कैलाश गौतम की कविता 'अमौसा के मेला'
कैलाश गौतम महाकुम्भ में यूं तो कई स्नान पर्व होते हैं, लेकिन इसका मुख्य स्नान पर्व मौनी अमावस्या को होता है। इस दिन करोड़ों लोग संगम तट पर पुण्य स्नान करते हैं। इस मेले को इलाहाबाद और आसपास की बोलियों में 'अमौसा का मेला' भी कहा जाता है। मेले में शामिल होने का जनता का उत्साह देखते ही बनता है। लोक कवि कैलाश गौतम ने इस अमौसा के मेले पर ही एक कविता अपनी बोली बानी अवधी में लिखी। यह कविता काफी ख्यात हुई और कैलाश गौतम के पहचान के साथ जुड़ गई। इस कविता में मेले के कई शेड्स देखे जा सकते हैं। महाकुम्भ विशेष के अन्तर्गत हम आज पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं कैलाश गौतम की कविता 'अमौसा के मेला'। महाकुम्भ विशेष : 16 'अमौसा के मेला' कैलाश गौतम भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा, धरम में, करम में, सनल गाँव देखा. अगल में, बगल में सगल गाँव देखा, अमौसा नहाये चलल गाँव देखा। एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा. कमरी में केहू, कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू। आजी रँगावत रही गोड़ देखऽ, हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखऽ. घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि,...