मोहन लाल यादव का आलेख 'सत्यकामी नीलकांत, बहुआयामी नीलकांत'
नीलकांत साहित्य का भी अपना एक प्रतिपक्ष होता है। इस प्रतिपक्ष में वे होते हैं जिनका स्वभाव विद्रोही का होता है। इस प्रतिपक्ष का चयन स्वयं करना पड़ता है। नीलकांत ऐसे ही रचनाकार थे जो आजीवन 'साहित्य का प्रतिपक्ष' रचते रहे। उन्हें 'हिन्दी साहित्य का आउटसाइडर' भी कहा गया। आउटसाइडर इसलिए कि वे बने बनाए खांचे में फिट नहीं हो पाते थे। कह सकते हैं उनका स्वभाव ही इस तरह का था। वे अपने ही जीवन को नष्ट करने की हद तक अराजक थे। इस अराजकता के वे स्वयंभू नायक थे। इसीलिए उनके इस अराजकता का शिकार खुद उनके परिवार को भी होना पड़ा। कथाकार मार्कण्डेय जी उनके सगे बड़े भाई थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा 'नीलकांत एक असाधारण कथाकार हो सकते थे। उनके अन्दर इसकी योग्यता भी थी। लेकिन उन्होंने अपनी ही अराजकता से खुद की प्रतिभा को नष्ट कर लिया।' रामचन्द्र शुक्ल पर लीक से अलग हट कर जो काम उन्होंने किया वह उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित करता है। जोखिम उठाते हुए भी उन्होंने इस काम को अंजाम दिया। मार्कण्डेय जी कहते थे जिस साहित्यकार का वध करना हो उसकी किताब नीलकांत को थमा दो। बाकी का काम नीलकांत कर दे...