कुमार कृष्ण शर्मा की कविताएँ
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| कुमार कृष्ण शर्मा |
पहले यह परम्परा थी कि किसान अपने अनाज का एक हिस्सा अगली फसल के बीज के तौर पर सुरक्षित रख लेता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले मौसम में पैदा अन्न बीज बनने की क्षमता नहीं रखते। हमने उन्हें अब हाइब्रिड बना दिया है। कहा जा सकता है कि आज का जमाना ही हाइब्रिड का है। हाइब्रिड बीजों वाले खेत खूब लहलहाते हैं। अनाज भी खूब होता है। लेकिन यह एक कड़वा सच है कि उनमें बीज बनने की क्षमता नहीं होती। यह खेल भी पूंजीपतियों का है। वे चाहते हैं कि किसान हर वर्ष महंगे बीज खरीद कर ही खेत बोये और इसकी आमदनी उनकी जेब में जाए। किसान जिसकी नियति ही परेशान होना है, झक मार कर बीज खरीदता है। पूंजीपतियों की लालची नजर अब किसानों की जमीन पर है। किसी भी तरह अब वे उसे हड़पना चाहते हैं। रचनाकार की नजर इन सब पर है। कुमार कृष्ण शर्मा किसानों की संवेदनाओं से भलीभांति परिचित हैं। अपनी कविता में वे लिखते हैं 'किसान जेब टटोलता है/ उसमें खेतों की मिट्टी है/ सामने वहां बीज के चमकीले पैकेट हैं/ जिनको जेब से मतलब है/ मिट्टी से नहीं'। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुमार कृष्ण शर्मा की कविताएँ।
कुमार कृष्ण शर्मा की कविताएँ
शहीद की मां
हर साल
सर्दियां आने से पहले
एक मां
गांव के चौक में लगी
पत्थर की प्रतिमा तक जाती है
इस साल
जल्द आ गई हैं सर्दियां
कांप रहे हैं मां के हाथ
ठंड से
या याद से
कहना मुश्किल है
वह प्रतिमा के कंधों पर
धीरे-धीरे रजाई ओढ़ाती है
कहीं टूट न जाए नींद
धीमे से बोलती है
आज ज्यादा ठंड है
लोग कहते हैं
यह तो पत्थर है
मां आंखों में आंसू ले
बस कहती है
अगर मुझे ठंड लगती है
मेरे बेटे को भी तो लगती होगी
वह याद करती है
आखिरी बार
जब छुट्टियां काट गया
तो कह गया था
छोटी है उसकी रजाई
ठंड लगती है रात को
इस बार
थोड़ी बड़ी बनावा रखना
मां ने
कपास चुन ली थी
कपड़ा भी देख लिया था
लेकिन
देश आ गया बीच में
अब
हर साल
मां एक रजाई बनाती है
और बेटे को ओढ़ा आती है
रात में
जब पाला गिरता है
मां दरवाजा बंद करते हुए
आसमान की ओर देखती है
जैसे पूछ रही हो
अब तो ठंड नहीं लग रही बेटा
मां जानती है
बेटे पत्थर के नहीं होते
खेत और जेब
पहाड़ से उतर कर
एक किसान
कस्बे की एक संकरी गली में
आ खड़ा हुआ है
बीज की दुकान के आगे
दाम सुन कर
थोड़ी देर खामोश रह
धीरे से बोलता है
पिछले साल से
फिर महंगा हो गया बीज
खामोश रहता है दुकानदार
किसान
एक पैकेट उठा
पूछता है
इसकी फसल से
अगर अगले साल के लिए
बीज बना लूं तो
यह हाइब्रिड बीज हैं
इससे बीज नहीं बनते
अच्छी पैदावार के लिए
हर बार लेना पड़ेगा नया
किसान दुकान से बाहर आ
एक किनारे बैठ
अपनी टोपी घुटनों पर रख लेता है
हथेली से
टोपी का किनारा ऐसे सीधा करता है
जैसे वह टोपी नहीं
उसके खेत की मेड़ हो
किसान जेब टटोलता है
उसमें खेतों की मिट्टी है
सामने वहां बीज के चमकीले पैकेट हैं
जिनको जेब से मतलब है
मिट्टी से नहीं
कितना जरूरी है
गर्मियों की कड़ी धूप में
मेरा सात साल का बेटा
छत पर
एक कटोरी पानी रख आया है
छत्त पर कोई नहीं आता पानी पीने
नहर मेरे घर के साथ जो बहती है
मैंने पूछ ही लिया
किसके लिए छोड़ा है पानी
बेटा बताता है
कितनी गरमी है पापा
अगर सूरज को लगी प्यास
सूखा उसका गला
तो वो कहां से पीएगा पानी
उसके लिए रख छोड़ी है भरी कटोरी
सोचता हूं
उसको बता दूं सारा रहस्य
गलत है उसका सोचना
सूरज नहीं पीता पानी
बोलते बोलते रुक जाता हूं
उसकी बातों में
कोई विज्ञान नहीं
बहुत सारा भरोसा है
बचा रहे उसका भरोसा
और आज की दुनिया में
कितना जरूरी है
कुछ चीजों का बचा रहना
सफेद तौलिया
कौन होगा वो
जिसने
सबसे पहले कुर्सी पर
लिपेटा होगा सफेद तौलिया
क्या सोचा होगा उसने
कोई छू न ले इस कुर्सी को
इस पर बैठने वाला
लगे तोलिए सा बेदाग
सबसे अलग
सफेद तौलिया
बैठने वाले के पसीने से नहीं डरता
वह उस हाथ के स्पर्श से डरता है
जो रोज मेहनत करते हैं
उस पीठ से
जो बोझ से झुकती रही है
उस शरीर से
जिसे कभी साफ कहलाने का मौका नहीं मिला
क्या सोचता होगा वह
जो इस तोलिए पर बैठता होगा
मैं कितना सुरक्षित हूं इस सीट पर
खास हूं बाकी सबसे
जलवा कायम है अपना
कहीं ऐसा तो नहीं
इस सीट पर बैठने के बाद
आदमी कुछ भी नहीं सोचता
और यही
सबसे डरावनी बात हो
समय की जेब
नव्वे साल का बूढ़ा
जवानी याद करते हुए कहता है—
जब मैं जवान था
पैदल पहुंच जाता था जम्मू से अपने गांव
पंद्रह किलोमीटर दूर है शहर
एक बार लौटते हुए
शहर से सटे राजपुरा में
छिंज^ देखने रुक गया था
पता ही नहीं चला
कब शाम उतर आई
टांगे वाला
आठ आने मांग रहा था
दस किलोमीटर की दूरी का
बहुत हल्की जेब थी मेरी
नहीं थे उसमे आठ आने
जिस टांगे पर बैठ
पहलवान लौट रहे थे
उसी के साथ
दौड़ते-दौड़ते पहुंचा अपने गांव
पहलवानों को भी बोलना पड़ा
“शाबाश जवाना, कमाल करी ओडया तू।”
(शाबाश जवान, तुमने कमाल कर दिया)
अब
दीवार पकड़ कर
बाथरूम तक पहुंचता हूं
आंगन तक जाने में
सुबह से दोपहर हो जाती है
आज भी
हल्की है जेब मेरी
बेटे खाना खिला दें
तो उनकी मेहरबानी
थोड़ी देर चुप रह कर बोल पड़ता है—
नई पीढ़ी
कहां समझती है
सबसे कीमती भारी जेब नहीं
समय होता है
^दंगल
कुछ नहीं कहा उसने
मैं दो घंटे देर से पहुंचा
बस स्टाप पर खड़े खड़े धूप
उसके चेहरे पर उतर आई थी
कमल के फूल सा चेहरा
केसर का फूल बन गया था
सोचता हूं उसने घड़ी तो
कई बार देखी होगी
पर मैं भूल गया
स्त्रियाँ
समय नहीं
संभावनाएं गिनती हैं
हो सकता है अचानक आन पड़ा हो जरूरी काम
किसी कारण बंद हो गई हो सड़क
कहीं हो तो नहीं गई कोई अनहोनी
मेरे पहुंचते ही
बिना कुछ कहे
मुस्कुराती चल पड़ी मेरे साथ
मैंने कहा लेट हो गया यार
घर से निकल ही रहा था कि मेहमान आ गए थे
समय का हिसाब क्यों दे रहे हो मुझे
प्रेम क्या हिसाब रखता है
उसके मुहं से निकला यह वाक्य
इतना सरल नहीं था
जितना सुनाई दिया
मैं
उसकी मुस्कान से राहत पा कर
भूल गया
स्त्री का मौन
सबसे लम्बा संवाद होता है
अब नहीं होगी लड़ाई
वो देखो
ड्रोन आ रहे हैं
लड़ाई की एक शांत शाम
छत पर टहलता छोटा भाई चिल्लाता है
मेरा ग्यारह साल का बेटा
चाचा से हाथ छुड़ा
बदहवासी में उतरता है सीढ़ियां
आखिरी पायदान तक पहुंचते-पहुंचते
गिर पड़ता है नीचे
कमरे में आते ही
लेट जाता है बिस्तर पर
देखता हूं
सफेद हो गया है उसका चेहरा
मैं उसे उठाकर
सीने से लगा लेता हूं
कहता हूं
मेरे होते किस बात की चिंता
मेरी आवाज
उसे कम
मुझे ज्यादा दिलासा देती है
दस मिनट लग गए
उसको होश में आते-आते
उन दिनों हर शाम
अंधेरी कोठी में छिपा रहा मेरा बेटा
देर रात जब तक तोपों के गोले
अपना काम कर लौट नहीं जाते
वह एक कोने में
अपने घुटनों को
सीने से लगाए बैठा रहता
जब सीजफायर हुआ
घर में सबसे ज्यादा खुश
वही था
बस बार-बार पूछता रहा
पापा, अब तो नहीं होगी लड़ाई
साल होने को आया है
अब भी कभी कभी
पूछ ही लेता है सवाल
पापा…फिर से तो नहीं होगी लड़ाई
यह जानते हुए
मेरे पास कोई हल नहीं
मैं देता हूं जवाब
नहीं बेटा
अब नहीं होगी लड़ाई
रिस रहा है बहन का जख्म
उम्र के साठ साल पार करने बाद भी
मेरी बड़ी बहन
नहीं होती पिता के सामने
एक बार बचपन में
मां ने खाने की थाली पकड़ाते कहा
‘ले जाओ पिता के कमरे तक’
हल्की थी उम्र
भारी थी थाली
पहुंचते-पहुंचते कटोरी से
थाली में गिर गई दाल
पिता ने थाली छीन
फैंक दी आंगन में
आंखें लाल
आवाज और लाल
‘दफा हो मेरे कमरे से’
मां को भी सुना दीं दो-तीन
उस दिन के बाद
जब भी हुई पिता के सामने
कांप गई उसकी रूह
लगा कुछ अटक गया है गले में
उम्र के इस पडाव में भी
चाव ही रहा
पिता लगाएं गले
सिर पर हाथ फेर पूछें
‘कैसी हो बेटी
मेरे होते किस बात की चिंता’
बहन की शादी को हो गए हैं पैंतीस साल
मायके में वह कभी नहीं जाती पिता के कमरे तक
बस मां के कमरे में बैठ लौट जाती है ससुराल
वापसी पर बार-बार गले को साफ करती है
दाल का वह जख्म
रुआंसे गले से रिस रहा है आज तक
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
कवि परिचय
पुरखू, जम्मू
जन्म: अगस्त 1974
शिक्षा: बीएससी (आनर्स) एग्रीकल्चर, एमए इंग्लिश
2007 में लिखना शुरू किया।
‘लहू में लोहा’ (कविता संग्रह) और ‘Dervish in the City of Merchants’ (हिंदी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद) प्रकाशित।
पंद्रह सालों का हिंदी, अंग्रेजी पत्रकारिता का अनुभव। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान, फरीदा खानम, प्रो रहमान राही, डा नामवर सिंह, पदमा सचदेव आदि का साक्षात्कार।
विभिन्न प्रिंट पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। लेखन अनेक आनलाइन मंचों पर लाइव। कई संकलनों में कविताएं सकलिंत। कविताओं का पंजाबी, बंगला, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन जम्मू कश्मीर में पहला हिंदी साहित्य आधिारित ब्लॉग ‘खुलते किवाड़’ को शुरू किया।
संप्रति: कृषि उत्पादन और किसान कल्याण विभाग में एग्रीकल्चर एक्सटेंशन अस्सिटेंट के रूप में कार्यरत।
सम्पर्क
मोबाइल: 9419184412, 7051652122
ई मेल : kumarbadyal@gmail.com




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