स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'झांसी प्रवास की स्मृतियाँ'


स्वप्निल श्रीवास्तव 


हर शहर अपने आप में विशिष्ट होता है। उसकी भौगोलिक स्थिति, उसका इतिहास, उसकी परम्परा, वहाँ से जुड़े विशिष्ट व्यक्ति उसे एक अलग पहचान प्रदान करते हैं। उसकी खूबी को वहां जा कर ही महसूस किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में अवस्थित झांसी ऐसा ही एक शहर है जिसकी अपनी एक अलग आभा है। झांसी का नाम लेते ही याद आती हैं रानी लक्ष्मी बाई, जिन्होंने 1857 में अद्भुत शौर्य के साथ अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। याद आती है बचपन की किताबों में पढ़ी सुभद्राकुमारी चौहान की कालजई पंक्तियाँ 'बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी'। मैथिली शरण गुप्त और सियाराम शरण गुप्त अनायास ही याद आते हैं। 'मुझे चांद चाहिए' जैसा अद्भुत उपन्यास लिखने वाले सुरेन्द्र वर्मा और इतिहास को साहित्य में ढालने वाले वृंदावन लाल वर्मा इसी मिट्टी की खुशबू हैं। अनाम रह जाने वाले ओम शंकर असर जैसे यारबाश की यादें मन मस्तिष्क में घुमड़ने लगती हैं जिनके पास हिन्दी साहित्य की तमाम स्मृतियाँ, अनेक पुरानी  पत्रिकाओं के अमूल्य अंक और दुर्लभ किताबों का खजाना था। झांसी का किला जैसे आज भी अपनी कहानी सुनाता रहता है। बेतवा की कल कल छल छल की विविधवर्णी ध्वनियाँ सहज ही लुभाती हैं। मैत्रेयी पुष्पा और विवेक मिश्र जैसे रचनाकार आज भी झांसी का झण्डा ऊँचा किए हुए हैं। शिव प्रकाश जैसे युवा रचनाकार झांसी को जीवन्त बनाए हुए हैं। झांसी प्रवास के समय इन स्मृतियों को स्वप्निल श्रीवास्तव ने जिया है और महसूस किया है। नौकरी के दौरान तमाम छोटे बड़े जिले में उनकी तैनाती हुई और स्वाभाविक रूप से उन शहरों की स्मृतियां उनके मन मस्तिष्क में संचित हैं। अब वे इन स्मृतियों को कलमबद्ध कर रहे हैं जिसे हम पहली बार पर एक एक कर श्रृंखलाबद्ध ढंग से प्रस्तुत करेंगे। इस क्रम में यह पहली प्रस्तुति है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'झांसी प्रवास की स्मृतियां'।


'झांसी प्रवास की स्मृतियाँ' 

   

स्वप्निल श्रीवास्तव 


झांसी मेरे लिये किसी अपरिचित शहर का नाम नही था। जब मैं मिडिल स्कूल में पढ़ता था तो मास्टर साहब ने हमें सुभद्रा कुमारी चौहान की लंबी कविता – 'झांसी की रानी' के बारे में बताया था। जब वे विद्यार्थियों के सामने इस कविता का पाठ करते थे तो ओज से भर जाते थे। उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे इसलिये वे अपने पिता के बहुत किस्से बताते थे, वे कहते थे फिरंगियों ने हम लोगों के ऊपर बहुत अत्याचार किये। इस देश को लूटने का काम किया। मास्टर साहब ने जो कहानियाँ अपने पिता से सुनी उसे हम लोगों से साझा करते थे। उनके आदर्श गांधी नेहरू भगत सिंह अशफाक उल्ला खां, राम प्रसाद विस्मिल थे। सुभद्रा कुमारी चौहान की यह कविता झांसी की रानी के अपरिमित साहस और जुझारू स्वभाव के बारे में बताती थी। यह 1857 की क्रांति का समय था। इस लंबी कविता में झांसी  की रानी के जीवन के तमाम विवरण अंकित थे। उस समय मैं सोचा करता था – काश झांसी का किला देख पाता? 

 

संयोग से मेरी चाकरी ऐसे महकमे में लगी जिसमें तबादले होते रहते थे। किसी शहर में दो या तीन साल रहने के बाद किसी दूसरे शहर में जाने का ऑर्डर आ जाता था। यह नौकरी टूरिंग टाकीज की तरह थी, अपने खेल दिखाओं और दफा  हो जाओ। जब शहर या शहर के लोगों से संबंध बनते थे कि जुदाई का परवाना आ जाता था। वैसे बुंदेलखंड क्षेत्र में कोई आना नही चाहता था। विभाग के समर्थ लोग उन जिलों में अपनी तैनाती करवाते थे जहां खनिज ज्यादा होते थे। जो विभाग को कृतार्थ नही कर पाते थे, उन्हें सजा के तौर पर बुंदेलखंड के जिलों में भेजा जाता था – जैसे बांदा, हमीरपुर, महोबा आदि। झांसी इन जिलों से अपनी आवो–हवा में भिन्न था, वह बड़ा शहर था। मुझे सजा के तहत झांसी भेजा गया था। मेरी खुशी यह थी कि जिस शहर को मैं देखना चाहता था वह शहर मुझे मिल गया है, वहाँ मैंने अपने जीवन के तीन साल बिताये। उस शहर के इतिहास और भूगोल को पहचाने की कोशिश की, मुझे इसका तनिक अफसोस नही था कि मुझे सजा पर भेजा गया है। मेरे पास शहर की बहुत सी स्मृतियाँ हैं जो अब भी मेरा पीछा करती हैं।

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मैंने झांसी के सीपरी मुहल्ले में अपना ठिकाना बनाया। वह सेंट्रल होटल के चौराहे के पास था ,रेलवे स्टेशन पैदल का रास्ता था। मेरे आवास में रेल की सीटी सुनाई पड़ती थी। रात आवाज बहुत मुखर हो जाती थी। कभी-कभी रेलवे स्टेशन जाना अच्छा लगता था। मुसाफिरों के आने की खुशी और जाने का गम उनके चेहरे पर दिखाई देता था। रविवार के दिन वहाँ अखबार खरीदने जरूर जाता था। उस समय में अखबारों के रविवारीय संस्करण पढ़ने योग्य होते थे। उसमे साहित्य और संस्कृति के अनेक लेख छपते थे।


सेंट्रल होटल मुझे यतीमखाने की तरह लगता था जिसमें कई विभागों के लोग वहाँ किराये पर रहते थे। वहाँ मेरी मुलाकात उन लोगों से हुई जो इलाहाबाद में कंपटीशन की तैयारी के दौरान मिले थे। वहाँ रहना किसी हॉस्टल में रहने जैसा था। जो झांसी में अकेले रहना चाहते थे उनके लिये यह मुफीद जगह थी। बहरहाल उस होटल की गली में मुझे मकान मिला था। सीपरी बाजार झांसी का पुराना मुहल्ला था, वहाँ नये नये निर्माण शुरू हो रहे थे। चूंकि वह झांसी के मुख्य मार्ग पर था इसलिये आवाजाही आसान थी। मैं स्कूटर से शहर की परिक्रमा कर लेता था। पास में चित्रा टाकीज था। उससे थोड़ी दूर पर सिनेमाहालों के समूह थे – जैसे खिलौना, नटराज, एलाइट और नंदिनी सिनेमा। जब शो छूटते थे तो चौराहे पर जाम लग जाता था। वह ऐसा समय था जब लोगों में सिनेमा देखने की दीवानगी थी। फिल्में भी अच्छी बनती थी, फिल्मों  की  कहानी और संगीत पर ध्यान दिया जाता था। अब वे सारे टाकीज की जगह या तो मल्टीप्लेक्स बन गये या बड़े बड़े माल स्थापित हो गये हैं। शहर की संस्कृति में मूलभूत बदलाव आ गया है।


  

गृहस्थी का सामान व्यवस्थित करने में एक हफ्ते का समय लग गया था। मकान में आलमारियाँ कम थी इसलिये किताबों को जहां–तहां रखना पड़ा। किचन की भी यही हालत थी, वहाँ टेबुल आदि जोड़ कर उसे अनुकूल बनाने की कोशिश की गयी थी। किराये के मकान मन-मुताबिक नही मिलते और न मकान मालिक यह सोचने की जहमत उठाते हैं कि मकान रहनेवालों के उपयुक्त बनाया जाय। बाज किराएं के मकान मकान कम अस्तबल का ज्यादा आभास देते थे। जब तक घर व्यवस्थित हो जाय तो किसी काम में मन नही लगता था।

  

झांसी का किला शहर के बीचोंबीच था, वह बंगरा पहाड़ी पर बना हुआ था। इस किले के दस गेट थे जिसमें ओरछा गेट, लक्ष्मी गेट और दतिया गेट प्रमुख था। किले के ऊपर लक्ष्मीबाई के साथ तस्वीर बनी हुई थी। उनकी गोद में उनका बच्चा और हाथ में तलवार थी, किले के नीचे वह जगह दिखाई गयी थी जहां से उन्होंने छलांग लगाई थी। किले से उस जगह की दूरी  पचास फीट से कम नही थी। यह सोच कर आश्चर्य हो रहा था कि अपने की पीठ पर किस तरह उन्होंने अपने बच्चे और तलवार को संभाला होगा और शत्रुओ से लोहा लिया होगा।

  

यह बहुत बड़ा किला नहीं था लेकिन इसके सामने बड़े-बड़े किलों की शौर्य गाथाएं धूमिल हो जाती है। यह किला 1857 की लड़ाई का प्रतीक है। किलों का महत्व किलों के आ कर से नही होता। वह किला किसके नाम से जाना जाता है और उसने कौन से एतिहासिक काम किये है।  उसका देश में क्या योगदान, इन सब तत्वों से किले का मूल्यांकन किया जाता है। कहने को ग्वालियर का सिंधिया का किला  झांसी के किले से विशाल है लेकिन उस किले का नाम सम्मान के साथ नही लिया जाता। सिंधिया के तत्कालीन राजा जयाजी राव सिंधिया ने 1957 की लड़ाई में अंग्रेजों की मदद की थी। अगर वे 1957 के स्वतंत्रता संग्राम में लक्ष्मीबाई के साथ लड़ते तो उसका इतिहास दूसरा होता। इतिहास का अध्ययन करते समय यह तथ्य प्रकाश में आया है कि देश के अनेक राजे–रजवाड़ों ने अंग्रेजों की सहायता की है अन्यथा अंग्रेज यहाँ अपनी जड़े नही जमा पाते। बहुत से राजे महाराजों ने देश के साथ जो विश्वासघात किया है, यह कथा इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। 


झाँसी का किला

  

जिसे हम लक्ष्मी बाई के नाम से जानते हैं उनका जन्म 1828 में बनारस में हुआ था। उनका नाम मणिकर्णिका था, उनके बचपन का  नाम मनु था। बचपन से वे घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला में पारंगत थी। उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी, उनका वंश चले इसलिये उन्होंने मनु  से विवाह कर लिया था। विवाहोपरांत उनका नाम लक्ष्मी बाई रखा गया था। उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई लेकिन कुछ समय बाद उसका देहांत हो गया। गंगाधर ने अंग्रेजों से यह निवेदन किया कि रानी को उसके परिवार से दत्तक पुत्र ग्रहण करने की अनुमति दी जाय। अंग्रेजों ने उनके इस आग्रह को ठुकराते हुए कहा कि यदि रानी को अपनी कोई संतान नही है तो उनका राज्य वे अपने अधीन कर लेंगे। यह लार्ड डलहौजी का डाक्टरिन आफ लेप्स था जिसके अंतर्गत उन्होंने देश अनेक राज्यों को अपना कब्जा जमा लिया था। लक्ष्मीबाई ने इस बंदिश के बावजूद दामोदर राव को अपना दस्तक पुत्र बनाया।

 

गंगाधर की मृत्यु के बाद उनकी अंग्रेजों से लड़ाई जारी रही। अपने सीमित सैन्य साधनों के साथ  वह अंग्रेजों के साथ संघर्ष करती रही। उस समय पड़ोस के राजाओं ने उनका सहयोग नही किया। अंग्रेजों से लड़ते हुये लक्ष्मीबाई ग्वालियर के पास कोटा सराय में 1858 को वीरगति को प्राप्त हुई थी। इस घटना को अंजाम देने में राजा सिंधिया की प्रमुख भूमिका थी। सुभद्रा कुमारी चौहान की यह काव्य पंक्ति देखें 


अंग्रेजों के मित्र सिंधिया से छोड़ी रजधानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी


झांसी की रानी के पास कितना अदम्य साहस था। उनके जीवन पर प्रसिद्ध लेखक वृंदावन लाल वर्मा ने झांसी की रानी उपन्यास लिखा था। बांग्ला लेखिका ने लक्ष्मीबाई पर अपना पहला उपन्यास लिखा था। इस उपन्यास को लिखने के लिये उन्होंने शोध कार्य किया था और इस उपन्यास को विश्वसनीय बनाने की कोशिश की थी।



लक्ष्मीबाई की कीर्ति और साहस के किस्से  अनेक उपन्यासों में दर्ज है। कई इतिहासकारों ने लक्ष्मीबाई को 1857 की लड़ाई का योद्धा बताया और उनके शौर्य की प्रशंसा की। इतिहासकार सुरेश नाथ सेन ने अपनी पुस्तक - 'एटी फिफ्टी सेवन' में लिखा है – अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में रानी ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया उसने भारतीय दिलों में क्रांति की ज्वाला हमेशा के लिये अमर कर दिया। ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज जिन्होंने झांसी की रानी के विरुद्ध मोर्चा संभाला था, उनका कथन था –'विद्रोहियों में रानी लक्ष्मी बाई सबसे बहादुर और सर्वश्रेष्ठ सैन्य नेता थी।'

 

झांसी के किले को देख कर इतिहास के अनेक दृश्य याद आने लगे। उसे देखने का सपना साकार हो गया था। जब कभी अवसर मिलता किले को देखने पहुँच जाता था। मेरे भीतर सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता – झांसी की रानी की पंक्तियाँ याद आने लगती थी।  लक्ष्मीबाई ने उन्तीस की उम्र में जो कारनामा किया वह इतिहास में गौरव कथा की तरह याद किया जाएगा। उनके बाद इस शहादत की परंपरा को – भगत सिंह, अशफाकउल्ला, रामप्रसाद विस्मिल आदि क्रांतिकारियों ने आगे बढ़ाया लेकिन उन्हें भुला दिया गया। सरकार ने उनके वंशजों के साथ किस तरह का सुलूक किया गया, उसे सोच कर शर्म आती हैं। झांसी के पुत्र दामोदर राय को अंग्रेजो ने मामूली पेंशन दी, वे दर दर भटकते रहे। आजादी के बाद शहीदों के परिवार साथ सरकार नें जो बर्ताव किया वह बेहद शर्मनाक है।

 

झांसी के किले को देख कर एक अन्य प्रकरण की याद आ रही हैं। पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी का दिन इसी किले पर मनाया जाता था और झण्डा फहराया जाता था। विभिन्न तरह के सांस्कृतिक आयोजन आयोजित किये जाते थे। इस आयोजन में सुदूर से स्वतंत्रता सेनानी को बुलाया जाता था। उन्हें सम्मानित करने और सभा को संबोधित करने की परंपरा थी। अधिकारियों ने बारी-बारी से अपनी बात रखी और शहीदों/ क्रांतिकारियों के योगदान को याद किया। वे  जो कुछ बोल रहे थे, उसमें रंच मात्र सच्चाई नही थी।  लोग उनके चरित्र को जानते थे। अंत में सेनानी के बोलने की बारी आयी और उनका दर्द छलक उठा – उन्होंने कहा कि जिस देश को आजाद कराने में हमारी पीढ़ी खर्च हो गयी लेकिन देश में कोई बदलाव नहीं हुआ। फिर उन्होंने कहा कि बस आज के दिन ही उन्हें याद किया जाता है, उनकी किसी समस्या पर ध्यान नहीं दिया जाता। क्या हमें आजादी के बाद ऐसा भारत चाहिये था। जिन लोगों ने अपना खून बहाया उन्हें सत्ता नहीं मिली बल्कि कुछ चुने हुए और चालाक लोगों के हाथ में देश का शासन चला गया।

 

उनके भाषण को सुन कर जिलाधिकारी असहज हो गये थे। उन्होंने तरेर कर एस डी एम की ओर  देखा, क्योंकि स्वतंत्रता सेनानी को लाने की जिम्मेदारी उनकी थी। अनेक कार्यक्रमों के बाद सभा विसर्जित हो गयी थी, सेनानी अकेले छूट गये थे। उनकी आँखें भरी हुई थीं। मैं उनके पास गया और उनकी इस स्थिति का सबब पूछा। उन्होंने बताया कि डिप्टी उनके गाँव गया था और कहा था कि आयोजन के बाद वह उन्हें उनके गाँव पहुंचा देगा लेकिन उसका पता नहीं है। मैंने उनसे कहा कि आप घबड़ाएं नहीं, मैं आपको आपके घर जाने वाली बस पर बैठा दूंगा। उनकी उम्र ज्यादा थी मैंने उन्हें अपने स्कूटर से उन्हें बस स्टेशन पहुंचाया। उन्हें उनके गाँव जाने वाली  बस पर बैठा दिया। वे बहुत आहत थे, उन्होंने कहा – मेरी  ज्यादा उम्र नहीं बची है। अब मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं होऊंगा। उनका जिस तरह से अपमान हुआ वह मुझे चिन्तित करने वाला था। आजादी के बाद ऐसे लोगों को विस्मृत कर दिया गया जिनके दम पर हम हवा में सांस ले रहे हैं।


बेतवा नदी 


 ओरछा और बेतवा नदी 


देश के प्रसिद्ध नगर और स्थल नदियों के किनारे बसे हुये है। ये  नदियां  उस नगर की सांस्कृतिक पहचान का परिचय देती हैं। ओरछा एक ऐतिहासिक नगर है , यह नगर बेतवा नदी के तट पर बसा हुआ है। बेतवा नदी म प्र के रायसेन के कुम्हार गाँव से निकलती है। यह भोपाल, बिदिशा, झांसी, ललितपुर के इलाके को सिंचित करते हुये हमीरपुर में यमुना में मिल जाती है। ओरछा में इस नदी का सौन्दर्य देखते ही बनता है। इस नदी के भीतर छोटी–छोटी पहाड़ियाँ है जिससे उसकी धाराएं टकराती हैं और उससे ध्वनि पैदा होती है। इस नदी में जीवन का संगीत छिपा हुआ है। सुबह दोपहर और शाम में इसकी ध्वनियाँ अलग-अलग होती है लेकिन इसका असली सौन्दर्य शाम के समय सुनाई पड़ता है। लोगों की आवाजाही रुक जाती थी, थोड़ा सन्नाटा छा जाता था। शाम के समय इस नदी को सुनिये तो लगता है कि जैसे कोई जलतरंग बज रहा हो। इसी आकर्षण के कारण मैं शाम के समय ओरछा जाता रहा हूँ।


ओरछा की स्थापना 1501 के आस-पास रुद्रप्रताप सिंह बुंदेला ने की थी। बुंदेला बुंदेलखंड की प्रचलित संज्ञा है। आज भी लोग अपने नाम के आगे इस विशेषण को जोड़ते है। बुंदेला एक बहादुर जाति है उनके भीतर गहरी जिजीविषा है जो सैन्य संचालन में प्रकट होती है। उस समय के लोक साहित्य में उनसे संबंधित अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। इस नगर का प्रमुख आकर्षण राजमहल, लक्ष्मी नारायण मंदिर, चतुर्भुज मंदिर है। इनका  शिल्प में अद्भुत है। उनके ऊपर छतरियाँ और भीतिचित्र देखने योग्य हैं। यहाँ पर राजा राम का मंदिर है जिसमें राम और सीता की मूर्तियाँ विराजमान हैं। यहाँ अयोध्या के राम को राजा राम का दर्जा दिया गया है  उन्हें गार्ड आफ आनर दिया जाता है। इस मन्दिर की रखवाली हथियारबंद सिपाही  करते हैं। मुझे यह देख कर अजीब लगा था कि जो राम दुनियाँ की रक्षा करता है, वह भी क्या असुरक्षित है?

इस राजाराम मंदिर का अयोध्या से गहरा संबंध है। बताया जाता है कि कनक भवन को रानी केकई ने सीता को मुंह दिखाई में दिया था। याद करिये कि वही केकई थी जिनके कारण राम को वनवास जाना पड़ा था।

कनक भवन को अनेक राजाओं ने अपने तरह से परिवर्तित किया जिसमें विक्रमादित्य का नाम लिया जाता है। ओरछा की रानी वृषभान कुंवारी ने इस महल को भव्य रूप दिया था। इस मन्दिर में भजन कीर्तन होता रहता है इस तरह यह मन्दिर आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विख्यात है।


ओरछा का राम राजा मन्दिर 


ओरछा का इतिहास कवि केशव दास के बिना अधूरा है। उनका जन्म 1555 में ओरछा में हुआ था। ओरछा के राजा मधुकर शाह के पुत्र इन्द्रजीत सिंह के शासन काल में उनके दरबारी कवि थे।  वे संस्कृत के विद्वान् थे लेकिन उन्होंने हिन्दी में लिखा। 'रामचन्द्रिका', 'कविप्रिया', 'रसिक प्रिया' और 'प्रबोध चन्द्रोदय' उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। प्रसिद्ध आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' कहा था। हिन्दी साहित्य में यह दोहा प्रचलित है।

सूर सूर तुलसी शशि उडगम केशव दास। 

अबके कवि खद्योत सम जंह तंह करत प्रकाश। 

राय प्रवीन का संदर्भ केशव दास के जीवन से जुड़ता है। कथा है कि राय प्रवीन के भीतर काव्य प्रतिभा थी। वे अपने काव्य विकास के लिए केशवदास के पास गयी थीं। वह बहुत सुंदर थी।केशव ने कहा कि वह उन्हें अपना कवित्त सुनाये जिसके आधार पर वे उनके कविता लेखन पर  अपनी राय दे सके। प्रवीन  ने यह दोहा सुनाया –

ऊँचे हवे सुर बस किये सम हुए नर बस कीन्ह।

अब पाताल बस करन को ढरिक पयानो कीन्ह।।

उसके इस दोहे को सुन कर केशव दास मन्त्र मुग्ध हो गये। यह दोहा वक्ष सौन्दर्य और उसके निरंतर ढलान के बारे में है। केशव ने प्रवीन को अपना शिष्य बना लिया। जब उसकी सुन्दरता और कवित्त के बारे में तत्कालीन राजा इन्द्रजीत सिंह के पास राय प्रवीन की यह कीर्ति पहुंची तो उसे अपने दरबार की शोभा बना लिया था। वे उसके प्रेम में बिंध गये थे। कवयित्री के साथ वह कुशल नर्तकी भी थी। उसके गायन और नृत्य से दरबार गुलजार रहता था। प्रायः हर राजा के दरबार में दरबारी कवि होते थे जिनका काम राजा के शौर्य गाथाओं को गाना था। संगीतकार, गायक राजा के एकांत को आबाद करते रहते थे। राय प्रवीन के सौन्दर्य की चर्चा ओरछा राज्य तक सीमित नहीं थी। उसकी चर्चा ओरछा की सीमा को लांघ चुकी थी। जब अकबर को पता चला तो उन्होंने राजा इन्द्रजीत से  कहा  कि वे राय प्रवीन  को हमारे दरबार में भेज दे अन्यथा उन्हें आक्रमण का सामना करना पड़ सकता है। राजा इन्द्रजीत बड़े पशोपेस में पड़ गये थे। वे प्रवीन के प्रेम में गहरे पड़ चुके थे। उसके लिए उन्होंने अलग से महल बनवा दिया था जिसे इतिहास में राय प्रवीन  महल के रूप में जाना जाता है।

यह समस्या राजा ने राय प्रवीन को बताई। उसने उन्हें आश्वस्त किया कि इस समस्या का वह  कोई न कोई हल निकाल लेगी। बताते हैं कि प्रवीन ने अकबर के दरबार में पहुँच कर उनको यह दोहा सुनाया –

 बिनती राय प्रवीन की सुनियें शाह सुजान। 

 जूठी पातर  बखत है बारी बायस स्वान।।

यानी वह जूठी हो चुकी है। इस दोहे से अकबर के सौन्दर्यबोध को आघात पहुंचा। उन्होंने अपना हुक्म को वापस ले लिया था। संयोग देखिये कि एक दोहे ने उसे केशव दास के माध्यम से राजदरबार पहुंचा दिया था और दूसरे ने राजा इन्द्रजीत सिंह की जान बख्श दी।  

केशव दास को आप कठिन काव्य का प्रेत कह सकते हैं लेकिन वे अपने जीवन में रोमांटिक थे। राय प्रवीन से उनका सान्निध्य इसका सुबूत है। उनका यह दोहा उनके स्वभाव को प्रदर्शित करता है –

  केशव केसन असि करी बैरिहु जस न कराहि।

  चन्द्र बदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहि।। 

मैं तीन साल झाँसी प्रवास में रहा हूँ। केशव जयंती साल की रामनवमी में पड़ती थी। रीवा से कवि लेखक उनकी जयंती को मनाने ओरछा आते थे। इन तीन वर्षो में कमला प्रसाद, आग्नेय, विश्वनाथ त्रिपाठी,  दिनेश कुशवाह और गीतकार नईम आदि से मुलाकात हुई थी जिन्हें आयोजकों ने इस आयोजन में बुलाया था। मार्च के वित्तीय वर्ष में तमाम सरकारी व्यस्तताओं के बावजूद उनके साथ समय बिताता था। मुझे याद है कि जब केशव पर आयोजन की समाप्ति हो गयी तो हम बेतवा नदी के पुल पर घूमने निकल गये। कुछ मित्र शाम होते ही व्याकुल होने लगते थे। मैं चाहता था कि कुछ चुनिन्दा लोग हमारी महफिल में शामिल हों। उसमें गीतकार नईम मौजूदगी जरुर होनी चाहिए। मैं उनके गीतों का दीवाना था। वे अपने शरीक–इ-हयात के साथ थे। मैंने बिना किसी संकोच के उनसे कहा – भाभी जी मुझे एक घंटे के लिये नईम साहब को उधार में दे दीजिये। हमारी बात को सुन कर वे खिलखिला कर हँस पड़ीं। उत्तर में कहा – 'मैं तुम्हारी बदमाशी जानती हूँ। ये कौन शाम को मेरे साथ रहते हैं।'

मैंने एक सहायक से बन्दोबस्त के लिए कह दिया था। उनके पास रसद और सामग्री मौजूद थी हमने किसी होटल के कमरे में दस्तरखान नही सजाएं। उसकी जगह बेतवा के तट को चुना। शाम के वक्त बेतवा नदी की लहरों जल तरंग की आवाज सुनाई पडती थी। शेर ओ शायरी और बतकही का दौर शुरू हुआ वह घण्टों तक चलता रहा। झांसी प्रवास की यह यादगार शाम अब तक याद है।

 


झाँसी के अदीब  

बुंदेलखंड का यह इलाका सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न होने के साथ साहित्यिक रुप से भी समृद्ध था। इसी जनपद के चिरगांव नामक स्थान पर खड़ी बोली के बड़े कवि मैथिली शरण गुप्त का जन्म (3 अगस्त 1886) हुआ था। उन्हें राष्ट्रकवि के नाम से जाना जाता था। बताते हैं कि गाँधी जी ने उन्हें यह उपाधि दी थी। उन्होंने 'साकेत' नामक महाकाव्य लिखा था। यह महाकाव्य उर्मिला पर केंद्रित है। रामकथाओं में उर्मिला के चरित्र को लगातार नजरअंदाज किया गया था। उन्हें अकेलेपन का दंश झेलना पड़ा था। राम सीता के साथ और भरत शत्रुघ्न सपत्नीक रह रहे थे लेकिन उर्मिला लक्ष्मण से चौदह वर्ष दूर रही। उनकी इस वेदना को गुप्त जी ने बेहद संवेदना के साथ व्यक्त किया है। उन्होंने यशोधरा, पंचवटी और भारत भारती जैसे खंडकाव्य लिखे जिन्हें हमने अपने स्कूल और कालेज के दिनों में खूब पढा है। भारत भारती की ये पंक्तियाँ आज भी हमारे भीतर गूँजती रहती हैं। 

हम कौन थे, क्या हो गये, और क्या होंगे अभी। 

आओ विचारे आज मिल कर समस्याएं सभी।।

स्वतंत्रता संग्राम में भारत भारती बहुत लोकप्रिय खंडकाव्य था। उसने लोगों को प्रेरित किया। आज भी उसकी उपयोगिता है। यह खंडकाव्य देश के कई सवालों से टकराता है और हमें दृष्टि देता है।

मैथिलीशरण गुप्त सरस्वती के संपादक और आलोचक महावीर प्रसाद दिवेदी के शिष्य थे। उन्हें राज्यसभा का मानक सदस्य बनाया गया था। सियाराम शरण गुप्त मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे। उन्होंने अनेक विधाओं में लेखन किया है। वे गाँधीवादी विचारों के लेखक थे। जब मैं चिरगांव पहुंचा और उसकी जमींन को छुआ तो रोमांच से भर गया। चिरगांव कोई बड़ा कस्बा नही था  लेकिन गुप्त जैसे कवि ने इस जगह को बड़ा बना दिया था। विलक्षण प्रतिभाएं किसी बड़े शहर में नही जन्म लेती जिस छोटी जगह में वे होते हैं वे बड़ी बन जाती हैं। मैथिलीशरण गुप्त का देहांत 12 दिसंबर 1964 को हुआ था। उन्हें पद्मभूषण सम्मान से विभूषित किया गया था। 

झांसी वृंदावन लाल वर्मा की जमीन है जिन्होंने ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। 'झांसी की रानी', 'मृगनयनी', 'महारानी दुर्गावती', 'गढ़कुंडार' उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। झांसी की रानी उपन्यास  लक्ष्मी बाई के जीवन और संघर्ष पर लिखा गया प्रथम उपन्यास था। 'मृगनयनी' पन्द्रहवी शताब्दी के राजा मानसिंह तोमर और निन्नी गुज्जर की प्रेम कथा है। यह लोककथा पर आधारित उपन्यास है। निन्नी की आंखे मृग की तरह थी इसलिये उसे मृगनयनी कहा गया। इस उपन्यास पर सीरियल भी बन चुके हैं। जब मैनें उनका उपन्यास 'गढ़कुंडार' पढा तो रोमांचित हो गया था और किले को देखने की इच्छा बलवती हो गयी। आगे की पंक्तियों में इसका विवरण दिया जाएगा।


वल्लभ सिद्धार्थ 


जब मैं झांसी आया था तो सिद्धार्थ बल्लभ से मिलने की बहुत उत्कंठा थी। वे मऊरानीपुर में रहते थे। मुझे लगा था कि मऊरानीपुर झांसी का कोई मुहल्ला होगा लेकिन मुझे लोगों ने बताया गया कि मऊरानीपुर झांसी के एक तहसील का नाम है जो झांसी से 60 किमी दूर है। राजकीय दौरे पर मुझे जनपद के कई इलाकों में जाना पड़ता था। बल्लभ जी से सारिका कार्यालय में हुई मुलाकात की याद थी। इस पत्रिका में उनकी कहानी 'ब्लैकआउट' प्रकाशित हुई थी जिसका अंत संपादक ने बदल दिया था। वे इस बात से खफा थे। उन्होंने संपादक से कहा कि उन्हें परिवर्तन करना था तो लेखक को अवगत कराना था। अगर ऐसा होता तो वे इस कहानी को वापस ले लेते। मुझे उनका यह स्टैन्ड अच्छा लगा। बल्लभ जी कथाकार उपन्यासकार के अलावा बहुत अच्छे अनुवादक थे। उन्होंने काफ्का, ज्यां पाल सार्त्र, तालस्टाय, दोस्तोवस्की की रचनाओं का हिन्दी में अनुवाद किया था।

जब मैं मऊ पहुँच कर उनके बारे में पूछा तो लोगों ने बताया कि वे दार्शनिक किस्म के व्यक्ति हैं। हमेशा ख्यालों में गुम रहते है। वे उस शहर के अमीर व्यक्तियों में शरीक थे। मैं यह सोच कर चकित था कि इस वर्ग के लेखक में इतनी दीवानगी कहां से आयी होगी? वे अपने रहन–सहन में बेहद साधारण लेकिन विचारों में असाधारण थे। मकान भी कोई भव्य नही था। वे अपनी बैठक में टाइपराइटर के साथ दिखाई देते थे। मैं उनसे मिलने का कोई न कोई बहाना बनाता रहता था। वे आत्मीयता के साथ मिलते थे। कंधे पर एक झोला और सर पर गमछा बांधे मेरे झांसी के दफ़तर में पहुँच जाते थे।

एक दिन जब उनके पास गया तो उन्होंने मुझे अपना उपन्यास 'कटघरे'  उपहार में दिया। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि आपातकाल थी। यह उपन्यास बहुत रोचक और मेहनत के साथ लिखा गया था। इस उपन्यास का जिक्र राजेन्द्र यादव ने हंस के सम्पादकीय में किया था। उन्होंने इसमे कबीर के दोहें का उद्धरण दिया था। उन्हें जब याद करता हूँ तो इस दोहे की याद आती हैं -

देह धरे को दंड है सब काहू को होय।   

ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय।।   

इस दोहे की उन्होंने मुझे अदभुत व्याख्या बताई। उन्होंने कहा यही जीवन का सार तत्व है। इतने बड़े लेखक होने के बावजूद वे बेहद निस्पृह थे। विश्व साहित्य के बारे में उनकी धारणाएं अलग थीं। वे विश्व साहित्य के बड़े अध्येता थे। वे किसी हिन्दी की लेखिका से प्रेम करते थे जिसका जिक्र वे बार बार करते थे। कई बार उनसे उसका नाम जानने की कोशिश की लेकिन सफलता नही मिली।

लोक कवि इसुरी मऊरानीपुर के पास के एक गाँव मेढकी में पैदा हुये थे। उनके काव्य में लोकजीवन का सौन्दर्य दिखाई देता है। उनका फाग विख्यात है। उनके फाग में शृंगार, करुणा संयोग वियोग और राजनीति के अनेक रंग मिलते हैं। मऊरानीपुर वस्त्र उद्योग के लिये मशहूर है। इसका प्राचीन नाम मधुपुरी था। यह सुखनई नदी के तट पर बसा हुआ है। इस नदी के किनारे हर वर्ष जल विहार उत्सव आयोजित किया जाता है।


ओम शंकर 'असर'


मैं भी मुंह में जुबान रखता हूँ 

यह गालिब के शेर का पहला हिस्सा है  – पूरा शेर इस तरह पढिए – 

मैं भी मुंह में जुबान रखता हूँ 

काश पूछो कि मुद्दआ क्या है। 

इस नाम से हिन्दी दैनिक में साप्ताहिक कालम साया होता था जिसे ओम शंकर खरे असर लिखते थे। यह कालम बहुत लोकप्रिय था लेकिन उनसे मेरा परिचय नहीं था। जब मैंने बल्लभ जी से उनके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह हमारे जिले के हीरा हैं। वे मुझे लेकर उनके घर गये। वे झांसी के पुराने बासुदेव मुहल्ले में रहते थे। उस मुहल्ले की आबादी घनी थी गलियाँ संकरी थी। उनका घर पुराने ढब का था। दीवारें जीर्ण–शीर्ण थीं। उसमें उनकी उपस्थिति अदभुत दिखती थी। उनके बैठकखाने में एक मेज और पुरानी कुर्सियां थीं। इस मकान में आधुनिकता का प्रवेश–निषेध था। उनके इस घर को देख कर मुझे अपने गाँव के मकान की याद आ गयी। वे मेरे पिता की उम्र के थे जिन्हें पुरानी चीजों से मोह था। भले ही वे पुराने घर में रह रहे थे लेकिन विचारों से आधुनिक थे।

असर साहब एकहरे बदन के थे। उनकी मूंछ नुकीली थी। देखने में वे महोबिया जवान लगते थे। उनकी आवाज दबंग थी। वे खूबसूरत बातें करते थे। इतने खूबसूरत बातें करने वाला आदमी मैनें नही देखा था। मैं भी उनसे बहुत मुतासिर हुआ। वे केन्द्रीय बचत विभाग में उपनिदेशक के पद से फैजाबाद से सेवानिवृत हुए थे। मुझे इस बात का मलाल था कि फैजाबाद में उनसे नहीं मिल सका जबकि इस शहर में मेरा आना–जाना था। लेकिन खुशी यह थी कि झांसी से उनसे मिलना संभव हुआ।

इस मुलाकात के बाद वे नियमित मुलाकातें होती रही। झांसी प्रवास में वे मेरे स्थानीय अभिभावक थे। मेरे सुख–दुख में शरीक थे। वे अपनी सायकिल से दनदनाते हुये मेरे दफ्तर में पहुँच जाते थे। वे बहुत अच्छे शायर और पेंटर थे।उन्होंने झांसी पर महत्वपूर्ण किताब लिखी है। उन्हें झांसी के इतिहास का विशेषज्ञ माना जाता था। शोधार्थी उनसे मिलने आते थे। असर साहब अद्भुत किस्म के किस्सागो थे। उनके पास अनोखी कहानियाँ थीं। जब उन्हे पहुंचाने चौराहे पर गया तो वे एक मजार के पास रुक गये। उन्होंने बताया कि जब उनका तबादला झांसी से नैनीताल हो गया तो वह बहुत चिंतित थे। किन्ही कारणों से वे झांसी नही छोड़ना चाहते थे। उन्होंने यह समस्या अपने भाई को बताया उन्होंने कहा – बस बाबा से मिल लो तुम्हारी मुसीबत दूर हो जाएगी। उन दिनों एक बाबा बबीना रेलवे स्टेशन पर फटेहाल रहते थे। जब भाई ने उनसे अपनी बात बताई तो बाबा ने उन्हें अपने पास बुला।कर एक झन्नाटेदार झापड़ रसीद कर दिया और वे बिलबिला उठे। उन्हें भला बुरा कहा और अपने मुख्यालय इंदौर चले गये। उन्होंने सोचा कि वे अपनी समस्या अपने बास को बताएंगे।लेकिन वहाँ पहुँचने पर बास छुट्टी पर चले गये थे। वहाँ वह उस आदमी से टकरा गये जो झांसी नहीं ज्वाइन करना चाहता था। दोनों मे अपने आवेदन ने अपनी–अपनी समस्या बताई। इस तरह उनका ट्रांसफर रुक गया। यह कहानी काल्पनिक नहीं थी लेकिन उनकी समस्या का हल किस चमत्कार के तहत हुआ। यह बात उन्हें समझ में नहीं आयी थी। झांसी प्रवास के बाद उनसे फोन पर बात होती रहती थी।

 

सुरेन्द्र वर्मा


'मुझे चांद चाहिए' के लेखक सुरेन्द्र वर्मा की जन्मभूमि झांसी थी। इस उपन्यास पर उन्हें साहित्य अकादमी का सम्मान मिला था। 'दो मुरदों के बीच गुलदस्ता', 'काटना शमी का वृक्ष पदमपंखुरी की धार से', उनके अन्य उपन्यासों के नाम हैं। उनके प्रसिद्ध नाटक 'सूर्य के अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक', 'छोटे सैयद बड़े सैयद' उनके मुख्य नाटक हैं जिसका अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में हो चुका है। उनका कार्य क्षेत्र मुंबई है। उनके छोटे भाई रवींद्र वर्मा हिन्दी के उपन्यासकार और कहानीकार हैं उनके मुख्य उपन्यास 'मैं झांसी नही दूँगा', 'गाथा शेख चिल्ली', 'दस वर्ष का भंवर हैं', कहानी संगह के नाम 'कोई अकेला नहीं', 'पचास वर्ष का बेकार आदमी' हैं। वे लखनऊ में निवास करते हैं।


शशधर मुखर्जी


झांसी केवल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न नहीं था। उसके तार फिल्मी दुनिया से जुडते हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता शशधर मुकर्जी झांसी में पैदा हुये थे फिर वे बाम्बे टाकीज से जुड़े। बाद में फिल्मालय स्टूडियो का निर्माण किया। जाय मुकर्जी उनके बेटे थे उन्होंने 'लव इन शिमला', 'लव इन टोकियो', 'फिर वही दिल लाया हूँ', 'दिल चाहता है' में अभिनय किया था।  शशिधर मशहूर सिनेमाकार थे। देब मुकर्जी, सुबोध मुकर्जी उनके बेटे थे। शशधर मुकर्जी की पत्नी सती देवी के भाई अशोक कुमार, किशोर कुमार फिल्मी दुनिया के बड़े कलाकार थे जिन्हें शशिधर मुकर्जी ने फिल्मों में जगह दी। अपनी प्रतिभा के बल पर वे अभिनय और गायिकी के शीर्ष पर पहुंचे।


ओ रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में 

जिन्हें हिन्दी फिल्मों की थोड़ी सी जानकारी होगी उन्हें पता होगा कि यह अनोखी रात फिल्म का गीत है। इस फिल्म में संजीव कुमार जाहिदा और परीक्षित साहनी का यादगार अभिनय है। इसे असित सेन ने निर्देशित किया है। इस गीत को गीतकार इंदीवर ने लिखा है। जब मैं बरुआ सागर भ्रमण के लिये गया तो इस बात का पता लगा। इंदीवर का मूल नाम – श्याम लाल राय था। वे शुरू से कविताई करते थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ 'सुन किरायेदार मकान खाली कर' कविता लिखी थी। इस कविता को लिखने के जुर्म में उन्हें जेल यात्रा करनी पड़ी। जब वे जेल से बाहर आए तो उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा जाने लगा बरुआ सागर एक झील है जिसके नाम पर इस कस्बे का नाम पड़ा है। बारिश के दिनों में बरुआसागर के प्रपात को देखना अवर्चनीय अनुभव है।


इंदीवर


बरुआसागर झील का निर्माण ओरछा के राजा उदित सिंह ने कराया था। इस झील के पास बरुआसागर किला है जहां मराठों और बुंदेलों के बीच लड़ाई हुई थी। जब बारिश में झील का पानी बढ़ जाता था तो उसकी जलधार बहने लगती है वह एक झरने का रूप ले लेता था। दूर दूर से लोग देखने आते थे। बरुआ सागर के किनारे बैठ कर इंदीवर ने बहुत से गीत लिखे हैं जिसमे 

ओ रे ताल मिले नदी के जल में 

नदी मिले सागर में 

सागर मिले कौन से जल में 

कोई जाने ना।

गीत प्रमुख है। यह इंदीवर की का दार्शनिक गीत है जिसे सुन कर कबीर की याद आती है। इंदीवर ने फिल्मों में हजारों गीत लिखे। उन्होंने अपने गीतों में साहित्यिक स्वरूप को ध्यान में रखा है। फिल्म सरस्वती चंद्र में अद्भुत गीत लिखे हैं जैसे 'चंदन सा बदन चंचल चितवन/ धीरे से तेरा मुस्काना' 'छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए'। ये गीत बहुत प्रसिद्ध हुये थे। पूरब–पश्चिम का गीत – कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, है प्रीत जहां की रीत, मैं गीत उसी के गाता हूँ/ भारत का रहनेवाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ। ये गीत भारतीयता के महत्व को बताते हैं। उन्होंने मल्हार, पारस मणि, दिल ने पुकारा, सफर और एक बार मुस्करा दो – जैसी फिल्मों के गीत लिखे हैं। उनकी फिल्मों की सूची लंबी है।

फिल्मी दुनिया में इंदीवर के गीतों की अलग जगह है। उनकी भाषा और शैली उन्हें विशिष्ट गीतकार का दर्जा  देती है। उन्होंने चलताऊ गीत नहीं लिखे है बल्कि उसे जीवन से जोड़ा है। उनके गीतों की अर्थवत्ता अदभुत है वे सीधे दिल में उतर जाते हैं।


गढ़कुंडार का किला


गढ़ कुंडार का तिलिस्म

बरुआ सागर से गढ़ कुंडार की दूरी पैतीस कि मी है , मुख्य सड़क ने निकल कर एक संकरी सड़क पर उतरना पड़ता था। सड़के टूटी–फूटी थी।  मैनें बहुत से बड़े और ऐतिहासिक किले देखे है लेकिन कोई इस किले के बराबर नही है। यह कोई विशाल किला नहीं था, इसकी अवस्थिति अलग थी। बहुत कम लोगों इसे देखने के लिये आते थे। इसे ले कर अनेकों डरावनी कहानियाँ प्रचलित है। बताया जाता है कि यहाँ पूरी बारात गायब हो गयी थी इसलिये लोग यहाँ आने से बचते हैं। इस किले में तहखाने और बंकर जैसी रहस्यमय जगहे हैं। यह किला लखनऊ की भूल भुलैया की याद दिलाता है। 'भूल भुलैया' नाम से हिन्दी में एक फिल्म हिन्दी में बनी है जो इस किले की याद दिलाती है। इस तरह के किले और खंडहर जासूसी फिल्मों में दिखाई देते है। जैसे कि फिल्म 'वह कौन थी' या मणि कौल की 'खंडहर'।

यहाँ दिन में अँधेरा छाया रहता था। आसपास कोई परछाई घूमती रहती थी। विशाल कमरे और लम्बी–लम्बी दालानें थी। यह किला डरावना दिखता था इसलिए लोग यहाँ आने से डरते थे। नागदेव और राजकुंवर की प्रेम कथा इस किले में दफन है। बताया जाता है खंगार वंश का राजा नागदेव जागीरदार की बेटी रूप कुंवर से प्रेम करता था। जागीरदार ने विवाह के लिये शर्त रखी कि विवाह में खंगार वंश के सभी सदस्य शामिल होगे। राजा ने यह शर्त मंजूर कर ली, जागीरदार ने खंगार वंश के सभी लोगों की हत्या कर दी। लोग इस घटना को  खंगार वंश का पतन से जोड़ते हैं।

यह कहानी कितनी सच्ची है इसकी पुष्टि नही की जा सकती। किले इस तरह की कथाओं से घिरे रहते हैं। मांडू के बाजबहादुर और रूपमती की प्रेम कथा को लोग जानते ही हैं। किलों में रहने वाले राजकुमार अपने से कम हैसियत की स्त्रियों से प्रेम और शादी के लिये लालायित रहते है उसके लिये अपनी जागीर तक गंवा देते हैं। किसी रियासत के पतन का कारण प्रेम भी होता है।

इस किले का इतिहास जानने के लिए वृंदावन लाल वर्मा का उपन्यास पढ़ने की जरूरत है हालांकि उसमें काल्पनिक विवरण अधिक है। यह किला एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित था। गढ़ कुंडार किसी समय खंगार और बुंदेला राजपूतों की राजधानी रही है। इस किले को दूर से देखा जा सकता है। यह किला खँगार राजाओ के आधिपत्य में था फिर बुंदेलों ने राजधानी बनाया। कुछ वर्ष बाद राजा रुद्र प्रताप सिंह अपनी राजधानी ओरछा को बनाया। जो गढ़ कुंडार से ज्यादा उपयुक्त था। इस किले को देख कर यह ध्यान में आया कि राजा/ शासक अपने किले ऊंची जगह पर बनाते है ताकि विरोधी सेनाएं वहाँ तक न पहुँच सके। सारे राजा, बादशाह अपने किले को मजबूत बनाते हैं ताकि परिंदा पर न मार सके। वे किले में  हाथी या घोड़े पर चढ़ कर आते है और अपने बंकर में छिप जाते हैं।

जब हमारी गाड़ी मुख्य सड़क से आगे बढ़ने लगी तो उस किले को देखने की इच्छा प्रबल होने लगी। किले से थोड़ी दूर रहने के बाद लोग हमें संदेह से देखने लगे। किले के जाने वाले रास्ते पर बहुत कम लोग दिखाई दे रहे थे। जब हम किले में पहुंचे तो लगा कि ऊंट पहाड़ के नीचे आ गये हैं। इस विशाल किले में गाड़ी तिनके के बराबर लग रही थी। उस जमाने में जब राजा आते थे तो हाथी और घोड़ों के समूह के साथ आते होंगे। उनके पीछे सैनिकों के काफिले चलते थे।

इस किले की कई मंजिलें थीं, दीवारे मोटी और मजबूत थी जिस पर गोला बारूद का कोई असर नही होता होगा। उसका प्रवेश द्वार चौड़ा था, उसे यह ध्यान रख कर बनाया गया होगा कि आवाजाही में कोई असुविधा न हो। किले के उपेक्षित एक बड़े भवन में जब हमने प्रवेश किया तो दर्जनों चमगादड़ उड़ने लगे। दूसरे भवन से उडने वाले कबूतरों की संख्या सैकड़ों में थी। छोटी छोटी पहाड़ियां और अनेक खंडहर थे। किले के तहखानों में उतरने के लिये रास्ते थे – उधर हमारी जाने की हिम्मत नही हुई। लोग बताते हैं कि किले के भीतर खजाने गड़े हुए हैं।किले के भीतर घूमने पर मालूम हुआ कि यहाँ कई जगह राख के ढेर है जिसमें आग जीवित थी। वहां के लोगों ने बताया की यहाँ डाकू रात के समय यहाँ पनाह लेने आते थे और भोजन बनाते थे। यहाँ वे अपने लूट के माल का बटवारा करते थे।

जब हम गढ़ कुंडार से लौटे तो तबियत बोझिल थी – जैसे हम किसी रहस्य की दुनिया से लौट रहे हों।

  

बुन्देलखंड सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इलाका है, झांसी उसका केंद्र है। 1989 में शंकर लाल मेहरोत्रा ने अपने साथियों के साथ बुन्देलखंड के अलग राज्य के लिये आन्दोलन किया था जिसमें फिल्म अभिनेता राजा बुंदेला शामिल थे। जिसमें उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर, बांदा, चित्रकूट तथा म प्र के दतिया, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़ आदि जिले प्रस्तावित किये गये थे। जब यह आन्दोलन तीव्र हुआ तो आन्दोलनकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया जहां इस आन्दोलन के सूत्रधार शंकर लाल मेहरोत्रा की मृत्यु हो गयी। यह आन्दोलन उनके आर्थिक सहयोग से चल रहा था, उनके न रहने से इस आन्दोलन की असामयिक मृत्यु हो गयी।


देश में छतरपुर, झारखंड, उत्तराखंड, जैसे नये राज्य बने। बुन्देलखंड अलग राज्य के लिये जो तर्क दिये गये थे वे हर तरह से वाजिब थे। इससे इस क्षेत्र की संस्कृति का विकास होता। बहरहाल ये सारे निर्णय सरकार द्वारा लिये जाते हैं। झांसी में तीन वर्ष तक पदस्थ रहा, वहां की नदिया जंगल पहाड़ियां, बाँध हमें आकर्षित करते रहे। वहां खूब गर्मी पडती थी लेकिन रात सुहावनी हो जाती थी। पहाड़ दिन में बहुत तपते थे और रात में ठंडे होने लगते थे।

 

उ प्र के दर्जनों जिलो में मेरी पोस्टिंग हुई थी। हर जिले के अपने महत्व और भौगोलिक स्थिति भिन्न थी।  गोरखपुर, महाराजगंज के बाद सबसे ज्यादा याद झांसी की याद आती है। तबादले  हमें जरुर परेशान करते थे लेकिन वे हमारे जीवनानुभव को बढ़ाते हैं। आज इतने वर्षो बाद जब झांसी पर यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो यकीन मानिये एक-एक दृश्य मेरे सामने जीवंत हो रहा है। इस शहर ने  मुझे बहुत कुछ दिया था लेकिन गवाया कम नही था – यह फसाना फिर कभी।



सम्पर्क 


स्वप्निल श्रीवास्तव

510 – अवधपुरी कालोनी – अमानीगंज 

 फैजाबाद – 224001


मोबाईल – 9415332326


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