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भरत प्रसाद का उपन्यास अंश : 3 - कालकलौटी

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भरत प्रसाद  प्रकृति के साथ जीवन का संबंध नाभिनालबद्ध है। प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। हमारे आस पास न जाने कितने पशु पक्षी विचरण करते रहते हैं। न जाने कितने अनाम पेड़ों की छाँह के हम गवाह बनते हैं। गाँव के साथ जुड़े हैं सीवान और सीवान तक फैले पसरे हुए हैं किसानों के खेत, जिस में लहलहाती फसलें किसानों के मन को उल्लसित कर देती हैं। प्रकृति का शब्द चित्र खींचते हुए भरत प्रसाद लिखते हैं सीवान है तो किसानों के सख्त चेहरों पर रौनक बची है, फसलों से उन्हें खनक का निःशब्द सुख मिल जाता है। छुपे रुस्तम प्रेमियों को भर तबियत विरहा ललकारने का अवसर मिलता है। इसी सीवान के निस्सीम अंचल में निर्भयमान हैं – बबूल, शीशम, आम, बरगद, झरबेरी, पाकड़ और कठजामुन के बिरिछ। जिनकी पतली, गाढ़ी, काली छाया में छुट्टा पशु मुर्दा बेफ्रिकी के साथ दोपहर काटते हैं। कौन है जो सीवान को सीने में जी पाए? कौन है, जो सीवान की महिमा को साकार कर सके? नहीं! सीने यह कोई दृश्य नहीं, यह महज सृष्टि का जादुई रूप नहीं। इसी में छिपा है हमारी चाहतों का फैलाव, इसी ...

भरत प्रसाद का उपन्यास 'कालकलौटी'

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भरत प्रसाद  जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। इसीलिए प्रकृति जीवन को अपनी तरफ आकर्षित करती रहती है। जीवन भी इस प्रकृति की तरफ स्वाभाविक रूप से झुकता है। पेड़ पौधे, पशु पक्षियां, कीड़े मकोड़े पृथिवी की जैविक समृद्धि में अनमोल रत्न की तरह हैं। इनके बिना पृथिवी और पृथिवी पर के जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। रचनाकारों की रचनाओं में यह प्रकृति अनायास ही आती है। क्योंकि इसके बिना रचनाओं में रवानी नहीं आ पाती। अलग बात है कि विकास के नाम पर आजकल प्रकृति पर ही लगातार प्रहार किया जा रहा है। वन दिन ब दिन सिकुड़ते जा रहे हैं। हम प्रकृति की खूबसूरती को निहारने की बजाए दिन रात मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। अपने आस पास के न तो पेड़ पौधों को पहचानते हैं, न ही पशु पक्षियों को। एक अजनबीयत हम सब पर लगातार हावी होती  जा रही है। हालत यह है कि अपने ही घर परिवार में अब हम अजनबी नजर आने लगे हैं। इससे भयावह और भला क्या हो सकता है। भरत प्रसाद इन दिनों एक उपन्यास ' कालकलौटी'  लिख रहे हैं। पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के दूसरे रविवार को 'कालकलौटी' उपन्यास को धारावाहिक रूप...

भरत प्रसाद का आलेख 'नवस्त्री की प्रतिबद्ध कथाकार : कृष्णा सोबती'

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कृष्णा सोबती  कोई भी कहानी महज कोरी कल्पना नहीं होती बल्कि उसमें कहानीकार का जीवन अनुभव भी अनुस्यूत होता है। यह जीवन अनुभव व्यक्तिगत नहीं होता बल्कि व्यापक हो कर समूचे समाज का जीवनानुभव बन जाता है। चर्चित कथाकार और उपन्यासकार  कृष्णा सोबती का लेखन बहुत कुछ  आत्मबद्ध लेखन के रूप में चिह्नित किया जाता है जिसमें उनके व्यक्तिगत दुख, संताप, दैनिक पराजय, विलाप सघन, प्रगाढ़ और प्रखर हैं। लेकिन अगर यह महज उनका ही होता तो उसकी व्याप्ति इतनी सघन न होती। यह उनके समय की स्त्रियों का दुःख दैन्य था। भले ही स्त्रियों बेहतरी की बात की जाती हो, आज भी कमोबेश स्त्रियों की हमारे समाज में त्रासद स्थिति ही है। स्त्रियों के प्रति अपराध न केवल बढ़े हैं बल्कि और निर्मम और कुछ अधिक अमानवीय हुए हैं। स्त्रियों को गुलाम समझे जाने की मानसिकता मन मस्तिष्क में आज भी बनी रहती है। ऐसे में कृष्णा सोबती की रचनाएँ जीवन्त हो कर हमारे सामने आती हैं। हाल ही में  प्रयागपथ का  दिसंबर-2025 का अंक आया है जो  ' कृष्णा सोबती विशेषांक' के रूप में है। भरत प्रसाद का एक आलेख इस अंक से हमने  स...

भरत प्रसाद की लम्बी कविता 'मणिपुर! मेरे देश के मणि'

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भरत प्रसाद  युद्ध हमेशा मानवता के विरुद्ध होता है। आंतरिक युद्ध तो और भी भयावह होता है। जब एक साथ रहने और सुख दुःख में शिरकत करने वाले लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन जाएं तो स्थितियां बेकाबू हो जाती हैं। आजादी के समय भारत में सांप्रदायिक वातावरण के चलते जो भयावह मार काट हुई वह इतिहास का एक काला अध्याय है। तब शताब्दियों से एक साथ रह रहे हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यास बन गए थे। आखिरकार देश का बंटवारा हुआ और धार्मिक सांप्रदायिक तांडव कुछ समय के लिए थम गया।   भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में 3 मई 2023 को इम्फाल घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मैती जनजाति और कुकी जनजाति के आदिवासी समुदाय के बीच एक झगड़ा शुरू हो  गया। इस झगड़े में मानवता एक बार फिर शर्मसार हुई। हत्या, आगजनी, बलात्कार जैसी घटनाएं एक के बाद एक घटती रहीं। हजारों लोग मारे गए। आज तक इस घटना का पटाक्षेप नहीं हो पाया है और रह रह कर इसकी चिंगारियां भड़कती रहती हैं। कवि भरत प्रसाद ने एक कवि के नजरिए से मणिपुर घटना की तहकीकात करते हुए एक लम्बी कविता लिखी है। भरत प्रसाद अपनी कविता में लिखते हैं : 'मेरी...