कुमार कृष्ण शर्मा की कविताएँ
कुमार कृष्ण शर्मा पहले यह परम्परा थी कि किसान अपने अनाज का एक हिस्सा अगली फसल के बीज के तौर पर सुरक्षित रख लेता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछले मौसम में पैदा अन्न बीज बनने की क्षमता नहीं रखते। हमने उन्हें अब हाइब्रिड बना दिया है। कहा जा सकता है कि आज का जमाना ही हाइब्रिड का है। हाइब्रिड बीजों वाले खेत खूब लहलहाते हैं। अनाज भी खूब होता है। लेकिन यह एक कड़वा सच है कि उनमें बीज बनने की क्षमता नहीं होती। यह खेल भी पूंजीपतियों का है। वे चाहते हैं कि किसान हर वर्ष महंगे बीज खरीद कर ही खेत बोये और इसकी आमदनी उनकी जेब में जाए। किसान जिसकी नियति ही परेशान होना है, झक मार कर बीज खरीदता है। पूंजीपतियों की लालची नजर अब किसानों की जमीन पर है। किसी भी तरह अब वे उसे हड़पना चाहते हैं। रचनाकार की नजर इन सब पर है। कुमार कृष्ण शर्मा किसानों की संवेदनाओं से भलीभांति परिचित हैं। अपनी कविता में वे लिखते हैं 'किसान जेब टटोलता है/ उसमें खेतों की मिट्टी है/ सामने वहां बीज के चमकीले पैकेट हैं/ जिनको जेब से मतलब है/ मिट्टी से नहीं'। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुमार कृष्ण शर्मा की कविताएँ। कुमार क...