युद्ध के विरुद्ध कविता : 3, टेरी एरेट की कविता फ़ासीवाद जब आएगा


Terry Ehret


फासीवाद, नाजीवाद मूलतः एक प्रवृत्ति है। जरूरी नहीं कि तानाशाह शासक शुरू में तानाशाह जैसा ही दिखे। इतिहास गवाह है कि हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह जनता को तमाम ऐसे सपने दिखा कर सत्ता में आए जो कभी पूरे नहीं होने थे। शुरू में तानाशाहों का चेहरा खासा उदारवादी और लोकतांत्रिक दिखता है लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है वह उसका चेहरा और स्वभाव बदलने लगता है। तानाशाह धर्म, राष्ट्रवाद और निजीकरण की बातें ज्यादा करते हैं। तानाशाह लड़ाईयों में ज्यादा यकीन करते हैं। तानाशाह अक्सर जनता में यह प्रदर्शित करते हैं कि उसका अपना कुछ नहीं, जो भी उसका है वह राष्ट्र और उसकी जनता के लिए ही है। आज दुनिया युद्ध के जंजाल में उलझी हुई है। अमरीका और इजरायल का निर्मम चेहरा सबके सामने है। कहने के लिए अमरीका एक लोकतान्त्रिक देश है लेकिन हमेशा उसका चेहरा एक तानाशाह की भांति दिखाई पड़ता है। बहरहाल ईरान आजकल एक थोपा हुआ युद्ध लड़ रहा है। उसने वेनेजुएला की तरह समर्पण नहीं किया। अगर समर्पण कर देता तो शायद यह नौबत नहीं आती। लेकिन ईरान एक पुरानी सभ्यता है । उसकी फितरत लड़ने की है न कि आत्मसमर्पण की। इन दिनों हम युद्ध के विरुद्ध कविता नामक एक कॉलम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस कड़ी में यह तीसरी प्रस्तुति है। कवयित्री है। अमरीकी कवयित्री टेरी एरेट। टेरी एरेट (Terry Ehret) ने यह कविता 23 सितम्बर, 2011 को Santa Rosa, कैलिफ़ोर्निया में "100 Thousand Poets for Change" के लिए लिखी थी। टेरी एरेट के चार कविता-संग्रह प्रकाशित हैं- लॉस्ट बॉडी, ट्रांसलेशन्स फ्रॉम द ह्यूमन लैंग्वेज, लकी ब्रेक और नाइट स्काई जर्नी। उन्हें नेशनल पोयट्री सीरीज़, कैलिफोर्निया बुक अवार्ड और पाब्लो नेरुदा पोयट्री प्राइज़ सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। 2004 से 2006 तक वे Sonoma County, कैलिफ़ोर्निया की Poet Laureate रहीं। राजेश चंद्रा ने मूल कविता का शब्दशः नहीं बल्कि भावानुवाद किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं टेरी एरेट की कविता 'फासीवाद जब आएगा'।



युद्ध के विरुद्ध कविता : 3

फ़ासीवाद जब आएगा


टेरी एरेट


हिन्दी अनुवाद : राजेश चंद्रा 

 

जब फ़ासीवाद आएगा

वह दरवाज़ा नहीं तोड़ेगा,

मुस्कुराते हुए भीतर आएगा—

घुटनों के बल झुकेगा,

प्रार्थना करेगा

और तुम्हारे ईश्वर को

तुम्हारे ही विरुद्ध खड़ा कर देगा।


वह रैलियों में बाज़ार की स्तुति करेगा—

गली की दुकानों से ले कर

काँच की अट्टालिकाओं तक,

हर जयकार में उसका नाम होगा।


वह दर्शकदीर्घा से ताली बजाएगा

जब बिना बीमा वाले गरीब लोग, बिना इलाज,

सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिये जाएंगे।


वह अपने नायकों के स्मारक खड़े करेगा

और उनके लिए रोएगा,

उनके पत्थर के चरणों में फूल चढ़ाएगा,

ग्रेनाइट की दीवार पर खुदे नामों को उँगलियों से छुएगा,

और सैनिकों को मरने के लिए भेजता रहेगा

पहाड़ों में, रेगिस्तानों में।


वह कबूतरों को भेजेगा 

अपने दुश्मनों की आँखें नोचने के लिए,

क्योंकि उसके पास बाज़ फालतू नहीं होंगे।


जब फ़ासीवाद आएगा

वह सत्ता के बरामदों में चाय पिएगा,

और सड़कों पर ज़हर उगलेगा।

मस्जिदों, गिरजाघरों, मंदिरों के बीच

वह डर की दीवारें खड़ी करेगा—

और चिल्लाएगा:

“जागो, दुश्मन तुम्हारे भीतर है!

उसे कपड़ों से पहचानो!”


वह शब्द गढ़ेगा—

निगमीकरण, निजीकरण,

और नफ़रत को नीति बना देगा।

रेडियो पर उसी की आवाज़ होगी,

स्क्रीन पर उसी का चेहरा,

और भाषा—

धीरे-धीरे अपनी गहराई खो देगी।


उसके पास तैयार बयान होंगे, 

एक फेसबुक पेज होगा,

और बड़े शब्दों या कठोर ध्वनियों के प्रति 

बेहिसाब घृणा होगी।


वह पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाएगा।

विश्वविद्यालयों को ख़तरा बता कर 

वह अपनी सारी किताबें चिथड़े कर देगा

वह उन्हें जलाएगा नहीं,

बस उन्हें अप्रासंगिक कर देगा।


वह शिक्षकों को कटघरे में खड़ा करेगा,

यूनियनों को गैरकानूनी घोषित करेगा

और मूढ़ता को नाम देगा राष्ट्रभक्ति का।


जब फ़ासीवाद आएगा

वह आकर्षक दिखेगा।

उसके घने बाल होंगे, इस्त्री किए हुए सूट

वह सभी चैनलों पर नियंत्रण करेगा।

वह सर्वोच्च न्यायालय में बैठेगा

और कानून की भाषा में

अन्याय लिखेगा।

वह हमें भय से फुसलाएगा,

वह हमें आशा से रिझाएगा।


जब फ़ासीवाद आएगा,

वह शेयर बाज़ार में खुद के हिस्से बेचेगा।

वह अमीर बनेगा, फिर बेहिसाब अमीर,

फिर कर देना बंद कर देगा।

वह तुम्हें धूल में पड़ा रहने देगा

कुचल दिये जाने की प्रतीक्षा के साथ।


तुम्हें दोबारा मूर्ख बनाने के लिए 

उसे पसीना भी नहीं बहाना पड़ेगा।

तुम उसके “असफल होने” का इंतज़ार करोगे

और यह इतना भी आसान नहीं होगा।


वह तुम्हें हराएगा

बिना लड़े,

और तुम समझ भी नहीं पाओगे

कि तुम हार चुके हो—

एक और बार।


जब फ़ासीवाद आएगा,

वह हमारी चुप्पी, उदासीनता और 

आत्मसंतोष की हवाओं पर सवार होकर आएगा।


और उस दिन, कवि इकट्ठा होंगे

किताबों की दूकानों में, पुस्तकालयों में, बारों और कैफ़े में,

अपने घरों और अपार्टमेंटों में, स्कूलों में और सड़कों के किनारों पर—

वे इकट्ठा होंगे

रोते हुए, हँसते हुए, चीखते हुए।


वे मानवता के उदास संगीत को 

शब्दों के छोटे-छोटे टुकड़ों में लपेटेंगे

और उन्हें प्रार्थनाओं की तरह

जीवन-वृक्ष पर टाँग देंगे।



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