बलभद्र का आलेख 'राजा, परजा और कोतवाल : एक कथात्मक बालखेल'


बलभद्र 


बचपन और खेल का चोली दामन का सम्बन्ध है। बचपन में हम सभी तमाम खेलों से हो कर गुजरे होते हैं। बच्चे के स्वास्थ्य और मानसिक विकास में इनकी एक बड़ी भूमिका होती है। ये खेल वस्तुतः मनोरंजक होने के साथ साथ समाज की मनःस्थिति के परिचायक भी होते हैं। बचपन के ये दिन किसी भी मनुष्य के लिए अहम होते हैं। ये दिन ही भविष्य की दिशा तय करते हैं। आज भले ही क्रिकेट ने तमाम खेलों को निगल लिया है, कुछ समय पहले तक भोजपुरी क्षेत्र में ऐसे तमाम खेल प्रचलन में थे जिसमें किसी क्रीडा उपकरण की जरूरत नहीं होती थी। कुछ नियमों के अन्तर्गत इसे शारीरिक रूप से ही खेला जाता था। बलभद्र की बात उधार ले कर कहूं तो "चिक्का, कबड्डी, दोल्हा-पाती, बाघ-बकरी, सतघरवा जैसे अनेक खेल थे, जो बचपन से बाहर निकले बच्चे खेलते थे। दस वर्ष तक के बच्चों के लिए अँखमुदउवल (लुका-छुपी) जैसे कई खेल थे। ऐसा ही एक खेल था 'राजा, परजा और कोतवाल"। बलभद्र ने एक अभिनव प्रयोग करते हुए इन खेलों की कथा को उनकी समग्रता में समझने का प्रयत्न किया है। हमने इसे श्रृंखलाबद्ध रूप से 'कथा खेल खेल में' प्रकाशित करने का निश्चय किया है। पहली कड़ी में 'राजा, परजा और कोतवाल" खेल और उसके कथा निहितार्थों के बारे में बताया गया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बलभद्र का आलेख 'राजा, परजा और कोतवाल : एक कथात्मक बालखेल'।


'राजा, परजा और कोतवाल : एक कथात्मक बालखेल'


बलभद्र


खेलों की भी अपनी एक निराली दुनिया रही है। बहुत से ऐसे खेल थे जो हमारी उम्र के लोग बचपन में खेला करते थे। बिना किसी साधन के भी खेले जाने वाले बहुतेरे खेल थे। चिक्का, कबड्डी, दोल्हा-पाती, बाघ-बकरी, सतघरवा जैसे अनेक खेल थे, जो बचपन से बाहर निकले बच्चे खेलते थे। दस वर्ष तक के बच्चों के लिए अँखमुदउवल (लुका-छुपी) जैसे कई खेल थे। ऐसा ही एक खेल था 'राजा, परजा और कोतवाल' का। अचानक इस खेल की याद आई और कुछ सोचने को मजबूर हुआ। बचपन के ऐसे भी खेल हुआ करते थे जो अपने में काफी गंभीर अर्थ समेटे हुए होते थे। आज यकीन नहीं होता इस खेल के अर्थ को समझते हुए कि यह बचपन का खेल था। जमींदारी प्रथा और उसकी शोषण-संरचना और परजा-विद्रोह की संभावना जिस खेल-कथा का सार हो, वह हम लोग बच्चे थे तब खेला करते थे। इस खेल को खेल कह लें, खेल-कथा कह लें, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन, इसको कथा के रूप में कभी नहीं सुना, किसी ने नहीं सुनाया। याद है कि बचपन में एक उम्र के हम कई लोग इसको खेलते थे। इसमें लड़का-लड़की का कोई भेद नहीं हुआ करता था। कोई भी इस खेल का पात्र हो सकता था। सबको एक गोलाई (गोलाकार) में बैठना होता था। थोड़े-थोड़े फासले पर। उतने पात्र जरूरी थे जिसे एक गोलाई पूरी हो जाए। पात्रों की संख्या कम होने पर प्रत्येक के बीच का फासला थोड़ा अधिक करना होता था। सब बच्चे जमीन पर गोलाई में बैठ जाते थे और बीच में कुछ रख दिया जाता था, कुछ भी, कोई भी वस्तु। लकड़ी का कोई छोटा टुकड़ा अथवा थोड़ी-सी धूल इकट्ठा कर। सभी को उसी बीच की वस्तु को देखना होता था। 


इस खेल में कुछ बच्चे गोल में बैठते थे और कोई एक राजा का कोतवाल होता था। इस खेल में राजा अदृश्य होता था। लेकिन, उसकी आभासी उपस्थिति होती थी। राजा का कोतवाल गोल में बैठे बच्चों के पीछे चक्कर लगाया करता था। चक्कर लगाते हुए वह खेंखर की आवाज की नकल उतारते हुए खेंखें.. खेंखें.. बोलते हुए गोल के बच्चों के पीछे घूमता था। इस खें.. खें को सुन कर गोल में से कोई एक पूछता कि मेरे पिछवाड़े कौन बोल रहा है? तब वह कोतवाल जो खेंखर की आवाज में बोल रहा था उत्तर देता था कि राजा का कोतवाल। फिर गोल से कोई दूसरा बच्चा या बच्ची पूछता कि राजा क्या मांग रहे हैं? तब कोतवाल कहता कि राजा खीरा-कंकरी मांग रहे हैं। तब गोल से कोई कहता था कि जाओ कह देना कि अभी खेत तैयार हो रहा है। तब वह कोतवाल अदृश्य राजा से कहने का अभिनय करता। फिर वह कोतवाल उसी तरह गोल के बार-बार चक्कर लगाता और फसल की बुआई, उसके जमने, उसमें फूल-फल लगने और तैयार होने तक की सूचना राजा को देता था। फिर आखिर में दो-तीन कोतवाल आते और गोल के बच्चों के सिर को दबाते हुए कहते कि यह पक गया है, यह अभी थोड़ा कच्चा है। इसी बीच गोल के सभी बच्चे हुहकार मचाते हुए खड़े हो जाते और कोतवाल भागने का नाटक करते। फिर कोतवाल टीम में मिल जाते और हुहकार करने लगते। इस तरह यह खेल पूरा हुआ करता था।




वह खेल भोजपुरी में इस प्रकार है


गोल बना के सब लइका-लइकी बइठ जालें। गोल के बीच थोरिका धूर बटोर के रखल जाला। सब लोग के नजर ओही धूर के गोला प होला। तब ले आ जाला राजा के कोतवाल आ बोलेला -

" खेंखें ...खेंखें..

बइठल लइकन में केहू पूछेला - 'हमरा पिछुअरिया के बोलेला!'

कोतवाल बोलेला- 'राजा के कोतवाल!'

गोल से केहू - 'राजा का मांगेलें !'

कोतवाल - 'खिरवे-कांकर!'

गोल से केहू - 'जा, कह द अबहीं खेत जोतात बा!'


कोतवाल गोल से तनिका हट के अदृश्य राजा से कहेला - 'अबहीं खेत जोतात बा। '


कोतवाल फेर आवेला -

- खेंखें .... खेंखें.....

- हमरा पिछुअरिया के बोलेला!

- राजा के कोतवाल!

- राजा का मांगेलें!

- खिरवे-कांकर!

- जा, कह द अबहीं बोआत बा!


कोतवाल राजा से  - 'अबे बोआत बा!'


कोतवाल फेर आवेला -

- खेंखें... खेंखें...

- हमरा पिछुअरिया के बोलेला!

- राजा के कोतवाल!

- राजा का मांगेलें!

- खिरवे-कांकर

- जा, कह द अब जाम गइल बा!

 

कोतवाल अदृश्य राजा से - 'अब जाम गइल बा।'


कोतवाल फेर आवेला -

- खेंखें... खेंखें...

- हमरा पिछुअरिया के बोलेला!

- राजा के कोतवाल!

- राजा का मांगेलें!

- खिरवे-कांकर!

- जा, कह द अबहीं फूल आ भतिया लागत बा!


कोतवाल अदृश्य राजा से - 'अबहीं फूल आ भतिया बा।'


कोतवाल फेर आवेला -

- खेंखें... खेंखें..

- हमरा पिछुअरिया के बोलेला!

- राजा के कोतवाल!

- राजा का मांगेलें!

- खिरवे-कांकर!

- जा, कह द अबहीं कांच बा!


कोतवाल राजा से - 'अबहीं कांच बा।'


कोतवाल फेर आवेला -

- खेंखें ... खेंखें ....

- हमरा पिछुअरिया के बोलेला!

- राजा के कोतवाल!

- राजा का मांगेलें!

- खिरवे-कांकर!

- जा, कह द पाक गइल बा!


कोतवाल राजा से - 'पाक गइल बा।'


अबकी दू-तीन गो कोतवाल आवेलें। गोल के लइका-लइकिन के माथा दबा के देखेलें। ई पाकल बा, ई कांच बा। पाकल के बहरी छांटेलें। तबले कुलि लइका-लइकी हुहकार मचा देला आ उठ खड़ा हो जालें। कोतवाल पहिले भागेला, फेर टीम के हिस्सा होके उ हो हल्ला में शामिल हो जाला। खेल एह तरे उड़स जाला। 



यह रहा खेल और उसकी कथा-पटकथा। एक तरह से यह एक लोक नाटक भी है। कोई चाहे तो आज की तारीख में मंचन भी कर सकता है। नुक्कड़ पर भी इसको खेला जा सकता है। नये प्रयोग की भी गुंजाइश है। पर, अभी तक यह हो नहीं सका है। शायद ही यह किसी की याद में हो। भोजपुरी अंचल के खेलों की पटकथा भी होती है या हो सकती है, इसका बेहतरीन उदाहरण है यह। लोकमानस की रचनात्मकता और उसकी कल्पनाशीलता को भी समझने की जरूरत है। 


यह खेल बचपन में हम लोगों ने पहली बार कहां देखा या सीखा था, नहीं कह सकता। हां, खेला जरूर था। जिस किसी ने इसे रचा होगा, कोई व्यक्ति या कोई टीम, उसके चिन्तन या उसकी समझ पर सुखद आश्चर्य होता है। यह खेल मेहनतकश किसान परिवेश का है। मेहनतकशों के धैर्य, धैर्य की चरम सीमा और उसके बाद सामूहिक विद्रोह की संभावना की बहुत कोमल और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। कोई पूछे तो कहा जा सकता है कि विद्रोह तो विद्रोह होता है और वह धैर्य, प्रतीक्षा, समय और समझ की जमीन पर ही प्रस्फुटित होता है। वह चाहे जितना कठोर हो, जितना परेशानहाल, मनुष्य की सबसे जरूरी और कोमल मिजाज की परिणति होता है। वह आदमी की तरह जीने की चाहतों का ही परिणाम होता है। उसमें भी यह एक बाल-खेल है जो खेल और कथा के ताने-बाने में है। 


अब जरा इस खेल के उस पात्र पर गौर फरमाया जाए जो है पर अदृश्य है, नेपथ्य में है। वह पात्र राजा है जो अपने प्यादे भेज कर किसानों की उपज का जायजा लेता है और अंत में, फसल तैयारी की हालत में, सब प्यादों के जरिए अपनी हवेली में जमा कर लेता है। उसके प्यादे किसानों के घरों के चक्कर लगाते रहते हैं। वह राजा इसमें खीरा-कंकरी उगाहने अपने प्यादे को भेजता है। जो राजा इस मामूली उपज तक नहीं छोड़ता, वह धान,  गेहूं या अन्य फसलों को कैसे छोड़ सकता है। रही बात खेल के खीरा-कंकरी की, तो बेशक इसे बालमनोविज्ञान को समझते हुए खेल में लाया गया है। बच्चों को खीरा-कंकरी से ज्यादा मतलब होता है। धान-गेहूं बड़े-बुजुर्ग समझें। यह भी संभव है कि बच्चे खीरा-कंकरी की तरह ही कोमल होते हैं।


इस खेल में जो राजा का कोतवाल है, वह आदमी की भाषा में बात तो करता है पर हांक लगाने की उसकी जो ध्वनि है, आवाज है, वह खेंखर की है। खेंखर की तरह खें खें करता है। खेंखर लोमड़ी की तरह का ही एक जीव है, लोमड़ी से भी छोटा, और उसके बारे में एक अध्ययन है कि वह गड़े हुए मुर्दे को अंदर से खोद कर खाती है। अब सोचिए जरा कि राजा के प्यादे को खेंखर की तरह दिखाना किस जनभावना को दर्शाता है। घोर नफरत को। गांवों में लोग पहले बेमतलब छिछिआते लोगों को खेंखर कहा करते थे, उसमें भी खासकर महिलाओं को। खेंखर की आवाज हम लोग बचपन में जाड़े की रात में सुना करते थे करीब पैंतीस-चालीस साल पहले। बाबा बताते थे कि वह अंधेरे में अपनी मांद खोजती फिरती है। तब गन्ने की खेती हमारे इलाके में खूब हुआ करती थी। उन खेतों में उनकी मांदे हुआ करती थी। जाड़े में उसकी कटाई और पेराई के चलते मांदे उजाड़ हो जाती हैं।


बच्चे गोलाकार बैठते हैं। कोतवाल उनके पीछे बोलता है। बच्चों के पीछे मतलब किसानों के घर के पिछवाड़े। प्रत्येक बच्चा एक किसान है, उसका एक घर है जिसके पिछवाड़े राजा का कोतवाल हांक लगाता है। वह उसकी प्यारी चीज खीरा-कंकरी की हांक लगाता है। समझने की बात है कि कम उम्र के बच्चे कोतवाल की प्रत्येक हांक पर खेती और फसल के जमने, फूलने, फलने और पकने तक की सूचना यानी खेती की पूरी प्रक्रिया की सूचना देते हैं। इतनी कम उम्र में वे अपने परिवेश से यह सब समझ- बूझ लेते हैं। किसान परिवारों के बच्चों को खेती-बारी कहीं अलग से नहीं सीखना होता है। वे खीरा के फूल और भतिया को देखते हैं। वे खुद भी फूल और भतिया होते हैं। जो एक समय फूल और भतिया होते हैं, वे पक कर किसान होते हैं। वे परिस्थितियों का आकलन करते हैं और एक समय शोषण के खिलाफ खड़ा होने का फैसला भी लेते हैं।


हिंदी सहित अन्य कई भाषाओं में किसानों के इस शोषण की अनेक मार्मिक कहानियां हैं। प्रेमचंद की 'पूस की रात' और मार्कण्डेय की 'बादलों का एक टुकड़ा' में किसानों की उपज जमींदार और सूदखोर हड़प लेते हैं।

 

इस तरह के खेलों में तब बड़ा आनंद आता था। इसमें कोतवाल की हांक पर बोलने के लिए हम उतावले होते थे। साथ ही, आखिर में हुहकार मचाने के लिए। इस हुहकार पर डांट भी खानी पड़ती थी। शोर होने पर आस पास कोई बूढ़ा-बुजुर्ग जरूर डांट पिलाता। नाद के मवेशी कान खड़े कर लेते। सबसे दिलचस्प था आखिर में कोतवाल को पकड़ना। लेकिन, पकड़ में आने के पहले ही कोतवाल टीम में शामिल हो कर शोर मचाना शुरू कर देता। मुझे इस खेल की याद आई तो उस समय-खेल में शामिल होने वाले वे लोग भी याद आए जो अब साठ पार हैं। कुछ तो गुजर भी गए हैं। उस गुजरे वक्त का आज की तारीख में बड़ा महत्व है। उन खेलों और कथाओं को समझने और संगोरने की भी जरूरत है और यह समझना भी जरूरी है कि इनको केवल बचाया जाना ही काफी नहीं है, बल्कि नये सिरे से समझना भी जरूरी है। इनमें भी हमारे समाज के दुःख-सुख, आक्रोश, विद्रोह दर्ज हैं। हमारी जीवन-शैलियां दर्ज हैं।


पता : 


ओक  607, आपनो घर, 

पो. - के. जी. आश्रम, 

जिला- धनबाद, 

पिन - 828109,  झारखंड


मोबाइल : 9801326311

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