प्रकर्ष मालवीय “विपुल" की रपट “स्मार्ट होते शहर के बीच लोप होती स्मृतियाँ”




29 मार्च 2026 को स्टेनली रोड स्थित इलाहाबाद मेडिकल एसोसियेशन के सभागार में गोपेश समग्र के विमोचन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ रचनाकार अशोक वाजपेई थे। सर्व भाषा ट्रस्ट दिल्ली ने इस गोपेश समग्र को प्रकाशित किया है। इसका सम्पादन किया है वरिष्ठ कवि अजामिल ने। इसकी एक रपट हमें लिख भेजी है कवि प्रकर्ष मालवीय विपुल ने। पोस्ट में प्रयुक्त तस्वीरें ली हैं प्रख्यात फोटोग्राफर एस के यादव ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रकर्ष मालवीय “विपुल" की रपट “स्मार्ट होते शहर के बीच लोप होती स्मृतियाँ”।



रपट 

“स्मार्ट होते शहर के बीच लोप होती स्मृतियाँ”- अशोक बाजपेयी


प्रकर्ष मालवीय “विपुल"


गोपीकृष्ण ‘गोपेश’ की रचनाओं के समग्र का लोकार्पण इलाहाबाद शहर स्थित इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन के सभागार में दिनांक 29/03/2026 को गरिमापूर्ण ढंग से आयोजित हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत उनकी चर्चित रचनाओं “मुझसे मेरा नाम ना पूछो” और “पीले हाथ करती हैं” की प्रस्तुति से हुई, जिन्हें क्रमशः वंदना शर्मा और पंकज श्रीवास्तव ने सस्वर प्रस्तुत किया।





समग्र में संकलित गीतों पर विचार रखते हुए प्रख्यात नवगीतकार और कवि ओम् निश्चल ने कहा कि जब समाज विस्मृति की गोधूलि में प्रवेश कर रहा है, ऐसे समय में एक पुत्री द्वारा अपने पिता की स्मृतियों को सहेजना अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्य है। उन्होंने कहा कि गोपीकृष्ण गोपेश का रचना-संसार इतना विस्तृत है कि उसे एक गोष्ठी में समेटा नहीं जा सकता। नई कविता के समानांतर उन्होंने गीतों की राह चुनी और उन्हें आधुनिक संवेदना से जोड़ा। अज्ञेय के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गीत काव्य की अनिवार्य विधा है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि गोपेश पर हरिवंश राय बच्चन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनके गीत विविध भावभूमियों पर रचे गए हैं और सीधे पाठक के मन से संवाद स्थापित करते हैं। उन्होंने गोपेश जी की पुत्री प्रो अनिता गोपेश को इस समग्र के प्रकाशन के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहाँ इससे उनका सम्पूर्ण साहित्य जनसामान्य के समक्ष उपस्थित हुआ है।


इसके पश्चात संकलन में शामिल डायरी पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो नीलम सरन गौर ने कहा कि गोपेश की मॉस्को डायरी एक परिचित संसार का आभास कराती है। उन्होंने कहा यह डायरी चेतना का प्राथमिक पाठ प्रतीत होती है, जो भावुकता, कलात्मकता और काव्यात्मक भाषा से परिपूर्ण है। इस डायरी के माध्यम से गोपेश ने रूसी समाज और जनजीवन का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। एक तरफ़ वे स्वयं को “सिटिजन ऑफ द वर्ल्ड” की तरह प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी तरफ़ अपनी जड़ों और परंपराओं से भी गहरे जुड़े रहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि डायरी का अधूरापन ही उसे एक विशेष अर्थ देता है—जैसे जीवन स्वयं अधूरा है, वैसे ही यह डायरी भी।



इसी क्रम में समग्र पर अपनी बात रखते हुए प्रो प्रणय कृष्ण ने कहा कि यह कहना मुश्किल है कि गोपेश एक परिमली प्रगतिशील थे या एक प्रगतिशील परिमली। उन्हें याद करना उस पूरे दौर को याद करना है। उनके लेखन के माध्यम से उस समय के मध्यवर्ग की झलक मिलती है, जहाँ साहित्य और कलाओं की सशक्त उपस्थिति थी। उन्होंने आगे कहा कि आज वह मध्य वर्ग लगभग लुप्त हो चुका है। गोपेश की स्मृति उस साझा सांस्कृतिक ज़मीन की स्मृति है, जिसे हम निरंतर खोते चले गए। उन्होंने यह भी उल्लिखित किया कि गोपेश के लेखन में जवाहर लाल नेहरू के युग की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। रूसी साहित्य के उनके अनुवादों की प्रचुरता और गुणवत्ता अपने आप में एक मानक स्थापित करती है।


समग्र के संपादक अजामिल ने इस कार्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह एक अत्यंत व्यापक और चुनौतीपूर्ण कार्य था। इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें बार-बार यह महसूस हुआ कि वे इसे और अधिक परिश्रम से कर सकते थे। उन्होंने यह भी बताया कि गोपेश भावानुवाद की विशेष शैली में काम करते थे।



मुख्य अतिथि श्री अशोक बाजपेयी ने अपने वक्तव्य में कहा कि रचनाकारों को अपने पूर्वजों को स्मरण करना चाहिए, क्योंकि आज स्मृति पर सबसे अधिक आक्रमण हो रहा है। ऐसे समय में यह आयोजन एक “स्मृति पर्व” का रूप ले लेता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक और स्मार्ट होते शहरों में स्मृतियों के संरक्षण का कोई भी उल्लेखनीय कार्य नहीं किया जा रहा है और इस स्मृति हीनता में एक गहरी कृतघ्नता शामिल है. इसलिए गोपेश समग्र का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। उन्होंने प्रो अनिता गोपेश को संदर्भित करते हुए इस समग्र के प्रकाशन को स्मृतिहीनता के विरुद्ध एक पुत्री का सशक्त प्रयास बताया। उन्होंने गोपेश के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करते हुए कहा कि गोपेश जी की जो छवि बनती है वो ये है कि उनकी वजह से एक कालखंड में इलाहाबाद में साहित्य संभव हुआ। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस आयोजन ने इलाहाबाद के साहित्य से विमुख होते जाने की उनके मन में बनी नकारात्मक छवि को बदलने का कार्य किया है।



अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो हेरंब चतुर्वेदी ने कहा कि यह अवसर गोपेश के रचनात्मक व्यक्तित्व को समझने का महत्वपूर्ण क्षण है। उनका रचनाकाल आदर्शों का युग था और वे अत्यंत संवेदनशील एवं भावुक व्यक्ति थे। वर्तमान युद्धकालीन परिस्थितियों में उनका पत्र “दुनिया के चंद जंग पसंद मुल्कों के नाम” विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने कहा कि गोपेश को समझने के लिए उनके द्वारा अपने बच्चों को दिए गए संस्कारों को भी देखना आवश्यक है। अनुवाद को उन्होंने मौलिकता का स्वरूप प्रदान किया और उनकी वैश्विक दृष्टि उनके रचना-चयन में स्पष्ट दिखाई देती है।



कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रख्यात कवि एवं गीतकार श्री यश मालवीय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रियंका गोपेश द्वारा प्रस्तुत किया गया।




इस अवसर पर गोपेश के परिवार के अतिरिक्त वयोवृद्ध समाजवादी चिंतक नरेश सहगल, प्रो एस के सेठ, आनंद मालवीय, सुरेंद्र राही, प्रो बसंत त्रिपाठी, डॉ सूर्य नारायण, वरिष्ठ कवि विवेक निराला, संध्या नवोदिता, केतन यादव, प्रदीप्त प्रीत, रूपम इत्यादि बड़ी संख्या में शहर के साहित्यिक और कला प्रेमी लोग उपस्थित रहे.



(इस पोस्ट में प्रयुक्त तस्वीर एस के यादव द्वारा ली गई हैं।)

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