विवेक कुमार शुक्ल के उपन्यास पर वैभव मणि त्रिपाठी की समीक्षा



एक जमाना था जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र संघ का चुनाव होता था। नवनिर्वाचित प्रतिनिधि बकायदे अपने पद की शपथ लेते थे। इनका काम छात्र छात्राओं की समस्याओं का प्रशासन के साथ मिल बैठ कर समाधान निकालना होता था। ये विश्वविद्यालय/ महाविद्यालय लोकतांत्रिक राजनीति की नर्सरी कहे जाते थे। यहीं पर नवनिर्वाचित प्रतिनिधि राजनीति का ककहरा सीखते थे। लेकिन वह दौर खत्म हुआ और राजनीति की नर्सरी सूख गई। विवेक कुमार शुक्ल अपने उपन्यास में उस दौर को याद करते हुए वह कथानक बुनते हैं जो हमारे समाज का हिस्सा हुआ करता था। हाल ही में विवेक कुमार शुक्ल का नया उपन्यास आया है 'अमरपुर'। इस उपन्यास की एक समीक्षा लिखी है वैभव मणि त्रिपाठी ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विवेक कुमार शुक्ल के उपन्यास पर वैभव मणि त्रिपाठी की समीक्षा 'कोलाहल में सिम्फनी- अमरपुर'।


समीक्षा 

कोलाहल में सिम्फनी – अमरपुर


वैभव मणि त्रिपाठी 


किसी भी रचना की प्रासंगिकता पर बात करें तो वो रचनाएं श्रेष्ठतम की कतार में मानी जाती रही हैं, जिन रचनाओं का वितान बड़ा हुआ करता है। विवेक कुमार शुक्ल का बीते दिनों युवा वाणी से प्रकाशित हुआ उपन्यास ‘अमरपुर’ कालजयी या श्रेष्ठतम है या नहीं, ये तो आने वाला समय बताएगा परंतु इसमें कोई शक नहीं है कि यह रचना कई अर्थों में लीक तोड़ती रचना है और लंबे समय तक पाठक में मन में बसी रहने वाली एक बड़े वितान की रचना है। 

किस्सा-कोताह यह है कि एक मठयुक्त कस्बे-नुमा शहर है जो अभी हालिया सालों तक गांवों से घिरा हुआ था, पर अब अचानक बड़ा हुआ जाता है। इस शहर में एक ‘विषविद्यालय’ ओह माफ कीजिएगा एक विश्वविद्यालय है जो इस कस्बेनुमा शहरी समाज का अक्स बनने में ही अपनी प्रासंगिकता तलाशता हुआ दिखाई देता है। इस विश्वविद्यालय की छात्र–छात्राओं में एक मुखर छात्रा है और एक कोमलमना कवयित्री है। मुखर छात्रा मुग्धा त्रिपाठी सवर्ण है, छात्र संघ का चुनाव लड़ना चाहती है पर लड़ नहीं पाती है। कवयित्री यामिनी उर्फ चिंटू कुमारी, दलित है चुनाव लड़ना नहीं चाहती पर उसे चुनाव लड़ना पड़ता है और इसी विश्वविद्यालय के इसी छात्रसंघ चुनाव की कहानी कहता यह उपन्यास प्रेम, सामंतवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और यौनिकता की पड़ताल अपनी चुटीले संवादों, मारक होने की हद तक तीखे व्यंगयबाणों और कहन के ढंग से करता है। कुछ छात्र नेता हैं जिनको छात्रसंघ चुनावों में इसलिए जीत हासिल करनी है क्योंकि उनके खुद के बच्चे एक-आध सालों में उनके वोटर बन जाने वाले हैं (जी हाँ, ये लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू होने से पहले की कहानी है)। कुछ के भविष्य के लोकसभा, विधानसभा चुनावों में टिकट की कुंजी है छात्रसंघ में अध्यक्ष का पद।    

एक सामान्य कौतूहल इस बात को ले कर हो सकता है कि आजकल जब प्रतिबद्धता का भार ढोते लगभग हर उपन्यास और कहानी में जातिवाद, सांप्रदायिकता, यौनिकता, सामंतवाद और प्रेम की ही छौंक से कथा आगे बढ़ती है तो यह उपन्यास किन अर्थों में अपने समय में लिखे जा रहे बयानों से अलग है या उनकी बनी-बनाई लीक को तोड़ता है। ये आलेख इन्हीं बातों की पड़ताल करेगा। 

सबसे पहली बात कहानी के कालखण्ड की। इस रचना का कालखण्ड इसी सदी के शुरुआती साल हैं, जब विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों के संचालन की गाइड लाइन देने वाली लिंगदोह समिति गठित भी नहीं हुई थी, और छात्रसंघ के चुनावों में ऐसे नेता दिख जाते थे जिन्होंने पी-एच. डी. के बाद एल-एल.बी. से ले कर फल संरक्षण में पीजी डिप्लोमा तक सिर्फ इसी आस में कर डाला था कि अगर एक बार छात्रसंघ का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महामंत्री चुन लिए गए तो वार्ड-पार्षदी से ले कर विधायक तक कहीं ना कहीं, किसी ना किसी पार्टी का टिकट जुगाड़ कर जनप्रतिनिधि बन जाने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। कालखंड का यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि आज तमाम सारे प्रतिबद्ध लेखक और लेखिकाएं वर्तमान के चित्रण और भविष्य की चिंता में लीन हैं, वहीं ‘अमरपुर’ आज से चौथाई सदी पहले के समाज के माध्यम से आज उगे वृक्ष की जड़ें तलाशता दिखाई देता है और कई सारी बीमारियों के शुरुआती लक्षणों पर निर्ममता से उंगली रखता है। उपन्यास का वर्णित कालखण्ड सही अर्थों में आदर्श सैम्पल टेस्टिंग का नमूना है। राजनीतिक रूप से कमंडल और सामाजिक रूप से मण्डल का एक दौर अपनी ढलान पर था, भूमंडलीकरण अपने लोकलुभावन रूप में सामने आ रहा था, पिज्जा-बर्गर से ले कर सिलिकॉन वैली तक सब कुछ ऐसा गड्डमगड्ड हुआ पड़ा था कि जनेऊ धारी पंक्तिपावन ब्राह्मणों के बच्चे बंगलौर में सॉफ्टवेयर की नौकरी, अन्तर्जातीय प्रेम और लिव-इन जैसी सच्चाईयों से राबता बढ़ा रहे थे और गाँव में उनके अभिभावक दिनों-दिन महंगे होते मजदूरों की खोज कर रहे थे। दलित और पिछड़ी जातियाँ ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी’ जैसे नारों से अपनी आवाज बुलंद कर रही थीं, ऐसे में इस उपन्यास से गुजरना एक टाइम ट्रैवल सरीखा अनुभव बन जाता है। 

उपन्यास की दूसरी सबसे बड़ी खासियत उस स्टीरियोटाइप को तोड़ना है जो आजकल के अधिकतर साहित्यकारों ने किसी ब्रह्मवाक्य की तरह अपना लिया है। अन्तर्जातीय प्रेम की कहानियों ने एक ऐसा ईको-सिस्टम बना लिया है जिसमें लगता है कि हर कहानी का उद्देश्य पाठक को येन-केन-प्रकारेण यही विश्वास दिलाना हो गया है कि दलित स्त्रियाँ कमजोर हैं, वे या तो बलात शोषित हो रही हैं या तथाकथित ऊंची जातियों के लड़कों/ पुरुषों द्वारा बहलाई फुसलाई जा रही हैं और हर शोषण को स्वीकार कर रही हैं। कभी-कभी यह लगने लगता है कि विचारधारापरक लेखन ने दलित और पिछड़ी जाति की लड़कियों को सामान्य मनुष्य समझना बन्द कर दिया है, ऐसे सामान्य मनुष्य जो खुश रहते हैं, प्रेम करते हैं और अपने प्रेम को पाने के लिए लड़ते हैं। ऐसा लगता है जैसे दलित स्त्रियों में संघर्ष कर अपने प्रेम को पाने का माद्दा ही नहीं बचा है। बहुत दिनों बाद किसी रचना ने दलित स्त्री पात्र के जुझारू तेवर को रेखांकित किया है। चिंटू कुमारी उर्फ यामिनी के रूप में एक ऐसा दलित स्त्री पात्र हमें देखने को मिलता है जो प्रेरक है और अपने लिए समाज में एक बेहतर जगह तलाशने को प्रतिबद्ध है। खुद को एकदम नई और ताजी कवयित्री कहे जाने पर –“यामिनी उठी। उसे लगा कि वो हनुमान मंदिर के सब्जी मार्केट की लौकी है”, एक युवा कवयित्री जिसे पहली बार बड़ा मंच मिला हो उसके मन में ऐसे भाव आना वाकई उसकी मानसिक शक्ति को इंगित करते हैं। उपन्यास जब समाप्त हो रहा होता है यानि अपने क्लाइमैक्स में चिंटू कुमारी उर्फ यामिनी की एक साधारण सी दिखती बातचीत के आवरण में समवेदनाओं का ज्वालामुखी और उस ज्वालामुखी का ताप पाठक तक पहुंचाते शब्द - लेखक ऐसे चरित्र की रचना और ऐसी भाषा के लिए बधाई का पात्र है। “उसका माथा नहीं चूम सकते, उसकी बाहों में बाहें डाल कर अब शहर में नहीं चल सकते, उसकी चिता को आग नहीं दे सकते। ना मुखाग्नि है, ना उसकी मृत देह से लिपट कर रोने का सौभाग्य! बस ये बाल हैं जो उसको बहुत पसंद थे, यही मुखाग्नि है, यही तर्पण है, यही पिंडदान है मुग्धा का भी और कुमारी यामिनी का भी। आज से इस शरीर का नाम सिर्फ चिंटू है! चिंटू कुमारी! मुग्धा के साथ कुमारी यामिनी भी अब इस दुनिया में नहीं रही”। देश और दुनिया के सभी वंचित-पीड़ित समाजों को ऐसी ही सशक्त नायिकाओं की आवश्यकता है।


विवेक कुमार शुक्ल 


लेखक के पास विकल्प था कि वे एक शहर, एक मठ और एक मठाधीश की पहचान को इतना ब्लर कर देते कि सारे प्रतीक और पहचान गड्डमगड्ड हो जाते, पर लेखक ने बहुत स्पष्ट मार्कर्स और इन्डिकेटर्स के साथ यह कथा हमारे सामने रखी है। मिलते जुलते नामों के प्रयोग और लगभग सच्ची घटनाओं के जिक्र रेफ्रेन्स के रूप में करने से कथा का रस भंग नहीं होता और पाठक को जरूरी संकेत भी मिल जाते हैं। मठ और अभिव्यक्ति के इस पूरे प्रकरण में मुक्तिबोध की पंक्तियाँ बार बार दिमाग में आती हैं, 

“अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे, 

तोड़ने ही होंगे गढ़ और मठ सब”। 

लेखक के खुद के छात्र जीवन के दौरान, देश दुनिया, समाज और विश्वविद्यालयों में जो कुछ हो रहा था उसका व्यापक अनुभव उपन्यास में पात्रों की चिंताओं और उनकी भाषा में खुल कर व्यक्त होता है। लेखक का यह व्यक्तिगत तजुर्बा पात्रों की बोली, भाषा और टिप्पणियों के माध्यम से उपन्यास में पहले पन्ने से मौजूद है। आज के रीलयुग में, जब फ्लैप पढ़ कर, ब्लर्ब देख कर और चैट जीपीटी से सार जान कर किताबों को खारिज और पसंद किया जा रहा है तो ऐसे में उस दौर की पठनीय कहानी कहती किताब, जिस दौर में जिसमें ना मोबाईल फोन थे ना सोशल मीडिया, बहुत सारे युवाओं को मानीखेज किताबों की ओर लौटाने का सामर्थ्य रखती है।

उपन्यास में समय की नब्ज पर उंगली रखती अनेकों पंक्तियाँ है, और लेखक ने वाम-दक्षिण का भेद किए बिना बेहद निर्ममता से हर किसी की कमियों पर उँगलियाँ रखी है और लेखन में तटस्थ बने रहने का प्रयास किया है। “अमरपुर में उन दिनों विचारधारा की कई दुकानें खुली थीं जिनके साइनबोर्डों का पता विश्वविद्यालय की बाहरी दीवारों पर लिखी इबारतों से चलता था”, “जब तक देश के चूल्हों में अकाल है/ सर्वहारा की उम्मीद लाल है लाल है”, “हर दीपावली की रात वह 1008 बार इंटेरनेशनले का जाप करते थे”, “मिश्र जी ने संगठन के कुछ छात्रों को अपने घर रहने की जगह भी दी थी जिसे वो गर्व से अपना सामाजिक योगदान घोषित करते थे। चूंकि घर में सब बराबर थे और सभी को काम करना होता था सो छात्र सफाई करते, खाना बनाते, सौदा सुलुफ़ लाते और मिश्र जी इनको रात के खाने के बाद रूसी क्रांति के बारे में बताने का काम करते”। इन कुछ एक बानगियों से समझ में आता है कि क्यों क्रांति के लिए सबसे उर्वर मानी जाने वाली भूमि पर क्रांति सबसे आखिरी विकल्प भी नहीं बन पाई।    

इसमें शक नहीं कि अमरपुर अपने समय की एक समर्थ और बेहतरीन रचना के रूप में याद की जाएगी, पर कुछ एक जगहों पर लगता है कि यदि लेखक लोभ संवरण कर पाते तो बेहतर होता। पहला मसला किताब का आवरण है। नक्काशीदार बेलबूटेदार हरे अक्षरों में लिखा बेगमपुर (यह तरीका और रंग हमने मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिया है) एक भगवा या नारंगी लकीर से काट दिया जाता है और फिर खून चूने का भाव जगाते अक्षरों में भगवा रंग से लिखा गया अमरपुर (जिसे हिन्दुत्व का प्रतीक माना जाएगा क्योंकि हमने भगवा/ नारंगी रंग हिन्दुत्व को समर्पित कर दिया है) पहली नजर में सांप्रदायिकता का ठीकरा भगवा रंग पर फोड़ते नजर आता है और बहुतों को आकर्षित करता है। पर जब आप उपन्यास पढ़ कर खत्म करते हैं तो ये सारी कसरत बेमानी लगने लगती हैं क्योंकि उपन्यास में सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक राजनीति के कुछ एक रेफरेंस भले हों पर मूल कहानी है जातिवाद और पितृसत्ता से लड़ती दो युवा लड़कियों के आपस में प्रेम की। एक ऐसी रचना जिसने लीक से हट कर कथ्य और तथ्य प्रस्तुत किए हों उस रचना का आवरण बहुत बेहतर और मानीखेज हो सकता था वो भी तब जब लेखक स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि ‘उन दिनों यह मान लिया गया था कि मुसलमान शायर होता है और हिन्दू कवि चाहे वो गजल सुनाए या कविता’।   

जातिवाद और पितृसत्ता से लड़ती दो युवा लड़कियों के प्रेम की इस कथा में कहानी और कहन दोनों में कई सारे प्रयोग तो हैं पर जब जेन्डर विमर्श और एलजीबीटीक्यू समुदाय की जायज मांगें भी इस उपन्यास में समुचित स्वर नहीं पातीं तो पात्रों का समलिंगी प्रेम उपन्यास को हर वर्ग के लिए ग्राह्य बनाने का प्रयास जैसा दिखने लगता है और जस्टिफाई नहीं हो पाता। “हिन्दी फिल्मों में नायिका के साथ छेड़खानी, जिसे कायदन यौन उत्पीड़न कहा जाना चाहिए को ही प्रेम का पहला कदम माना जाता था। सीधे-सादे चरित्र नायिकाओं की शादी में काली शेरवानी पहन कर सैड सॉन्ग गाने के लिए रखे जाते थे”। ऐसी पंक्तियां कह कर लेखक खुद से अपेक्षाएँ बढ़ा देते हैं पर समलैंगिकता जैसे संवेदनशील मुद्दे को पूरी संवेदना से ट्रीट्मेन्ट देने में कहीं-कहीं चूक जाते हैं। खासतौर पर उन जगहों पर जहां नायिकाओं के परस्पर निजी एकांत वार्तालाप में मुग्धा के सवालों के यामिनी उचित जवाब नहीं देती बल्कि इधर उधर की बौद्धिक बातें कर के टाल जाती हैं।      

उपन्यास का विस्तार भी इसे उपन्यास और उपन्यासिका के बीच के ग्रे एरिया में खड़ा कर देता है। एक अच्छी-खासी कहानी, जिसमें समाज की लगभग हर समस्या का जिक्र और रेफरेंस हो उस कहानी को इतनी जल्दी समेटना रचना के साथ न्याय नहीं करता क्योंकि बहुत सी घटनाएं सिर्फ संकेत भर में आगे बढ़ जाती हैं जबकि उनमें विस्तार में जाने की अपार संभावनाएं थीं। उपन्यास पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस हिस्से की कथा कहता है उस हिस्से की स्थानीय भाषा और बोली के बहुत से संवाद शायद क्षेत्रीय जुड़ाव ना रहने पर वैसी प्रभावोत्पादकता ना उत्पन्न कर पाते हों जैसे किसी क्षेत्रीय जुड़ाव वाले पाठक पर करते हैं उदाहरण के लिए “पड़रौना के बउक” यह पद पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाहर बहुत प्रभावी नहीं महसूस होगा पर पूर्वाञ्चल में किसी व्यक्ति के बौद्धिक मूल्यांकन के संदर्भ में खासा असरदार माना जाता है और एक क्षेत्र विशेष के लोगों की बुद्धि पर व्यंग्य के तौर पर प्रयोग किया जाता है। यदि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘सुरक्षा’ को ‘सुरक्शा’ और ‘शिक्षा’ को ‘शिक्शा’ कहने का दौर ना आया होता तो शायद ऐसे बहुत से रेफरेंस उस प्रकार का अर्थ प्रेषित नहीं कर पाते जैसा आज के माहौल में कर पा रहे हैं।  

पर इन छोटी-मोटी कमियों को ध्यान में रखते हुए भी रचना का समग्र मूल्यांकन किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि अमरपुर समय में पीछे जा कर उन प्रवृत्तियों और परिस्थितियों पर उंगली रखता है जिन्हें अनदेखा किए जाने के कारण ही आज हमारा समाज अपने वर्तमान रूप में खड़ा है। रीलयुग के बहुत पहले जब प्रेम करने या प्रेम होने से बड़ा प्रश्न था प्रेम की गोपनीयता का, जब बड़ा प्रश्न था प्रेम में जातीयता का और प्रेम में प्रश्न था प्रेमियों का समाज में मिलने की जुगत लगाने का – उस दौर का टाइम ट्रैवल करवाता अमरपुर कुछ एक हल्के झटकों के साथ बहुत खूबसूरती से यात्रा सम्पन्न करवाता है। ये टाइम ट्रैवल खत्म करते आप खुद से एक बेहतर और संवेदनशील इंसान बनने का वादा करते हैं और मुग्धा, चिंटू कुमारी उर्फ यामिनी और कई सारे पात्र बहुत दूर तक आपके साथ आते हैं और समय समय पर आपको आपका खुद से किया वादा याद दिलाते हैं।


पुस्तक का नाम : अमरपुर 

लेखक : विवेक कुमार शुक्ल

प्रकाशन : वाणी प्रकाशन 

मूल्य :299/- 

कुल पृष्ठ सं : 131


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वैभव मणि त्रिपाठी 


परिचय : 

गोरखपुर में जन्मे और पले-बढ़े वैभव मणि त्रिपाठी, वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हैं और झारखण्ड सरकार की सेवा में हैं। 

पूर्व प्रकाशन : प्रतिष्ठित पत्रिका ‘हंस’ तथा ‘समालोचन’, ‘पहली बार’ और ‘जानकीपुल’ जैसी वेबसाईट में पुस्तक एवं फिल्म समीक्षाएं तथा विज्ञान कथा ‘लोरी’ समेत कुछ एक कहानियाँ पूर्व में प्रकाशित। विज्ञान कथा ‘मद्धिम’ पर भोजपुरी की पहली साइफाई शॉर्ट फिल्म।   



संपर्क :


डूप्लेक्स नं 50, विजया गार्डन, 

बारीडीह, जमशेदपुर 831017


मोबाइल: 9471589300 


ईमेल: vaibhavmani@gmail.com



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