मुकेश मानस की कहानी 'चींजे जब लौटती हैं'
किसी भी कहानीकार के लिए मिथक एक चुनौती की तरह होते हैं । पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे इन मिथकों से आज के सन्दर्भ को जोड़ते हुए कोई कृति लिखना आसान काम नहीं । मुकेश मानस ने अपनी कहानी 'चीजें जब लौटती हैं' में हमारे प्राचीन मिथक को आधुनिक सन्दर्भों से भलीभांति जोड़ कर यह साबित किया है कि उनमें एक बेहतर रचनाकार की अपार संभावनाएँ हैं । आईये पढ़ते हैं युवा कहानीकार मुकेश मानस की यह नयी कहानी । चीजें जब लौटती हैं मुकेश मानस कहानी के प्रारम्भ में आदमगढ़ की पहाड़ियां तकरीबन आधा-पौना घंटा चलने के बाद हमें सड़क के बांईं तरफ़ आदमगढ़ की पहाड़ियां दिखाई पड़ने लगीं। इन पहाड़ियों का एक सिरा तो वहाँ भी था जहां से हमने चलना शुरु किया था। मगर बीच में यह कहीं खो सी गईं लगती हैं। सूरज की तेज रौशनी में सोने सी चमचमाती, अपने भीतर हज़ारों वर्षों के अतीत और जीवनानुभवों का अथाह भंडार लिए किसी गर्व से अपना माथा उठा, अटल, निश्चल और निस्पृह सी पहाड़ियों की इस श्रृंखला ने बरबस ही मेरा मन मोह ...