हरियश राय का आलेख 'विभाजन का जहरीला संताप और कृष्णा सोबती की रचनात्मकता'
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| कृष्णा सोबती |
भारत विभाजन की त्रासदी का शिकार आबादी का एक बड़ा वर्ग हुआ। इन लोगों में रचनाकार भी अच्छी खासी संख्या में शामिल थे। सआदत हसन मंटो, कृष्णा सोबती, यशपाल, कुर्रतुल ऐन हैदर, भीष्म साहनी, उपेन्द्र नाथ अश्क, खदीजा मस्तूर, कृश्न चंदर, अमृता प्रीतम जैसे तमाम लेखकों ने इस विभाजन की यंत्रणा भुगती और स्वाभाविक रूप से इसे अपनी रचनाओं में चित्रित किया। कृष्णा सोबती के लेखन की पड़ताल करते हुए हरियश राय लिखते हैं "यह एक सच्चाई है कि हिन्दुस्तान के बँटवारे की स्मृतियां हमारे देश के कथाकारों के मन में इतने गहरे समाई हुई हैं कि बँटवारे के इतने लंबे अर्से बाद भी वे स्मृतियां उनका पीछा नहीं छोड़तीं, उन्हें बार-बार हांट करती हैं और किसी न किसी रुप में रचनात्मक स्तर पर व्यक्त होती रहती हैं। दरअसल कोई भी रचनाकार अपने अतीत से, अपनी परम्पराओं से, अपनी स्मृतियों से एकदम कट कर रह भी नहीं सकता। पुरानी स्मृतियां उसके जेहन में लगातार दस्तक देती रहती हैं।" इस आलेख को हमने प्रयाग पथ का हालिया अंक से साभार लिया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हरियश राय का आलेख 'विभाजन का जहरीला संताप और कृष्णा सोबती की रचनात्मकता'।
'विभाजन का जहरीला संताप और कृष्णा सोबती की रचनात्मकता'
हरियश राय
कृष्णा सोबती हमारे समय की सजग, संवेदनशील रचनाकार रही हैं जिनका समूचा लेखन मानवीय गरिमा का लेखन है। 'मित्रो मरजानी', 'जिन्दगीनामा', 'सूरजमुखी अंधेरे के,', 'दिलो दानिश', 'ऐ लड़की', 'समय सरगम', 'जैनी मेहरबान सिंह', 'हम हशमत', 'बादलों के घेरे', 'चन्ना' जैसी रचनाओं से उन्होंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया और रचनात्मकता की एक नई मिसाल पेश की। 'बुद्ध का कमंडल लद्दाख' और 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' में वे अपने अतीत को याद करती हुई अपने गहरे सरोकार व्यक्त करती हैं। उनका लेखन पुरुष वर्चस्व समाज में रह रही स्त्रियों के जीवन की अनेक पर्ते खोलता है। उनके स्त्री पात्र तमाम वर्जनाओं से मुक्त हो कर पुरुष वर्चस्व समाज में अपनी जगह खुद बनाते हुए नजर आते हैं।
कृष्णा सोबती के ज़ेहन में पंजाब और देश का बंटवारा लगातार समाया रहा जिससे वे अंत तक मुक्त नहीं हो सकी। उनका उपन्यास 'जिन्दगीनामा' को पढ़ते हुए उस पंजाब की पंजाबियत से रूबरू हुआ जा सकता है जिसे कृष्णा सोबती देश की आज़ादी के समय बँटवारे का दंश सहते हुए अपने पीछे छोड़ आई। पंजाब उनकी रग-रग में बसा था, उनके खून के एक-एक कतरे में समाया हुआ था। पंजाब की जिंदा-दिली, पंजाब के गीत-संगीत, पंजाब के खेत-खलिहान, पंजाब की उमंगे, पंजाबी बोली और पंजाबी भाषा के मुहावरे 'जिन्दगीनामा' में देखे जा सकते हैं। 'जिन्दगीनामा' में उन्होंने अनेक कथाओं, दृश्यों और चित्रों को कथाओं, उप-कथाओं में ढाल कर पंजाब के दर्द को पिरोया है। वे जानती थी कि पंजाब को पंजाब के शाहों ने ही अपने शिकंजे में कस कर रखा हुआ है। ये पंजाबी शाह जमींदार हैं, सूदखोर हैं और 'जो शाह कहें, वही सच, बाकी सब झूठ।' ये शाह गाँवों के बेताज बादशाह हैं। वे लिखती हैं, 'खोज-खबर तो शाहों के पास, सलाह मशबिरा तो शाहों के पास, जिवियों के हिसाब-किताब, धन-दौलत, जो बंदे को चाहिए, सब इनके पास। साहेब नसीब हुए न। 'जिन्दगीनामा' के जाट इन शाहों के बारे में क्या सोच रहे हैं देखिए, यारा मुझे तो रब्ब भी इन चिट्टी पगडियों का जोडीदार लगता है, दूध मलाई धनाढ्य शाहों की और छाछ-लस्सी हमारी, लानत हमारी मेहनतों पर। मींह बरसे तो सब पर बराबर, धूप निकले तो सब पर एक सी, सूरज सब पर। बन्दे के रिजक पर ही कुदरत ने उल्टी लकड़ी क्यों फेर दी।'
बँटवारे के बाद आबादी की अदला-बदली एक ऐसी क्रूरतम त्रासदी के रुप में आजाद देश में आई जिसका उल्लेख एशिया के किसी और देश में देखने को नहीं मिलता। आबादी की इस अदला बदली को सबसे ध्वंसकारी घटना के रुप में याद किया जाता है। सईद नकवी ने अपनी किताब 'वतन में पराया हिन्दुस्तान का मुसलमान' में यह लिखा है 'विभाजन को स्वीकार करने की ऐसी जबरदस्त जल्दबाजी थी कि कांग्रेस के नेताओं के पास इतना समय ही नहीं था कि वे सावधानी के उन उपायों के बारे में विचार करते जो कि न्यूनतम कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक थे। स्वतंत्रता के बाद जो कुछ हुआ वह सामान्य रुप से अव्यवस्था मात्र नहीं थी, बल्कि साम्प्रदायिक दंगे, आगजनी, और अभूतपूर्व नरसंहार था। इसके परिणामस्वरूप लगभग 1.40 करोड़ लोग बेघर हो कर विस्थापित हो गये और लाखों लोग भावनात्मक आधार पर पीढियों तक अपने आप को आहत और ठगा हुआ महसूस करने लगे थे। हिन्दू-मुस्लिम समानता और भाईचारे का हज़ारों सालों का हमारा इतिहास रहा है। ब्रिटिश साम्राज्य ने आपसी मेल जोल ओर समन्वय की संस्कृति पर आघात कर धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा कर दिया। इस बँटवारे ने मुसलमानों के मन में एक ऐसे भय को जन्म दिया जो आज तक बरकरार है। यह भय न सिर्फ बरकरार है बल्कि लगातार गहराता चला जा रहा है। शासक वर्ग ने लगातार ऐसे ऐसे संदर्भ और हालात पैदा किये कि मुसलमानों में इस भय ने विकराल रुप धारण कर लिया और मुस्लिम समुदाय के प्रति एक अप्रत्यक्ष ही घृणा लोगों के मन में बस गई।
यह एक सच्चाई है कि हिन्दुस्तान के बँटवारे की स्मृतियां हमारे देश के कथाकारों के मन में इतने गहरे समाई हुई हैं कि बँटवारे के इतने लंबे अर्से बाद भी वे स्मृतियां उनका पीछा नहीं छोड़तीं, उन्हें बार-बार हांट करती हैं और किसी न किसी रुप में रचनात्मक स्तर पर व्यक्त होती हैं. दरअसल कोई भी रचनाकार अपने अतीत से, अपनी परम्पराओं से, अपनी स्मृतियों से एकदम कट कर रह भी नहीं सकता। पुरानी स्मृतियां उसके जेहन में लगातार दस्तक देती रहती हैं, यह अकारण नहीं है कि बँटवारे के दौरान हिन्दी और उर्दू के लेखकों ने, चाहे वे भीष्म साहनी हों, अश्क हों, मंटो हों, यशपाल हों, खदीजा मस्तूर हो, कृश्न चंदर हो, कुर्रतुल ऐन हैदर हों, अमृता प्रीतम हों या फिर कृष्णा सोबती हों, सभी ने बँटवारे के दंश को महसूस किया और यह दंश अनेक स्तरों पर उनके लेखन में व्यक्त हुआ।
विभाजन का दंश कृष्णा सोबती की 'सिक्का बदल गया', 'मेरी मां कहां', 'डरो मत', 'मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा' जैसी कहानियों से ले कर 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान' तक में फैला हुआ है। इन सभी रचनाओं में वे विभाजन के दंश को बार-बार याद कराती हुई हिंदुओं और मुसलमानों में व्याप्त डर, परस्पर नफरत व अविश्वास को मार्मिकता के साथ व्यक्त करती हैं और विभाजन जैसे राजनैतिक फैसलों पर ही सवाल खड़े करती हैं। विभाजन के बारे में कृष्णा सोबती ने कहा था कि, 'विभाजन ऐतिहासिक विघटन की एक ऐसी मानवीय स्मृति है जिसे भूलना नामुमकिन है और याद रखना खतरनाक।'
'सिक्का बदल गया' कहानी की शुरुआत शाहनी द्वारा चिनाब के पानी में नहाने से होती है। चिनाब के किनारे सुबह की मीठी नीरवता में शाहनी को कुछ भयावना सा लगता है और वह अतीत में चली जाती है। उसे याद आता है कि एक दिन इसी दरिया के किनारे वह दुलहिन बन कर आई थी और आज उसके शाहजी नहीं है, उसका पढ़ा-लिखा लड़का नहीं है, आज वह अकेली है शाहजी की लंबी-चौड़ी हवेली में। स्मृतियों से बाहर निकलते ही उसे बदलते वक्त का मिजाज समझ में आ जाता है, उसे शेरा याद आता है। उसे हुसेना याद आती है। इन सबसे उसका ममत्व जुड़ा हुआ है। वह शेरा से पूछती है, 'रात को कुल्लीवाल के लोग आए हैं यहां?' उसके जवाब में शेरा चिंतित स्वर में कहता है, जो कुछ हो रहा है, अच्छी नहीं। तब शाहनी को लगता है कि 'आज शाहजी होते तो बीच-बचाव करते।' यह शाहनी का अपना विचार था। पर शेरा का यह मानना था कि 'आज शाहजी, क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता था, "उसके मन में शाहजी के प्रति एक नफरत है वह सोचता है, 'यह हो के रहेगा क्यों' न हो? हमारे ही भाई बंदी से सूद ले ले कर शाहजी सोने की बोरिया तौला करते थे।' कृष्णा सोबती कहानी के इस मुकाम पर लिखती है 'प्रतिहिंसा की आग शेरे की आंखों में उतर आई। गंडासे की याद आ गई।'
कहानी में एक तरफ तो शेरे की शाहजी के प्रति नफरत है तो दूसरी तरफ शाहनी के प्रति आदर और सम्मान भी है। वह सोचता है कि आखिर शाहनी ने क्या बिगाड़ा हमारा? शाहजी की बात शाहजी के साथ गई, वह शाहनी को जरूर बचायेगा। 'पर फिर उसे फौरन याद आता है कल रात वाली फिरोज़ की बात कि 'सामान बांट लिया जायेगा।' फिर तत्काल उसके मन में ख्याल आता है कि 'क्या होगा शाहनी को मार कर?' और यह भी ख्याल आता है कि आने वाले खतरे के बारे में शाहनी को बता दे।
पर शाहनी को सब पता है। उसे पता है जलालपुर में आज आग लगनी थी, लग गई और उसी आग के धुएं से पूरा आसमान भर गया। उसे पता है कि आज उसे हवेली छोड़ कर कैंप में चले जाना है, उसे पता है कि हवा में ऐसा जहर फैला हुआ है जिसके रहते आज उसका कोई नहीं। उसे पता है कि उसके इशारे पर नाचने वाले गांव के लोग उसके यहां से चले जाने की राह देख रहे है। मगर क्या हो सकता है सिक्का जो बदल गया था। थानेदार दाऊद खां जब यह कहता है कि 'देर हो रही है शाहनी, कुछ साथ रखना हो तो रख लो सोना चाँदी।' तो शाहनी का यह कहना 'सोना चाँदी! बच्चा, वह सब तुम लोगो के लिए है, मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।' वह अपने साथ नकदी भी नहीं ले जाना चाहती क्योंकि यहां की नकदी यहीं रहेगी। शाहनी तय करती है कि 'वह इस घर से रो कर नहीं, शान से निकलेंगी। पुरखों के इस घर से, शान से लांघेगी यह देहरी।' देहरी लाँघते समय इस्माइल की भरी आवाज, 'शाहनी कुछ कह जाओ! तुम्हारे मुँह से निकली आसीस झूठी नहीं हो सकती 'तो शाहनी ने यही कहा, 'रब्ब! तुहानूं सलामत रखे बच्चा, खुशियां बक्शे .. शेरे ने भी आगे बढ़ कर शाहनी के पाँव छुए, 'शाहनी कोई कुछ नहीं कर सका। राज भी पलट गया। शाहनी ने कांपता हाथ शेरे के सिर पर रक्खा और रुक-रुक कर कहा, 'तैनूं भाग जगण चन्ना'। जाते वक्त दाऊद खां भी विचलित हो कर कहता है 'शाहनी, मन में मैल न लाना, कुछ कर सकते तो उठा न रखते। वक्त ही ऐसा है राज पलट गया, सिक्का बदल गया' पर कैम्प में जमीन पर लेटे-लेटे शाहनी सोचती है 'सिक्का क्या बदलेगा? वह तो मैं वहीं छोड़ आई'।
कहानी में कृष्णा सोबती ने बँटवारे की यंत्रणा को बहुत ही बारीकी से पिरोया है। पूरी कहानी में बँटवारे और आबादी की अदला-बदली के असीम दुःख-दर्द छिपे हुए हैं। बँटवारे से जो दिलों में बंटवारा हुआ, उसकी दर्द भरी दास्ताँ है कृष्णा सोबती की कहानी 'सिक्का बदल गया'। कहानी बिना लाउड हुए बँटवारे की पीड़ा को उकेरती है। सीमित कथ्य में मानवीयता की अनेक परतें संवेदनात्मक स्तर पर सामने आती हैं। कहानी के यह अनुभव हमें इसलिये भी अपने लगते हैं कि कड़वाहट के परे जा कर शेरा, इस्माइल खां, दाऊद खां के अनुभव मानवीय हैं और यह कहानी बँटवारे की त्रासदी को उकेरने के साथ-साथ मानवीयता की कहानी बन जाती है।
विभाजन के बारे में कृष्णा सोबती ने कहा था कि, "सिर्फ मैं ही नहीं स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन के ऐन बीचों-बीच से हो कर निकली पीढ़ियां भी, जो आज तक दशकों दशकों लम्बा सफर तय कर चुकी हैं। वह न उस त्रासदी को भूली हैं और न ही विभाजन से जुड़े देश के स्वाधीनता पर्व को। विभाजन को भूलना भी मुश्किल और उसे याद करते चले जाना भी खतरनाक। लाखों-लाख लोग जड़ों से कट गए। कुनबों के पुराने छांहदार पेड़ उखड़ कर ठंडे हो गए। इतिहास और भूगोल बदल गए। ऐसे में अपने को जीवित पा कर हर विस्थापित की इस त्रासदी से उबर कर खड़े हो जाने की कोशिश कम महत्वपूर्ण नहीं थी। व्यक्तिगत आतंक, पीड़ा, ज़ख़्म सब हकीकत को चुनौती दे रहे थे।" अपने-अपने ढंग से दोनों ओर से समय का आख्यान प्रस्तुत किया गया।
'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' उपन्यास में कृष्णा जी के अपने अनुभव दर्ज किए गए हैं। उपन्यास की शुरुआत दो नक़्शों से होती हैं जो विभाजन के पहले के हिन्दुस्तान और विभाजन के बाद के हिन्दुस्तान को दिखाते हैं। उपन्यास में अपने माध्यम से वे उन लाखों लोगों की पीड़ा को व्यक्त करती है जिन्हें आजादी अपना घर, अपनी विरासत, अपनी जमीन, अपनी जिंदगी अपना मान, अपना सम्मान खोने पर मिली है। इस उपन्यास की कथा-नायिका एक खुद्दार लड़की है जो अपनी मर्जी से यह सोच कर सिरोही आती है कि 'यदि सिरोही में मन न लगा, तो वह वापस चली जायेगी।' यह कथा नायिका सिरोही में रहते हुए पाकिस्तान में रह गये अपने अतीत को और बँटवारे के दौरान हुए अनुभवों को बहुत ही शिद्दत के साथ याद करती है। अपने बचपन की स्मृतियों को याद करते समय उसकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक दिखाई देती है। वह 'रोशनियों के शहर' कराची को याद करती है, 'बागीचों के शहर' लाहौर को याद करती है। विभाजन के दंश को अपनी स्मृतियों में गहरे समाए यह कथा-नायिका लाहौर और दिल्ली में हुई घटनाओं को अपनी स्मृतियों में संजोए आजाद हिन्दुस्तान के गुजरात राज्य के सिरोही रियासत में नौकरी के सिलसिले में पहुंचती है। कृष्णा सोबती पाकिस्तान में छूट गए लाहौर को याद करते हुए लिखती हैं, 'पलट कर एक बार फिर डबडबाई आंखों से अपने कमरे की ओर देखा और मन ही मन दोहराया, बहती हवाओं, याद रखना, हम यहां रह गए हैं।' ये स्मृतियां ही उपन्यास को हिन्दी कथा साहित्य का अत्यंत विशिष्ट उपन्यास बनाती है।
मजीद अहमद द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कृष्णा सोबती कहती हैं, 'आजादी के दिन भी क्या दिन थे! एक ऐसा धुपैला मौसम जो हर नागरिक को नया ताप दे रहा था। विभाजन का जहरीला संताप, हिंसा और एक दूसरे से बिछड़ने का शॉक धीरे- धीरे कम हो रहा था। मैं बहुत गहरे भाव से अपनी लेखक बिरादरी की वैचारिक जागरूकता का संवेदन अपने दिल से लगाए हुए हूं। इस तरह जैसे कि वह इस विश्व में इतने लंबे जीवन का सबसे कीमती समय हो। बँटवारे के खून-खराबे के बाद हमारे लेखकों ने जो मानवीय संतुलन प्रस्तुत किया, वह किसी भी देश और किसी भी साहित्य के लिए गर्व का विषय होगा।
उपन्यास की कथा-नायिका के जेहन में विभाजन के दौरान आबादी की हुई अदला-बदली के ढेर सारे दृश्य कौंधते रहते हैं, जब लोग अपने सामानों की गठरियां, अपने बुजुर्ग मां-बाप, अपने बच्चों को कांधे पर लादे रोते-बिलखते सरहदें पार करते हैं 'इस बँटवारे से, इस आजादी से, क्या हासिल हुआ? सोबती जी लिखती हैं 'अब तो हम तेज किए हुए चाकू हैं। हम आग का पलीता हैं। हम दुश्मनों को चाक कर देने वाली गरम हिंसा हैं। हम दुल्हनों की बाँहें काट देने वाले टोके हैं, हम गंडासे हैं। अब हम नहीं हैं, हथियार हैं।'
कथा नायिका के मन में विभाजन के दौरान की स्मृतियां जीवंत हो कर उभरती हैं और वह सोचती है कि हमें अब पुराने नहीं, नये मुल्क का पानी पीना है। पुराना वतन छोड़ना होगा। नई सरहदों को पार करना होगा। किंग्सवे कैम्प की स्मृतियां उसके जेहन में कौंधती हैं जहां तम्बुओं की कतारें है, अंदर-बाहर लुटे-पिटे घायल, बेबसी में भटकते बीमार शरणार्थी हैं और बँटवारे पर राज़ी होने वालों को गॉलियां हैं। वह सवाल उठाती है- 'बापू गांधी, तुमने हमारे घर बाहर, धरती-पानी सब पराए कर दिए, यह कैसी सियासत'? उसके जेहन में हर वक्त विभाजन के दौरान अपना घर छोड़ने की पीड़ा है और शरणार्थी कैम्पों के संदर्भ हैं। किंग्सवे कैम्प में वचनों नाम की लड़की के साथ दुष्कर्म होता है तो उसकी मां अत्यंत विक्षोभ भरे स्वर में कहती है 'गाडियां कट गईं, बेटे-बेटियां मर गये, हाय, तुम्हें चैन न आए दुश्मन-बेटियों की नस्ल को खत्म कर दो। अपने लड़के पैदा करना कीकरो से, कीकर के कांटेदार पेड़ों से कमीनों।'
बँटवारे के दौरान जो डर और नफरत का माहौल बना, उस डर की कहानी है 'मेरी मां कहां?' कहानी में एक बलोच रेजीमेंट के बहादुर यूनस खां है जो बँटवारे के दौरान लाहौर की सड़कों पर ट्रक ले कर निकलता है और रास्ते में दूर गांव में आग की लपटें देखता है, स्त्रियों और पुरुषों की लाशें देखता है। उसके मन में घबराहट पैदा होती है और वह अपनी घबराहट को यह कह कर नियंत्रित करता है कि 'आजादी बिना खून के नहीं मिलती, क्रांति बिना खून के नहीं आती' वह सोचता है कि कोई काफ़िर बचना नहीं चाहिए उसे दूर से आती हुई अल्ला हो अकबर व हर-हर महादेव की आवाज सुनाई देती है लेकिन उसे इन आवाज़ों से कोई सरोकार नहीं। उसे तो अपनी आंखों में एक नई मुगलिया सल्तनत दिखाई देती है जो शानदार है और बुलंद है। रास्ते में उसे रक्त से भीगी सलवार में एक बच्ची मूर्च्छित मिलती है। उस बच्ची को देख कर उसके मन में दया सी उमड़ आती है। तब उसे अपनी बारह साल की खूबसूरत बहन नूरन की याद हो आती है जिसे छोड़ कर उसकी अम्मी ने आंखें मूंद ली थी और जिसे उसने कब्रिस्तान में दफन किया था। तभी चार दिन से खून की होली खेलने वाले युनूस खां के मन में उस बच्ची के प्रति रहम की भावना जागृत होती है। वह उस बच्ची को अस्पताल ले जा कर उसका इलाज करवाता है, इलाज से बच्ची ठीक तो हो जाती है लेकिन उसकी आंखों में डर और घृणा ज्यों की त्यों बनी रहती है। युनूस खां बच्ची को अपने साथ रखना चाहता है लेकिन बच्ची को बार-बार लगता है कि यह युनूस खां मुझे मार देगा। इसी डर से वह उसकी छाती पर मुट्ठियां मारते हुए कहती है कि तुम मुसलमान हो और नफरत से वह चीखते हुए कहती हे 'मेरी मां कहां? मेरा भाई कहां? मेरी बहन कहां?'
कहानी बँटवारे के दौरान हुई नफरत और मानवीयता के तकाज़े को एक साथ इस तरह पाठकों के सामने रखती है कि पाठक बड़ी देर तक इस कहानी से अपने आप को बाहर नहीं कर पाता। कहानी में यह बात पुरज़ोर तरीके से सामने आई कि बँटवारे के दौरान उपजी हिंसा से कुछ समय के लिये तो व्यक्ति इस बहाव में बह सकता है लेकिन उसमें मानवीयता हमेशा बची रहती है और यह मानवीयता ही मनुष्यता की पहचान है।
कृष्णा सोबती आजीवन सामाजिक सरोकारों से गहरे रुप से जुड़ी रहीं। उन्होंने वर्तमान परिवेश में बढ़ रही असहिष्णुता और अंध-राष्ट्रवाद के खिलाफ अपने सरोकारों को व्यक्त करने में सबसे आगे रह कर नई पीढ़ी के लेखकों का मार्ग प्रशस्त किया। धार्मिक कट्टरपंथ और हिंसा का विरोध करते हुए कृष्णा सोबती ने वर्तमान सरकार से अपनी असहमतियां दर्ज की हैं और साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी। आज के माहौल पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था 'हम यह न भूले कि हमारी संस्कृति का प्रमुख पक्ष विचार स्वातंत्र्य ही रहा है। यह तब भी मौजूद रहा, जब हम दूसरों के अधीन थे। 'विचार' की इस लंबी प्रक्रिया ने ही भारतीय दर्शन और चिंतन को विशेष और विशिष्टता का मुखड़ा दिया। यह भारतीय विचार-संस्कृति और जीवन शैली का मुखड़ा है, इसकी पहचान भी।' आज के पेचीदा सत्ता तंत्र में प्रतिशोध की भावना, लोगों को विभाजित करती रणनीतियां न सिर्फ लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होंगी - वह आने वाली पीढियां और उनके भविष्य के लिए भी खतरनाक हैं। आज युवा वर्ग के लेखकीय और नागरिक रुझान बदल रहे हैं, उन्हें अनदेखा कर हिंसक टोलियों की मदद से पुराने खातों से ऋण उगाहने का मसविदा बेमानी है। (संदर्भ: प्रतिरोध पुस्तिका : राष्ट्र की साहित्यिक संस्कृति नागरिक समाज की थाती है)
अपने प्रतिरोध की आवाज़ उन्होंने इसलिये बुलंद की कि देश में बढ़ती असहिष्णुता, धर्मान्धता, कट्टरता के खिलाफ उनके मन में एक बेचैनी थी और यह बेचैनी इसलिए थी कि प्रगतिशील-जनवादी मूल्य उनकी चेतना के अभिन्न हिस्से थे और इसलिए वे लेखकों और पत्रकारों की निर्मम हत्याओं को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।
कृष्णा सोबती की ये सभी रचनाएँ एक ओर तो बँटवारे के बाद पैदा हुए परिवेश को पूरी जटिलता और मानवीय संदर्भों के साथ बंया करती हैं तो दूसरी ओर आज़ादी के बाद इस देश में फैली साम्प्रदायिक घृणा, अंधराष्ट्रवाद और संकीर्णता को भी सामने लाती हैं। आजादी के बाद साम्प्रदायिक उन्माद, धार्मिकता हमारे जीवन में इस कदर पिरो दिये गये हैं कि देश में उन्माद का माहौल पैदा हो गया है। हम इन रचनाओं से अपने आप को जोड़ पाते हैं। कृष्णा सोबती के ये अनुभव हमें उद्वेलित करते हैं और ये अनुभव मानवीय बनाते हैं।
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| हरियश राय |
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वी- 27/15, डीएलएफ, फेज़-3,
गुरुग्राम, (हरियाणा)
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