रवि रंजन का आलेख "कोरोना-कालीन यथार्थ और मानवीय संवेदना : संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ "
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| संतोष दीक्षित |
कोरोना महामारी मनुष्यता के लिए एक बड़ी आपदा ले कर आई। सामान्य तौर पर देखा जाए तो इस महामारी ने पूरे समाज को व्यापक तौर पर प्रभावित किया। लेकिन निम्न मध्यम वर्ग, रोजमर्रा का काम करने वाले, किसान और मजदूरों पर इस महामारी का व्यापक असर पड़ा। इसने इन वर्गों की रीढ़ तोड़ कर रख दी। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन लिखते हैं 'महामारी भले ही सार्वभौमिक थी, किन्तु उसके अनुभव वर्ग, पेशा, संसाधन, निवास-स्थान और सामाजिक स्थिति के अनुसार भिन्न थे। एक ओर समाज का वह वर्ग था जो घरों में सुरक्षित रह कर डिजिटल माध्यमों की सहायता से अपने जीवन को अपेक्षाकृत व्यवस्थित बनाए रखने में सक्षम था; दूसरी ओर विशाल श्रमजीवी समुदाय जीविका, भोजन, आवास और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था। इस प्रकार कोरोना-काल ने भारतीय समाज के भीतर विद्यमान वर्गीय, आर्थिक और सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को और अधिक स्पष्ट रूप में सामने ला दिया।' इस महामारी के दौरान मजदूरों का व्यापक पैमाने पर माइग्रेशन हुआ। भारत के विभाजन के बाद इतने व्यापक पैमाने का माइग्रेशन इस महामारी के दौरान ही दिखाई पड़ा। प्रख्यात कथाकार संतोष दीक्षित ने इस कोरोना-काल की पृष्ठभूमि पर एक मार्मिक और विचारोत्तेजक कहानी ‘काल कथा’ लिखी। यह कथा केवल महामारी का वर्णन भर नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में विद्यमान आर्थिक और सामाजिक असमानताओं का भी सशक्त आख्यान है। रवि रंजन ने इस कहानी को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों के हवाले से परखने की एक महत्त्वपूर्ण कोशिश की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख "कोरोना-कालीन यथार्थ और मानवीय संवेदना : संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ "।
"कोरोना-कालीन यथार्थ और मानवीय संवेदना : संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ "
रवि रंजन
संतोष दीक्षित समकालीन हिंदी कथा-साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। उन्होंने कहानी, उपन्यास और व्यंग्य—तीनों विधाओं में उल्लेखनीय लेखन किया है। उनकी रचनात्मक पहचान मुख्यतः ऐसे कथाकार के रूप में स्थापित हुई है जो बदलते भारतीय समाज, उसके अंतर्विरोधों, हाशिये के जीवन, मानवीय संबंधों और सामाजिक यथार्थ को गहरी संवेदनात्मक दृष्टि से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी कहानियों में जीवन के विविध अनुभवों, ग्रामीण-शहरी संक्रमण, सामाजिक विषमता तथा साधारण मनुष्य के संघर्षों का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं— 'आखेट' (1997), 'शहर में लछमिनियाँ' (2001), 'ललस' (2004), 'ईश्वर का जासूस' (2008) तथा धूप में सीधी सड़क' (2014)। व्यंग्य साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। 'बुलडोजर और दीमक' उनकी व्यंग्य रचना है। इसके अतिरिक्त उनके चयनित व्यंग्यों का एक संकलन वर्ष 2022 में प्रकाशित हुआ। उपन्यासकार के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनके उपन्यास 'केलिडोस्कोप' (2010), 'घर बदर' (2020), 'बगलगीर' (2022) 'बैल की आँख' (2023) और 'खलल' (2025) उल्लेखनीय हैं। अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
विदित है कि कोरोना-काल सिर्फ़ एक वैश्विक स्वास्थ्य-संकट नहीं था; उसने आधुनिक समाज की संरचना, उसकी असमानताओं, उसके संबंधों और उसकी संवेदनात्मक सीमाओं को भी अभूतपूर्व ढंग से उजागर किया। इस दौर ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी आपदा का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। महामारी भले ही सार्वभौमिक थी, किन्तु उसके अनुभव वर्ग, पेशा, संसाधन, निवास-स्थान और सामाजिक स्थिति के अनुसार भिन्न थे। एक ओर समाज का वह वर्ग था जो घरों में सुरक्षित रह कर डिजिटल माध्यमों की सहायता से अपने जीवन को अपेक्षाकृत व्यवस्थित बनाए रखने में सक्षम था; दूसरी ओर विशाल श्रमजीवी समुदाय जीविका, भोजन, आवास और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था। इस प्रकार कोरोना-काल ने भारतीय समाज के भीतर विद्यमान वर्गीय, आर्थिक और सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को और अधिक स्पष्ट रूप में सामने ला दिया।
साहित्य ने इस ऐतिहासिक अनुभव को केवल घटनाओं के स्तर पर दर्ज नहीं किया, बल्कि उसके भीतर निहित मानवीय अनुभवों, सामाजिक विडंबनाओं और संवेदनात्मक संकटों को भी अभिव्यक्ति प्रदान की। संतोष दीक्षित की कहानी ‘काल कथा’ इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण रचना है। यह कहानी कोरोना-काल को किसी समाचार-रिपोर्ट या ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि मनुष्यों के जीवन, संबंधों, आशाओं और विघटनशील अनुभवों के माध्यम से उसे समझने का प्रयास करती है। कहानी का केंद्र महामारी नहीं, बल्कि महामारी से घिरा हुआ मनुष्य है—वह मनुष्य जो परिवार, श्रम, स्मृतियों और भविष्य की आशाओं के सहारे कठिन समय को पार करने की कोशिश करता है।
‘काल कथा’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह समकालीन भारतीय समाज की दो समानांतर जीवन-स्थितियों को एक साथ सामने लाती है। एक ओर वह वर्ग है जिसके पास संसाधन, सुरक्षा और विकल्प उपलब्ध हैं; दूसरी ओर वह वर्ग है जिसका जीवन प्रतिदिन के श्रम पर निर्भर है। कहानी इन दोनों संसारों को आमने-सामने रख कर केवल आर्थिक विषमता का चित्रण नहीं करती, बल्कि यह भी दिखाती है कि सामाजिक स्थिति मनुष्य की संवेदनाओं, आशंकाओं और जीवन-अनुभवों को किस प्रकार प्रभावित करती है। फिर भी इसका महत्त्व केवल यहीं तक सीमित नहीं है। यह वर्गीय विभाजन के भीतर भी उन मानवीय भावनाओं को खोज लेती है जो सभी मनुष्यों को एक साझा धरातल पर जोड़ती हैं—परिवार के प्रति लगाव, बच्चों की चिंता, भविष्य की उम्मीद और अपनों के लौट आने की प्रतीक्षा।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो ‘काल कथा’ आधुनिक भारतीय समाज के अनेक पक्षों को उद्घाटित करती है। इसमें शहरी विभाजन, प्रवासी श्रमिकों की स्थिति, परिवार संस्था, शिक्षा, रोजगार, तकनीक, वैश्वीकरण और सामाजिक असमानता जैसे प्रश्न परस्पर जुड़े हुए रूप में उपस्थित हैं। किन्तु इन सबके केंद्र में एक गहरी मानवीय संवेदना सक्रिय है। यही संवेदना कहानी को मात्र सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज़ बनने से बचाती है और उसे ऐसी रचना में रूपांतरित करती है जो अपने समय के इतिहास को मनुष्य के अनुभवों के माध्यम से समझने का अवसर देती है।
वस्तुतः ‘काल कथा’ उस समाज की कथा है जहाँ एक ही समय, एक ही संकट और एक ही तकनीक अलग-अलग सामाजिक समूहों के लिए भिन्न अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। कहानी यह रेखांकित करती है कि सामाजिक संरचनाएँ मनुष्य के जीवन को प्रभावित अवश्य करती हैं, किन्तु प्रेम, करुणा, भय, प्रतीक्षा और आशा जैसी मूल मानवीय संवेदनाएँ उन संरचनाओं के भीतर भी अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं। इसी कारण ‘काल कथा’ का अध्ययन केवल कोरोना-काल के सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए ही नहीं, बल्कि उस मानवीय तत्त्व को पहचानने के लिए भी आवश्यक है जो विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है। यही संवेदना इस कहानी की आत्मा है और यही इस आलेख के चिंतन का केंद्रीय आधार भी।
‘काल कथा’ कोरोना-काल की पृष्ठभूमि में लिखी गई एक मार्मिक और विचारोत्तेजक कहानी है। यह केवल महामारी की कथा नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में विद्यमान आर्थिक और सामाजिक असमानताओं का भी सशक्त आख्यान है। कथाकार एक ऐसे शहर का चित्र प्रस्तुत करता है जो दो हिस्सों में विभाजित है। रेलवे लाइन के इस पार झोपड़पट्टियाँ, अभाव और संघर्ष हैं; उस पार समृद्धि, सुविधाएँ और आधुनिक जीवन का संसार है। यह विभाजन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि दो भिन्न सामाजिक वास्तविकताओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार रेलवे लाइन एक ऐसे प्रतीक में रूपांतरित हो जाती है जो समाज में मौजूद वर्गीय दूरी और असमानता को मूर्त रूप में सामने लाती है।
कहानी का केंद्र दो परिवार हैं—कृष्णा बिंद का परिवार और वासुदेव श्रीवास्तव का परिवार। इन दोनों परिवारों के माध्यम से भारतीय समाज के दो अलग-अलग वर्गों का चित्र उभरता है। कृष्णा बिंद मेहनतकश और निम्नवर्गीय व्यक्ति है, जिसका जीवन प्रतिदिन की कमाई पर निर्भर है। इसके विपरीत वासुदेव श्रीवास्तव शिक्षित, व्यवस्थित और आर्थिक रूप से सुरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। कोरोना का संकट दोनों परिवारों के सामने एक साथ उपस्थित होता है, किन्तु उसके प्रभाव दोनों पर समान नहीं पड़ते। यहीं से कहानी का केंद्रीय अर्थ उद्घाटित होता है कि एक ही ऐतिहासिक संकट का अनुभव सभी वर्गों के लिए एक जैसा नहीं होता।
कथाकार ने मोबाइल फोन का प्रयोग एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में किया है। मोबाइल दोनों परिवारों के पास है। पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है मानो तकनीक ने सामाजिक दूरी को समाप्त कर दिया हो, किन्तु कहानी आगे चल कर इस भ्रम को तोड़ देती है। श्रीवास्तव दंपति विदेश में रहने वाले अपने बेटों से वीडियो कॉल पर बातचीत करते हैं। वे उनके चित्र और वीडियो देख कर प्रसन्न होते हैं तथा भावनात्मक संतोष प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी मोबाइल के माध्यम से पंजाब में फँसे अपने बेटों की कुशलता का समाचार प्राप्त करते हैं। उनके लिए मोबाइल सुख का नहीं, बल्कि चिंता, प्रतीक्षा और असुरक्षा का माध्यम बन जाता है। इस प्रकार एक ही तकनीकी साधन अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों में भिन्न अर्थ ग्रहण करता है।
कहानी में कोरोना और लॉकडाउन का चित्रण भी विशेष ध्यान आकर्षित करता है। बीमारी की शुरुआत भले ही सम्पन्न और वैश्विक संपर्क वाले वर्गों के बीच दिखाई देती हो, किन्तु लॉकडाउन का सबसे गहरा प्रभाव गरीब और श्रमिक वर्ग पर पड़ता है। सम्पन्न लोग अपने घरों में अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। उनके पास बचत, नौकरी और संसाधन उपलब्ध हैं। इसके विपरीत गरीबों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। कृष्णा बिंद को परिवार चलाने के लिए सब्ज़ी बेचनी पड़ती है। वह और उसकी पत्नी दिन-भर कठिन श्रम करते हैं, तब कहीं जा कर घर का खर्च चल पाता है। कहानी इस कठोर यथार्थ को रेखांकित करती है कि भूख का संकट अनेक बार बीमारी के संकट से भी अधिक भयावह हो सकता है।
कृष्णा बिंद का चरित्र कहानी की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। वह मेहनती, जिम्मेदार और परिवार के प्रति गहरे लगाव वाला व्यक्ति है। उसने अपने बच्चों के लिए अनेक सपने देखे हैं। वह चाहता है कि उसके बेटे पढ़-लिख कर उससे बेहतर जीवन जिएँ। वह अपने घर की कच्ची छत को पक्का करवाना चाहता है और परिवार के भविष्य को सुरक्षित देखना चाहता है। किन्तु उसके अधिकांश सपने अधूरे रह जाते हैं। इसका कारण केवल उसकी गरीबी नहीं है। कहानी यह भी संकेत करती है कि शिक्षा-व्यवस्था, अवसरों की असमान उपलब्धता और सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसके जीवन की सीमाएँ निर्धारित करती हैं। परिणामस्वरूप उसके बेटे पढ़ाई बीच में छोड़ कर रोजगार की तलाश में पंजाब चले जाते हैं।
इसके विपरीत श्रीवास्तव परिवार की स्थिति भिन्न है। बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलती है, घर में अध्ययन का वातावरण उपलब्ध है और संसाधनों का अभाव नहीं है। परिणामस्वरूप दोनों बेटे विदेशों में अच्छे पदों तक पहुँच जाते हैं। यहाँ कथाकार एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथ्य की ओर संकेत करता है—सफलता सिर्फ़ व्यक्तिगत मेहनत का नतीजा नहीं होती; अवसर, संसाधन और सामाजिक पूँजी भी उसके निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
कहानी का शीर्षक ‘काल कथा’ भी विशेष अर्थवत्ता से युक्त है। कथाकार समय को एक सतत प्रवाह के रूप में देखता है और कथा उसी प्रवाह के भीतर विकसित होती है। कहानी यह दिखाती है कि समय सबके लिए समान नहीं होता। कोरोना का वही समय श्रीवास्तव परिवार के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर अनुभव का समय है। वे घर में रह कर काम कर सकते हैं और अपने बच्चों से निरंतर संपर्क बनाए रख सकते हैं। दूसरी ओर वही समय कृष्णा बिंद के लिए चिंता, भूख, असुरक्षा और अनिश्चितता का पर्याय बन जाता है। इस प्रकार कहानी समय के सामाजिक अनुभव को वर्गीय संदर्भों से जोड़ती है।
प्रवासी मजदूरों का प्रसंग कहानी को और अधिक मार्मिक बना देता है। अजय और विजय का परिवार सहित घर लौटना उस दौर की एक व्यापक राष्ट्रीय त्रासदी को सामने लाता है। लाखों प्रवासी मजदूरों की तरह वे भी अपने घर की ओर लौटने के लिए विवश हो जाते हैं। उनके माता-पिता निरंतर उनकी चिंता में डूबे रहते हैं। मोबाइल की प्रत्येक घंटी उनके भीतर आशा और भय—दोनों भावों को एक साथ जगाती है। यहाँ कहानी किसी एक परिवार की निजी कथा नहीं रह जाती; वह पूरे देश के प्रवासी श्रमिक समुदाय की सामूहिक पीड़ा का प्रतिनिधित्व करने लगती है।
कहानी का अंतिम भाग सबसे अधिक प्रभावशाली है। एक ओर श्रीवास्तव परिवार अपने बेटे के घर लौटने की खुशी में डूबा हुआ है, तो दूसरी ओर कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी भी अपने बेटों तथा पोतों के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों परिवारों के जीवन में आशा का वातावरण है। किन्तु अचानक परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। फोन पर यह सूचना मिलती है कि सड़क दुर्घटना में पोते की मृत्यु हो गई है। यह समाचार पाठक को भीतर तक झकझोर देता है। यह केवल एक बच्चे की मृत्यु नहीं है; यह उन सपनों, आकांक्षाओं और उम्मीदों का विघटन भी है जिनके सहारे कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी कठिन समय में जी रहे थे।
कहानी की भाषा सरल, संप्रेषणीय और जीवन के अत्यंत निकट है। कथाकार ने लोकभाषा तथा बोलचाल के शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग किया है, जिससे पात्रों की दुनिया अधिक सजीव और विश्वसनीय बन जाती है। संवाद अपेक्षाकृत छोटे हैं, किन्तु उनमें जीवन का दर्द, आत्मीयता और अनुभव की सघनता मौजूद है। कथा में करुणा, विडंबना और यथार्थ का संतुलित संयोजन दिखाई देता है।
‘काल कथा’ हमारे समय की एक महत्त्वपूर्ण कहानी है। यह कोरोना-काल की घटनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं को उजागर करती है। कहानी यह रेखांकित करती है कि संकट सबके लिए एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग उसे अपेक्षाकृत सुरक्षित परिस्थितियों में झेल लेते हैं, जबकि कुछ लोगों के लिए वह जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन जाता है। कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव के परिवारों के माध्यम से संतोष दीक्षित ने भारतीय समाज के दो चेहरों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने रखा है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
‘काल कथा’ का मूल पाठ अनेक स्तरों पर अर्थ-संभावनाएँ निर्मित करता है। इसलिए इसे किसी एक आलोचनात्मक दृष्टि तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। फिर भी मार्क्सवादी दृष्टि से इसका अध्ययन विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कहानी का केंद्रीय सरोकार वर्गीय असमानता, श्रम, संसाधनों के असमान वितरण और सामाजिक विषमता से जुड़ा हुआ है। इस दृष्टि से पढ़े जाने पर यह कहानी समकालीन भारतीय समाज की वर्ग-संरचना का एक प्रभावशाली आख्यान बन कर सामने आती है।
मार्क्सवादी आलोचना का मूल आग्रह यह है कि साहित्यिक कृतियों को उनके सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में समझा जाए। समाज की वर्ग-संरचना, उत्पादन-संबंध, श्रम, पूँजी, शोषण और सत्ता इसके प्रमुख विश्लेषण-बिंदु होते हैं। ‘काल कथा’ इन सभी प्रश्नों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने कथानक में समाहित करती है। कहानी यह स्पष्ट करती है कि आर्थिक असमानता केवल आय का अंतर नहीं होती; वह जीवन के अवसरों, सुरक्षा, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की संभावनाओं को भी प्रभावित करती है।
कहानी के आरंभ में शहर का जो भूगोल प्रस्तुत किया गया है, वह मार्क्सवादी विश्लेषण की दृष्टि से अत्यंत अर्थपूर्ण है। रेलवे लाइन के एक ओर झोपड़पट्टियाँ, कूड़े के ढेर और श्रमिक जीवन है, जबकि दूसरी ओर चौड़ी सड़कें, बहुमंज़िली इमारतें, हवाई अड्डा और सम्पन्न वर्ग का संसार है। यह विभाजन केवल स्थानगत नहीं है; यह वर्गीय संरचना का दृश्य रूप है। कथाकार जब इस पार की बस्ती को ‘अश्वेतों’ और उस पार की बस्ती को ‘श्वेतों’ का संसार कहता है, तब वह वस्तुतः आर्थिक शक्ति और वंचना के बीच मौजूद दूरी को रेखांकित कर रहा होता है। यहाँ शहर का भूगोल वर्ग-संबंधों के भूगोल में रूपांतरित हो जाता है।
कहानी के दो केंद्रीय पात्र—कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव—व्यक्तिगत चरित्रों से अधिक सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं। कृष्णा बिंद श्रमजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। उसका जीवन प्रत्यक्ष शारीरिक श्रम पर आधारित है। वह कभी ठेला खींचता है, कभी सब्ज़ी बेचता है और कभी अन्य श्रमकार्य करता है। उसकी जीविका पूरी तरह श्रम पर निर्भर है। इसके विपरीत वासुदेव श्रीवास्तव उस मध्यवर्गीय-उच्च मध्यवर्गीय तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने शिक्षा, नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा के माध्यम से आर्थिक स्थिरता अर्जित कर ली है। कहानी इन दोनों जीवन-स्थितियों को समानांतर रख कर यह दिखाती है कि वर्गीय स्थिति मनुष्य के जीवन की दिशा और संभावनाओं को किस प्रकार प्रभावित करती है।
मार्क्सवादी आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न अवसरों की असमानता से जुड़ा है। ‘काल कथा’ इस प्रश्न को अत्यंत संवेदनशील ढंग से उठाती है। कृष्णा बिंद अपने बेटों को पढ़ाना चाहता है। वह चाहता है कि वे उसके जीवन से बेहतर जीवन जिएँ। लेकिन उसके पास न गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सुविधा है, न पर्याप्त संसाधन और न ऐसा सामाजिक परिवेश जो बच्चों की प्रगति में सहायक हो। दूसरी ओर श्रीवास्तव परिवार अपने बच्चों को बेहतर विद्यालय, अतिरिक्त शैक्षिक सहयोग और प्रतिस्पर्धी वातावरण उपलब्ध कराता है। परिणामस्वरूप उनके बच्चे वैश्विक श्रम-बाज़ार का हिस्सा बन जाते हैं। यहाँ कहानी यह मिथक तोड़ती है कि सफलता केवल व्यक्तिगत परिश्रम का परिणाम होती है। वह संकेत करती है कि सामाजिक और आर्थिक पूँजी भी सफलता के निर्माण में उतनी ही निर्णायक भूमिका निभाती है।
कोरोना-काल कहानी में वर्गीय विषमता को और अधिक स्पष्ट कर देता है। महामारी जैविक स्तर पर सभी मनुष्यों को प्रभावित कर सकती है, किन्तु उसके सामाजिक परिणाम समान नहीं होते। सम्पन्न वर्ग अपने घरों में अपेक्षाकृत सुरक्षित है। उसके पास बचत है, स्थायी आय है और घर से काम करने की सुविधा है। इसके विपरीत श्रमिक वर्ग के लिए लॉकडाउन का अर्थ है—बेरोज़गारी, भूख और असुरक्षा। मार्क्सवादी दृष्टि के अनुसार संकट की घड़ियाँ समाज की वास्तविक वर्ग-संरचना को उजागर कर देती हैं। ‘काल कथा’ इसी यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है।
कहानी में श्रम की केंद्रीयता विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। कृष्णा बिंद का पूरा अस्तित्व श्रम से निर्मित है। वह लगातार काम करता है और उसकी पत्नी भी श्रम में सहभागी है। उनके जीवन में विश्राम का कोई स्थायी स्थान नहीं है। दूसरी ओर श्रीवास्तव परिवार का श्रम मुख्यतः बौद्धिक और तकनीकी प्रकृति का है। मार्क्सवादी दृष्टि इस अंतर को केवल पेशागत भिन्नता नहीं मानती, बल्कि उत्पादन-संबंधों की संरचना से जोड़ कर देखती है। कहानी यह संकेत करती है कि शारीरिक श्रम पर निर्भर वर्ग अधिक असुरक्षित है, जबकि ज्ञान और तकनीक से जुड़ा वर्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित जीवन जीने में सक्षम है।
मोबाइल का प्रसंग भी मार्क्सवादी दृष्टि से विशेष अर्थ ग्रहण करता है। पहली नज़र में लगता है कि तकनीक ने वर्गीय दूरी को कम कर दिया है। मोबाइल अमीर के पास भी है और गरीब के पास भी। किन्तु कहानी यह दिखाती है कि तकनीकी साधनों की उपलब्धता और उनके सामाजिक अर्थ एक नहीं होते। श्रीवास्तव परिवार के लिए मोबाइल वैश्विक संपर्क, सुविधा और आत्मसंतोष का माध्यम है, जबकि कृष्णा बिंद के लिए वही मोबाइल भय, चिंता और प्रतीक्षा का साधन बन जाता है। यहाँ कहानी यह संकेत करती है कि तकनीकी आधुनिकता अपने आप सामाजिक समानता स्थापित नहीं कर सकती। वर्गीय अंतर तकनीकी समानता के भीतर भी विद्यमान रहते हैं।
कहानी में प्रवासी मजदूरों का प्रसंग मार्क्सवादी विश्लेषण का एक और महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। अजय और विजय का पंजाब जाना इस तथ्य को उजागर करता है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था उन्हें सम्मानजनक जीवन उपलब्ध नहीं करा सकी। उन्हें अपनी श्रम-शक्ति बेचने के लिए घर से दूर जाना पड़ता है। वे उस विशाल श्रमिक समुदाय का हिस्सा हैं जो पूँजीवादी उत्पादन-व्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरित होता रहता है। कोरोना-काल में उद्योगों और कारखानों के बंद होते ही यही वर्ग सबसे पहले संकटग्रस्त हो जाता है। मजदूरी समाप्त हो जाती है, रोजगार छिन जाता है और श्रमिकों को अपने घरों की ओर लौटने के लिए विवश होना पड़ता है। यह प्रसंग पूँजी और श्रम के बीच मौजूद असमान संबंधों को अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने लाता है।
कहानी का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष राज्य की उपस्थिति से जुड़ा है। यद्यपि राज्य प्रत्यक्ष रूप से कथा के केंद्र में नहीं है, फिर भी राशन, लॉकडाउन, पुलिस, प्रवासी मजदूरों की आवाजाही और सरकारी व्यवस्थाओं के माध्यम से उसकी उपस्थिति निरंतर बनी रहती है। गरीब पात्रों के जीवन में राज्य प्रायः राहत की अपेक्षा नियंत्रण और असुरक्षा के रूप में अधिक दिखाई देता है। हरियाणा सीमा पर मजदूरों को उतार दिया जाना इसी विडंबना की ओर संकेत करता है। मार्क्सवादी आलोचना राज्य को अक्सर ऐसी संस्था के रूप में देखती है जो प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों की रक्षा करती है। कहानी इस विचार को प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त नहीं करती, किन्तु घटनाओं के माध्यम से उसका संकेत अवश्य करती है।
कहानी का अंतिम भाग मार्क्सवादी दृष्टि से सबसे अधिक अर्थपूर्ण है। दोनों परिवार अपने बच्चों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों के भीतर आशा है। किन्तु परिणाम समान नहीं हैं। श्रीवास्तव परिवार का बेटा सुरक्षित लौट आता है, जबकि कृष्णा बिंद के हिस्से में पोते की मृत्यु का समाचार आता है। यह अंतर केवल व्यक्तिगत संयोग नहीं लगता। पूरी कथा-रचना इस निष्कर्ष की ओर संकेत करती है कि वर्गीय स्थिति जीवन की संभावनाओं और जोखिमों को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है। सम्पन्न वर्ग के पास सुरक्षा के साधन अधिक हैं, जबकि श्रमिक वर्ग निरंतर असुरक्षा और जोखिम के बीच जीवन बिताता है।
इस प्रकार ‘काल कथा’ केवल कोरोना-काल का वृत्तांत नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना का उद्घाटन करती है जिसमें श्रम करने वाला वर्ग सबसे अधिक संकट झेलता है और संसाधनों पर अधिकार रखने वाला वर्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है। कहानी यह रेखांकित करती है कि आर्थिक विषमता केवल धन का अंतर नहीं है; वह शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की संभावनाओं का भी अंतर है। कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव के समानांतर जीवन के माध्यम से संतोष दीक्षित ने वर्गीय विषमता, श्रमजीवी जीवन की विडंबनाओं और सामाजिक असमानता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। इसी कारण ‘काल कथा'’ को समकालीन हिंदी कहानी में वर्गीय यथार्थ की एक महत्त्वपूर्ण रचना के रूप में देखा जा सकता है।
समाजशास्त्रीय आलोचना किसी साहित्यिक कृति को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि समाज की संरचना, संबंधों, मूल्यों और अंतर्विरोधों के प्रतिबिंब के रूप में भी देखती है। उसका उद्देश्य यह समझना होता है कि किसी रचना में समाज की संस्थाएँ, वर्ग-संबंध, सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ और परिवर्तनशील जीवन-स्थितियाँ किस प्रकार अभिव्यक्त हुई हैं। इस दृष्टि से संतोष दीक्षित की ‘काल कथा'’ समकालीन भारतीय समाज का एक संवेदनशील और बहुआयामी आख्यान है। यद्यपि इसकी पृष्ठभूमि कोरोना-काल है, किन्तु इसका वास्तविक सरोकार उन सामाजिक संरचनाओं से है जो संकट के समय अधिक स्पष्ट रूप में सामने आती हैं। इसीलिए यह कहानी केवल महामारी का वृत्तांत नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज का एक महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्रीय पाठ भी है।
कहानी का आरंभ जिस शहर के वर्णन से होता है, वह समाजशास्त्रीय दृष्टि से विशेष अर्थवत्ता रखता है। शहर दो हिस्सों में विभाजित दिखाई देता है। रेलवे लाइन के इस पार झोपड़पट्टियाँ, कूड़े के ढेर और श्रमिक जीवन है; उस पार चौड़ी सड़कें, बहुमंज़िली इमारतें और सम्पन्न वर्ग का संसार। यह विभाजन केवल भौगोलिक नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचना का भी संकेतक है। समाजशास्त्र यह मानता है कि शहर केवल एक भौतिक इकाई नहीं होता; वह विभिन्न वर्गों, पेशों और जीवन-शैलियों का जटिल संगठन होता है। ‘काल कथा’ का शहर इसी यथार्थ को मूर्त रूप देता है। एक ही नगर में रहने वाले लोग अलग-अलग सामाजिक संसारों में जीवन व्यतीत करते हैं। भौगोलिक निकटता के बावजूद उनके अनुभवों और अवसरों में गहरा अंतर बना रहता है।
कहानी आधुनिक शहरीकरण की प्रक्रिया पर भी विचार करने का अवसर प्रदान करती है। सामान्यतः शहर को विकास और आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है, किन्तु कहानी यह दिखाती है कि विकास के लाभ समान रूप से वितरित नहीं होते। एक वर्ग को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बेहतर जीवन-सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जबकि दूसरा वर्ग बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत है। इस प्रकार कहानी शहरी विकास के भीतर निहित असमानताओं को उजागर करती है और यह संकेत देती है कि आधुनिकता के साथ सामाजिक दूरी भी बढ़ सकती है।
परिवार संस्था का चित्रण कहानी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समाजशास्त्र में परिवार को सबसे मूल सामाजिक संस्था माना जाता है, क्योंकि व्यक्ति के प्रारंभिक संस्कार, संबंध और भावनात्मक संरचना का निर्माण यहीं होता है। ‘काल कथा’ में दो परिवारों के माध्यम से भारतीय परिवार व्यवस्था के दो भिन्न रूप सामने आते हैं। कृष्णा बिंद का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है, किन्तु भावनात्मक रूप से अत्यंत सघन और आत्मीय है। दूसरी ओर श्रीवास्तव परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न है, पर उसके सदस्य भौगोलिक रूप से बिखरे हुए हैं। दोनों परिवारों में बच्चों के प्रति प्रेम और लगाव मौजूद है, किन्तु उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रूपों में होती है। कहानी यह स्पष्ट करती है कि आर्थिक स्थिति परिवार की जीवन-शैली को प्रभावित कर सकती है, किन्तु पारिवारिक संबंधों की भावनात्मक आवश्यकता सभी वर्गों में बनी रहती है।
पीढ़ियों के संबंधों का चित्रण भी कहानी में उल्लेखनीय है। कृष्णा बिंद अपने बेटों के लिए बेहतर भविष्य का सपना देखता है। सीमित संसाधनों के बावजूद वह उन्हें पढ़ाने का प्रयास करता है। इसी प्रकार श्रीवास्तव दंपति भी अपने बच्चों की सफलता के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं। इससे यह तथ्य सामने आता है कि भारतीय समाज में परिवार अभी भी सामाजिक गतिशीलता का एक प्रमुख माध्यम है। माता-पिता अपनी अगली पीढ़ी के माध्यम से बेहतर जीवन की आकांक्षा करते हैं। हालाँकि कहानी यह भी दिखाती है कि सभी परिवारों को अपने सपनों को साकार करने के समान अवसर उपलब्ध नहीं होते।
प्रवासन कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्रीय पक्ष है। अजय और विजय का पंजाब जाना केवल रोजगार की तलाश नहीं है; यह उस व्यापक सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें निम्नवर्गीय और श्रमजीवी लोग जीविका के लिए अपने घरों से दूर जाने को विवश होते हैं। आधुनिक भारत की आर्थिक संरचना में प्रवासन एक केंद्रीय तत्त्व बन चुका है। कहानी यह दिखाती है कि प्रवासी श्रमिक उद्योगों और शहरों के लिए आवश्यक हैं, किन्तु संकट की घड़ी में सबसे पहले वही असुरक्षित हो जाते हैं। कोरोना-काल में लाखों मजदूरों की वापसी ने भारतीय समाज की अनेक विसंगतियों को उजागर किया था। ‘काल कथा’ इसी ऐतिहासिक अनुभव को मानवीय संवेदना के साथ रूपायित करती है।
शिक्षा का प्रश्न भी कहानी में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रूप से उपस्थित है। कृष्णा बिंद अपने बेटों को विद्यालय भेजता है, किन्तु शिक्षा उनके लिए सामाजिक उन्नति का प्रभावी माध्यम नहीं बन पाती। दूसरी ओर श्रीवास्तव परिवार के बच्चे बेहतर शैक्षिक अवसरों के सहारे वैश्विक स्तर पर सफलता प्राप्त करते हैं। यहाँ कहानी शिक्षा की सामाजिक भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाती है। समाजशास्त्र यह मानता है कि शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का माध्यम बन सकती है, किन्तु जब उसकी गुणवत्ता और उपलब्धता वर्गानुसार विभाजित हो, तब वह असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें पुनरुत्पादित भी कर सकती है। कहानी इसी यथार्थ की ओर संकेत करती है।
रोज़गार और श्रम का प्रश्न भी कहानी के केंद्र में है। कृष्णा बिंद का जीवन असंगठित क्षेत्र के श्रम पर आधारित है। उसकी आय अनिश्चित है और उसके पास किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत श्रीवास्तव परिवार के बच्चे ऐसे पेशों से जुड़े हैं जहाँ घर से काम करने की सुविधा उपलब्ध है। महामारी के दौरान यह अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह आधुनिक श्रम-बाज़ार की असमान संरचना का द्योतक है। एक वर्ग ज्ञान और तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, जबकि दूसरा वर्ग प्रत्यक्ष शारीरिक श्रम पर निर्भर है।
कहानी तकनीक और समाज के संबंधों को भी सूक्ष्मता से उद्घाटित करती है। मोबाइल दोनों परिवारों के पास है। सतही दृष्टि से यह तकनीकी लोकतंत्रीकरण का संकेत प्रतीत हो सकता है, किन्तु कहानी इसके सामाजिक आयामों को भी उजागर करती है। श्रीवास्तव परिवार के लिए मोबाइल सुविधा, मनोरंजन और वैश्विक संपर्क का माध्यम है, जबकि कृष्णा बिंद के लिए वही चिंता, प्रतीक्षा और असुरक्षा का वाहक बन जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि किसी तकनीक का प्रभाव केवल उसकी उपलब्धता से निर्धारित नहीं होता; उसके सामाजिक उपयोग और संदर्भ भी उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं।
सामाजिक सुरक्षा और असुरक्षा का प्रश्न भी कहानी में बार-बार उभरता है। महामारी के दौरान सम्पन्न वर्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित है। उसके पास बचत, संसाधन और वैकल्पिक व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं। दूसरी ओर गरीब वर्ग को प्रतिदिन श्रम करके जीविका अर्जित करनी पड़ती है। इस अंतर से समाज में विद्यमान संरचनात्मक असमानता स्पष्ट होती है। समाजशास्त्र ऐसे ही अंतरों को सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया से जोड़कर देखता है।
महिलाओं की भूमिका भी कहानी में उल्लेखनीय है। सुंदरी देवी केवल गृहस्थी संभालने वाली स्त्री नहीं हैं; वे परिवार की आर्थिक और भावनात्मक संरचना का भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। संकट की स्थिति में वे निर्णय लेती हैं, सलाह देती हैं और परिवार को मानसिक रूप से संभालती हैं। इसी प्रकार श्रीमती श्रीवास्तव भी परिवार को जोड़ कर रखने वाली केंद्रीय शक्ति के रूप में उपस्थित हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परिवारों में महिलाओं की भूमिका घरेलू दायित्वों तक सीमित नहीं है; वे भावनात्मक स्थिरता और सामाजिक संतुलन की भी वाहक हैं।
कहानी सामाजिक गतिशीलता की आकांक्षा को भी रेखांकित करती है। कृष्णा बिंद चाहता है कि उसके बच्चे उससे बेहतर जीवन जिएँ। दूसरी ओर श्रीवास्तव अपने बच्चों को वैश्विक स्तर तक पहुँचाने में सफल होते हैं। दोनों स्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि आधुनिक समाज में व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति को बदलने की आकांक्षा रखता है। किन्तु यह परिवर्तन सभी के लिए समान रूप से संभव नहीं होता। किसी के लिए यह अपेक्षाकृत सहज है, तो किसी के लिए संघर्षपूर्ण और अनिश्चित।
कहानी का अंत समाजशास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत अर्थपूर्ण है। एक ही समय में दो परिवार अपने बच्चों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दोनों के भीतर आशा और उत्सुकता है। किन्तु एक परिवार को सुखद समाचार मिलता है, जबकि दूसरे को मृत्यु का। यह केवल व्यक्तिगत घटना नहीं है; इसके पीछे वे सामाजिक परिस्थितियाँ भी सक्रिय हैं जिन्होंने एक परिवार को सुरक्षा प्रदान की और दूसरे को जोखिमपूर्ण प्रवास के लिए विवश किया। इस प्रकार निजी दुःख भी सामाजिक संरचना से जुड़ जाता है।
‘काल कथा’ आधुनिक भारतीय समाज की अनेक परतों को उद्घाटित करती है। इसमें वर्गीय असमानता, शहरीकरण, प्रवासन, परिवार, शिक्षा, रोजगार, तकनीक, सामाजिक सुरक्षा और मानवीय संबंधों के प्रश्न परस्पर जुड़े हुए रूप में उपस्थित हैं। कहानी किसी समाजशास्त्रीय सिद्धांत की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं करती, किन्तु अपने पात्रों और घटनाओं के माध्यम से उस समाज का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है जिसमें हम रह रहे हैं। यही कारण है कि इसे समकालीन भारतीय समाज का एक प्रामाणिक समाजशास्त्रीय पाठ माना जा सकता है।
यथार्थवादी दृष्टि साहित्य को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों, सामाजिक संबंधों और मानवीय अनुभवों के आधार पर समझती है। इस दृष्टि का मूल आग्रह यह है कि रचना जीवन को उसकी जटिलताओं, संघर्षों, अंतर्विरोधों और वास्तविक परिस्थितियों सहित प्रस्तुत करे। संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ इस कसौटी पर एक उल्लेखनीय कहानी सिद्ध होती है। कोरोना-काल की पृष्ठभूमि में रचित यह कहानी उस समय के सामाजिक जीवन, आर्थिक संकट, प्रवासी श्रमिकों की पीड़ा और वर्गीय विषमता का ऐसा चित्र प्रस्तुत करती है जो पाठक को अपने ही समय और समाज का विश्वसनीय प्रतिबिंब प्रतीत होता है। इसमें न तो यथार्थ को अनावश्यक रूप से नाटकीय बनाया गया है और न ही करुणा उत्पन्न करने के लिए कृत्रिम भावुकता का सहारा लिया गया है। कथा का यथार्थ स्वाभाविक रूप से विकसित होता है और इसी कारण उसका प्रभाव अधिक गहरा बन जाता है।
यथार्थवादी दृष्टि से कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका आधार किसी असाधारण नायक या चमत्कारिक घटना पर नहीं, बल्कि साधारण मनुष्यों के जीवन पर टिका है। कोरोना महामारी निश्चय ही एक असाधारण ऐतिहासिक घटना थी, किन्तु कहानी का केंद्र महामारी की चिकित्सकीय भयावहता नहीं है। उसका ध्यान उन लोगों के जीवन पर है जिनके लिए महामारी से भी बड़ा संकट जीविका का था। कथाकार कोरोना को मुख्यतः एक सामाजिक अनुभव के रूप में देखता है। इसलिए कहानी में अस्पतालों, दवाओं और संक्रमण की अपेक्षा भूख, बेरोज़गारी, प्रवास और पारिवारिक चिंता अधिक प्रमुख हो कर सामने आते हैं। यही दृष्टिकोण कहानी को मजबूत यथार्थवादी आधार प्रदान करता है।
कहानी का आरंभ जिस शहर के चित्रण से होता है, वह भी यथार्थवादी लेखन का उत्कृष्ट उदाहरण है। नगर का वर्णन किसी रोमानी या आदर्शवादी दृष्टि से नहीं किया गया। वहाँ झोपड़पट्टियाँ हैं, कूड़े के ढेर हैं, जलकुंभियों से भरे गड्ढे हैं और उनके समानांतर विकसित शहरी क्षेत्र भी है। यह वही सामाजिक यथार्थ है जो भारत के अधिकांश नगरों में दिखाई देता है। कथाकार किसी काल्पनिक आदर्श नगर की रचना नहीं करता, बल्कि वास्तविक भारतीय शहर की संरचना को सामने रखता है। परिणामतः पाठक को लगता है कि यह केवल किसी एक नगर की नहीं, बल्कि समकालीन भारत के अनेक शहरों की कहानी है।
यथार्थवादी लेखन की एक प्रमुख विशेषता यह मानी जाती है कि उसके पात्र जीवन से उठाए हुए लगें। ‘काल कथा’ के पात्र इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। कृष्णा बिंद कोई असाधारण नायक नहीं है। वह एक साधारण श्रमिक है, जिसकी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ भी साधारण हैं। वह चाहता है कि उसके बच्चे सम्मानजनक जीवन जिएँ, घर की छत पक्की हो जाए और परिवार सुरक्षित बना रहे। उसके सपनों में कोई असाधारण महत्त्वाकांक्षा नहीं है। यही साधारणता उसे विश्वसनीय बनाती है। पाठक उसके भीतर अपने आस पास के असंख्य श्रमिकों की छवि देख सकता है।
सुंदरी देवी का चरित्र भी इसी यथार्थ का हिस्सा है। वह बच्चों की चिंता करती है, घर की जिम्मेदारियाँ निभाती है और संकट की घड़ी में व्यावहारिक निर्णय लेने की क्षमता भी रखती है। उसकी आशाएँ, भय और दुःख किसी साहित्यिक आदर्श से नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से निर्मित हुए हैं। इसी प्रकार वासुदेव श्रीवास्तव और उनकी पत्नी भी जीवन से उठाए गए पात्र प्रतीत होते हैं। वे सम्पन्न हैं, शिक्षित हैं और अपने बच्चों की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, किन्तु कथाकार उन्हें खलनायक के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। यथार्थवादी साहित्य की यही विशेषता है कि वह पात्रों को अच्छाई और बुराई के सरल खाँचों में विभाजित नहीं करता।
कहानी में यथार्थ के आर्थिक पहलू का चित्रण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लॉकडाउन के बाद कृष्णा बिंद को सब्ज़ी बेचने का काम करना पड़ता है। वह प्रतिदिन मंडी जाता है, ठेला लगाता है और दिन-भर परिश्रम करके सीमित आय अर्जित करता है। यह विवरण केवल सूचना भर नहीं है; यह उस श्रमिक जीवन की वास्तविकता को उद्घाटित करता है जिसमें रोज़ की आय ही अस्तित्व का आधार होती है। जैसे ही काम रुकता है, संकट सामने खड़ा हो जाता है। कोरोना-काल में करोड़ों लोगों ने इसी स्थिति का सामना किया था। कहानी इस सामूहिक अनुभव को अत्यंत विश्वसनीय ढंग से रूपायित करती है।
यथार्थवादी दृष्टि से कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष प्रवासी मजदूरों का चित्रण है। कोरोना-काल की सबसे बड़ी सामाजिक घटनाओं में लाखों मजदूरों का अपने घरों की ओर लौटना शामिल था। ‘काल कथा’ इस घटना को समाचार या आँकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक परिवार की त्रासदी के रूप में प्रस्तुत करती है। अजय और विजय का घर लौटने का निर्णय पूरी तरह वास्तविक परिस्थितियों से उत्पन्न होता है। फैक्ट्री बंद है, रोजगार समाप्त हो चुका है और भविष्य अनिश्चित है। ऐसी स्थिति में घर लौटना उनके लिए विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी बन जाता है। यही कारण है कि यह प्रसंग केवल व्यक्तिगत कथा न रहकर एक ऐतिहासिक यथार्थ का प्रतिनिधित्व करने लगता है।
कहानी में मोबाइल का प्रयोग भी यथार्थवादी ढंग से किया गया है। आज के सामाजिक जीवन में मोबाइल एक अनिवार्य वस्तु बन चुका है। कथाकार इसे मात्र तकनीकी उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करता है। कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी के लिए बच्चों की आवाज़ सुन लेना ही मानसिक सहारा बन जाता है। संपर्क टूटते ही उनकी बेचैनी बढ़ जाती है। यह अनुभव कोरोना-काल में असंख्य परिवारों का अनुभव था। इसलिए कहानी का यह पक्ष भी जीवन के अत्यंत निकट प्रतीत होता है।
यथार्थवादी साहित्य में वातावरण-निर्माण का विशेष महत्त्व होता है। ‘काल कथा’ में कोरोना-काल का वातावरण बड़ी स्वाभाविकता के साथ निर्मित हुआ है। लॉकडाउन, बंद बाज़ार, बेरोज़गारी, राशन की चिंता, पुलिस का भय, घर लौटते मजदूर और लगातार आती खबरें—ये सभी तत्व मिल कर उस समय की सामाजिक मनःस्थिति को सजीव बना देते हैं। कहानी पढ़ते समय पाठक केवल घटनाओं का अनुक्रम नहीं देखता, बल्कि उस दौर की सामूहिक बेचैनी और असुरक्षा को भी महसूस करता है।
कहानी की भाषा भी उसकी यथार्थवादी शक्ति को सुदृढ़ करती है। संवादों में लोकभाषा और बोलचाल की अभिव्यक्तियों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। पात्र अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप बोलते हैं। कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी की भाषा उनके जीवन-संसार से निकली हुई प्रतीत होती है। यही कारण है कि संवाद बनावटी नहीं लगते और कथा का परिवेश अधिक विश्वसनीय बन जाता है। यथार्थवादी साहित्य में भाषा की यह स्वाभाविकता अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि वही पात्रों और परिस्थितियों को जीवंत बनाती है।
कहानी के अंत को भी यथार्थवादी दृष्टि से समझा जाना चाहिए। पोते की मृत्यु का समाचार किसी रहस्य, संयोगपूर्ण चमत्कार या नाटकीय मोड़ का नतीजा नहीं है। वह उस असुरक्षित सामाजिक स्थिति का परिणाम है जिसमें प्रवासी मजदूरों को लंबी और जोखिमपूर्ण यात्राएँ करनी पड़ रही थीं। कोरोना-काल में ऐसी अनेक दुर्घटनाएँ वास्तव में हुई थीं। इसलिए कहानी का अंत पाठक को गहरे स्तर पर विचलित तो करता है, किन्तु अविश्वसनीय नहीं लगता। यही यथार्थवादी कला की सफलता है—वह जीवन की त्रासदी को इस प्रकार प्रस्तुत करती है कि पाठक उसे सहज रूप से सत्य के रूप में स्वीकार कर लेता है।
यथार्थवादी दृष्टि से देखें तो ‘काल कथा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह अपने समय के जीवन को बिना किसी अलंकरण या कृत्रिम सजावट के सामने रखती है। कहानी में भूख है, श्रम है, बेरोज़गारी है, प्रवास है, पारिवारिक प्रेम है, आशा है और त्रासदी भी है। ये सभी तत्त्व जीवन के वास्तविक अनुभवों से जुड़े हुए हैं। कथाकार न तो जीवन को अनावश्यक रूप से सुंदर बनाकर प्रस्तुत करता है और न ही उसे केवल अँधेरे और निराशा से भर देता है। वह जीवन को उसी रूप में चित्रित करता है जैसा वह अपने समय में दिखाई देता है। इसी कारण ‘काल कथा’ केवल कोरोना-काल की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि हमारे समय के सामाजिक यथार्थ का एक प्रामाणिक साहित्यिक दस्तावेज़ बन जाती है।
सबाल्टर्न आलोचना-दृष्टि का उद्भव उन लोगों के इतिहास, अनुभव और आवाज़ को केंद्र में लाने के प्रयास से हुआ जिन्हें मुख्य धारा के इतिहास, साहित्य और सत्ता-विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। इसका मूल प्रश्न यह है कि समाज के हाशिये पर स्थित समूहों को किस प्रकार देखा गया है, उनकी उपस्थिति किस रूप में दर्ज हुई है और क्या उन्हें स्वयं बोलने का अवसर मिला है या उनके बारे में हमेशा कोई दूसरा बोलता रहा है। संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ इस दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहानी है, क्योंकि इसका केंद्र कोई अधिकारी, उद्योगपति, राजनीतिज्ञ या अभिजात मध्यवर्गीय पात्र नहीं, बल्कि कृष्णा बिंद जैसा श्रमिक और उसका परिवार है। कहानी उस जीवन को केंद्र में लाती है जो सामान्यतः विकास, आधुनिकता और प्रगति के चमकदार आख्यानों के पीछे छिप जाता है।
कहानी का आरंभ ही सबाल्टर्न दृष्टि के लिए अर्थपूर्ण है। शहर का परिचय देते समय कथाकार सबसे पहले रेलवे लाइन के इस पार की दुनिया को सामने लाता है—झोपड़पट्टियाँ, कूड़े के ढेर, गंदा पानी, जलकुंभियों से भरे गड्ढे और वहाँ रहने वाले श्रमिक परिवार। सामान्यतः शहर का वर्णन उसकी चमक-दमक, चौड़ी सड़कों, मॉलों और आधुनिक इमारतों से शुरू होता है, किन्तु यहाँ कथाकार उन लोगों की दुनिया को प्राथमिकता देता है जो सामाजिक संरचना की निचली पायदान पर स्थित हैं। यह चयन स्वयं सबाल्टर्न संवेदना का संकेत है।
सबाल्टर्न आलोचना इस तथ्य पर बल देती है कि इतिहास और समाज के बड़े आख्यानों में कुछ वर्ग लगातार अदृश्य बने रहते हैं। ‘काल कथा'’ इसी अदृश्य संसार को दृश्य बनाती है। कृष्णा बिंद कोई असाधारण व्यक्ति नहीं है। वह एक साधारण श्रमिक है। उसकी पत्नी सुंदरी देवी सामान्य गृहस्थ जीवन जीने वाली स्त्री है और उसके बेटे प्रवासी मजदूर हैं। ये वे लोग हैं जिनकी चर्चा अक्सर आँकड़ों, योजनाओं या सरकारी रिपोर्टों में होती है। कहानी उन्हें आँकड़ों से निकाल कर जीवित मनुष्यों के रूप में प्रस्तुत करती है। उन्हें नाम, चेहरा, परिवार, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ प्रदान करती है। यही सबाल्टर्न लेखन का एक केंद्रीय उद्देश्य भी है।
कहानी की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें गरीब पात्र केवल दया के पात्र बनकर उपस्थित नहीं होते। कृष्णा बिंद संघर्ष करता है, निर्णय लेता है, सपने देखता है और परिस्थितियों का सामना करता है। वह केवल पीड़ित व्यक्ति नहीं, बल्कि सक्रिय मानवीय व्यक्तित्व है। सबाल्टर्न आलोचना के अनुसार हाशिये के लोगों को केवल करुणा की वस्तु बनाकर प्रस्तुत करना भी एक प्रकार का प्रभुत्ववादी दृष्टिकोण है। ‘काल कथा’ इस प्रवृत्ति से बचती है। कृष्णा बिंद अपनी सीमाओं के बावजूद आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने की कोशिश करता है। उसका श्रम, उसका पारिवारिक दायित्व-बोध और उसकी जिजीविषा उसे एक सशक्त मानवीय चरित्र बनाते हैं।
प्रवासी मजदूरों का चित्रण इस कहानी की सबाल्टर्न चेतना को और अधिक स्पष्ट करता है। अजय और विजय का पंजाब जाना केवल रोजगार का प्रश्न नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना का परिणाम है जिसमें गरीब और श्रमजीवी लोगों को जीविका के लिए अपने घर, गाँव और सामाजिक परिवेश से दूर जाना पड़ता है। वे उत्पादन-व्यवस्था के लिए अनिवार्य हैं, किन्तु सम्मान और सुरक्षा के मामले में सबसे अधिक उपेक्षित रहते हैं। कोरोना-काल में जब लाखों मजदूर पैदल या असुरक्षित साधनों से घर लौटने लगे, तब पहली बार भारतीय समाज ने उस विशाल श्रमिक समुदाय को एक साथ देखा जो सामान्य दिनों में लगभग अदृश्य बना रहता था। ‘काल कथा’ इसी अनुभव को मानवीय गहराई के साथ प्रस्तुत करती है।
सबाल्टर्न विमर्श में ‘आवाज़’ का प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रायः हाशिये के लोगों के बारे में अभिजात वर्ग बोलता है, जबकि उनकी अपनी आवाज़ सुनाई नहीं देती। ‘काल कथा’ की विशेषता यह है कि कृष्णा बिंद, सुंदरी देवी, अजय और विजय स्वयं बोलते हैं। उनके संवाद, उनकी भाषा और उनकी चिंताएँ कथा का अभिन्न हिस्सा हैं। कथाकार उनकी ओर से भाषण नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनी बात कहने का अवसर प्रदान करता है। लोकभाषा और बोलचाल की अभिव्यक्तियों के प्रयोग से उनकी सामाजिक पहचान भी सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि कहानी में सबाल्टर्न पात्र केवल विषय नहीं, बल्कि सक्रिय उपस्थिति के रूप में सामने आते हैं।
कहानी विकास के प्रचलित विमर्श पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। शहर में हवाई अड्डा है, चौड़ी सड़कें हैं, वैश्विक संपर्क है और विदेशों में कार्यरत लोग हैं। पहली दृष्टि में यह विकास का आकर्षक चित्र प्रतीत होता है। किन्तु इसी शहर में झोपड़पट्टियाँ भी हैं, असुरक्षित श्रमिक भी हैं और ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए लॉकडाउन भूख और अस्तित्व का संकट बन जाता है। कहानी यह संकेत करती है कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचता। इस प्रकार वह विकासवादी आख्यानों के भीतर छिपी असमानताओं को उजागर करती है।
मोबाइल का प्रसंग भी सबाल्टर्न दृष्टि से विशेष अर्थ ग्रहण करता है। सतह पर देखने पर लगता है कि तकनीक ने सामाजिक दूरी कम कर दी है। दोनों परिवारों के पास मोबाइल है और दोनों अपने प्रियजनों से संपर्क बनाए रखते हैं। किन्तु कहानी यह स्पष्ट करती है कि तकनीकी उपलब्धता और सामाजिक शक्ति एक ही चीज़ नहीं हैं। कृष्णा बिंद अपने बेटों की आवाज़ सुन सकता है, लेकिन उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। उसके पास सूचना है, पर नियंत्रण नहीं। यही अंतर तकनीकी आधुनिकता और सामाजिक वास्तविकता के बीच मौजूद दूरी को उजागर करता है।
कहानी में राज्य की उपस्थिति भी सबाल्टर्न दृष्टि से विचारणीय है। गरीब पात्रों के जीवन में राज्य मुख्यतः राशन, पुलिस, लॉकडाउन और प्रशासनिक नियंत्रण के रूप में दिखाई देता है। प्रवासी मजदूरों की वापसी के दौरान दिखाई गई अव्यवस्था यह संकेत करती है कि संकट की घड़ी में सबसे कमजोर वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित हो जाता है। यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि उस सत्ता-संरचना की ओर संकेत है जिसमें हाशिये के लोगों की आवश्यकताएँ अक्सर प्राथमिकता नहीं बन पातीं।
सुंदरी देवी का चरित्र भी विशेष ध्यान देने योग्य है। वे गरीब हैं, श्रमिक परिवार से आती हैं और स्त्री होने के कारण सामाजिक संरचना में दोहरे-तिहरे हाशिये का अनुभव करती हैं। फिर भी वे निष्क्रिय पात्र नहीं हैं। परिवार की चिंताओं, निर्णयों और भावनात्मक संतुलन में उनकी सक्रिय भूमिका है। इस प्रकार कहानी हाशिये के भीतर मौजूद और भी हाशियाकृत अनुभवों को सामने लाती है।
कहानी का अंतिम प्रसंग सबाल्टर्न दृष्टि से अत्यंत मार्मिक है। पोते की मृत्यु का समाचार केवल एक परिवार का दुःख नहीं रह जाता। वह उस व्यापक असुरक्षा का प्रतीक बन जाता है जिसके बीच श्रमिक समुदाय जीवन व्यतीत करता है। यह मृत्यु किसी व्यक्तिगत भूल का परिणाम नहीं है; इसके पीछे वे सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ हैं जिन्होंने लाखों लोगों को असुरक्षित यात्राओं के लिए विवश किया। इस प्रकार निजी त्रासदी एक सामूहिक सामाजिक त्रासदी का रूप ग्रहण कर लेती है।
सबाल्टर्न आलोचना-दृष्टि से देखें तो ‘काल कथा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह हाशिये के जीवन को साहित्य के केंद्र में स्थापित करती है। कहानी उन लोगों को दृश्यता प्रदान करती है जिन्हें समाज प्रायः ‘गरीब’, ‘मजदूर’ या ‘प्रवासी’ जैसे सामान्यीकृत शब्दों में समेट देता है। यहाँ वे मनुष्य हैं—सपनों वाले, संबंधों वाले, संघर्ष करने वाले और दुःख सहने वाले मनुष्य। उनकी पीड़ा, आशाएँ और जीवन-अनुभव कथा के केंद्रीय विषय बन जाते हैं। इसी कारण ‘काल कथा’ को सबाल्टर्न संवेदना से सम्पन्न एक महत्त्वपूर्ण कहानी कहा जा सकता है, जो विकास और आधुनिकता के बड़े आख्यानों के पीछे छूट गए मनुष्यों को साहित्यिक गरिमा और मानवीय दृश्यता प्रदान करती है।
सबाल्टर्न आलोचना-दृष्टि से ‘काल कथा’ का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह दृष्टि केवल गरीबों या वंचितों के चित्रण तक सीमित नहीं है। इसका मूल उद्देश्य उन सामाजिक समूहों की उपस्थिति, अनुभव और आवाज़ को पहचानना है जिन्हें इतिहास, सत्ता और प्रभुत्वशाली विमर्शों ने हाशिये पर धकेल दिया है। इसलिए इस कहानी को केवल प्रवासी मजदूरों की कथा मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह उन लोगों की भी कथा है जो आधुनिक विकास, वैश्वीकरण और शहरीकरण की चमकदार संरचनाओं के भीतर रहते हुए भी सामाजिक दृश्यता से वंचित बने रहते हैं।
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| रणजीत गुहा |
विदित है कि सबाल्टर्न अध्ययन की संगठित शुरुआत रणजीत गुहा के नेतृत्व में हुई। उनकी प्रसिद्ध कृति “एलीमेंटरी ऐस्पेक्ट्स ऑफ पीज़ेंट इन्सर्जेन्सी इन कॉलोनियल इंडिया” (1983) में यह प्रतिपादित किया गया कि भारतीय इतिहास को केवल अभिजात वर्ग, राष्ट्रवादी नेतृत्व या औपनिवेशिक सत्ता की दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। किसानों, श्रमिकों और हाशिये के समुदायों की अपनी चेतना, अपनी ऐतिहासिक भूमिका और अपनी राजनीतिक सक्रियता होती है। ‘काल कथा’ इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि इसका केंद्र कोई प्रभावशाली सामाजिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि कृष्णा बिंद जैसा श्रमिक है। कथा का भावनात्मक और वैचारिक केंद्र भी वही है। उसकी चिंताएँ, उसके सपने, उसकी असफलताएँ और उसकी आशाएँ ही कथा को आगे बढ़ाती हैं। यह चयन स्वयं सबाल्टर्न संवेदना का द्योतक है।
रणजीत गुहा ने इतिहास-लेखन में ‘एलीट’ और ‘सबाल्टर्न’ के बीच जो भेद स्थापित किया था, उसका प्रत्यक्ष रूप कहानी में दिखाई देता है। वासुदेव श्रीवास्तव और कृष्णा बिंद केवल दो व्यक्ति नहीं हैं; वे दो भिन्न सामाजिक अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्रीवास्तव उस वर्ग का हिस्सा हैं जिसे शिक्षा, संसाधन और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। दूसरी ओर कृष्णा बिंद उस वर्ग का प्रतिनिधि है जिसकी उपस्थिति समाज के लिए अनिवार्य तो है, किन्तु जिसकी समस्याएँ प्रायः सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में नहीं आ पातीं। कहानी इस अंतर को केवल दर्ज नहीं करती, बल्कि पाठक का ध्यान उस जीवन की ओर आकृष्ट करती है जो सामान्यतः दृष्टि से ओझल बना रहता है।
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| गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक |
गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक का प्रसिद्ध निबंध ‘कैन द सबाल्टर्न स्पीक’ (1988) सबाल्टर्न विमर्श का एक आधारभूत पाठ माना जाता है। स्पिवाक का तर्क है कि हाशिये के लोगों की आवाज़ अक्सर सत्ता-समर्थित संरचनाओं के भीतर दब जाती है। उनकी ओर से दूसरे लोग बोलते हैं, किन्तु वे स्वयं अपनी बात नहीं कह पाते। ‘काल कथा’ का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि यहाँ कृष्णा बिंद, सुंदरी देवी, अजय और विजय स्वयं बोलते हैं। उनके संवाद, उनकी भाषा और उनके अनुभव कथा का सक्रिय हिस्सा हैं। कथाकार उनकी भाषा को अभिजात या संस्कारित बनाने का प्रयास नहीं करता। लोकभाषा और बोलचाल की अभिव्यक्तियों के माध्यम से उनकी सामाजिक पहचान सुरक्षित रहती है। इस प्रकार कहानी सबाल्टर्न की आवाज़ को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करती है।
हालाँकि स्पिवाक यह भी संकेत करती हैं कि सबाल्टर्न की आवाज़ को प्रस्तुत करना सरल नहीं है, क्योंकि सत्ता-संरचनाएँ उसके अर्थ को निरंतर नियंत्रित करती रहती हैं। ‘काल कथा’ में यह स्थिति तब दिखाई देती है जब प्रवासी मजदूरों का जीवन प्रशासनिक निर्णयों, आर्थिक संरचनाओं और संस्थागत व्यवस्थाओं से संचालित होता है। अजय और विजय अपने जीवन के बारे में निर्णय लेना चाहते हैं, किन्तु उनकी परिस्थितियाँ उनकी स्वतंत्रता को सीमित करती रहती हैं। वे उत्पादन-प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा हैं, फिर भी संकट की घड़ी में सबसे अधिक असुरक्षित बने रहते हैं।
एंतोनियो ग्राम्शी की “सेलेक्शन्स फ्रॉम द प्रिजन नोटबुक्स” सबाल्टर्न विमर्श के प्रमुख वैचारिक स्रोतों में गिनी जाती है। ग्राम्शी ने ‘हेजेमनी’ अर्थात् सांस्कृतिक प्रभुत्व की अवधारणा विकसित करते हुए बताया कि सत्ता केवल राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण से संचालित नहीं होती, बल्कि सांस्कृतिक स्वीकृति और वैचारिक सहमति के माध्यम से भी अपना प्रभाव बनाए रखती है। ‘काल कथा’ में विकास और आधुनिकता का जो आकर्षक संसार दिखाई देता है—चौड़ी सड़कें, हवाई अड्डा, विदेशों में कार्यरत बेटे और डिजिटल संपर्क—वह इसी प्रभुत्वशाली विचारधारा का हिस्सा है। किन्तु कहानी इसके समानांतर झोपड़पट्टियों, प्रवासी मजदूरों और असुरक्षित श्रमिक जीवन को भी सामने लाती है। इस प्रकार वह विकास के प्रभुत्वशाली आख्यान के भीतर छिपे यथार्थ को उजागर करती है।
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| पार्थ चटर्जी |
पार्थ चटर्जी ने “द नेशन ऐंड इट्स फ्रैग्मेंट्स” में यह प्रश्न उठाया था कि राष्ट्र और आधुनिकता के बड़े आख्यानों में हाशिये के समुदायों की स्थिति क्या है। ‘काल कथा’ को इस संदर्भ में पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि कोरोना-काल जैसी राष्ट्रीय आपदा के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों के अनुभव एक समान नहीं थे। ‘स्टे होम, स्टे सेफ’ का नारा उस व्यक्ति के लिए अर्थपूर्ण हो सकता है जिसके पास घर, संसाधन और सुरक्षित आय हो; किन्तु उस श्रमिक के लिए नहीं जिसकी जीविका प्रतिदिन के श्रम पर निर्भर है। इस प्रकार कहानी राष्ट्रीय अनुभव के भीतर मौजूद वर्गीय और सामाजिक विषमताओं को रेखांकित करती है।
दीपेश चक्रवर्ती ने “प्रोविन्शियलाइज़िंग यूरोप” में आधुनिकता और इतिहास की उन अवधारणाओं की आलोचना की है जो यूरोपीय अनुभव को सार्वभौमिक मान लेती हैं। ‘काल कथा’ आधुनिकता के एक वैकल्पिक अनुभव को सामने लाती है। मोबाइल फोन, डिजिटल संपर्क और वैश्विक संचार दोनों वर्गों तक पहुँच चुके हैं, किन्तु उनके सामाजिक अर्थ समान नहीं हैं। श्रीवास्तव परिवार के लिए मोबाइल सुविधा, संपर्क और आत्मविश्वास का माध्यम है, जबकि कृष्णा बिंद के लिए वही चिंता, प्रतीक्षा और असुरक्षा का वाहक बन जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिकता का अनुभव सामाजिक स्थिति और वर्गीय संदर्भों के अनुसार बदलता रहता है।
सबाल्टर्न अध्ययन के एक अन्य महत्त्वपूर्ण चिंतक शाहिद अमीन हैं। उनकी कृति ‘इवेंट, मेटाफ़र मेमोरी’ (1995) यह दिखाती है कि बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम साधारण लोगों के जीवन में किस प्रकार अनुभव किए जाते हैं। ‘काल कथा’ को इसी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है। यहाँ कोरोना-काल कोई सांख्यिकीय, प्रशासनिक या नीतिगत घटना नहीं है; वह कृष्णा बिंद, सुंदरी देवी और उनके परिवार के जीवन-अनुभवों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। इतिहास का विशाल परिदृश्य एक परिवार की निजी पीड़ा और संघर्ष में रूपांतरित हो जाता है।
कहानी का अंतिम दृश्य सबाल्टर्न विमर्श की दृष्टि से सबसे अधिक मार्मिक और अर्थपूर्ण है। पोते की मृत्यु केवल एक दुर्घटना नहीं है; वह उस संरचनात्मक असुरक्षा का प्रतीक है जिसमें समाज का वंचित वर्ग जीवन व्यतीत करता है। यहाँ मृत्यु एक निजी घटना से आगे बढ़ कर सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेती है। यह उस व्यवस्था की विफलता की ओर संकेत करती है जिसमें श्रमिक वर्ग उत्पादन-प्रक्रिया का आधार होने के बावजूद सुरक्षा, सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन से वंचित रहता है।
इस प्रकार ‘काल कथा’ का सबाल्टर्न पाठ यह स्पष्ट करता है कि कहानी का वास्तविक सरोकार केवल महामारी नहीं है। इसका केंद्र वे लोग हैं जो समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना के निचले स्तर पर स्थित हैं। रणजीत गुहा की सबाल्टर्न चेतना, स्पिवाक का प्रतिनिधित्व और आवाज़ का प्रश्न, ग्राम्शी की प्रभुत्व की अवधारणा, पार्थ चटर्जी की राष्ट्र-विमर्श संबंधी चिंताएँ तथा शाहिद अमीन का जन-अनुभव पर बल—इन सबके आलोक में देखें तो ‘काल कथा’ हाशिये के जीवन को साहित्य के केंद्र में स्थापित करने वाली एक महत्त्वपूर्ण कहानी के रूप में सामने आती है। यह विकास, आधुनिकता और राष्ट्र के बड़े आख्यानों के बीच दब गई मानवीय आवाज़ों को साहित्यिक गरिमा, वैचारिक महत्त्व और ऐतिहासिक पहचान प्रदान करती है।
उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना-दृष्टि उन सत्ता-संबंधों, सांस्कृतिक संरचनाओं और आर्थिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करती है जो औपनिवेशिक शासन की औपचारिक समाप्ति के बाद भी विभिन्न रूपों में समाजों को प्रभावित करती रहती हैं। यह दृष्टि केवल उपनिवेशवाद के ऐतिहासिक अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्वीकरण, विकास, आधुनिकता, प्रवासन, सांस्कृतिक प्रभुत्व और वैश्विक असमानताओं जैसे प्रश्नों को भी अपने विश्लेषण का हिस्सा बनाती है। संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ को इस परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह कहानी केवल कोरोना-काल की सामाजिक त्रासदी नहीं रह जाती, बल्कि उत्तर-औपनिवेशिक भारत के अंतर्विरोधों, वैश्विक पूँजी के प्रभावों और विकास की असमान प्रक्रियाओं का एक महत्त्वपूर्ण आख्यान बन कर सामने आती है।
उत्तर-औपनिवेशिक चिंतन का एक प्रमुख आग्रह यह है कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो जाने के बाद भी आर्थिक और सांस्कृतिक निर्भरताएँ समाप्त नहीं हो जातीं। ‘काल कथा’ में यह स्थिति स्पष्ट दिखाई देती है। वासुदेव श्रीवास्तव के दोनों पुत्र अमेरिका और ब्रिटेन में कार्यरत हैं। वे वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। उनकी शिक्षा, पेशा और जीवन-शैली उन्हें राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक विस्तृत आर्थिक-सांस्कृतिक संसार से जोड़ देती है। दूसरी ओर कृष्णा बिंद के बेटे पंजाब की फैक्ट्रियों में मजदूरी करते हैं। दोनों ही स्थितियों में प्रवास मौजूद है, किन्तु दोनों प्रवासों की प्रकृति, उद्देश्य और परिणाम एक-दूसरे से भिन्न हैं। एक प्रवास ज्ञान-आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, जबकि दूसरा श्रम-आधारित और असुरक्षित आर्थिक संरचना का हिस्सा है। यही अंतर कहानी के उत्तर-औपनिवेशिक अर्थों को उद्घाटित करता है।
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| एडवर्ड सईद |
एडवर्ड सईद की प्रसिद्ध कृति ओरिएंटलिज़्म उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन की आधारभूत पुस्तकों में गिनी जाती है। सईद ने दिखाया कि पश्चिम ने पूर्व की एक ऐसी छवि निर्मित की जो उसके प्रभुत्व को वैधता प्रदान करती थी। ‘काल कथा’ में प्रत्यक्ष रूप से ओरिएंटलिज़्म का प्रश्न उपस्थित नहीं है, फिर भी पश्चिम के प्रति आकर्षण और पश्चिमी जीवन को सफलता के आदर्श के रूप में देखने की मानसिकता अवश्य दिखाई देती है। श्रीवास्तव परिवार के लिए अमेरिका और ब्रिटेन केवल रोजगार के स्थल नहीं हैं; वे उपलब्धि, प्रतिष्ठा और सामाजिक सफलता के प्रतीक भी हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि औपनिवेशिक सत्ता के समाप्त हो जाने के बाद भी कुछ मानसिक संरचनाएँ सामाजिक चेतना को प्रभावित करती रहती हैं।
होमी के. भाभा ने 'द लोकेशन ऑफ कल्चर' में यह प्रतिपादित किया कि उपनिवेशोत्तर समाजों की पहचानें स्थिर नहीं होतीं; वे निरंतर परिवर्तनशील और मिश्रित होती हैं। ‘काल कथा’ में भी ऐसी सांस्कृतिक मिश्रितता स्पष्ट दिखाई देती है। एक ओर स्थानीय जीवन, लोकभाषा और श्रमिक संस्कृति है, तो दूसरी ओर वीडियो कॉल, सोशल मीडिया, डिजिटल संपर्क और वैश्विक रोजगार की दुनिया। कहानी का सामाजिक संसार न पूरी तरह पारंपरिक है और न पूर्णतः वैश्विक। वह इन दोनों के बीच निर्मित एक जटिल सामाजिक वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करता है। भाभा की संकरता या ‘हाइब्रिडिटी’ की अवधारणा को इस संदर्भ में सार्थक रूप से देखा जा सकता है।
उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना वैश्वीकरण को केवल प्रगति की प्रक्रिया के रूप में स्वीकार नहीं करती, बल्कि उसके भीतर निहित असमानताओं को भी रेखांकित करती है। ‘काल कथा’ में वैश्वीकरण का प्रभाव दोनों परिवारों के जीवन में उपस्थित है, किन्तु उसके परिणाम समान नहीं हैं। श्रीवास्तव परिवार के बेटे बहुराष्ट्रीय तकनीकी व्यवस्था से जुड़े हैं। वे दुनिया के किसी भी हिस्से में रहकर काम कर सकते हैं और संकट की परिस्थितियों में भी उनकी आय अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है। इसके विपरीत कृष्णा बिंद के बेटे श्रम-आधारित प्रवासी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। जैसे ही कारखाने बंद होते हैं, उनका जीवन संकट में पड़ जाता है। इस प्रकार कहानी वैश्वीकरण के दो भिन्न चेहरों को सामने लाती है—एक अवसर, गतिशीलता और सुरक्षा का; दूसरा अस्थिरता, निर्भरता और असुरक्षा का।
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| अर्जुन अप्पादुरई |
अर्जुन अप्पादुरई ने 'मॉडर्निटी ऐट लार्ज' में लोगों, पूँजी, तकनीक और सूचनाओं के वैश्विक प्रवाहों की चर्चा की है। ‘काल कथा’ को इस संदर्भ में पढ़ें तो स्पष्ट होता है कि कहानी का पूरा संसार इन्हीं प्रवाहों से निर्मित है। लोग स्थानांतरित हो रहे हैं, सूचनाएँ मोबाइल के माध्यम से लगातार प्रवाहित हो रही हैं, तकनीक सामाजिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है और पूँजी का प्रभाव जीवन की दिशा निर्धारित कर रहा है। किन्तु इन वैश्विक प्रवाहों का लाभ सभी को समान रूप से प्राप्त नहीं होता। सूचना तक पहुँच दोनों वर्गों की है, पर सुरक्षा और नियंत्रण केवल एक वर्ग के पास है। यही असमानता कहानी के उत्तर-औपनिवेशिक अर्थों को और गहरा बनाती है।
गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक ने कैन द सबाल्टर्न स्पीक? में यह प्रश्न उठाया था कि वैश्विक और प्रभुत्वशाली विमर्शों में हाशिये के लोगों की आवाज़ कहाँ स्थित है। ‘काल कथा’ इस प्रश्न को भी अप्रत्यक्ष रूप से सामने लाती है। कोरोना-काल के दौरान सार्वजनिक विमर्श में घर से काम करने, डिजिटल जीवन और वैश्विक संपर्कों की चर्चा व्यापक रूप से हुई, किन्तु प्रवासी मजदूरों की वास्तविक समस्याएँ लंबे समय तक केंद्र में नहीं आ सकीं। कहानी इसी उपेक्षित अनुभव को अपनी कथा का केंद्र बनाती है। इस प्रकार वह वैश्वीकरण के उत्सवधर्मी आख्यान के भीतर छिपी मानवीय कीमत को उजागर करती है।
प्रवास का प्रश्न कहानी में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। श्रीवास्तव परिवार के बेटे भी प्रवासी हैं और कृष्णा बिंद के बेटे भी, किन्तु दोनों की सामाजिक स्थिति में गहरा अंतर है। पहला प्रवास स्वैच्छिक, सम्मानजनक और आर्थिक उन्नति का माध्यम है; दूसरा प्रवास आर्थिक विवशता का परिणाम है। उसमें श्रमिक अपनी श्रम-शक्ति बेचने के लिए घर छोड़ने को बाध्य होता है। यहाँ कहानी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—क्या वैश्विक और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था वास्तव में सभी को समान अवसर उपलब्ध कराती है? कथा का उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक है। वह दिखाती है कि गतिशीलता की संभावनाएँ भी वर्गीय स्थिति और सामाजिक शक्ति से निर्धारित होती हैं।
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| दीपेश चक्रवर्ती |
दीपेश चक्रवर्ती ने 'प्रोविन्शियलाइज़िंग यूरोप' में आधुनिकता की उस अवधारणा की आलोचना की है जो यूरोपीय अनुभव को सार्वभौमिक मान लेती है। ‘काल कथा’ इसी संदर्भ में आधुनिकता के असमान अनुभवों को सामने लाती है। मोबाइल, इंटरनेट और वैश्विक संपर्क दोनों वर्गों तक पहुँचे हैं, किन्तु उनके सामाजिक अर्थ अलग-अलग हैं। आधुनिक तकनीक जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाती है, पर सामाजिक विषमताओं को समाप्त नहीं करती। इस प्रकार कहानी आधुनिकता की सीमाओं और उसके वर्गीय चरित्र को रेखांकित करती है।
कोरोना-काल का प्रसंग भी उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ में विशेष अर्थ ग्रहण करता है। महामारी वैश्विक थी, किन्तु उसके प्रभाव स्थानीय सामाजिक संरचनाओं द्वारा निर्धारित हुए। सम्पन्न वर्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सका क्योंकि उसके पास संसाधन और विकल्प उपलब्ध थे। दूसरी ओर श्रमिक वर्ग को जीविका की तलाश में सड़क पर उतरना पड़ा। यहाँ वैश्विक संकट स्थानीय असमानताओं को और अधिक स्पष्ट कर देता है। उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन ऐसे ही प्रसंगों में वैश्विक और स्थानीय के जटिल संबंधों को समझने का प्रयास करता है।
कहानी का अंतिम भाग इस पूरी संरचना को एक गहरे मानवीय और वैचारिक बिंदु पर पहुँचा देता है। श्रीवास्तव परिवार का बेटा विदेश से सुरक्षित लौट आता है, जबकि कृष्णा बिंद का परिवार घर लौटने की प्रक्रिया में अपने बच्चे को खो देता है। यह केवल दो परिवारों के भाग्य का अंतर नहीं है; यह उन असमान सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं का परिणाम है जिनमें कुछ लोगों की गतिशीलता सुरक्षित और सम्मानजनक होती है, जबकि कुछ लोगों की यात्रा जोखिम और असुरक्षा से भरी होती है। यहाँ निजी त्रासदी व्यापक सामाजिक यथार्थ का प्रतीक बन जाती है।
‘काल कथा’ का उत्तर-औपनिवेशिक पाठ यह स्पष्ट करता है कि कहानी वैश्वीकरण, आधुनिकता और विकास के चमकदार आख्यानों के भीतर मौजूद गहरे अंतर्विरोधों को उद्घाटित करती है। एडवर्ड सईद की सांस्कृतिक प्रभुत्व की अवधारणा, होमी भाभा की सांस्कृतिक मिश्रण संबंधी अवधारणा, स्पिवाक का प्रतिनिधित्व और आवाज़ का प्रश्न, अप्पादुरई के वैश्विक प्रवाह तथा दीपेश चक्रवर्ती की आधुनिकता-संबंधी आलोचना—इन सबके आलोक में देखें तो ‘काल कथा’ उत्तर-औपनिवेशिक भारत की जटिल सामाजिक वास्तविकताओं को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पाठ सिद्ध होती है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि वैश्विक जुड़ाव और तकनीकी प्रगति के बावजूद सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा के प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पहले थे।
मानवतावादी आलोचना-दृष्टि साहित्य में मनुष्य को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित करती है। यह वर्ग, जाति, धर्म, राष्ट्र, विचारधारा और राजनीतिक संरचनाओं से परे जाकर मनुष्य के सुख-दुःख, प्रेम, करुणा, भय, आशा और संवेदनात्मक अनुभवों को समझने का प्रयास करती है। इस दृष्टि का मूल विश्वास है कि मनुष्य की कुछ मूलभूत भावनाएँ सार्वभौमिक होती हैं और वही साहित्य को स्थायी महत्त्व प्रदान करती हैं। संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ को इस परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह केवल वर्गीय विषमता, प्रवासी मजदूरों की समस्या अथवा कोरोना-काल की सामाजिक त्रासदी की कथा नहीं रह जाती, बल्कि मानवीय संवेदना और साझा मानवीय अनुभवों का एक गहरा आख्यान बनकर सामने आती है।
कहानी में दो परिवार हैं—कृष्णा बिंद का परिवार और वासुदेव श्रीवास्तव का परिवार। पहली दृष्टि में दोनों परिवार आर्थिक और सामाजिक स्तर पर एक-दूसरे के विपरीत दिखाई देते हैं। एक ओर अभाव, संघर्ष और असुरक्षा से घिरा परिवार है, तो दूसरी ओर सुविधा, स्थिरता और संसाधनों से सम्पन्न परिवार। मार्क्सवादी या समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह अंतर विश्लेषण का प्रमुख आधार बन सकता है, किन्तु मानवतावादी दृष्टि इन भिन्नताओं के भीतर मौजूद उस साझा मानवीय धरातल को पहचानती है जहाँ दोनों परिवार एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं। दोनों परिवारों के माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, उनकी सुरक्षा चाहते हैं और उनकी अनुपस्थिति में बेचैन होते हैं। दोनों उनकी वापसी की प्रतीक्षा करते हैं। इस स्तर पर कहानी मनुष्य की उन मूल भावनाओं को सामने लाती है जो सामाजिक विभाजनों से कहीं अधिक व्यापक और स्थायी हैं।
मानवतावादी आलोचना व्यक्ति को केवल किसी वर्ग, समूह या सामाजिक श्रेणी के प्रतिनिधि के रूप में नहीं देखती। वह उसके भीतर मौजूद मानवीय जटिलताओं और भावनात्मक संसार को भी महत्त्व देती है। कृष्णा बिंद को यदि केवल श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधि मान कर पढ़ा जाए, तो उसके चरित्र का एक महत्त्वपूर्ण आयाम छूट जाता है। वह केवल श्रमिक नहीं है; वह एक पिता है, एक पति है और बेहतर भविष्य का सपना देखने वाला मनुष्य भी है। उसने अपने बच्चों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया, घर बनाने का सपना देखा और जीवन को अधिक सुरक्षित बनाने की आकांक्षा रखी। उसकी ये इच्छाएँ किसी विशेष वर्ग की नहीं, बल्कि सामान्य मानवीय आकांक्षाएँ हैं। यही कारण है कि पाठक सहज रूप से उसके अनुभवों से जुड़ जाता है।
इसी प्रकार वासुदेव श्रीवास्तव को केवल सम्पन्न वर्ग का प्रतिनिधि मानना भी पर्याप्त नहीं होगा। वे भी अपने बच्चों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं जितने कृष्णा बिंद। उनके बच्चे विदेश में रहते हैं और उनसे दूर हैं। वे उनसे लगातार संपर्क बनाए रखते हैं और उनकी कुशलता को लेकर चिंतित रहते हैं। बेटे की वापसी का समाचार उन्हें जिस प्रकार आनंदित करता है, वह किसी भी माता-पिता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। कहानी इस तथ्य को रेखांकित करती है कि आर्थिक स्थिति भले ही भिन्न हो, संतान के प्रति प्रेम और लगाव मनुष्य की मूल मानवीय प्रवृत्तियों में शामिल है।
मानवतावादी दृष्टि से मोबाइल का प्रसंग भी विशेष अर्थ ग्रहण करता है। समाजशास्त्रीय स्तर पर वह तकनीक का प्रतीक हो सकता है और वर्गीय विषमता की ओर संकेत कर सकता है, किन्तु मानवीय स्तर पर उसका महत्त्व कुछ और है। वह मनुष्यों के बीच भावनात्मक संबंध का माध्यम बन जाता है। श्रीवास्तव दंपति अपने बच्चों को देखकर संतोष का अनुभव करते हैं, जबकि कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी अपने बेटों की आवाज़ सुनकर आश्वस्त होते हैं। यहाँ तकनीक का वास्तविक अर्थ संपर्क नहीं, बल्कि आत्मीयता है। कहानी यह दिखाती है कि हर परिस्थिति में मनुष्य अपने प्रियजनों से जुड़े रहने की आकांक्षा रखता है।
कोरोना-काल का चित्रण भी मानवतावादी दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। महामारी केवल एक सामाजिक या आर्थिक संकट नहीं थी; वह भय, अनिश्चितता और असुरक्षा का समय भी थी। कहानी में यह भय हर वर्ग में मौजूद है। सम्पन्न परिवार बीमारी और दूरी को लेकर चिंतित है, जबकि गरीब परिवार जीविका और सुरक्षा को लेकर। परिस्थितियाँ अलग हैं, किन्तु चिंता का भाव दोनों में समान है। इससे स्पष्ट होता है कि संकट की घड़ी में मनुष्य की मूल असुरक्षाएँ सामने आ जाती हैं। ‘काल कथा’ इसी साझा मानवीय अनुभव को गहराई से अभिव्यक्त करती है।
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| Erich Fromm |
मानवतावादी चिंतक एरिख फ़्रॉम ने 'द आर्ट ऑफ़ लविंग' में प्रेम को मनुष्य की सबसे बुनियादी आवश्यकता माना है। उनके अनुसार प्रेम केवल भावुकता नहीं, बल्कि दूसरे मनुष्य के प्रति जिम्मेदारी, देखभाल और सहभागिता का भाव है। ‘काल कथा’ में यह भावना अनेक स्तरों पर दिखाई देती है। कृष्णा बिंद अपने बेटों को घर लौट आने के लिए कहता है। वह जानता है कि उसके पास संसाधनों की कमी है, फिर भी वह परिवार के साथ मिल कर कठिन समय का सामना करने को तैयार है। यह भाव केवल पारिवारिक दायित्व का नहीं, बल्कि गहरे मानवीय प्रेम का भी प्रमाण है।
अब्राहम मैस्लो ने 'मोटिवेशन ऐंड पर्सनैलिटी' में सुरक्षा, अपनापन और संबंध को मनुष्य की मूल आवश्यकताओं में शामिल किया है। ‘काल कथा’ के पात्र लगातार इन्हीं आवश्यकताओं की ओर लौटते हैं। प्रवासी बेटे अपने घर लौटना चाहते हैं। माता-पिता उन्हें अपने पास बुलाना चाहते हैं। संकट की घड़ी में घर और परिवार सुरक्षा के सबसे विश्वसनीय स्रोत बन जाते हैं। कहानी इस तथ्य को रेखांकित करती है कि मनुष्य का भावनात्मक संसार उसकी भौतिक आवश्यकताओं जितना ही महत्त्वपूर्ण है।
मानवतावादी आलोचना में करुणा का विशेष स्थान है और कहानी का अंतिम भाग इसी करुणा का चरम रूप प्रस्तुत करता है। जब कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी को अपने पोते की मृत्यु का समाचार मिलता है, तब पाठक केवल एक सामाजिक समस्या का सामना नहीं करता, बल्कि एक परिवार के टूटते हुए संसार को देखता है। यह प्रसंग इसलिए मार्मिक है क्योंकि यहाँ किसी विचारधारा से पहले मनुष्य उपस्थित है। एक दादा-दादी का दुःख, एक परिवार की आशाओं का विघटन और एक बच्चे का असमय चले जाना ऐसी करुणा उत्पन्न करता है जो किसी भी संवेदनशील पाठक को भीतर तक प्रभावित कर सकती है।
लियो टॉल्स्टॉय का मानना था कि महान साहित्य मनुष्य को दूसरे मनुष्य के सुख-दुःख से जोड़ता है। ‘काल कथा’ इसी अर्थ में मानवीय संवेदना की कहानी है। पाठक कृष्णा बिंद के परिवार से इसलिए जुड़ता है क्योंकि उसमें वह अपनी ही मानवीय अनुभूतियों का विस्तार देखता है। कहानी सहानुभूति, करुणा और मानवीय साझेदारी की भावना को गहरा करती है। यही मानवतावादी साहित्य का मूल उद्देश्य भी है।
कहानी का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वह किसी पात्र को पूर्णतः अच्छा या बुरा नहीं बनाती। श्रीवास्तव परिवार सम्पन्न है, किन्तु उसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। इसी प्रकार कृष्णा बिंद का परिवार संघर्षरत है, किन्तु उसे केवल दया का पात्र भी नहीं बनाया गया। मानवतावादी दृष्टि व्यक्ति को उसकी संपूर्ण मानवीयता में देखने का आग्रह करती है और ‘काल कथा’ इस संतुलन को सफलतापूर्वक बनाए रखती है।
कहानी का शीर्षक ‘काल कथा’ भी मानवतावादी अर्थों में विचारणीय है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और इतिहास निरंतर नए रूप ग्रहण करता है; किन्तु मनुष्य की मूल संवेदनाएँ बनी रहती हैं। प्रेम, भय, आशा, करुणा और प्रतीक्षा जैसे भाव हर युग में उपस्थित रहते हैं। कोरोना-काल एक विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति अवश्य है, किन्तु कहानी का प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। वह इसलिए दीर्घजीवी बनती है क्योंकि उसके केंद्र में मनुष्य की सार्वभौमिक अनुभूतियाँ हैं।
वस्तुतः ‘काल कथा’ का मानवतावादी पाठ यह स्पष्ट करता है कि कहानी का वास्तविक केंद्र मनुष्य है। वर्गीय विषमता, महामारी, प्रवासन और आर्थिक संकट जैसे प्रश्न महत्त्वपूर्ण अवश्य हैं, किन्तु उनका अंतिम अर्थ मनुष्य के जीवन और संवेदना से ही निर्मित होता है। कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव के परिवारों के माध्यम से कहानी यह रेखांकित करती है कि सामाजिक परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही भिन्न क्यों न हों, प्रेम, चिंता, आशा और दुःख जैसी मूल मानवीय अनुभूतियाँ मनुष्यों को एक साझा धरातल पर ला खड़ा करती हैं। इसी कारण ‘काल कथा’ केवल सामाजिक यथार्थ की कहानी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का भी एक सशक्त और स्थायी आख्यान है।
अस्तित्ववादी दृष्टि जीवन और साहित्य में मनुष्य की उस स्थिति को समझने का प्रयास करती है जिसमें वह एक अनिश्चित, असुरक्षित और अनेक बार अर्थहीन प्रतीत होने वाली दुनिया में अपने अस्तित्व को बनाए रखने, समझने और सार्थक बनाने की कोशिश करता है। यह दृष्टि जीवन की क्षणभंगुरता, मृत्यु की अनिवार्यता, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलेपन, चिंता, चयन की स्वतंत्रता और मनुष्य की सीमाओं जैसे प्रश्नों को केंद्र में रखती है। संतोष दीक्षित की ‘काल कथा’ को यदि अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाए, तो यह केवल वर्गीय विषमता, प्रवासी मजदूरों की त्रासदी अथवा कोरोना-काल का सामाजिक दस्तावेज़ नहीं रह जाती; यह मनुष्य की असुरक्षित और अनिश्चित स्थिति की गहरी कथा बन जाती है।
अस्तित्ववाद का मूल प्रश्न है—मनुष्य ऐसी दुनिया में कैसे जीता है जहाँ किसी भी क्षण सब कुछ बदल सकता है? सार्त्र ने 'बीइंग ऐंड नथिंगनेस तथा एग्ज़िस्टेंशियलिज़्म इज़ अ ह्यूमनिज़्म' में कहा था कि मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और फिर अपने जीवन का अर्थ स्वयं निर्मित करता है। उसके सामने कोई पूर्वनिर्धारित जीवन-योजना नहीं होती। ‘काल कथा’ के पात्र भी ऐसी ही दुनिया में जी रहे हैं जहाँ भविष्य का कोई भरोसा नहीं है। कृष्णा बिंद अपने बच्चों के लिए सपने देखता है, घर बनाने की इच्छा रखता है और बेहतर जीवन की आकांक्षा करता है, किन्तु परिस्थितियाँ बार-बार उसके सामने ऐसी चुनौतियाँ उपस्थित करती हैं जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। इस प्रकार कहानी मनुष्य की सीमित शक्ति और जीवन की अनिश्चितता को रेखांकित करती है।
कोरोना-काल स्वयं अस्तित्ववादी संकट का एक विराट रूप था। महामारी ने मनुष्य को उसकी नश्वरता का तीव्र बोध कराया। जो जीवन सामान्य और सुरक्षित प्रतीत होता था, वह अचानक भय, आशंका और असुरक्षा से भर उठा। ‘काल कथा’ में यह अनुभव प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है। पात्र केवल आर्थिक संकट का सामना नहीं कर रहे, बल्कि उस अनिश्चितता से भी जूझ रहे हैं जिसमें भविष्य का कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं है। कल क्या होगा, कौन सुरक्षित रहेगा और कौन नहीं—इन प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं है। यही स्थिति अस्तित्ववादी चिंता का मूल स्रोत है।
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| मार्टिन हाइडेगर |
अस्तित्ववादी चिंतन में ‘चिंता’ (Angst) को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सोरेन कीर्केगार्द और बाद में मार्टिन हाइडेगर ने इसे मनुष्य के अस्तित्व का अनिवार्य अनुभव माना। ‘काल कथा’ में यह चिंता अनेक रूपों में उपस्थित है। कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी अपने बेटों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। श्रीवास्तव दंपति भी अपने बच्चों की कुशलता को लेकर आशंकित रहते हैं। दोनों परिवारों की परिस्थितियाँ अलग हैं, किन्तु चिंता का भाव समान है। कहानी इस तथ्य को रेखांकित करती है कि असुरक्षा का अनुभव केवल आर्थिक स्थिति से निर्धारित नहीं होता; वह मनुष्य के अस्तित्वगत अनुभव का भी हिस्सा है।
मार्टिन हाइडेगर ने बीइंग एंड टाइम में मनुष्य को ‘मृत्यु की ओर उन्मुख अस्तित्व’ (Being-towards-death) कहा था। उनके अनुसार मृत्यु का बोध ही मनुष्य को अपने अस्तित्व की वास्तविकता से परिचित कराता है। ‘काल कथा’ में मृत्यु केवल अंतिम घटना के रूप में उपस्थित नहीं होती; उसकी संभावना पूरी कथा में व्याप्त रहती है। महामारी, दुर्घटना, प्रवास और असुरक्षित जीवन-स्थितियाँ लगातार इस तथ्य की याद दिलाती हैं कि जीवन किसी भी क्षण बदल सकता है। यही कारण है कि कहानी में प्रतीक्षा, भय और आशा का तनाव लगातार बना रहता है।
अलबेयर कामू ने 'द मिथ ऑफ सिसिफस' में जीवन की ‘निरर्थकता’ (Absurdity) की चर्चा करते हुए कहा था कि मनुष्य अर्थ की खोज करता है, जबकि संसार उसे कोई निश्चित अर्थ प्रदान नहीं करता। ‘काल कथा’ में भी यह प्रश्न अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है। कृष्णा बिंद ने अपने बच्चों के लिए संघर्ष किया, बेहतर भविष्य के सपने देखे और कठिन श्रम किया। फिर भी उसके हिस्से में त्रासदी आती है। यह स्थिति पाठक को उस प्रश्न की ओर ले जाती है कि क्या जीवन वास्तव में न्यायपूर्ण है? क्या परिश्रम और परिणाम के बीच हमेशा सीधा संबंध होता है? कहानी इन प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देती, किन्तु उन्हें गहरे मानवीय स्तर पर उपस्थित अवश्य करती है।
अस्तित्ववादी साहित्य में घर और वापसी का भाव भी विशेष अर्थ रखता है। घर केवल भौतिक स्थान नहीं होता; वह सुरक्षा, पहचान और आत्मीयता का प्रतीक बन जाता है। ‘काल कथा’ में प्रवासी बेटों की घर लौटने की इच्छा इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है। संकट की घड़ी में वे अपने मूल संबंधों और परिचित संसार की ओर लौटना चाहते हैं। यह लौटना केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत भी है। वे उस स्थान की तलाश कर रहे हैं जहाँ उन्हें अपने होने का अर्थ और आश्रय मिल सके।
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| अलबेयर कामू |
कहानी में मोबाइल भी अस्तित्ववादी स्तर पर एक रोचक प्रतीक बन जाता है। यह दूरी को कम करता है, किन्तु अनुपस्थिति को समाप्त नहीं कर पाता। पात्र अपने प्रियजनों की आवाज़ सुन सकते हैं, उनका चेहरा देख सकते हैं, पर उन्हें अपने पास नहीं पा सकते। इस प्रकार तकनीक निकटता का भ्रम तो उत्पन्न करती है, किन्तु अस्तित्वगत अकेलेपन को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाती। यह अनुभव आधुनिक मनुष्य की स्थिति को भी प्रतिबिंबित करता है, जो संचार के असंख्य साधनों के बावजूद कई बार भीतर से अकेला और असुरक्षित महसूस करता है।
अस्तित्ववादी चिंतन का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि मनुष्य संकट के बीच भी आशा और अर्थ की खोज नहीं छोड़ता। ‘काल कथा’ के पात्र लगातार इसी प्रक्रिया से गुजरते हैं। कृष्णा बिंद कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिवार के भविष्य की कल्पना करता है। सुंदरी देवी प्रतीक्षा करती हैं। अजय और विजय घर लौटने का निर्णय लेते हैं। ये सभी क्रियाएँ इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि मनुष्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अर्थ, संबंध और भविष्य की संभावना को बचाए रखने का प्रयास करता है। यही जिजीविषा उसे निराशा के पूर्ण अंधकार में डूबने नहीं देती।
कहानी का अंतिम प्रसंग अस्तित्ववादी नज़रिए से सबसे अधिक मार्मिक है। जिस क्षण परिवार पुनर्मिलन की आशा से भरा हुआ है, उसी समय मृत्यु का समाचार आता है। यह घटना जीवन की अनिश्चितता को तीव्रतम रूप में सामने लाती है। मनुष्य योजनाएँ बनाता है, सपने देखता है और भविष्य की कल्पना करता है, किन्तु अस्तित्व का अंतिम सत्य उसके नियंत्रण से बाहर रहता है। कहानी इसी विडंबना को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती है।
फिर भी ‘काल कथा’ मायूसी फैलाने वाली कहानी नहीं है। उसका मूल स्वर जीवन की नश्वरता के बीच भी मानवीय संबंधों के महत्त्व को रेखांकित करता है। अस्तित्ववादी दृष्टि से देखें तो कहानी यह संकेत करती है कि जीवन का अर्थ किसी बाहरी व्यवस्था या निश्चित सत्य में नहीं, बल्कि मनुष्यों के बीच निर्मित संबंधों, प्रेम, स्मृति, प्रतीक्षा और सहभागिता में निहित है। यही वे तत्त्व हैं जो अनिश्चित और असुरक्षित संसार में भी मनुष्य को जीने का संबल प्रदान करते हैं।
‘काल कथा’ का अस्तित्ववादी पाठ यह स्पष्ट करता है कि कहानी का सरोकार केवल सामाजिक यथार्थ से नहीं है; वह मनुष्य की उस मूल स्थिति से भी जुड़ा है जिसमें जीवन और मृत्यु, आशा और भय, उपस्थिति और अनुपस्थिति, सुरक्षा और असुरक्षा निरंतर एक-दूसरे से गुंथे रहते हैं। इसी कारण यह कहानी अपने समय की सामाजिक त्रासदी का दस्तावेज़ होने के साथ-साथ मानवीय अस्तित्व की जटिलताओं का भी एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आख्यान बन जाती है।
‘काल कथा’ कहानी का महत्त्व केवल उसके कथ्य या सामाजिक सरोकारों तक सीमित नहीं है; उसका शिल्प भी उतना ही उल्लेखनीय है। कथाकार ने कोरोना-काल जैसे व्यापक ऐतिहासिक अनुभव को किसी वृत्तांतात्मक या दस्तावेज़ी शैली में प्रस्तुत करने के बजाय एक सघन मानवीय कथा के रूप में रूपायित किया है। यही कारण है कि कहानी अपने समय की सामाजिक वास्तविकताओं को अभिव्यक्त करते हुए भी कलात्मकता और संवेदनात्मक प्रभाव को बनाए रखती है।
कहानी की संरचना समानांतर कथाविन्यास पर आधारित है। कथाकार कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव के परिवारों को एक-दूसरे के समांतर विकसित करता है। यह समानांतरता केवल दो परिवारों की कथा कहने के लिए नहीं है, बल्कि दो सामाजिक संसारों को आमने-सामने रखने की एक रचनात्मक युक्ति है। दोनों परिवारों के अनुभव, आशंकाएँ, प्रतीक्षाएँ और पारिवारिक संबंध कथा में साथ-साथ चलते हैं। परिणामस्वरूप पाठक को सामाजिक विषमता का बोध किसी वैचारिक भाषण के माध्यम से नहीं, बल्कि कथा-संरचना के माध्यम से होता है। यही इस शिल्प की सबसे बड़ी सफलता है।
कहानी का आरंभ भी विशेष ध्यान देने योग्य है। कथाकार किसी पात्र से नहीं, बल्कि शहर के भूगोल से कथा की शुरुआत करता है। रेलवे लाइन के इस पार और उस पार का वर्णन वस्तुतः पूरे कथानक की वैचारिक भूमि तैयार करता है। यह आरंभ पाठक को तत्काल उस सामाजिक विभाजन से परिचित करा देता है जो आगे चल कर कथा के अर्थ-निर्माण का आधार बनता है। इस प्रकार स्थान-वर्णन केवल पृष्ठभूमि नहीं रह जाता, बल्कि कथा-संरचना का सक्रिय अंग बन जाता है।
प्रतीकात्मक स्तर पर रेलवे लाइन कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। वह केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि वर्गीय विभाजन की रेखा है। उसके एक ओर अभावग्रस्त जीवन है और दूसरी ओर सम्पन्नता का संसार। दोनों पक्ष एक ही शहर का हिस्सा हैं, किन्तु उनके अनुभव और अवसर भिन्न हैं। रेलवे लाइन इस सामाजिक दूरी का दृश्य रूप बन जाती है। इसी प्रकार मोबाइल फोन भी कहानी में एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में उपस्थित है। वह आधुनिक तकनीक, वैश्विक संपर्क और संचार का माध्यम है, किन्तु कथा में उसका अर्थ केवल तकनीकी नहीं है। वह प्रतीक्षा, चिंता, आशा और भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक बन जाता है। एक ही वस्त का दोनों परिवारों के जीवन में अलग-अलग अर्थ ग्रहण करना कथाकार की सूक्ष्म शिल्पगत क्षमता का परिचायक है।
इस रचना का शीर्षक 'काल कथा' स्वयं में एक गहन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। यहाँ 'काल' केवल समय का संकेत नहीं है। वह महामारी, संकट, मृत्यु, अनिश्चितता और इतिहास- सभी अर्थों को एक साथ समेटता है। कथा में समय एक निष्क्रिय पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सक्रिय शक्ति के रूप में उपस्थित है। वही समय एक वर्ग के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित अनुभव है और दूसरे के लिए त्रासदी का पर्याय। शीर्षक की यह बहुस्तरीयता कहानी के अर्थ-क्षेत्र को व्यापक बनाती है।
कथाकार का चरित्र-निर्माण भी उल्लेखनीय है। कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव किसी विचारधारा के यांत्रिक प्रतिनिधि नहीं बनते। वे अपने समूचे मानवीय स्वरूप में उपस्थित होते हैं। विशेष रूप से कृष्णा बिंद का चरित्र बड़ी सहजता से विकसित होता है। कथाकार उसके बारे में प्रत्यक्ष टिप्पणी करने के बजाय उसकी परिस्थितियों, संवादों और व्यवहार के माध्यम से उसके व्यक्तित्व को उभारता है। यही कारण है कि वह पाठक के सामने एक जीवंत और विश्वसनीय व्यक्ति के रूप में उपस्थित होता है। संवाद कहानी के शिल्प का एक और सशक्त पक्ष हैं। संवाद अपेक्षाकृत छोटे हैं, किन्तु उनमें जीवन का अर्थ ग्रहण करना कथाकार की सूक्ष्म शिल्पगत क्षमता का परिचायक है।
इस रचना का शीर्षक 'काल कथा' स्वयं में एक गहन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। यहाँ 'काल' केवल समय का संकेत नहीं है। वह महामारी, संकट, मृत्यु, अनिश्चितता और इतिहास- सभी अर्थों को एक साथ समेटता है। कथा में समय एक निष्क्रिय पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सक्रिय शक्ति के रूप में उपस्थित है। वही समय एक वर्ग के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित अनुभव है और दूसरे के लिए त्रासदी का पर्याय। शीर्षक की यह बहुस्तरीयता कहानी के अर्थ-क्षेत्र को व्यापक बनाती है।
कथाकार का चरित्र-निर्माण भी उल्लेखनीय है। कृष्णा बिंद और वासुदेव श्रीवास्तव किसी विचारधारा के यांत्रिक प्रतिनिधि नहीं बनते। वे अपने समूचे मानवीय स्वरूप में उपस्थित होते हैं। विशेष रूप से कृष्णा बिंद का चरित्र बड़ी सहजता से विकसित होता है। कथाकार उसके बारे में प्रत्यक्ष टिप्पणी करने के बजाय उसकी परिस्थितियों, संवादों और व्यवहार के माध्यम से उसके व्यक्तित्व को उभारता है। यही कारण है कि वह पाठक के सामने एक जीवंत और विश्वसनीय व्यक्ति के रूप में उपस्थित होता है। संवाद कहानी के शिल्प का एक और सशक्त पक्ष हैं। संवाद अपेक्षाकृत छोटे हैं, किन्तु उनमें जीवन का अनुभव और भावनात्मक घनत्व समाहित है। वे कथा को गति भी देते हैं और पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि को भी उद्घाटित करते हैं। विशेष रूप से कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी के संवादों में लोकजीवन की सहजता और आत्मीयता दिखाई देती है। कथाकार ने उन्हें कृत्रिम साहित्यिक भाषा में नहीं ढाला, जिससे उनकी विश्वसनीयता बनी रहती है।
भाषा की दृष्टि से कहानी का शिल्प उल्लेखनीय संतुलन प्रस्तुत करता है। कथाकार की भाषा सरल, संप्रेषणीय और जीवन-सापेक्ष है। उसमें अनावश्यक अलंकरण या भाषिक प्रदर्शन नहीं है। लोकभाषा, बोलचाल और मानक हिंदी का संतुलित संयोजन कथा को स्वाभाविक बनाता है। भाषा की यह सहजता कहानी की संवेदनात्मक शक्ति को और अधिक प्रभावी बना देती है।
कहानी में करुणा का निर्माण भी शिल्पगत स्तर पर अत्यंत नियंत्रित ढंग से हुआ है। कथाकार कहीं भी भावुकता का अनावश्यक सहारा नहीं लेता। वह घटनाओं को स्वाभाविक रूप से विकसित होने देता है। परिणामस्वरूप अंतिम त्रासदी पाठक पर कहीं अधिक गहरा प्रभाव छोड़ती है। यदि कथाकार प्रारंभ से ही अत्यधिक भावुकता का सहारा लेता, तो यह प्रभाव संभवतः कम हो जाता। यहाँ करुणा कथात्मक विकास से उत्पन्न होती है, आरोपित नहीं लगती।
कहानी की गति भी उल्लेखनीय है। कथानक क्रमिक रूप से आगे बढ़ता है और प्रत्येक घटना अगली घटना के लिए भूमि तैयार करती है। कोरोना-काल की परिस्थितियाँ, प्रवासी मजदूरों की समस्या, परिवारों की चिंता और अंततः दुर्घटना- ये सभी प्रसंग एक-दूसरे से स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं। कहीं भी कथानक में कृत्रिमता या अनावश्यक मोड़ दिखाई नहीं देता। इस दृष्टि से कहानी का कथाविन्यास अत्यंत संतुलित और संगठित है।
'काल कथा' का शिल्प उसके कथ्य का प्रभावी वाहक है। समानांतर संरचना, सार्थक प्रतीक-विधान, नियंत्रित करुणा, स्वाभाविक संवाद, जीवन-सापेक्ष भाषा और संतुलित कथाविन्यास मिलकर कहानी को कलात्मक ऊँचाई प्रदान करते हैं। संतोष दीक्षित की सफलता इस बात में है कि वे सामाजिक यथार्थ को कलात्मकता के साथ जोड़ते हैं। यही कारण है कि 'काल कथा' केवल विचारोत्तेजक कहानी नहीं, बल्कि शिल्प की दृष्टि से भी समकालीन हिंदी कहानी की एक उल्लेखनीय उपलब्धि सिद्ध होती है।
'काल कथा' कहानी का स्थायी महत्त्व इस बात में निहित है कि वह एक ऐतिहासिक संकट को केवल तत्कालीन घटना के रूप में दर्ज नहीं करती, बल्कि उसे मनुष्य और समाज के संबंधों की व्यापक पड़ताल में रूपांतरित कर देती है। यह कहानी दिखाती है कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके आर्थिक विकास, तकनीकी उपलब्धियों या भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उन मानवीय मूल्यों में निहित होती है जो संकट की घड़ी में मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं। संतोष दीक्षित ने इस रचना में जीवन के उन सूक्ष्म पक्षों को पकड़ा है जो सामान्य परिस्थितियों में अक्सर अनदेखे रह जाते हैं, किन्तु असाधारण समय में अपनी पूरी अर्थवत्ता के साथ सामने आते हैं।
कहानी का एक बड़ा योगदान यह है कि वह अनुभव के विविध स्तरों-सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक और अस्तित्वगत- को एक साथ समेटते हुए समकालीन भारतीय जीवन का बहुआयामी चित्र प्रस्तुत करती है। यहाँ मनुष्य केवल परिस्थितियों का शिकार नहीं है; वह स्मृतियों, संबंधों, आशाओं और संघर्षों से निर्मित एक जीवंत उपस्थिति है। यही कारण है कि 'काल कथा' महामारी के समय की कहानी हो कर भी उससे आगे निकल जाती है और मनुष्य की गरिमा, उसकी जिजीविषा तथा उसकी संवेदनात्मक शक्ति के पक्ष में एक स्थायी साहित्यिक साक्ष्य बन जाती है। यही इसकी सबसे बड़ी रचनात्मक उपलब्धि है। 'काल कथा' की बडी विशेषताओं में से एक इसकी गहरी मानवीय संवेदना है। कहानी का प्रभाव केवल इसलिए नहीं है कि वह कोरोना-काल जैसी ऐतिहासिक त्रासदी का चित्रण करती है, बल्कि इसलिए भी है कि वह पाठक को मनुष्य की पीड़ा और उसके भावनात्मक संसार से जोड़ देती है।
साहित्य में करुणा का अर्थ मात्र दुःख का चित्रण नहीं होता; वह दूसरे के अनुभव को अनुभव करने की क्षमता का विकास भी करती है। इसी अर्थ में 'काल कथा' करुणा की एक महत्त्वपूर्ण कथा है।
कहानी में करुणा किसी एक घटना से पैदा नहीं होती। वह धीरे-धीरे निर्मित होती है। कृष्णा बिंद और सुंदरी देवी की प्रतीक्षा, बेटों की चिंता, सीमित संसाधनों के बीच जीवन को संभालने का प्रयास और भविष्य के प्रति उनकी आशाएँ पाठक को उनके जीवन से जोड़ती चलती हैं। जब अंत में त्रासदी घटित होती है, तब पाठक केवल एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं करता; वह उन समस्त भावनात्मक निवेशों के विफल हो जाने का अनुभव करता है जो कथा के दौरान निर्मित हुए थे।
विशेष बात यह है कि कहानी करुणा को भावुकता में परिवर्तित नहीं होने देती। कथाकार कहीं भी आँसू निकालने वाली भाषा का सहारा नहीं लेता। वह घटनाओं को उनके स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत करता है। परिणामस्वरूप करुणा अधिक प्रामाणिक और प्रभावशाली बन जाती है। यही इस कहानी की संवेदनात्मक शक्ति का आधार है।
यद्यपि कहानी का शीर्षक 'काल कथा' है, फिर भी इसके समय-बोध पर अलग से विचार किया जाना चाहिए। यहाँ समय केवल घटनाओं का क्रम नहीं है। वह पात्रों के अनुभव का हिस्सा है। महामारी का समय सभी के लिए समान नहीं है। किसी के लिए वह घर में सुरक्षित रहने का समय है, तो किसी के लिए जीविका और अस्तित्व के संकट का समय ।
कहानी में प्रतीक्षा का समय विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। माता-पिता लगातार अपने बेटों की वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह प्रतीक्षा केवल भौतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक है। प्रतीक्षा के कारण समय का अनुभव लंबा, बोझिल और बेचैन हो जाता है। इस प्रकार कहानी समय के मनोवैज्ञानिक आयाम को भी उद्घाटित करती है।
स्मृति भी कथा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पात्र बार-बार अपने बच्चों, उनके भविष्य और उनके साथ जुड़े अनुभवों को याद करते हैं। स्मृति उनके लिए आशा का स्रोत भी है और चिंता का कारण भी। इस प्रकार वर्तमान, अतीत और भविष्य लगातार एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
समकालीन हिंदी कहानी में पिछले तीन दशकों के दौरान सामाजिक यथार्थ, विस्थापन, श्रम, बाज़ारवाद और हाशिये के जीवन से जुड़े प्रश्न प्रमुख रूप से उपस्थित हुए हैं। उदय प्रकाश, स्वयं प्रकाश, संजीव, अखिलेश, असगर वजाहत, पंकज मित्र, सत्यनारायण पटेल और हरि भटनागर जैसे कथाकारों ने अपने-अपने ढंग से बदलते भारतीय समाज की जटिलताओं को अभिव्यक्ति दी है। 'काल कथा' इसी परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखी जा सकती है।
इस कहानी की ख़ासियत यह है कि यह कोरोना-काल जैसे ऐतिहासिक अनुभव को केंद्र में रखकर भी केवल महामारी-कथा बन कर नहीं रह जाती। इसमें वर्गीय विषमता, प्रवासी जीवन, तकनीक, परिवार, मानवीय संबंध और सामाजिक असुरक्षा जैसे अनेक प्रश्न एक साथ उपस्थित हैं। इस दृष्टि से यह कहानी अपने समय के बहुआयामी यथार्थ को समेटने वाली रचना के रूप में सामने आती है।
समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में कोरोना-काल पर अनेक रचनाएँ लिखी गई, किन्तु उनमें से बहुत-सी तत्कालीन अनुभवों के दस्तावेज़ भर बनकर रह गई। 'काल कथा' की विशेषता यह है कि वह तत्कालीन घटना से आगे जा कर मनुष्य और समाज के स्थायी सवालों से रूबरू होती है।
सन्दर्भ
बुनियादी पाठ
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One small MLA correction: the title should be Existentialism Is a Humanism (with "Is" capitalised), not Existentialism is a Humanism.
(रवि रंजन हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व-अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर रह चुके हैं।)
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| रवि रंजन |
सम्पर्क
ई मेल : raviranjan@uohyd.ac.in
















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