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गौतम राजरिशी का आलेख 'कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी'

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गौतम राजरिशी युवा कवि गौतम राजरिशी ने कविता के संदर्भ में कई एक महत्वपूर्ण पाठकीय सवाल उठाए हैं। गौरतलब है कि गौतम ने अपने आलेख का शीर्षक ही दिया है 'कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी'। इस आलेख में जहाँ एक तरफ मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ कविता की दुर्बोधता के समक्ष राजकमल चौधरी की महत्वपूर्ण कविता ‘मुक्ति प्रसंग’ की अवहेलना किए जाने का प्रसंग है वहीं दूसरी तरफ 'लांग नाईनटीज' के शोरोगुल पर भी बेबाक टिप्पणी है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं गौतम राजरिशी का यह आलेख। इस आलेख/ टिप्पणी पर आपकी पाठकीय टिप्पणियों/ सहमतियों/ असहमतियों का स्वागत है।                                 कविता की कॉन्सपिरेसी थ्योरी गौतम राजरिशी अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब... मुक्तिबोध की लिखी ये पंक्तियाँ , जो उनकी ख्यात कविता “अँधेरे में” का हिस्सा हैं , शायद सबसे ज़्यादा उद्धृत की जाने वाले काव्य-पंक्तियों में शुमार किए जाने का रौब गाँठती हैं ...

गौतम राजरिशी की कविताएँ

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गौतम राजरिशी किसी सैनिक का नाम सुनते ही हमारे मन में उसके लिए एक अलग तरह के मनोभाव उठने लगते हैं. देश के लिए मर-मिटने के लिए हर घडी तैयार रहने वाला वाला ऐसा शख्स जो हमेशा युद्ध की परिस्थितियों में रहता है. जो युद्ध के लिए नियुक्त ही किया जाता है और युद्ध को जीता और महसूस करता है.   लेकिन हम भूल जाते हैं कि तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी होता है जिसमें उस सैनिक के अन्दर एक सजग-संवेदनशील इंसान का जागरुक मन होता है. विपदाओं को करीब से देखने और भोगने की वजह से उसके अन्दर जो प्रेम जगता है वह औरों से अलग और सघन अनुभूति लिए होता है. गौतम राजरिशी की कविताएँ पढ़ते हुए प्रेम की इस सघन अनुभूति को सहज ही महसूस किया जा सकता है. अगर कवि की पंक्तियों का ही सहारा ले कर कहूं तो गौतम राईफल के कुंदे से परे उन पंक्तियों में बंट जाना चाहते हैं जो छन्द की बन्दिशों की भी परवाह नहीं करती. जहाँ होता है बस एक आजाद, उन्मुक्त और बदहवास अनुभूति. बिल्कुल एक सहज जीवन की ही तरह कुछ-कुछ बेतरतीब और किसी भी तरह के अनुशासन से मुक्त. जहाँ एक घर की यादें हमेशा उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं और जो प्रेम की उस गली में खोना च...