मोसाब अबू तोहा की कविता 'घाव'
मोसाब अबू तोहा ग़ज़ा की घटनाएं मनुष्यता के इतिहास में एक कलंक की तरह है। इज़रायल हर कीमत पर अपना वर्चस्व स्थापित करने पर आमादा है। उसने अस्पतालों से ले कर उन स्कूलों तक पर भयंकर बमबारी की है जहां मासूम बच्चे जीवन की ए बी सी डी के बारे में सीखते जानते हैं। वे मासूम बमबारी से रक्तरंजित होते हैं। जो जीवन का सबक तक नहीं जानते, वे मासूम असमय ही मारे जाते हैं। हम दूरदराज बैठ कर जब ग़ज़ा की तस्वीरें देखते हैं तो विचलित हो जाते हैं। जिन पर बीतती होगी, उनके बारे में कल्पना कर पाना मुश्किल है। ग़ज़ा की चीख पुकार को बर्दाश्त कर पाना किसी कठकरेजी के बस का भी नहीं है। मनुष्य से बड़ी जब संस्थाएं हो जाती हैं तब वे मनुष्यता पर कुछ इसी तरह कहर बरपाती हैं। ग़ज़ा के कवि मोसाब अबू तोहा ने एक दस्तावेजी कविता लिखी है 'घाव'। इस कविता का उम्दा अनुवाद किया है कवि भास्कर चौधुरी ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मोसाब अबू तोहा की कविता 'घाव'। ग़ज़ा के कवि मोसाब अबू तोहा की कविता - 'घाव' (ग़ज़ा के विरुद्ध इज़रायली आक्रमण - दिसंबर 27, 2008 - जनवरी 18, 2009) अंग्रेजी भाषा स...