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विवेक निराला की कविताएँ

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समकालीन कवियों में विवेक निराला अपने अलग शिल्प और सांगीतिक भाषा के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। ‘एक बिम्ब है यह’ उनका पहला कविता संग्रह था। एक अरसे बाद राजकमल प्रकाशन से विवेक का दूसरा कविता संग्रह ‘ध्रुव तारा जल में’ प्रकाशित हुआ है। कवि को बधाई देते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं कवि के इस नए संकलन की कुछ चुनिन्दा कविताएँ। तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं कवि विवेक निराला की कविताएँ ।                   विवेक निराला की कविताएँ   भाषा मेरी पीठ पर टिकी एक नन्हीं सी लड़की मेरी गर्दन में अपने हाथ डाले हुए जितना सीख कर आती है उतना मुझे सिखाती है। उतने में ही अपना सब कुछ कह जाती है। पासवर्ड मेरे पिता के पिता के पिता के पास कोई संपत्ति नहीं थी। मेरे पिता के पिता को अपने पिता का वारिस अपने को सिद्ध करने के लिए भी मुक़द्दमा लड़ना पड़ा था। मेरे पिता के पिता के पास एक हारमोनियम था जिसके स्वर उसकी निजी संपत्ति थे। मेरे पिता के पास उनकी निजी नौकरी थी उस नौकरी के निजी सुख-दुःख थे। मेरी भी निजता ...

विवेक निराला का आलेख "हैराँ हूँ मैं कि ऐसी ये मश्हद है कौन-सी"

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विवेक निराला का यह महत्वपूर्ण आलेख पहल अंक-94 में कुछ सम्पादित करके प्रकाशित किया गया है। ब्लॉग पर इस आलेख की अविकल प्रस्तुति की जा रही है। आइये पढ़ते हैं यह आलेख।  (90’ के दशक की परिस्थितियों, हिन्दी कविताओं और कवियों के रचनात्मक मानस पर पुनर्विचार) हैराँ हूँ मैं कि ऐसी ये मश्हद है कौन-सी विवेक निराला         पहल के 92 वें अंक में 90’ के दशक की हिन्दी कविता पर युवा कवि एवं आलोचक मृत्युंजय का एक विचारोत्तेजक आलेख प्रकाशित हुआ था। उस आलेख के तमाम विचारों से सहमत होते हुए भी आलेख पर मुझे पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस हुई। इस समय जबकि कविता के अंत की घोषणाएं हो रही हैं, कविता ही बार-बार कटघरे में खड़ी की जा रही है। 90’ के दशक को हम हादसों का दशक भी कह सकते हैं। इन हादसों के दरम्यान जब समूचा महादेश असमंजस के दौर से ग़ुज़र रहा था तब ये कवि धुंधलके में शत्रु से मुठभेड़ भी कर रहे थे और अपनी राह तलाश रहे थे क्योंकि इन्हें विरसे में मिला विश्वास अब तक डिग चुका था, समाजवाद का एक घना तरुवर ढह चुका था। इसी दौर में साम्प्रदायिकता ने साझी विरासत को गहरा ...