। यह भाषा सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि शरीर की धड़कन, स्मृतियों की टीस, और दमित आकांक्षाओं का बहाव है। हेलन सिक्सू  की ‘écriture féminine’ की अवधारणा से प्रेरित होकर मैं इसे एक ऐसी लेखन प्रक्रिया मानती हूँ जो पुरुष-प्रधान भाषा की रैखिक, तर्क-प्रधान संरचना से विद्रोह करती है। सीकसू कहती हैं कि स्त्री लेखन 'द्रव' होता है—जैसे स्त्री शरीर की तरलता, जो सीमाओं को तोड़ता है, बहुलता को अपनाता है, और दमन की लकीरों को उलझा देता है। मेरे लिए यह भाषा एक हथियार भी है, जो पितृसत्ता की जकड़न को चीर कर बाहर आती है, लेकिन साथ ही एक घाव भी—क्योंकि यह हमेशा अपनी अधूरी अभिव्यक्ति की पीड़ा को साथ लाती है।

जब एक स्त्री लिखती है और पुरुष लिखता है, तो अंतर सिर्फ शैली का नहीं, बल्कि दृष्टि, अनुभव और शक्ति-संरचना का होता है। स्त्रीवादी सैद्धांतिकी में यह अंतर 'द आइसर ऑफ द वर्ल्ड' (लुस इरिगरे) की अवधारणा से जुड़ता है—जिसमें स्त्री को 'दूसरी' (the Other) बना कर पुरुष-केंद्रित भाषा ने हमेशा चुप कराया है। पुरुष लेखन अक्सर 'सार्वभौमिक' (universal) होने का दावा करता है—जैसे सार्त्र या कामू का अस्तित्ववाद, जहाँ मनुष्य का अनुभव पुरुष का अनुभव ही मान लिया जाता है। यह भाषा तर्कसंगत, संरचित और बाह्य-दुनिया पर केंद्रित होती है: युद्ध, शक्ति, विजय की कथाएँ, जहाँ स्त्री या तो पृष्ठभूमि में होती है या प्रतीक के रूप में। लेकिन जब स्त्री लिखती है, तो भाषा 'शारीरिक' और 'आंतरिक' हो जाती है—जूलिया क्रिस्टेवा के सेमियोटिक (semoiotic) भाषा के सिद्धांत की तरह, जो लय, भावना और शरीर की अनियमित धड़कनों से बनी होती है। यह भाषा दमन की परतें उघाड़ती है: यौन-शोषण, मातृत्व की थकान, सामाजिक बहिष्कार, और प्रेम की त्रासदी को नंगा करती है।

उदाहरण के तौर पर, मेरे उपन्यास 'आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा' में स्त्री भाषा का रूप देखिए—प्रतीति सेन का आत्मालाप, रहमाना खातून के पत्र, या सबीना की स्मृतियाँ। ये शब्द रैखिक कथा नहीं बुनते, बल्कि चेतना-प्रवाह की तरह बहते हैं, जहाँ प्रेम की असफलता 'नासूर' बनकर टीसती है, लेकिन यातना के बीच भी अर्थ ढूंढती है। पुरुष लेखक—जैसे बिराजित सेन या अभिरूप का चित्रण—अधूरा रह जाता है, क्योंकि उनकी भाषा अपराधबोध में उलझी रहती है, जबकि स्त्री की भाषा त्याग के बाद भी पुनर्जन्म की तलाश करती है। टोनी मॉरिसन की 'बिलव्ड' या कृष्णा सोबती की 'ऐ लड़की' को याद कीजिए—ये स्त्री लेखन हैं जो इतिहास को स्त्री-देह के माध्यम से फिर से लिखते हैं। पुरुष लेखन में इतिहास 'महान घटनाएँ' हैं; स्त्री लेखन में वही घटनाएँ 'शरीर पर खरोंचें' बन जाती हैं।

स्त्रीवादी सैद्धांतिकी में यह अंतर शक्ति-असंतुलन से उपजता है। सिमोन द बोउवार ने 'द सेकंड सेक्स' में कहा कि स्त्री को 'अन्य' बना कर भाषा ने ही उसकी आवाज दबाई है। इसलिए जब स्त्री लिखती है, तो भाषा प्रतिरोध बन जाती है—विरांजना (बीरांगना) की तरह, जो यौन-हिंसा के बाद भी अपनी कथा कहती है। पुरुष लेखन अक्सर पितृसत्ता को सामान्यीकृत करता है, जबकि स्त्री लेखन उसे चुनौती देता है: 'औरत का कोई देश नहीं होता, न कोई जाति'—यह मेरी कृति का वाक्य है, जो ब्लैक फेमिनिस्ट बेल हुक की 'फेमिनिस्ट थ्योरी: फ्रॉम मार्जिन टू सेंटर' से प्रेरित है, जहाँ भाषा हाशिए की आवाजों को केंद्र में लाती है। अंतर यह भी है कि स्त्री लेखन 'अधूरा' रहता है—क्योंकि समाज ने हमें हमेशा चुप रहना सिखाया है—लेकिन यही अधूरापन इसे शक्तिशाली बनाता है।

इस मुद्दे पर लूस इरिगरे की अवधारणा बेहद महत्त्वपूर्ण है जिसका का मूल आधार यह है कि पश्चिमी दर्शन, भाषा और मनोविश्लेषण पूरी तरह से फैलोगोसेंट्रिक हैं—यानी पुरुष-केंद्रित (phallus) और तर्क-केंद्रित (logos)। इसमें स्त्री को कभी स्वतंत्र विषय के रूप में नहीं, बल्कि पुरुष की कमी या नकारात्मक प्रतिबिंब के रूप में देखा जाता है। इरिगरे कहती हैं कि फ्रायड और लाकाँ के मनोविश्लेषण में स्त्री का लिंग 'एक' नहीं है—यह 'नहीं एक' (not one) है, क्योंकि पुरुष लिंग को एकल, ठोस और दृश्य-केंद्रित माना जाता है, जबकि स्त्री का लिंग बहुल, तरल और स्पर्श-केंद्रित है। योनि के होंठ हमेशा एक-दूसरे को छूते रहते हैं, जो आत्म-कामुकता का प्रतीक है—स्त्री को पुरुष की आवश्यकता नहीं पड़ती खुद को छूने के लिए। फ्रायड की 'पेनिस एन्वी' को इरिगरे उलट देती हैं: स्त्री की कमी नहीं है, बल्कि पुरुष की एकता ही सीमित है।

उनकी पुस्तक 'This Sex Which Is Not One' में यह विचार विस्तार से आता है—स्त्री का लिंग 'एक' नहीं है क्योंकि इसमें कई कामुक क्षेत्र हैं (क्लिटोरिस, योनि, स्तन आदि), यह तरल है, बहती है, और कभी पूरी तरह बंद नहीं होती। पितृसत्तात्मक भाषा स्त्री को 'एक' बनाने की कोशिश करती है—जैसे क्लिटोरिस को छोटा लिंग मानना—लेकिन इरिगरे कहती हैं कि यही बहुलता स्त्री की शक्ति है। इससे स्त्री की कामुकता पुरुष पैमाने पर मापी नहीं जा सकती।

'Speculum of the Other Woman' में वे प्लेटो के गुफा के रूपक से शुरू करती हैं—स्त्री को 'मैटर' (प्रकृति, शरीर) के रूप में देखा जाता है, जबकि पुरुष 'आइडिया' (रूप, विचार) है। दर्पण (speculum) स्त्री को पुरुष की छवि में दिखाता है, लेकिन कभी उसकी अपनी छवि नहीं। स्त्री हमेशा 'ऑफ-स्टेज' रहती है—प्रतिनिधित्व से बाहर। इरिगरे इसे 'लॉजिक ऑफ समनेस' कहती हैं: स्त्री पुरुष का नकारात्मक (not-man), कमी या अतिरिक्त मात्र है। इससे स्त्री कभी स्वतंत्र विषय नहीं बन पाती।

इरिगरे की बाद की रचनाओं में 'यौन अंतर की नैतिकता' (An Ethics of Sexual Difference) प्रमुख है। वे कहती हैं कि यौन अंतर प्राकृतिक और अपरिहार्य है—दुनिया सेक्सुएट है, हर चीज में यौन अंतर मौजूद है। पितृसत्ता ने इस अंतर को दबाया है, जिससे स्त्री को पुरुष की नकल करने पर मजबूर किया जाता है। वे एक नई नैतिकता की मांग करती हैं जो अंतर को स्वीकार करे—समानता नहीं, बल्कि पारस्परिकता पर आधारित संबंध। इससे स्त्री-पुरुष संबंध नई भाषा, नई कामुकता और नई संस्कृति से जुड़ सकते हैं।

भाषा के स्तर पर इरिगरे 'मिमेसिस' का उपयोग करती हैं—पितृसत्तात्मक भाषा की नकल कर के उसे उलट देना। स्त्री भाषा तरल, बहुल और शरीर से जुड़ी होनी चाहिए—रैखिक और एकता वाली पुरुष भाषा से अलग। इससे स्त्री अपनी आवाज़ को पुनः प्राप्त करती है।

इरिगरे की आलोचना होती है कि वे अनिवार्यतावादी (essentialist) हैं—स्त्री को शरीर से जोड़ कर—लेकिन वे इसे रणनीतिक अनिवार्यतावाद  (essentialism) कहती हैं: पितृसत्ता द्वारा दबाए गए शरीर को फिर से केंद्र में लाना। उनकी अवधारणाएँ स्त्री लेखन को प्रभावित करती हैं, जहाँ भाषा शरीर की तरह बहती है, टूटती है और पुनर्निर्मित होती है। इरिगरे का दर्शन स्त्री को 'दूसरी' से मुक्त कर के स्वतंत्र विषय बनाता है—न कि पुरुष की समानता में, बल्कि अंतर की मान्यता में। यह अंतर न केवल यौन है, बल्कि सांस्कृतिक, भाषाई और नैतिक भी—जो दुनिया को फिर से रचने की कुंजी है।

स्त्री भाषा को रूप देने का मतलब है पुरुष-भाषा के एकाधिकार को तोड़ना। यह अंतर सिर्फ लेखन का नहीं, अस्तित्व का है—स्त्री लिखती है तो वह अपनी चुप्पी को तोड़ती है, और पुरुष लिखता है तो वह अपनी पूर्व-स्थापित कथा को दोहराता है। लेकिन आज, जब ‘मी टू’ जैसी लहरें उठ रही हैं, स्त्री भाषा वैश्विक हो रही है—एक ऐसी भाषा जो न केवल बताती है, बल्कि बदलती भी है। यही स्त्रीवादी सैद्धांतिकी का सार है: भाषा मुक्ति का माध्यम है, दमन का नहीं।


प्रज्ञा : क्या इस विभीषिका और नस्लीय घृणा को आप भारतीय उपमहाद्वीप में भी आप देखती है और क्या एक बेहतर समाज के रूप में हम परिपक्व हुए हैं या अधिक जातिवादी, साम्प्रदायिक और स्त्री विरोधी हुए हैं?

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, बिलकुल, आउशवित्ज़ की वह विभीषिका और नस्लीय घृणा—जो मानवता को शर्मसार करती है—मैं भारतीय उपमहाद्वीप में भी साफ-साफ देखती हूँ। मेरे उपन्यास में आउशवित्ज़ को मैंने एक रूपक के रूप में प्रयुक्त  किया है, जो सिर्फ यूरोपीय होलोकॉस्ट तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे अपने इतिहास की उन भयावह परतों को भी उजागर करता है जहाँ नस्ल, धर्म और जेंडर के नाम पर हिंसा का नंगा नाच हुआ है। 1947 का भारत-विभाजन याद कीजिए—जब साम्प्रदायिक उन्माद में लाखों लोग मारे गए, और स्त्रियाँ सबसे ज्यादा शोषित हुईं: अपहरण, बलात्कार, धर्मांतरण और फिर परिवारों द्वारा 'कलंक' मानकर त्याग दिया जाना। मेरी कृति में रहमाना खातून (द्रौपदी देवी) की कहानी ठीक इसी विभीषिका की गवाही देती है—जहाँ एक हिन्दू स्त्री को मुस्लिम बना लिया जाता है, और उसका अपना पति पितृसत्तात्मक 'पवित्रता' के नाम पर उसे स्वीकार नहीं करता। या फिर 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम-पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में हजारों स्त्रियों को 'कम्फर्ट वूमेन' बना लिया, बलात्कार को हथियार बनाया, और बाद में 'बीरांगना' कह कर सम्मानित करने वाले समाज में वे घर-परिवार में 'कलंक' ही रहीं। शेख मुजीबुर्रहमान की 'बीरांगना' वाली घोषणा कितनी खोखली थी—क्योंकि घर लौट कर उन स्त्रियों को जाति से बहिष्कृत किया गया, गर्भवती लड़कियों को पोखर में डुबो दिया गया। यह नस्लीय घृणा नहीं तो क्या है? हिन्दू-मुस्लिम, बंगाली-बिहारी, पश्चिमी पाकिस्तानी-पूर्वी पाकिस्तानी—ये सब विभेद एक ही क्रूरता की उपज हैं, जो आउशवित्ज़ के गैस चैंबरों से अलग नहीं।

और अब सवाल कि क्या हम बेहतर समाज के रूप में परिपक्व हुए हैं? दुखद सच्चाई यह है कि नहीं—बल्कि हम और अधिक जातिवादी, साम्प्रदायिक और स्त्रीद्वेषी हुए हैं। आजादी के 75 साल बाद भी देखिए: 1984 के सिख विरोधी दंगे, 1992 से ले कर  हाल के दिल्ली दंगे—हर बार साम्प्रदायिकता के नाम पर हिंसा, और उसमें स्त्रियाँ सबसे ज्यादा पीड़ित। जातिवाद तो हमारे रक्त में घुला हुआ है—कमजोर तबके के लोगों  पर अत्याचार, स्त्रियों की ऑनर किलिंग  आदि की घटनाएं विचलित करती हैं । स्त्रीद्वेष तो और भी गहरा: ‘MeToo’ से ले कर निर्भया तक, रोजाना बलात्कार की खबरें, घरेलू हिंसा, और अब सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग—ये सब बताते हैं कि हम परिपक्व नहीं, बल्कि और ज्यादा विभाजित और क्रूर हुए हैं। वैश्विक स्तर पर देखें तो उक्रेन जैसी जंगें, हथियारों का व्यापार, पर्यटन के नाम पर देह व्यापार—ये सब 'वार इकॉनमी' के तहत चल रहे हैं, और स्त्रियाँ-बच्चे सबसे ज्यादा पीड़ित। हमारे उपमहाद्वीप में भी, विकास के दावों के बीच औरतों को शिक्षा-रोजगार में बराबरी के अवसर कागजी हैं, और जाति-धर्म के नाम पर मार-काट जारी है। मुक्तिबोध के शब्दों में, 'अपने दुखों को तमगों-सा पहन लेना' आसान है, लेकिन करुणा का क्षेत्र विस्तृत करना मुश्किल—और हमने यही चुना है।

फिर भी, मैं पूरी तरह निराश नहीं हूँ। उपन्यास में प्रेम को मैंने क्रूरता से मुकाबला करने वाले ब्रह्मास्त्र के रूप में रखा है—क्योंकि प्रेम ही है जो घृणा की जड़ें काट सकता है। स्त्री-दृष्टि से देखें तो औरत का कोई देश नहीं, कोई जाति नहीं—वह हमेशा मानवता की पैरोकार रही है। अगर हम प्रेम, करुणा और बृहत्तर मनुष्यता में विश्वास रखें, तो परिपक्वता आएगी। लेकिन इसके लिए हमें इतिहास से सीखना होगा—न कि उसे दोहराना। यही मेरी रचनात्मक जद्दोजहद है: पीड़ा को अर्थ दे कर, जैसे विक्टर फ्रैंकल ने कहा, उसे दर्द न रहने देना।


प्रज्ञा : योरोपीय और अमेरिकी सिनेमा में होलोकास्ट की बर्बरता को बहुत गहराई और संजीदगी से उकेरा गया है। स्टीवन स्पिलबर्ग की शिंडलर्स लिस्ट हो या 'बॉय इन स्ट्राइप्ड पजामा' या लाइफ इज ब्यूटीफुल आदि-आदि। ये मैं जानती हूं कि सिनेमा की भाषा अलग होती है और साहित्य की अलग क्योंकि सिनेमा के माध्यम में साउंड एंड साइलेंस, प्रकाश और अंधकार की सुविधा होती है जिसमें सब कुछ प्रतीकित होता चलता है। आप जब इस उपन्यास को रच रही थीं तो क्या आप सिनेमा की चुनौती को महसूस कर रही थीं।


गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, बिलकुल महसूस कर रही थी—और वह चुनौती मेरे लिए एक तरह की आंतरिक जंग बन गई थी। यूरोपीय और अमेरिकी सिनेमा ने होलोकास्ट को जिस तरह से उकेरा है, वह देख कर मैं बार-बार ठिठक जाती थी। स्पीलबर्ग की ‘Schindler's List’ में वह काला-सफेद फ्रेम, जहाँ लड़की का लाल कोट अकेला रंग है—वह प्रतीक कितना मार्मिक है। ‘The Boy in the Striped Pajamas’ में बच्चे की मासूमियत और बाड़ के उस पार की भयावहता का विपरीत। या रोबर्टो बेनिनी की *Life is Beautiful* में वह हास्य जो दर्द को ढकने की बजाय उसे और गहरा कर देता है। सिनेमा की भाषा में साउंड और साइलेंस, प्रकाश और अंधकार, फ्रेम की सीमाएँ और कैमरा की नजर—ये सब मिल कर दर्शक को सीधे उस यातना के बीच धकेल देते हैं। दर्शक को देखना पड़ता है, सुनना पड़ता है, और कई बार आँखें बंद करने की इच्छा भी दबानी पड़ती है।

साहित्य में यह सब नहीं है। मेरे पास न तो साउंडट्रैक है, न लाइटिंग, न कोई दृश्य जो एक सेकंड में हजार शब्दों का बोझ उठा ले। मेरे पास सिर्फ शब्द हैं—और शब्द कितने भी सघन क्यों न हों, वे कभी भी आउशवित्ज़ के गैस चैंबर की ठंडक, या स्त्रियों के कटे बालों का दर्द  या बच्चे के चौपाए बन कर पानी पीने की उस अपमानजनक हँसी को पूरी तरह से नहीं पकड़ सकते। सिनेमा में प्रतीक तुरंत उभर आता है—एक लाल कोट, एक पट्टीदार पजामा, एक मुस्कान जो मौत के सामने टिकती है। लेकिन उपन्यास में प्रतीक को शब्दों से बुना जाता है, और वह बुना हुआ प्रतीक कभी-कभी पाठक के मन में धीरे-धीरे उतरता है, कभी अचानक चीर देता है।

मैंने जानबूझ कर सिनेमा की इस चुनौती को स्वीकार किया। मैंने सोचा कि अगर सिनेमा दृश्य और ध्वनि से प्रतीकित करता है, तो साहित्य चेतना-प्रवाह, पत्रों की तरलता, और कविता की छंद-भंगिमा से कर सकता है। इसलिए मैंने बंगाली प्रगीतों को बीच-बीच में डाला—रवींद्रनाथ की पंक्तियाँ, सैयद शम्सुल हक़ की कविता—ताकि भाषा में एक संगीतिकता आए, जो सिनेमा के साउंडट्रैक की तरह भाव को गहरा कर दे। मैंने चेतना-प्रवाह का सहारा लिया, ताकि प्रतीति सेन का अंतर्मन, रहमाना खातून की स्मृति, और सबीना की उदासी एक साथ बहती दिखे—जैसे सिनेमा में मॉन्टाज। मैंने साइलेंस को भी शब्दों में पिरोया—उन क्षणों में जहाँ कुछ नहीं कहा जाता, सिर्फ टीस बयान की जाती है। जैसे बिराजित सेन का अंतिम समय, जब वे 'गीत वितान' की पंक्तियाँ बुदबुदाते हैं, लेकिन आवाज़ मास्क के पीछे दब जाती है—वह साइलेंस सिनेमा से कम नहीं है।

फिर भी, मैं जानती थी कि साहित्य की सीमा अलग है। सिनेमा दर्शक को मजबूर करता है देखने को; उपन्यास पाठक को मजबूर करता है महसूस करने को। सिनेमा में आप आँखें बंद कर सकते हैं, लेकिन किताब बंद करने पर भी शब्द मन में गूँजते रहते हैं। इसलिए मैंने चुनौती को अवसर में बदला—सिनेमा जो दृश्य से करता है, मैंने उसे अंतर्दृष्टि से करने की कोशिश की। प्रेम को केंद्र में रख कर, क्योंकि प्रेम ही वह एकमात्र चीज है जो क्रूरता के सामने भी टिक सकती है—चाहे वह असफल हो, टूटा हुआ हो, या अधूरा। सिनेमा में प्रेम अक्सर रोमांटिक बैकग्राउंड बन जाता है; मेरे उपन्यास में प्रेम ही वह लेंस है, जिससे मैंने आउशवित्ज़ को देखा।

कुल मिला कर, आपके सवाल का जवाब है -हाँ, सिनेमा की चुनौती हर पन्ने पर महसूस हुई—लेकिन मैंने उसे स्वीकार किया। क्योंकि साहित्य की अपनी भाषा है—शब्दों की, स्मृति की, और उस गहरी करुणा की, जो पाठक के मन में उतर कर शायद एक छोटा-सा बदलाव ला सके। और शायद यही मेरी जीत है—कि मैंने सिनेमा की तरह नहीं, बल्कि साहित्य की तरह ही उस विभीषिका को फिर से जीया, और फिर से लिखा।



प्रज्ञा : अक्सर इस शुद्वतावादी नस्लीय जनसंहार की घटना को, घृष्णा को एक त्रासदी के रूप में बताया जाता है। भोपाल गैस कांड पर आधारित रमेश उपाध्याय की कहानी याद आती है- 'ट्रैजिडी माय फुट। जिस तरह भोपाल गैस कांड एक सुनियोजित, सुचिंतित और वीभत्स हत्याकांड रहा वैसे ही ये हत्याकांड भी मनुष्य समाज और सभ्यता के मुँह पर एक तमाचे की तरह है। मैं देखती हूं कि यह घटना पूरी मनुष्यता की बुद्धिमत्ता और मानवीय करूणा को बौना और हास्यास्पद सिद्ध करती है। आपके अनुसार इसे त्रासदी कहना कितना उचित है? त्रासदी कहते ही लगता है कि इसके पीछे कोई दैवीय कारण है जिससे ये घटना घटित हुई। मैं मानती हूं कि दुनिया में जितनी भी इतिहास बदलने वाली घटनाएं चाहे वह सकारात्मक हों या नकारात्मक उसमें कुछ भी अलौकिक है ही नहीं। आप इसे किस तरह से देखती हैं?

गरिमा श्रीवास्तव :  हाँ, आपका सवाल बहुत गहरा और जरूरी है। भोपाल गैस कांड को ‘ट्रेजेडी’ कहना वाकई एक तरह का अपराध है—क्योंकि ‘त्रासदी’ शब्द में एक अनजाने दैवीय या भाग्यवादी रंग चिपक जाता है, जैसे कि यह कोई अपरिहार्य, अलौकिक आपदा थी। लेकिन भोपाल 1984 में हुआ क्या? एक सुनियोजित, कॉर्पोरेट लापरवाही और लाभ की लालच से उपजा वीभत्स हत्याकांड। यूनियन कार्बाइड ने जानबूझकर सुरक्षा मानकों को ताक पर रखा, सरकार ने आँखें मूँद लीं, और हजारों निर्दोष लोग—ज्यादातर गरीब, मजदूर, बच्चे—मिथाइल आइसोसाइनेट की जहरीली गैस में घुट-घुट कर मरे। यह कोई ‘ट्रेजेडी’ नहीं, बल्कि पूँजीवाद की क्रूरता, नस्लीय असमानता और कॉर्पोरेट साम्राज्यवाद का नंगा चेहरा था।

लेकिन आउशवित्ज़ और होलोकास्ट की तुलना में इसे रखना मेरे लिए मुश्किल है— इसलिए नहीं कि भोपाल की पीड़ा कम थी, बल्कि इसलिए कि दोनों की प्रकृति, उद्देश्य और संरचना अलग हैं। होलोकास्ट एक राज्य-प्रायोजित, व्यवस्थित, नस्लीय सफाए का अभियान था—जिसमें पूरे एक समुदाय को ‘अमानवीय’ घोषित कर, वैज्ञानिक ढंग से, औद्योगिक स्तर पर मार डाला गया। जर्मन कवि पॉल सेलान की मशहूर कविता के हवाले से कहूँ तो गैस चैंबर, क्रीमेटोरियम, मेडिकल प्रयोग—यह सब एक विचारधारा की चरम परिणति थी, जो ‘शुद्ध नस्ल’ के नाम पर मानवता को नकारती थी। भोपाल में, भले ही मौतें लाखों में न हों, लेकिन यह कॉर्पोरेट लालच और उपनिवेशवादी मानसिकता का परिणाम था—जहाँ तीसरी दुनिया के गरीबों की जान को सस्ता माल समझा गया। दोनों ही अमानवीय हैं, दोनों ही सभ्यता के चेहरे पर थप्पड़ हैं, लेकिन एक राज्य-सत्ता द्वारा नस्ल के नाम पर किया गया सुनियोजित नरसंहार है, दूसरा लाभ के नाम पर कॉर्पोरेट घराने द्वारा की लापरवाही की वजह से  बेगुनाह लोगों की हत्या थी।

मैं दोनों को अलग-अलग देखती हूँ, क्योंकि तुलना करने से दोनों की विशिष्टता खो जाती है। होलोकास्ट को ‘त्रासदी’ कहना भी गलत है—यह कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि मानव-निर्मित और ख़ासकर राज्य द्वारा प्रायोजित क्रूरता थी, जिसके पीछे विचारधारा, राज्य-सत्ता और नफ़रत का तंत्र था। इसने पूरी दुनिया के साहित्य एवं अन्य कला माध्यमों को प्रभावित किया। भोपाल गैस काण्ड  भी त्रासदी नहीं—यह पूँजीवाद की क्रूरता, नस्लीय असमानता और कॉर्पोरेट अपराध था। दोनों ही घटनाएँ सभ्यता को बौना सिद्ध करती हैं, लेकिन एक को ‘नरसंहार’ कहना और दूसरे को ‘ट्रेजेडी’ कह कर अलग करना हमें जिम्मेदारी से बचाने का तरीका बन जाता है।

उपन्यास में आउशवित्ज़ को रूपक बनाया है, ताकि हम अपने घर के भीतर की उन विभीषिकाओं को भी देख सकें—विभाजन में स्त्रियों पर हुए अत्याचार, 1971 में बांग्लादेश की औरतों की यातना, और आज भी जाति-धर्म-लिंग के नाम पर हो रही हिंसा। लेकिन मैं कभी भोपाल को आउशवित्ज़ के बराबर नहीं रखती—क्योंकि दोनों की जड़ें अलग हैं। एक विचारधारा से उपजा नफरत का तंत्र है, दूसरा लाभ का तंत्र। दोनों ही मानवता पर कलंक हैं, लेकिन तुलना करने से हम दोनों की विशिष्ट क्रूरता को कम करके आँक देते हैं।

मैं इन्हें अलग-अलग नाम देना चाहती हूँ—क्योंकि नाम देने से ही हम जिम्मेदारी तय कर सकते हैं। भोपाल एक कॉर्पोरेट हत्याकांड है, जिसके लिए आज भी न्याय बाकी है। आउशवित्ज़ एक नस्लीय सफाया था, जिसकी गूँज आज भी घृणा की राजनीति में सुनाई देती है। दोनों को ‘त्रासदी’ कहकर हम उन्हें भाग्य का खेल बना देते हैं—जबकि दोनों ही मानव-निर्मित अपराध हैं। और अपराध का नाम लेना ही पहला कदम है उसे दोहराने से रोकने का।


प्रज्ञा : आपका ये उपन्यास इतिहास, कल्पना और शोध से निर्मित हुआ है। मैं जानना चाहती हूं कि ऐतिहासिक घटनाओं पर लिखे गए उपन्यासों में कल्पना की भी कोई सीमा होती है?

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, ऐतिहासिक उपन्यासों में कल्पना की सीमा होती है—और वह सीमा बहुत सख्त, बहुत संवेदनशील और बहुत नैतिक होती है।

जब मैं ‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ लिख रही थी, तो मेरे सामने दो सत्य थे: एक ऐतिहासिक सत्य, जो दस्तावेज़ों, जीवनी, शोध-पत्रों, सर्वाइवरों की गवाहियों और अभिलेखागारों में सुरक्षित था; और दूसरा, साहित्यिक सत्य, जो पाठक के मन में उस पीड़ा को, उस यातना को, उस प्रेम की टीस को जीवंत करना चाहता था। ऐतिहासिक सत्य को मैंने कभी नहीं तोड़ा—आउशवित्ज़ के गैस चैंबरों की संख्या, वहाँ मारे गए लोगों के अनुमानित आँकड़े, बाल काटने की प्रक्रिया, विग का उपयोग, या बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में ‘कम्फर्ट वूमेन’ की संख्या और यौन-हिंसा के पैमाने—ये सब मैंने शोध से ही लिए। इन्हें बदलना या बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना मेरे लिए अपराध होता।

लेकिन कल्पना की जगह जहाँ शुरू होती है, वहाँ मैंने पात्रों के अंतर्मन, उनके संवाद, उनके पत्र, उनकी स्मृतियों और उनके प्रेम की गहराई को रचा। प्रतीति सेन, रहमाना खातून, सबीना—ये पात्र ऐतिहासिक घटनाओं में नहीं थे, लेकिन इनके माध्यम से मैंने उन अनगिनत स्त्रियों की अनकही पीड़ा को आवाज़ दी, जिनके नाम इतिहास की किताबों में नहीं मिलते। क्या यह कल्पना की सीमा लाँघना था? नहीं—यह तो इतिहास की उस खामोशी को भरना था, जो स्त्रियों की यातना को अक्सर आँकड़ों में समेट देती है।

उपन्यास लिखने के दौरान  कल्पना की सीमा मेरे लिए यह थी कि ऐतिहासिक तथ्यों को कभी झुठलाना नहीं है, पीड़ितों की गरिमा को कभी ठेस नहीं पहुँचानी है, यातना को सनसनीखेज़ बना कर उसकी गंभीरता को कम नहीं करना है और प्रेम और करुणा को इतना सच्चा रखना कि वह यातना के सामने भी टिक सके, न कि उसका मजाक उड़ाए।  

उदाहरण के लिए, आउशवित्ज़ में स्त्रियों के साथ हुई यौन-हिंसा के विवरण मैंने बहुत सावधानी से लिखे—न तो बहुत विस्तार से कि वे पोर्नोग्राफिक लगें, न इतने संक्षिप्त कि उनकी भयावहता छिप जाए। मैंने जानबूझ कर चेतना-प्रवाह और पत्रों का सहारा लिया, ताकि पाठक को घटना का ब्यौरा नहीं, बल्कि उस घटना से गुज़रती आत्मा की टीस महसूस हो।

ऐतिहासिक उपन्यास में कल्पना की सीमा इसलिए भी सख्त होती है क्योंकि इतिहास जीवित स्मृति है—उसमें छेड़छाड़ करने से पीड़ितों का अपमान होता है। लेकिन कल्पना की अनुपस्थिति भी खतरनाक है—क्योंकि तब उपन्यास सूखी रिपोर्ट बन जाता है, जो दिल तक नहीं पहुँचता। मेरी कोशिश यही रही कि ऐतिहासिक सत्य को आधार बना कर, कल्पना से उस सत्य को भावनात्मक सत्य में बदल दूँ—ताकि पाठक सिर्फ पढ़े नहीं, महसूस करे, और शायद थोड़ा-सा बदल भी जाए।

सीमा है, लेकिन वह सीमा कठोर नहीं—वह संवेदनशील है। वह हमें याद दिलाती है कि हम इतिहास को नहीं बदल सकते, लेकिन उसकी व्याख्या को, उसकी संवेदना को, उसकी आवाज़ को ज़रूर बदल सकते हैं। और यही साहित्य का अधिकार और दायित्व दोनों है।


प्रज्ञा : भारतीय इतिहास में विभाजन बडी परिवर्तनकारी घटना के तौर पर देखा जाता है जिसका बड़ा दूरगामी प्रभाव हमारे वर्तमान समय पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। उस दौर में दो समुदायों के मनुष्य ने अपने निम्नतम स्तर को छुआ। हत्याएं, बलात्कार, लूटपाट, अकल्पनीय यातनाएं मनुष्यों को दी गई। हिंदी साहित्य में कुछ एक बड़े उपन्यासों तमस झूठा सच, कितने पाकिस्तान' और कुछ कहानियों को अगर छोड़ दिया जाए तो बहुत अधिक नहीं लिखा गया है। जबकि दुनिया भर के साहित्य को अगर आप देखें तो हिटलर और उसके दौर को अलग-अलग भाषाओं के साहित्य में जगह मिली है। आप क्या समझती है कि इसकी मुख्य वजह क्या रही है?

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, आपका सवाल बहुत महत्वपूर्ण  है और यह मेरे उपन्यास की रचना-प्रक्रिया के ठीक बीच से गुजरता है। भारतीय उपमहाद्वीप में 1947 का विभाजन न केवल एक भौगोलिक विभाजन था, बल्कि एक मानवीय विभाजन था—जिसमें लाखों लोगों की मौत हुई, औरतों पर अपार यौन-हिंसा हुई, परिवार बिखरे, और सदियों की साझा संस्कृति राख हो गई। फिर भी, होलोकास्ट की तुलना में इस पर साहित्य अपेक्षाकृत कम है। 'झूठा सच', 'तमस', 'कितने पाकिस्तान', कुछ कहानियाँ, और कुछ और रचनाएँ हैं, लेकिन विश्व स्तर पर होलोकास्ट जितनी गहन, बहुभाषी और निरंतर साहित्यिक परंपरा यहाँ नहीं बनी। मेरे विचार में इसकी कई वजहें हैं, और ये वजहें ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर फैली हुई हैं।

सबसे पहली वजह है सामूहिक स्मृति का दमन और चुप्पी का संस्कृति। विभाजन की पीड़ा इतनी गहरी थी कि पीड़ित समुदायों ने इसे व्यक्त करने के बजाय दबा लिया। परिवारों में यह बात घर की चारदीवारी में कैद हो गई—‘इसके बारे में बात मत करो, भूल जाओ’। यह चुप्पी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। होलोकास्ट में, यूरोपीय यहूदी समुदाय ने स्मृति को बनाए रखने का सामूहिक संकल्प लिया—सर्वाइवरों ने गवाहियाँ दीं, म्यूज़ियम बने, शिक्षा का हिस्सा बना। हमारे यहाँ ऐसा नहीं हुआ। विभाजन को ‘स्वतंत्रता की कीमत’ कह कर रोमांटिसाइज़ कर दिया गया, या फिर ‘दोनों तरफ हुआ’ कह कर दोनों पक्षों की बराबरी कर दी गई। इससे अपराध-बोध और जिम्मेदारी का सवाल धुंधला हो गया।

दूसरी वजह है राजनीतिक उपयोग और विभाजन की निरंतरता। होलोकास्ट एक समाप्त घटना थी—नाजी शासन खत्म हुआ, अपराधियों पर मुकदमे चले, और दुनिया ने उसे ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ घोषित किया। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में विभाजन कभी समाप्त नहीं हुआ—वह 1947 से 1971 तक, और आज भी कश्मीर, असम, गुजरात, दिल्ली के दंगों में जीवित है। साम्प्रदायिकता राजनीति का हथियार बनी रही। इसलिए साहित्यकारों को डर लगता है कि अगर वे विभाजन की क्रूरता को बहुत गहराई से लिखेंगे, तो वह वर्तमान की राजनीति में इस्तेमाल हो सकता है। कई लेखक चुप रह गए, या फिर संतुलन बनाने की कोशिश में सच्चाई को कमज़ोर कर दिया।

तीसरी वजह है भाषा और प्रकाशन का संकट। होलोकास्ट पर यूरोपीय भाषाओं में लिखा गया, और अंग्रेज़ी के माध्यम से विश्व स्तर पर पहुँचा। हमारे यहाँ हिंदी, उर्दू, बंगला, पंजाबी—ये भाषाएँ अलग-अलग हैं, और अनुवाद की परंपरा कमज़ोर रही। साथ ही, प्रकाशन बाज़ार में ‘विभाजन’ जैसे विषय को ‘पुरानी बात’ मान कर कम महत्व दिया जाता है। होलोकास्ट पर किताबें विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं, मेमोरियल बनते हैं, लेकिन हमारे यहाँ विभाजन की स्मृति को मेमोरियल में बदलने की बजाय दबाने की कोशिश हुई।

चौथी और सबसे गहरी वजह है स्त्री-यातना की अनदेखी। विभाजन में सबसे ज्यादा हिंसा स्त्रियों पर हुई—अपहरण, बलात्कार, जबरन विवाह, आत्महत्या, और फिर परिवार द्वारा ‘अशुद्ध’ मानकर त्याग। लेकिन यह हिंसा घरेलू और निजी मानी गई। इतिहासकारों ने इसे ‘सामूहिक हिंसा’ में शामिल किया, लेकिन स्त्री की व्यक्तिगत पीड़ा को केंद्र में नहीं रखा। होलोकास्ट में भी स्त्रियों की यौन-यातना हुई, लेकिन वहाँ सर्वाइवरों ने, फेमिनिस्ट इतिहासकारों ने इसे लिखा। हमारे यहाँ स्त्री की आवाज़ दब गई—क्योंकि समाज ने ‘इज्ज़त’ के नाम पर चुप रहना सिखाया।

मैंने ‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ में ठीक इसी खामोशी को तोड़ने की कोशिश की। आउशवित्ज़ को रूपक बना कर मैंने विभाजन और 1971 की उन अनकही स्त्री-कथाओं को सामने लाया—रहमाना खातून की, टिया की, प्रतीति की। क्योंकि मुझे लगा कि अगर हम विभाजन को सिर्फ ‘त्रासदी’ कह कर छोड़ देंगे, तो हम दोहराव से नहीं बच पाएँगे। होलोकास्ट पर साहित्य इसलिए ज्यादा है क्योंकि वहाँ स्मृति को जीवित रखने की सामूहिक जिद थी। हमारे यहाँ वह जिद अभी बननी बाकी है।

मैं मानती हूँ कि विभाजन पर और लिखा जाना चाहिए—न कि इसलिए कि होलोकास्ट से कम है, बल्कि इसलिए कि हमारी अपनी पीड़ा है, और उस पीड़ा को शब्द दे कर ही हम उसे अर्थ दे सकते हैं। और अर्थ मिलने पर ही वह पीड़ा दर्द नहीं रह जाती। यही मेरी रचनात्मक जद्दोजहद है—चुप्पी को तोड़ना, और उस चुप्पी में दबी आवाज़ों को बोलने देना।



प्रज्ञा : 'आउशवित्ज : एक प्रेम कथा' क्यों जरूरी है इसके माध्यम से उन घटनाओं को फिर से याद किया जाना? उन यातनाओं को फिर से जीना? क्योंकि समय की धूल यातनाओं के जख्मों को धुंधला कर देती है। सवाल ये है कि हम क्यों इन्हें फिर से पढ़ें और बतौर लेखक हम क्यों इन्हें दर्ज करें?

गरिमा श्रीवास्तव : क्योंकि चुप रहना सबसे बड़ा अन्याय है। आउशवित्ज़ की यातनाएँ, विभाजन की हिंसा, 1971 की बांग्लादेशी औरतों की पीड़ा—ये घटनाएँ समय की धूल से धुंधली नहीं होतीं, बल्कि हमारी सुविधा से धुंधली की जाती हैं। हम उन्हें भूलना चाहते हैं क्योंकि उन्हें याद रखना असहज है। उन्हें याद रखना मतलब हर बार खुद से पूछना—हम कहाँ खड़े हैं? हमने क्या सीखा? और सबसे कड़वा सवाल—क्या हम फिर से वही करने वाले हैं?

इन्हें फिर से पढ़ना और लिखना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि भूलने से क्रूरता दोहराई जाती है। इतिहास की किताबें आँकड़े देती हैं, लेकिन साहित्य उस आँकड़े के पीछे छिपी आत्मा की चीख सुनाता है। आउशवित्ज़ में लाखों मरे—यह तथ्य है। लेकिन जब प्रतीति सेन उस जगह खड़ी हो कर सोचती है कि “यहाँ सुन्दर औरतों के साथ खुलेआम बलात्कार होता था और बार-बार होता था”, या जब रहमाना खातून अपने पति के सामने अपमानित होने की स्मृति को जीती है—तब वह संख्या नहीं रह जाती, वह एक जीवित जख्म बन जाती है। और जख्म जब जीवित रहता है, तो वह हमें जगाता है।

मैंने इन यातनाओं को फिर से इसलिए जीया क्योंकि चुप रह कर मैं उन स्त्रियों के साथ अन्याय करती, जिनकी आवाज़ इतिहास ने कभी नहीं सुनी। जिनके नाम अभिलेखागार में नहीं हैं, जिनकी कहानी ‘सामूहिक हिंसा’ के पैराग्राफ में दब गई। साहित्य का काम यही है—उन अनकही आवाज़ों को शब्द देना। दिनकर की पंक्ति है – 


‘अंधा चकाचौंध का मारा 

क्या जाने इतिहास बेचारा 

साखी हैं जिनकी महिमा का 

सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल

कलम आज उनकी जय बोल।” 

यहाँ जय की जगह पराजय और यातना की दास्तान है। ‘हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते’ लिखने वाले ग़ालिब प्रकारांतर से यही तो बताते हैं कि रचनाकार को अपने रचनाकर्म को ले कर जाग्रत रहना चाहिए। दुनिया में अनेक बड़े साहित्यकारों ने इस मुद्दे पर कालजयी रचनाएं लिखी, हिन्दी में अगर मैं न लिखती, तो हिन्दी के पाठकों के लिए वह पीड़ा और गहरी चुप्पी में दफ़न हो जाती।

हम इन्हें क्यों फिर से पढ़ें? क्योंकि पढ़ना मतलब याद रखना है। और याद रखना मतलब सतर्क रहना है। ‘आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा’ समेत दुनिया-भर का साहित्य पढ़ने वाले पाठक  सिर्फ अतीत के बजाय वर्तमान को भी देखते हैं : उक्रेन की औरतें, गाज़ा की माँएँ, हमारे अपने शहरों में साम्प्रदायिक हिंसा की शिकार लड़कियाँ- ये सब पाठक की नज़र को चौकन्ना बनाती हैं। जब हम विभाजन की यातना पढ़ते हैं, तो हम समझते हैं कि ‘कलंक’ का बोझ आज भी औरतों पर क्यों डाला जाता है।

लेखक के रूप में मैंने इन्हें इसलिए फिर से दर्ज किया क्योंकि मैं मानती हूँ कि पीड़ा को अर्थ दिए बिना वह पीड़ा व्यर्थ नहीं जाती—वह हमें बेहतर बनाने का अवसर देती है। पॉल सेलान की कविताएँ और विक्टर फ्रैंकल का जीवन और लेखन एक उपन्यासकार के रूप में मेरे लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत रहा है। फैंकल ने कहा था—“दर्द जिस क्षण अर्थ प्राप्त कर लेता है, तब वह दर्द नहीं रह जाता।” विक्टर फ्रैंकल का दर्शन जीवन की सबसे गहरी खोज पर टिका है—अर्थ की खोज। उनका मानना था कि मनुष्य का सबसे मूलभूत प्रेरक सुख की तलाश (फ्रायड) या शक्ति की तलाश (एडलर) नहीं, बल्कि अर्थ की इच्छा है। उन्होंने इसे "विल टू मीनिंग" कहा। जीवन स्वयं अर्थपूर्ण नहीं होता; हम उसे अर्थ देते हैं। अर्थ मिल जाए तो सबसे भयानक पीड़ा भी सहन हो जाती है, और अर्थ न मिले तो सबसे सुखी स्थिति में भी मनुष्य टूट जाता है।

फ्रैंकल ने यह सब न केवल सिद्धांत में, बल्कि आउशवित्ज़ जैसे यातना शिविरों में जी कर देखा। वहाँ उन्होंने पाया कि जो कैदी अपने जीवन को कोई अर्थ दे पाते थे—चाहे वह परिवार की याद हो, भविष्य में कोई अधूरा काम पूरा करने की योजना हो, किसी साथी की छोटी मदद हो, या बस जीवित रह कर गवाही देने का संकल्प—वे आश्चर्यजनक रूप से मानसिक रूप से टिके रहे। वहीं, जिन्हें लगा कि जीवन अब व्यर्थ है, वे जल्दी टूट गए। फ्रैंकल ने लिखा कि दुःख का आकार बड़ा या छोटा होना मायने नहीं रखता; महत्वपूर्ण है कि वह दुःख किस अर्थ से जुड़ता है। उन्होंने गैस की उपमा दी: जैसे गैस किसी बंद कमरे में भर जाए तो वह पूरे कमरे को भर देती है—चाहे कमरा बड़ा हो या छोटा—ठीक वैसे ही दुःख भी चेतना को पूरी तरह भर देता है। लेकिन जब उस दुःख को कोई अर्थ मिल जाता है—बलिदान का अर्थ, प्रेम का अर्थ, किसी बड़े उद्देश्य का अर्थ—तो वह दर्द दर्द नहीं रह जाता। उनके अनुसार तीन मुख्य रास्ते हैं जिनसे जीवन में अर्थ मिल सकता है: पहला, कुछ रचनात्मक कार्य करना या दुनिया में योगदान देना; दूसरा, किसी अनुभव में डूब जाना—प्रकृति, कला, संगीत, या सबसे ऊँचा प्रेम; और तीसरा, जब कुछ भी नहीं बदला जा सकता तो दुःख का सामना करते हुए उसका अर्थ ढूंढना। फ्रैंकल ने इसे "ट्रैजिक ट्रायड" कहा—पीड़ा, अपराध बोध और मृत्यु—इन तीनों को भी अर्थ दिया जा सकता है। प्रेम को फ्रैंकल ने जीवन का सर्वोच्च अर्थ माना। प्रेम में हम दूसरे की आंतरिक दुनिया को छूते हैं, और वह छूना ही अर्थ देता है। मेरे उपन्यास में मैंने प्रेम को क्रूरता के मुकाबले ब्रह्मास्त्र बनाया—क्योंकि फ्रैंकल के अनुसार, प्रेम ही वह शक्ति है जो यातना के बीच भी मानवता को बचाए रखती है।

मैंने कोशिश की कि इन यातनाओं को प्रेम के माध्यम से अर्थ दूँ—क्योंकि प्रेम ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो घृणा के सामने टिक सकती है। प्रेम असफल हो सकता है, टूट सकता है, लेकिन वह हमें याद दिलाता है कि हम इंसान हैं।

इन्हें फिर से पढ़ना और लिखना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अगर हम भूल गए, तो हम दोहराएँगे। और दोहराव से बड़ा कोई अपराध नहीं। साहित्य की यही ताकत है—वह समय की धूल को हटाता है, और हमें फिर से इंसान होने की याद दिलाता है। यही वजह है कि ‘आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा’ की रचना की गयी —न कि भूलने के लिए, बल्कि याद रखने के लिए। और याद रखना ही शायद सबसे बड़ा प्रतिरोध है।



प्रज्ञा : आपके उपन्यास में अलग-अलग उपमहाद्वीपों की घटनाएं हैं। इनके स्त्री पात्र हैं। कहीं भारत की प्रतीति सेन है, तो कहीं पोलैंड की सबीना स्कंवित्ज है या द्रौपदी देवी के रहमाना खातून बनने और धर्म परिवर्तन की कहानी। पाकिस्तान के कैंपों में यौन शोषण की शिकार द्रौपदी देवी और विराजित सेन की बेटी भी या सबीना की मां और आउशिवत्ज़ कैंपों की स्त्रियां, बंगलादेश में अपमानित बलात्कृत स्त्रियां अलग-अलग देशों में बसने चाली स्त्रियों के शोषण की कहानियां आपने कही हैं। इन्हें एकसाथ लाने की जरूरत क्या है? जबकि माना ये जाता है कि योरोपीय समाज अलग है और एशियाई समाज अलग है।

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, यह सवाल मेरे उपन्यास की रीढ़ तक जाता है। मैंने जानबूझ कर अलग-अलग महादेशों की घटनाओं और स्त्री-पात्रों को एक साथ बुना—क्योंकि ये अलग-अलग नहीं हैं। ये एक ही क्रूरता की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं, जो समय और स्थान बदल कर भी अपनी मूल संरचना नहीं बदलतीं।

प्रतीति सेन भारत की है—जादवपुर की प्रोफेसर, जो संघर्ष क्षेत्रों पर शोध करती है, लेकिन उसके भीतर भी वही यातना की स्मृति बहती है जो उसकी नानी द्रौपदी देवी से रहमाना खातून बनने की प्रक्रिया में थी। सबीना पोलैंड की है—एक यहूदी परिवार की बहू, जिसके जीवन में आउशवित्ज़ की छाया पीढ़ियों तक फैली हुई है। दोनों के बीच जो मुलाकात होती है, वह संयोग नहीं—वह एक जरूरी संवाद है। क्योंकि स्त्री-यातना का दर्द कोई स्थानीय या राष्ट्रीय सीमा नहीं मानता। यह वैश्विक है।

मैंने इन सबको साथ लाने की ज़रूरत इसलिए महसूस की क्योंकि अगर मैं सिर्फ आउशवित्ज़ लिखती, तो वह यूरोपीय इतिहास की एक घटना बनकर रह जाती। अगर सिर्फ विभाजन या 1971 की बांग्लादेश की हिंसा लिखती, तो वह दक्षिण एशियाई संदर्भ तक सीमित हो जाती। लेकिन जब मैं इन दोनों को एक साथ रखती हूँ—जब प्रतीति आउशवित्ज़ में खड़ी हो कर अपनी नानी की यातना याद करती है, या सबीना प्रतीति के पत्र पढ़ कर अपने परिवार की पीड़ा में भारतीय उपमहाद्वीप की स्त्रियों की पीड़ा को देखती है—तब पाठक को दिखता है कि यह क्रूरता एक ही है।

स्त्री-देह को युद्ध का हथियार बनाना , धर्मांतरण को जीवित रहने का एकमात्र रास्ता बनाना, बलात्कार को सामूहिक अपमान का औज़ार बनाना  और  परिवार और समाज द्वारा ‘कलंकित’ कह कर त्याग देना - यह सब क्रूरता के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं।

आउशवित्ज़ में नात्सी एस. एस. के लोग स्त्रियों को बार-बार उठवा लेते थे। हसनपुर के आँगन में भीड़ ने द्रौपदी देवी को पति के सामने अपमानित किया। पाकिस्तानी कैम्पों में हजारों बंगाली स्त्रियों को ‘कम्फर्ट वूमेन’ बनाया गया। ये अलग घटनाएँ नहीं—ये एक ही मानसिकता की उपज हैं: स्त्री को वस्तु मानना, उसकी गरिमा को छीनकर पुरुष की शक्ति साबित करना।

मैंने इन्हें साथ लायी ताकि हिन्दी का पाठक  समझ सकें कि यह समस्या स्थानीय नहीं, वैश्विक है। अगर हम आउशवित्ज़ को सिर्फ यूरोप की त्रासदी मान कर अलग रख देंगे, तो हम अपने घर के भीतर की विभीषिका से आँखें चुरा लेंगे। और अगर हम विभाजन या बांग्लादेश की हिंसा को सिर्फ ‘हमारा दर्द’ कह कर अलग कर देंगे, तो हम मानवता के उस बड़े घाव को नहीं देख पाएँगे जो हर जगह एक जैसा बहता है।

प्रेम को मैंने केंद्र में इसलिए रखा क्योंकि प्रेम ही वह एकमात्र धागा है जो इन अलग-अलग महादेशों की पीड़ा को जोड़ सकता है। प्रतीति और अभिरूप का अधूरा प्रेम, बिराजित और रहमाना का टूटा प्रेम, सबीना और आंद्रेई का अधूरा-सा  प्रेम—ये सब एक ही सवाल पूछते हैं: क्रूरता के सामने प्रेम कितना टिक सकता है? और क्या प्रेम ही वह शक्ति है जो हमें इन यातनाओं से मुक्त कर सकती है?

इन बातों को अलग-अलग कहने से हम सतह पर रह जाते हैं। साथ लाने से हम गहराई में उतरते हैं—और वह गहराई हमें बताती है कि स्त्री-यातना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक व्यवस्था है। और जब तक हम इस व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर नहीं पहचानेंगे, हम उसे तोड़ नहीं पाएँगे। यही मेरी रचनात्मक जिद थी—इन अलग-अलग आवाज़ों को एक साथ सुनाना, ताकि उनकी सिसकी एक ही गीत बन जाए: मानवता की पुकार।


प्रज्ञा : रेडिकल स्त्रीवाद की सबसे बड़ी सीमा यह बताई जाती है कि उसमें पुरूष द्वेष दिखाई देता है। इस उपन्यास के पुरूष पात्रों की यदि हम चर्चा करें तो क्या हम यह मानें कि कोई सकारात्मक पुरुष पात्र भी है?

गरिमा श्रीवास्तव : हाँ, यह सवाल अक्सर पूछा जाता है, और रेडिकल स्त्रीवाद पर यह सबसे आम आलोचना भी है कि वह पुरुष-द्वेष में बदल जाता है। लेकिन मेरे उपन्यास को पढ़ते हुए अगर कोई यह निष्कर्ष निकाले कि इसमें कोई सकारात्मक पुरुष पात्र नहीं है, तो यह एक विभ्रम होगा।

मैंने जानबूझ कर पुरुष पात्रों को सपाट या एकरूप नहीं बनाया। बिराजित सेन और अभिरूप—दोनों ही जटिल हैं। बिराजित सेन में अपराध-बोध है, वह पत्नी को खोने के बाद बार -बार स्टेशन जा कर इंतज़ार में खड़ा रहता है, उम्मीद करते हैं कि शायद वह लाल पाड़ की साड़ी में उतर आए। वह टूटा हुआ है, लेकिन उसकी टूटन में एक ईमानदारी है—वह खुद से झूठ नहीं बोलता। वह जानता है कि उसने पत्नी की रक्षा नहीं की, और उस अपराध-बोध ने उसे जीवन भर चुभोया। क्या यह सकारात्मक नहीं है? यह कम से कम ईमानदार है—और ईमानदारी ही सकारात्मकता की शुरुआत है।


अभिरूप में भी वही द्वंद्व है। वह प्रतीति से प्रेम करता है, लेकिन परिवार के दबाव  से पीछे हट जाता है। वह बोहेमियन नहीं है, न ही क्रूर—वह एक आम पुरुष है, जो प्रेम चाहता है लेकिन उसे निभाने का साहस नहीं जुटा पाता। उसकी कमज़ोरी उसे नकारात्मक नहीं बनाती; वह मानवीय बनाती है। और मानवीय होना ही सकारात्मकता का आधार है।

उपन्यास में मैंने पुरुषों को न तो आदर्श बनाया, न ही राक्षस। मैंने उन्हें वैसा दिखाया जैसा वे अक्सर होते हैं—अपराध-बोध से भरे, कमज़ोरियों से जूझते, और कभी-कभी अपनी कमज़ोरी को स्वीकार करने की हिम्मत जुटाते। सकारात्मक पुरुष पात्र की तलाश में अगर कोई एक ‘परफेक्ट’ हीरो ढूंढ रहा है, तो वह निराश होगा—क्योंकि मैंने कोई परफेक्ट हीरो नहीं बनाया। लेकिन अगर सकारात्मकता का मतलब है जटिलता, आत्म-चिंतन, अपराधबोध और सुधार की संभावना, तो हाँ—बिराजित और अभिरूप में वह मौजूद है।

रेडिकल स्त्रीवाद की आलोचना में पुरुष-द्वेष की बात इसलिए आती है क्योंकि वह पितृसत्ता की व्यवस्था पर हमला करता है, न कि हर पुरुष पर। मेरे उपन्यास में भी हमला पितृसत्तात्मक मानसिकता पर है—उस ‘सनातनी’ सोच पर जो स्त्री को ‘भूलुंठित पुष्प’ मान कर त्याग देती है, उस दबाव पर जो पुरुष को प्रेम छोड़ने पर मजबूर करता है। मैं पुरुषों से नफरत नहीं करती; मैं उस व्यवस्था से नफरत करती हूँ जो पुरुषों को भी विकृत करती है, उन्हें अपराधी बनाती है, और फिर उन्हें अपराधी होने की सज़ा भी नहीं देती।

तो हाँ, उपन्यास में सकारात्मक पुरुष पात्र हैं—वे पूर्ण नहीं हैं, लेकिन वे मानवीय हैं। और मानवीय होना ही सबसे बड़ी सकारात्मकता है। क्योंकि अगर हम पुरुषों को सिर्फ राक्षस मान लें, तो हम बदलाव की संभावना को ही नकार देंगे। और बदलाव के बिना कोई मुक्ति संभव नहीं। यही मेरी स्त्रीवादी नजर है—नफरत नहीं, समझ और जिम्मेदारी की माँग।


प्रज्ञा : क्या आपकी बहुचर्चित पुस्तक 'देह ही देश' के नैरंतर्य के रूप में आपके उपन्यास 'आउशवित्ज : एक प्रेम कथा' को देखा जा सकता है?

गरिमा श्रीवास्तव : इसका उत्तर हाँ या ना में देना मुश्किल है. साहित्य जगत में अमूमन यह कहा जाता है कि हर लेखक आरंभ से ले कर अंत तक एक ही रचना को बार–बार लिखता है। लेकिन यह बात समझने की है कि रचनाओं की विषयवस्तु एक होने या मिलती जुलती होने के बावजूद उनकी अंतर्वस्तु अलग-अलग होती है। ‘देह ही देश: क्रोएशिया प्रवास डायरी’ और ‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ के बीच विषयवस्तु की दृष्टि से एक सीमा तक समानता है इसलिए एक गहरा नैरन्तर्य है, जो मेरी रचनात्मक यात्रा की निरंतरता को दर्शाता है। 

‘देह ही देश’ एक यात्रा-डायरी है, जो क्रोएशिया के युद्ध-क्षेत्रों में स्त्री-यातना, विस्थापन और देह पर लड़े गए युद्धों की गवाही देती है। वहाँ मैंने देखा और महसूस किया कि युद्ध कभी सिर्फ़ सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता—वह देह पर लड़ा जाता है, औरतों के शरीर को ही देश की सीमा बनाकर। वह डायरी एक तरह से प्रश्नों का संग्रह थी: युद्ध में स्त्री की जगह क्या है? उसकी पीड़ा को इतिहास कैसे दर्ज करता है? और क्या वह पीड़ा सिर्फ़ स्थानीय है या वैश्विक?

‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ उपन्यास है. इसकी रचना-प्रक्रिया ‘देह ही देश’ से भिन्न ही नहीं, बल्कि बेहद जटिल है. एक अर्थ में यहाँ उन्हीं प्रश्नों का विस्तार है, लेकिन अंतर्वस्तु जब बदली तो स्वत: रूप या फॉर्म भी बदल गया उपन्यास के रूप में। जहाँ ‘देह ही देश’ में मैंने व्यक्तिगत अनुभव और प्रत्यक्षदर्शन से लिखा, वहाँ उपन्यास में मैंने कल्पना की शक्ति से उन अनुभवों को शिद्दत के साथ महसूस किया और  व्यापक बनाया। क्रोएशिया के युद्ध-क्षेत्रों में जो स्त्री-यातना मैंने देखी, वही यातना आउशवित्ज़ के गैस चैंबरों में, विभाजन के हसनपुर में, और 1971 के बांग्लादेशी कैम्पों में दोहराई गई। प्रतीति सेन, रहमाना खातून और सबीना—ये तीन स्त्रियाँ उसी यात्रा का विस्तार हैं। प्रतीति का आउशवित्ज़ जाना, अपनी नानी की स्मृति से जुड़ना, और सबीना से संवाद—यह सब ‘देह ही देश’ में शुरू हुई उस जिज्ञासा का परिणाम है कि स्त्री-देह ही वह जगह है जहाँ इतिहास सबसे ज्यादा क्रूरता से लिखा जाता है।

‘देह ही देश’ में मैंने प्रश्न उठाए थे; ‘आउशवित्ज़’ में मैंने उन प्रश्नों को कथा की संरचना में ढाला। डायरी में जो व्यक्तिगत था, उपन्यास में वह सार्वभौमिक हो गया। दोनों में एक ही थीम है- युद्ध, घृणा और सत्ता की लड़ाई देह पर ही लड़ी जाती है—और स्त्री का देह सबसे पहले उसका मैदान बनता है। दोनों कृतियों में मैंने यही दिखाने की कोशिश की कि यह क्रूरता कोई एक जगह या एक समय की नहीं—यह वैश्विक है, और स्त्री-दृष्टि से देखने पर ही इसकी पूरी भयावहता समझ आती है।

इसलिए हाँ, —‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ एक अर्थ में  ‘देह ही देश’ का नैरन्तर्य है, उसकी अगली कड़ी है, लेकिन रचनात्मक बीज इस कृति में पहले के मुकाबले एक भिन्न अंतर्वस्तु और रूप से साथ प्रकट हुआ है जिसका रचनात्मक अभिप्राय और कलात्मक प्रभाव वही नहीं है जो डायरी में है। जहाँ डायरी ने यात्रा शुरू की, उपन्यास ने उसे एक महाख्यान में बदल दिया। यह बात ज़ोर दे कर कहना शायद ज़रूरी है कि रचना करते हुए तमाम तरह की कल्पना आदि के बावजूद वह रचना अंतत: क्या आकार लेगी, यह दुनिया के किसी लेखक को पहले से पता नहीं होता। जिनको पता होता है उनके लेखन को जार्ज लुकाच ने स्कीमेटिक लेखन कहा है।

मैंने दोनों रचनाओं में प्रेम को  क्रूरता के मुकाबले ब्रह्मास्त्र बनाया—क्योंकि प्रेम ही वह एकमात्र शक्ति है जो यातना को अर्थ दे सकती है, और अर्थ मिलने पर यातना की प्रकृति बदल  जाती है। बावजूद इसके उनमें प्रेम का स्वरूप भी भिन्न है। वस्तुत: आप जिस नैरन्तर्य की बार कर रही हैं वह निरंतरता मेरी रचनाओं के बजाय मेरे  स्त्रीवादी चिंतन की निरंतरता है—देह से देश तक, और देश से वापस देह तक की यात्रा। बावजूद इसके दोनों दो भिन्न कृतियाँ हैं।

बहुत बहुत धन्यवाद।



प्रज्ञा


सम्पर्क - 


ई-112, आस्था कुंज अपार्टमेंट्स, 

सेक्टर 18, रोहिणी, 

दिल्ली-89


ई-मेल - pragya3k@gmail.com

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