राहुल सांकृत्यायन के भोजपुरी नाटक "जपनिया राछछ" का पंकज मोहन द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद


राहुल सांकृत्यायन 


मानव इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध सबसे विनाशकारी युद्ध साबित हुआ। जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी राष्ट्रों ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। यूरोपीय तानाशाहों की तर्ज पर जापान ने तोजो के नेतृत्व में साम्राज्यवादी रुख अपनाते हुए 'एशिया एशियाइयों के लिए' जैसा नारा गढ़ दिया। ताकतवर होने के नाते समूचे एशिया पर कब्जा करना वह अपना अधिकार समझने लगा। इस समय उसने पूरी तरह से साम्राज्यवादी तौर तरीका अपना कर एशियाई देशों को रौंदना शुरू कर दिया। क्षेत्रफल के मामले में चीन के आगे जापान कहीं नहीं ठहरता, लेकिन बौने जापान ने चीन को 1904 में ही पराजित कर दिया। 1931 में जापान ने मंचूरिया पर कब्जा कर लिया और दुनिया देखती रह गई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने सिंगापुर, फिलीपींस, मलाया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, डच न्यू गिनी, वर्मा जैसे देशों पर कब्जा कर लिया। जापानी सेनाएं भारत में प्रवेश करने लगीं। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भोजपुरी नाटक 'जापानी राछछ' में जापान की इस साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा को उद्घाटित किया है। वैसे भी दुनिया के तमाम देशों में आज भी उनकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं स्पष्टतया देखी जा सकती है। आज 9 अप्रैल को राहुल सांकृत्यायन का जन्मदिन है। हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इतिहासकार पंकज मोहन बहुभाषाविद हैं। उन्होंने न केवल राहुल जी के इस अप्राप्य नाटक को खोज निकाला है बल्कि उसका सुरुचिपूर्ण हिन्दी अनुवाद भी किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राहुल सांकृत्यायन के भोजपुरी नाटक "जपनिया राछछ" का पंकज मोहन द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद।



अतीत में मैंने अंग्रेजी, कोरियाई, जापानी, आधुनिक और क्लासिकल चीनी, संस्कृत, बंगला, ब्रजभाषा, मैथिली, मगही, डेनिस, स्वीडिश आदि भाषाओ की रचनाओं का हिन्दी, अंग्रेजी और कोरियाई अनुवाद तैयार किया, लेकिन  मैने कभी कल्पना नहीं की थी कि मुझे भोजपुरी की किसी कृति का भी अनुवाद करना होगा। राहुल जी के प्रति श्रद्धा के कारण मैने उनके अप्राप्य भोजपुरी नाटक "जपनिया राछछ" जिसे उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 1942 में लिखा था, का उद्धार किया और एक सप्ताह के परिश्रम के फलस्वरूप उसे हिन्दी मे अनूदित भी कर दिया। 

पंकज मोहन 


जापानी राक्षस

राहुल सांकृत्यायन 

भोजपुरी से हिन्दी अनुवाद : पंकज मोहन

(Copyright@pankajnmohan)



दृश्य 1


मंच के नीचे अपने-अपने हाथों में लाल झंडा और तिरंगा लिए मजदूर, किसान और विद्यार्थी गाते हुए प्रवेश करते हैं।


सभी (गाते हुए):

अपने मुल्क के दो-चार लोगों के लोभ के लिये

देश-देश में खून की नदियां बहाते हैं जापानी।

माँ से बच्चों को छीन कर उनका बध करते,

विदेश के गांव-गांव में आग लगाते हैं जापानी।


जहाँ-जहाँ जापानी भेजते अपनी फौज,

बेटी-बहनों की इज़्ज़त लूटते, हम होते शर्मसार।

बचानी है हमें घर-परिवार और देश की इज़्ज़त,

उठाओ बन्दूक-तलवार, करो जापानियों पर वार।



दृश्य 2


कुर्ता, टोपी, धोती और चश्मा पहने एक जापानी दलाल मंच पर खड़ा हो कर बड़बड़ाता और मुट्ठी तानता है। दूसरा किसान पास आ कर सीना तान कर खड़ा हो जाता है।


दलाल : जापान की निंदा करते हो? क्या नहीं जानते, जापान हमारे देश को स्वराज देने आया है?


किसान : क्या कह रहे हो? तुम जापान का दलाल तो नहीं हो? जापान हमें स्वराज देगा?


दलाल : जापान हमारा भाई है।


किसान : कैसा भाई? गला काटने वाला भाई तो नहीं?


दलाल : हमारी दुश्मनी गोरों से है। जापान भारत की ही तरह अश्वेत मुल्क है, इसलिए वह अंग्रेजों को भारत से खदेड़ कर हमें स्वराज दिलाएगा।


किसान : क्या कोई दूसरा मुल्क हमें स्वराज देगा? या हमें खुद अपनी बाज़ुओं के बल पर स्वराज प्राप्त करना होगा? ये बता भैया, कोरिया गोरा है या अश्वेत?


दलाल : अश्वेत।


किसान : कोरिया जापान से बस अठारह कोस की दूरी पर एक छोटा-सा देश है, जो पिछले बत्तीस साल से जापान के चंगुल में फँस कर स्वराज के लिये छटपटा रहा है। अगर जापान पहले कोरिया को आज़ाद करेगा, तभी मानेंगे कि उसके मन में हिंदुस्तान को आज़ाद कराने की मंशा है। और ये बता—कोरिया के लोग रूप-रंग में जापानियों जैसे ही हैं न?


दलाल : हाँ, दोनों के चेहरे नेपाली जैसे हैं।


किसान : तो कोरिया नज़दीकी भाई हुआ कि हम? वही जापान कोरिया को बत्तीस साल से अत्याचार की चक्की में पीस रहा है! और बताओ—जापान में बड़ा भूकंप कब आया था?


दलाल : उन्नीस साल पहले।


किसान : उसी साल जापान ने आठ हज़ार बेगुनाह कोरियाइयों को मार डाला। और आज जब कोरिया स्वराज माँगता है, तो जापान उस पर कोड़े बरसा कर अधमरा कर देता है। कौन कहता है, जापान हमें आज़ादी देगा?


दलाल : जापान की जनता बौद्ध भाई है और भारत बुद्ध का जन्मस्थान। हम बुद्ध को विष्णु का अवतार मानते हैं, इस हिसाब से जापान हमारा धर्म-भाई हुआ। इसलिए जापान हिंदुस्तान को स्वराज देगा।


किसान : भाई, कोरिया कौन-सा धर्म मानता है?


दलाल : बौद्ध धर्म।


किसान : हम हिंदुस्तानी बौद्ध धर्म को नहीं मानते, लेकिन कोरिया तो पूरी तरह बौद्ध देश है। कोरिया के स्वराज को पिछले बत्तीस साल से लाठी-गोली के बल पर कुचलने वाला मुल्क हमें स्वराज देगा? यह सरासर बकवास है। और चीन भी तो बौद्ध है न?


दलाल : हाँ।


किसान : कितने लाख चीनी लोगों को जापान ने मार डाला! न जाने कितने चीनी गाँवों को आग के हवाले कर दिया। वह जापान हमें स्वराज देगा?


दलाल : काँटे से काँटा निकलता है। अंग्रेजों को निकालने के लिए जापान की मदद ज़रूरी है।


किसान : एक काँटे को हटा कर दूसरे काँटे में फँसना—तुम इसे स्वराज कहते हो, भाई?


दलाल : तो अंग्रेजों से स्वराज कैसे लिया जाएगा?


किसान : जिस ताकत से हम जापान को अपने देश में घुसने नहीं देंगे, उसी ताकत से।



दृश्य 3


जापान। मेज़ के किनारे चार कुर्सियाँ लगी हैं, जिन पर जनरल तोयो, सेठ मित्सुई, सेठ मित्सुबिशी और शिक्षक ओयामा बैठे हैं। एक सुंदरी महिला दो बोतलें और चार प्याले रखती है। जनरल तोयो उसके गाल पर हाथ फेर कर हँसता है। महिला नाराज़ हो कर चली जाती है।


मित्सुई (प्याला खाली करके) : सुंदरी और शराब—बस यही दो चीज़ें चाहिए।


तोयो (प्याला उठा कर): सही कहा, सेठ मित्सुई! मोहिनी और मदिरा। यह महिला बहुत रूपसी लगती है। कहाँ से फँसाया?


मित्सुई : पैसा चाहिए, फँसाने की क्या बात है।


तोयो : और सेना चाहिए। दुनिया भर का पैसा तो हमारे पास है।


ओयामा : लेकिन जापान का आधा धन तो तुम दोनों के पास है। दस बड़े घरानों के हाथ में अस्सी प्रतिशत धन केंद्रित है, फिर भी तुम्हें संतोष नहीं होता।


मित्सुबिशी : संतोष पाप है, महाशय। हम जापान के ही नहीं, पूरी दुनिया के धन पर कब्जा करना चाहते हैं।


तोयो : ओयामा, चुप रहो। तुम उम्रदराज हो गये, लेकिन उम्र के हिसाब से तुम्हारे अक्ल में बढोत्तरी नही हुई। अक्ल होती तो तुम समझते कि जापान धरती और सात समुद्रों पर राज करने के लिए जन्मा है। जापानी तलवार एक बार म्यान से निकल गई, तो बिना विजय-ध्वज गाड़े वापस नहीं जाएगी।


ओयामा : विजय का झंडा चोरी-छिपे नहीं गाड़ा जा सकता। कोई भी अपने देश में तुम्हारा झंडा खुशी से नहीं गाड़ेगा।


तोयो : हमारे पास सेना है, हथियार हैं—वह किस काम के लिए हैं?


ओयामा (मित्सुई की तोंद पर हाथ फेरते हुए): सेठ, अभी भी यह पेट नहीं भरा? कितने लाख महिलाएँ विधवा हो गईं, कितने लाख बच्चे अनाथ हो गए!


तोयो : दया-माया से काम नहीं चलता।


ओयामा : लेकिन सेठ मित्सुई, तुम खुद को बुद्ध का शिष्य कहते हो।


तोयोबी: कहावत सुनी होगी—"हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और।" हमें शराब और औरत चाहिए। दस-बीस लाख आदमी मरें या जिएँ, हमें परवाह नहीं।


मित्सुबिशी : और आदमियों की जापान में क्या कमी है? हर साल दस लाख बच्चे जन्म लेते हैं।


ओयामा : क्या वे बच्चे इसलिए जन्म लेते हैं कि मित्सुई और तोयो उन्हें दूर-दराज़ मुल्क में युद्ध की ज्वाला में झोक दे?


तोयो : बकवास बंद करो। हमने सिपाहियों को छूट दे दी है—जहाँ  कहीं जाओ, वहां की औरतों के साथ जो मन में आये, करो और जितना शराब  पीना चाहो, पियो।


ओयामा : जापान के नाम पर दुनिया थूकती है, जनरल साहब।


मित्सुई : पर हमें यह सब खुल कर नहीं करना है। हमें प्रचार करना होगा कि जापान गोरों से अश्वेतों को मुक्त कराना चाहता है।



दृश्य 4


तीन-चार मजदूर, किसान और विद्यार्थी एक महिला के साथ प्रवेश करते हैं। महिला का बेटा कंजी, जो फौजी था, मंचूरिया की लड़ाई में मारा गया। माँ की आँखों से आँसू बह रहे हैं।


सभी (नारा लगाते हुए) :

कसाई तोयो मुर्दाबाद!

तोंद-फुलाऊ मित्सुई मुर्दाबाद!

सैनिक राज मुर्दाबाद!


किसान (भगवान से प्रार्थना): हे भगवान! कब इन कसाइयों का राज खत्म होगा? हाय! कंजी बेटा!


महिला (छाती पीटते हुए): हाय कंजी! हाय कंजी! ऊपर वाला तोयो की सात पीढ़ियों का सत्यानाश करे। उसकी लाश को चील-कौवे भी न पूछें। हाय, कंजी! तुझे मंचूरिया भेज कर मार डाला इस मित्सुई ने, अपनी तोंद फुलाने के लिए! जैसे मेरा वंश डूबा, वैसे ही कसाइयों का वंश डूबे!


मजदूर (किसान से): कसाई तोयो और मित्सुई—इनकी एक बोतल शराब के लिए देश के जवानों को यमलोक भेजते हैं।


विद्यार्थी : इस देश में सच बोलना गुनाह हो गया है। किसके लिए, तोयो? किसके लिए जनता पर ये ज़ुल्म करते हो? क्यों जेल में ठूँस दिए उन्तीस-तीस हजार बुद्धिजीवियों को--  स्कूल-काॅलेज के अध्यापक और छात्र को?

(मजदूर से) यह तुम्हारा हाथ कैसे टूटा?


मजदूर : तोयो की पुलिस ने मारा। चार आने की मज़दूरी में रात-दिन खटना पड़ता है। हमारा पेट काट कर सेठ-साहुकार मुनाफा कमाते हैं। जब हमने अपनी माँग रखी, तो पुलिस ने हम पर लाठी-गोली बरसाई। दस लोग मर गए, बाबू—दस लोग! और तुम्हारा तो बाबू टोपी, पायजामा भी फट गया था।


विद्रोही : हमारे कॉलेज में भी पुलिस पहुँच गई। अनेक छात्र लहूलुहान हुए। पचास लोगों को पकड़कर हवालात में बंद कर दिया गया।


किसान : यह सब किसके लिए?


विद्रोही: इन्हीं पाँच जनरलों और पाँच सेठों की तोंद फुलाने के लिए। अपने देश में जब इतना अत्याचार हो रहा है, तो सोचिए, दूसरे देशों में तोयो के मातहत फौजी क्या-क्या कर रहे होंगे। राक्षस तोयो! खूनी मित्सुई!


सभी (मिल कर नारा लगाते हैं):

कसाई तोयो मुर्दाबाद!

तोंद-फुलाऊ मित्सुई मुर्दाबाद!

सैनिक राज मुर्दाबाद!



दृश्य 5


सभी (गाते हुए):

अपने मुल्क के दो-चार लोगों के लोभ के लिये

देश-देश में खून की नदियाँ बहाते हैं जापानी।

माँ से बच्चों को छीन कर उनका बध करते,

घर-घर में मौत का जाल बिछाते हैं जापानी।



दृश्य 6


तोयो और उसके साथी मंच पर लौटते हैं।


तोयो (गर्व से): ओयामा ! जापान का विजय ध्वज फहराने के लिए हम घर-घर में गोली चलाने को तैयार हैं। हम किसी भी हालत में पीछे नहीं हटेंगे।


ओयामा (व्यंग्य से): यह सब जापान का झंडा फहराने के लिए नहीं, बल्कि तोयो और मित्सुई की औरत और शराब की भूख मिटाने के लिए हो रहा है।


तोयो (गुस्से में): मत भूलो, रिश्ते मे तुम मेरा साला लगते हो, इसलिए बचे हुए हो, नहीं तो उन्तीस हज़ार बुद्धिजीवी जो जेल में सड़ रहे हैं, तुम भी उन्हीं के बीच होते।

(सेठ मित्सुई से) अच्छा, यह  साकी  कहाँ से पकड़ कर लाए हो?


मित्सुई : जावा से, जनरल! अब लड़कियों की कोई कमी नहीं है। जहाँ-जहाँ हमने झंडा गाड़ा, वहाँ की हसीनाओं को निशाना बनाया।


तोयो : सेठ मित्सुबिशी! तुम चुप क्यों हो? बताओ, रोज़गार का क्या हाल है?


मित्सुबिशी : जनरल! जैसे ही किसी देश में जापान का झंडा गड़ता है, हमारे आदमी वहाँ के बड़े कल-कारखाने, गोदाम और दुकान पर कब्ज़ा कर लेते हैं। देसी लोगों को आदेश है कि पाँच हज़ार येन से अधिक का कारोबार नहीं कर सकते। नतीजा—सारे बड़े व्यापार हमारे कब्ज़े में आ जाते हैं।


तोयो : मैंने यह भी हुक्म निकाला है कि स्कूल-कॉलेज में जापानी भाषा में पढ़ाई होगी और कोर्ट-कचहरी भी जापानी भाषा में चलेगी। इससे हज़ारों जापानी शिक्षकों को काम मिलेगा और स्थानीय शिक्षक, वकील बेरोज़गार हो जाएँगे। अगला हुक्म यह है कि डॉक्टर भी नुस्ख़ा जापानी में लिखें।


मित्सुई : खबर मिली है कि नए देशों में जैसे ही हमने झंडा गाड़ा, हमारे जापानी भाइयों ने छोटी दुकानों से ले कर वेश्यालय तक खोल दिए।


तोयो : किसी भी तरह से धन लूट कर लाना है।


मित्सुई : सही कहा आपने। जब इंग्लैंड ने बर्मा पर कब्ज़ा किया, अंग्रेज़ों ने केवल ऊँचे सरकारी पद और बड़े कारोबार हथियाए। लेकिन हम छोटी नौकरी या छोटे कारोबार को भी नहीं छोड़ते।


तोयो : जब छोटी दुकान से ले कर रंडीख़ाना तक हमारी मुट्ठी में आ गया—तो अब बाकी क्या बचा?


सभी मंच से बाहर चले जाते हैं।



अंक 2


दो किसान गुस्से से लाल, दूर से आती चीख-पुकार और धधकती आग की लपटें देख कर आपस में बात कर रहे हैं।


फूची : थाइची भाई, फूशुन गाँव का हाल सुना तुमने?


थाइची : अभी-अभी बांस फटने की आवाज़ आ रही थी, और आग की लपटें अब भी आसमान तक उठ रही हैं।


फूची : नज़दीक से देखा तो कलेजा फट गया। पहले विश्वास ही नहीं होता था कि जापानी लोग निहत्थे ग्रामीणों पर इतना कहर ढाते होंगे।


थाइची : मुझे तो विश्वास था। नौ साल पहले शंघाई में उनकी राक्षसी करतूतें देख चुका हूँ।


फूची : गाँव वालों पर ऐसा अत्याचार—ये वीरता नहीं, दरिंदगी है। घरों से जो कुछ मिला, सब लूट लिया। बर्तन-बासन, ओढ़ना-बिछौना तक उठा ले गए।


थाइची : बिछौना-ओढ़ना भी?


फूची : हाँ! गाय-भैंसें तक हाँक ले गए। कुछ भैंसों को जलते घरों में झोंक दिया और फिर पके मांस पर टूट पड़े।


थाइची : अपने देश में इन्हें पेट भर खाना नहीं मिलता क्या?


फूची : जापान में पेट कैसे भरेगा? वहाँ तो पूरे देश की दौलत मुट्ठी भर अमीरों के पास है।


थाइची : मवेशियों को कहाँ ले गए?


फूची : छावनी में। गाय-बकरी, सुअर—यहाँ तक कि मुर्गियाँ तक नहीं छोड़ीं।


थाइची : कितनी नीच सोच है इनकी!


फूची : इतना ही नहीं। लूट-पाट के बाद घरों को आग लगा दी। पूरा गाँव राख हो गया। लोग जान बचा कर भागे तो चारों तरफ से गोलियाँ बरसाईं।


थाइची : निहत्थों पर गोलियाँ?


फूची : औरतों-बच्चों तक को नहीं बख्शा। जलते घरों से जो भी बाहर निकला, सबको गोलियों से भून डाला। बच गए तो उनके सीने में संगीन भोंक दिया।


थाइची (स्तब्ध): औरतों और बच्चों को भी?


फूची : माँ की छाती से चिपके दुधमुंहे बच्चे तक को नहीं छोड़ा।


थाइची : इंसान हो कर ऐसा कैसे कर सकते हैं!


फूची : खून देख कर कलेजा काँप जाता है, लेकिन जो मासूम बच्चों पर गोली चला सकते हैं— उनका दिल पत्थर से भी कठोर हैं।


थाइची : पत्थर भी पिघल जाए, ऐसे दृश्य देख कर।


फूची : बूढ़े-जवान सब को पकड़ कर गड्ढों में जिंदा दफना दिया।


थाइची : तो फू शुन गाँव उजड़ गया?


फूची : तीन हज़ार लोग मारे गए—तीन हज़ार! और कितनी ही औरतों को घसीट कर छावनी ले गए।


दोनों धीरे-धीरे मंच से जाते हैं।


पर्दा गिरता है और नया पर्दा उठता है—जले हुए फूशुन गाँव का दृश्य। एक औरत विलाप कर रही है।


गीत (पृष्ठभूमि):

फेंक लुकाठी झोपड़ियों पर, फूँका फूशुन ग्राम,

चहुँओर फैल गया धुआँ, उठीं लपटें अविराम।

जहाँ खेलते थे शिशुगण, गूँजता था गीत का तान,

वहाँ बिछी अनगिन लाशें, प्यारा गांव बना मशान।


सीने से सटा कर बच्चों को भागने लगे जब नर-नारी,

गोली से भून दिया उनको जापान की सेना हत्यारी।

माताएँ गिरीं, बच्चे मरे, बह चली खून की धार,

बचाओ बाबू, बचाओ भाई, गूंजी दारुण चीत्कार।



अंक 3


फूची, थाइची, जुम्मन और जंगली—चारों का मिलन।


फूची : हम दोनों भाइयों ने मिल कर बीस जापानियों को ढेर कर दिया।


जंगली (उत्साहित): बीस! अगर हम पाँच-पाँच को भी मार गिराएँ तो कलेजा ठंडा हो जाएगा।


थाइची : बीस तो यमलोक भेज चुके हैं, भाई। अब जान हथेली पर ले कर कुछ और जापानी राक्षसों को मारना है। 


फूची : बीस और जापानियों को मारना है।


जुम्मन : हमें भी बताओ, भैया! हम भी जान की बाज़ी लगाने को तैयार हैं। हमने जापानियों का खून पी जाने की कसम खाई है।


थाइची : हथियार हैं तुम्हारे पास?


जुम्मन : बस एक छुरी।


थाइची : छुरी से काम नहीं चलेगा। बंदूक चलाना जानते हो?


जुम्मन : हाँ, हम दोनों पिछली बडी लडाई में पलटन में रह चुके हैं।


थाइची : अच्छा। हमारे पास दो बंदूकें और एक पिस्तौल है। जिसका निशाना अच्छा होगा, वही इन्हें संभालेगा।


फूची : और हमारे पास दो तलवारें भी हैं। हर किसी के हाथ में हथियार होगा।


जुम्मन: और जंगली भाई तो सौ में सौ निशाना लगाने वाले हैं।


थाइची : तो सुन लो—आज से तुम दोनों हमारी चौथी लाल पलटन का हिस्सा हो।


जुम्मन और जंगली (एक साथ): लाल पलटन!


थाइची: वही मजदूरों-किसानों की पलटन, वही जिसका नाम सुन कर जापानी काँपते हैं।


जुम्मन : असरफ भाई कहते थे—हज़ारों लाल पलटनें जापानियों से लड़ रही हैं।


थाइची : और अब तुम भी उनमें शामिल हो। लाल पलटन के कुछ नियम है, पहले उन्हें जानो।


पहला नियम—गाँव-शहर के लोग हमारे अपने हैं। किसी से कठोर वचन मत बोलना, बिना इजाज़त कुछ मत लेना। हमारी जान उनकी इज़्ज़त और संपत्ति की रक्षा के लिए है।


फूची :  हम आवाम के बीच घुल-मिल कर रहना है, उन्हें यकीन दिलाना है कि हम उनके रक्षक है, उनके माँ-बाप जैसे हैं।


थाइची: और दुश्मन से सीधे नहीं भिड़ना। बल, बुद्धि और छल से लड़ना। यह धरती हमारी है, हर नहर-नाले की पहचान हमें है। यही हमारी ताकत है।


जुम्मन: यह अलग किस्म की लड़ाई है, जंगली भाई।


जंगली : और इसी में दुश्मन को सबसे ज्यादा चोट लगेगी।


थाइची : जापान हर गाँव में पलटन नहीं बिठा सकता। लेकिन हम अपनी शहादत से लाखों को निडर बना देंगे।


फूची : अकेले फूशुन गाँव के तीन हज़ार शहीदों ने ही लाखों को जगा दिया है।


थाइची : तो अब चलें!


जुम्मन : पहले भेस बदलना होगा।


थाइची : हाँ। मूँछ-दाढ़ी साफ़ कर लो, और हमारे जैसे लाल कोट-पायजामे पहन लो।


जुम्मन : जो कहोगे, वही करेंगे। लेकिन पाँच जापानियों को मार कर मरने की शपथ कभी नहीं भूलेंगे।


चारों गले मिलते हैं और मंच से निकल जाते हैं।



अंक 4


मैदान में। गाँव से अलग। चार गोरिल्ला बंदूकें कंधे पर टाँगे बैठे हैं।


थाइची : जुम्मन भाई, दो महीने हो गए। कैसा मन है?


जुम्मन (मुस्करा कर): मत पूछो, थाइची भाई। पाँच जापानियों को मार कर दिल ठंडा हो गया। (बंदूक चूमते हुए) मेरी बिटिया—बारह राक्षसों को भून चुकी है।


जंगली (अपनी बंदूक चूमते हुए): और ये बीस को।


थाइची : जंगली भाई का निशाना अब सचमुच अचूक हो गया है।


जंगली (गदगद हो कर): थाइची भाई, तुमसे भेंट न हुई होती तो निशानेबाजी का हमारा अनुभव बेकार चला जाता।

(उत्साह से चिल्लाता है) जर्नल हान-पिंग की जय! चौथी लाल सेना की जय!


जुम्मन (धीरे): अरे भाई, गोरिल्लों को इतना ज़ोर से नहीं चिल्लाना चाहिए।


थाइची (मुस्करा कर): अभी कोई हरज नहीं।


जुम्मन : हमारा जेनरल हमारे जैसा ही है। हमारे साथ खाता-पीता है, हमारे साथ एक ही बैरक मे सोता है। लाल पलटन में अफ़सर और सिपाही में कोई फ़र्क नहीं।


थाइची : यही कारण है कि एक लाल सिपाही बीस जापानियों के बराबर है।


जुम्मन : जुम्मन बीस बार मरने को तैयार है।


जंगली : और जंगली का सीना आज गज भर चौड़ा हो गया है। (बंदूक गाल से लगा कर) बीस राक्षसों को मार कर माँ की कोख पवित्र कर दी। अब जितने दिन जीऊँगा, जापानियों को मार कर ही जीऊँगा।


जुम्मन: हाँ भाई! अब हमारी ज़िंदगी तीर जैसी है—हर पल दुश्मन के सीने में धँसने को तैयार।


पर्दा गिरता है।



पंकज मोहन 


जुलाई 2020 मे नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर के स्कूल ऑफ हिस्टोरिकल स्टड़ीज के प्रोफ़ेसर और डीन पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पंकज मोहन आजकल आस्ट्रेलिया मे रह कर शोधकार्य में संलग्न हैं. उत्तर एशिया की संस्कृति पर हिन्दी, अंग्रेजी, कोरियाई और चीनी भाषाओं में लिखे उनके अनेक ग्रंथ तथा शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।



सम्पर्क


ई मेल : pankajnmohan@gmail.com

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