मिज़ाज की कहानी 'संडे की ओ टी पी'
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| मिज़ाज |
व्यवहार और सिद्धान्त भले एक दूसरे से जुड़े प्रतीत होते हैं लेकिन उनमें हमेशा एक गहरी फाँक होती है। इसीलिए ट्रेनिंग या अभ्यास की जीवन में एक बड़ी भूमिका होती है। यह जान कर आपको ताज्जुब हो सकता है कि हमारे इर्द गिर्द तमाम लोग ऐसे भी हैं जो गेहूँ, जौ, अरहर, अलसी, मूँग, मसूर के पौधे को नहीं पहचान सकते। ये ऐसे लोग हैं जो पैक्ड बैग में यह सब खरीदते और उपयोग करते हैं। जो इन फसलों तक से अनभिज्ञ हैं वे किसानों की संवेदनाओं और दिक्कतों को कैसे समझ सकते हैं। यह ठीक है कि खेती किसानी से जुड़े लोग इन फसलों की खेती अपनी आजीविका के लिए करते हैं लेकिन दुनिया की भूख को मिटाने की जिम्मेदारी भी यही निभाते हैं। ये किसान अनाज के इन पौधों को आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि खेती से उनके सरोकार गहरे तक जुड़े होते हैं। मिज़ाज ने इसी सन्दर्भ को ले कर कहानी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मिज़ाज की कहानी 'संडे की ओ टी पी'।
कहानी
'संडे की ओ टी पी'
मिज़ाज
वह इतवार का दिन था और सोया को आफिस नहीं जाना था। सोया महज़ 22 वर्ष की थी और कैंपस प्लेसमेंट के बाद मेट्रो शहर में उसकी पहली नौकरी शुरू हुई थी। वह वर्क फ्राम आफिस और वर्क फ्राम होम के बीच खुद को ढालने का प्रयास कर रही थी। छुट्टी वाले दिन के लिए सोया के पास कोई काम तय नहीं था।
सोया ने आलस भरी सुबह में ओ टी टी प्लेटफार्म पर कोई वेब सीरीज लगा ली। और उसके किरदार जिसमें मुख्य किरदार पहाड़ो पर आउटिंग करने के लिए खुद की तैयारी करता है और सोया खुद को उसी किरदार में ढला हुआ पाती है। जहाँ एक ही सड़क है और आसमान चूमते लहलाते पेड़ हैं। पेड़ों को आपस में कोई प्रतियोगिता नहीं करनी पड़ रही। आसमां फ़लक तक फैला है और पेड़ों की डालियाँ कैनोपी की तरह झूल रहीं हैं। सोया जैसे आसमान और ज़मीन के बीच पालने में झूल रही हो। तभी उसकी चार सीट वाली छोटी कार धीमी होने लगी।
अचानक हुये भूस्खलन की वजह से रास्ता अवरुद्ध हो गया था और आगे का रास्ता अघोषित रूप से बंद कर दिया गया था। जियादातर लोग वहीँ से वापिस लौट रहे थे। पर सोया ने वहीं इंतज़ार करने का तय किया। वह एक हाटू गांव था। हाटू एक पहाड़ी गाँव था। जो वहां के ग्राम देवता हाटू की वजह से पड़ा था। हाटू देवता का मंदिर गाँव के बीच में था। हाटू देवता वहां से सबको निहारते रहते थे। हाटू देवता मंदिर के पुजारी ने सोया के रहने का इंतजाम वहीँ मंदिर की धर्मशाला में कर दिया।
वहां पानी तो उपलब्ध था पर खाना उपलब्ध नहीं था। एक दिन पानी और चाय के साथ बिताने पर सोया को भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी। सारे आनलाइन प्लेटफार्म किसी भी तरह का खाना पहुंचाने को तैयार न थे जहां सोया ने रुकने का निर्णय लिया था। सोया को दो मिनट की मैगी के अलावा कुछ बनाना नहीं आता था। और यहां पैक्ड खाना तो दूर पैक्ड पानी भी उपलब्ध न था। उस रात पहली बार सोया ने गूगल पर हाऊ टू कुक फूड टाइप किया.....।
और गूगल के डूडल ने सोया को जैसे सब्जी मंडी में ही ला खड़ा किया हो। जल्द ही सोया को पता लग चुका था कि पैक्ड फ़ूड आर्डर करना व फूड बनाना अलग मसला है और पकाने के लिए कच्चा माल खरीदना बिल्कुल अलहदा। कच्चा माल खरीदने के लिए मात्रा जो पाव, किलो, नग, दर्जन किसी में हो सकती है और उसकी कीमतों से अपनी आमदनी के साथ बिठाने के लिए गणित आनी चाहिए।
सोया ने अपनी भूख को तरज़ीह देते हुए हाटू गांव के लोकल बाजार में जाने का निश्चय किया। वहां हजारों फीट की ऊंचाई पर कुछ एक सब्जी वाले टोकरी में कुछ ही ऐसी सब्जियां बेच रहे थे जिनको शक्ल से पहचान सकता था। सोया ने सब्जियों को अपने इस रुप में पहली बार देखा था।
पहला सब्ज़ी वाला; सब्ज़ी के साथ रेसिपी भी बताता। उसकी अज्ञानता को भांपते हुए सब्जी वाले ने सोया को नसीहत दी कि यहां ऊंचाई के कारण सब्जियां देर में गलती हैं। सभी सब्जियां काट कर नहीं धुली जातीं, सभी हरे पत्ते सब्जियां नहीं होते, सभी सब्जियां आप खुद घर पर काट नहीं सकते, उन्हें सब्जी वाले से ही कटवाना होता है। उसका तो दिमाग ही चकराने लगा। यह खाना था या गणित? यही सोचते हुए.... उसने दूसरे सब्ज़ी वाले की ओर रुख किया।
दूसरा सब्ज़ी वाला; उसके पास सारी मौसमी पत्तेदार सब्जियां थी। एक-एक सब्ज़ी को उसने बंडल बना के रखा था। इन सब्ज़ियों को सीधे काट कर नहीं पकाया जा सकता। उसने सोया को बताया।
सोया; उसका दिमाग अनधिमान की स्थिति में पहुँच जाये इससे पहले वह बोला!
दूसरा सब्ज़ी वाला; पत्तेदार सब्ज़ियों को तने से अलग करना होता है जो एक निहायत ही धैर्य और अनुशासन का काम है।
सोया; अब उसके चेहरे पर एक किस्म की तिरस्कार की भावना जाग्रत हो रही थी। उसे लगा कि पेट भरने के लिए कुछ भी तो खाया जा सकता है। वह कोई बुरा अनुभव तो नहीं देता बल्कि जो भी वह पैक्ड भोजन या किसी फ़ूड चेन में जो खाना कहती है एक तलब ही पैदा करता है।
तीसरा सब्ज़ी वाला; जो सोया को हाटू गाँव की छोटी हाट में देख कर अचंभित था। इसलिए उसकी अन्य सब्ज़ी वालों से की गयी बातों को सुन चूका था।
तीसरा सब्ज़ी वाला; जिस तरह दुनिया एक भूगोल है। सब्ज़ियों का पाया जाना उसी भूगोल का अनुपात। एक तापमान नमी की दरकार ही सब्ज़ियों के स्वाद को बढ़ावा देती है। अगर आप एक फ़ूड चेन को फॉलो करते हैं तो आपकी जीभ की तलब तो बढ़ेगी लेकिन शरीर के तंत्र की ऊर्जा नहीं।
सोया; घर और हॉस्टल की मेस के बाद आज उसने पहली बार जाना कि खाना महज़ खानापूर्ति नहीं है। आज सहसा ही ऐसी विसंगत परिस्थतियों ने एक अलग ही विज्ञान से रूबरू करा दिया।
सोया; लगभग रात होती जा रही थी। हाटू पहाड़ी पर धीरे-धीरे रौशनी टिमटिमाने लगी थी। हाटू की हाट में अब जियादातर दुकानदार अपने सामान को समेटे जा रहे थे। जल्दी ख़राब हो जाने वाली सब्ज़ियों को अब खरीददार को कम दाम दे कर भी बेचने को राज़ी थे। कुछ और न सूझ कर सोया ने एक अपरिचित सब्ज़ी मैथी का बंडल उस तीसरे सब्ज़ी वाले से लिया। सब्ज़ी वाले ने उसे टमाटर और प्याज की चटनी की रेसिपी बताते हुए पाव भर सब्ज़ी टमाटर, मिर्च, लहसुन की कली, हरा धनिया, लेमन, हल्दी और अदरक की छोटी सी गाँठ उसके हवाले कर दी।
सोया जब हाटू मंदिर की धर्मशाला में दाखिल हुई तो पुजारी जी शाम की आरती कर के प्रसाद बाँट रहे थे। पुजारी जी ने सोया को प्रसाद दिया और उससे शाम के खाने के बारे में पूछा?
सोया; जो पहले से ही नर्वस थी उसने हाट का पूरा वाकया पुजारी जी को सुनाया और उस सब्ज़ी वाले की सब्ज़ी जो उसको एक भूल भुलय्या लग रही थी। वह कैसे शुरू करेगी और कैसी बनाएगी के लिए केवल गूगल पर निर्भर थी।
पुजारी; ने कहा तरकारी जिसके लिए बन रही है और जो बना रहा है उसके बीच एक संवाद होता है तभी तरकारी में स्वाद आता है। संवादहीनता तो बस खिचड़ी पका सकती है तरकारी नहीं। आग तेज़ कर कम मिनट में तरकारी पकाने का नुस्खा एक फ़ूड चेन के लिए सही हो सकता है। भूगोल के लिए नहीं।
सहसा सोया की आंख खुली तो देखा कि मोबाइल फ़ोन लगातार रिंग कर रहा है। किसी पैक्ड खाने के आर्डर कर के सोया की आंख लग गयी थी।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)
सम्पर्क
मोबाइल : 9140256381
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बढ़िया।
जवाब देंहटाएंसार्थक लेखन
जवाब देंहटाएंSimple words, powerful message
जवाब देंहटाएंSir,
जवाब देंहटाएंThe story is simple, relatable, and thought-provoking. It made me reflect on how easily we take everyday things for granted in our fast-paced lives.
Thank you for sharing such a wonderful piece of writing.
सरल भाषा, गहरा संदेश और प्रभावशाली प्रस्तुति। समकालीन जीवन की सच्चाइयों को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। गुरु जी को हार्दिक बधाई!
जवाब देंहटाएंकहानी ने आधुनिक जीवन की विडंबनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से उकेरा है। सरल भाषा में गहरा संदेश देने वाली उत्कृष्ट रचना। हार्दिक बधाई! Sir
जवाब देंहटाएंहमारे आधुनिकता से भरे जीवन में जो भी हमको सहज रूप से उपलब्ध है भोजन संसाधन या संस्थाएं जीवन की भागदौड़ में हम उनके पीछे का विज्ञान और संयम दोनों भूल जाते है। और भूल जाते है प्रकृति और उसके संवाद को। शुक्रिया गुरु जी सोया के स्वयं से किए संवाद के लिए अब जब वो अगली बार पहाड़ों पे आएगी तो आवश्यक रूप से 1 2 पहाड़ी सब्जी के बारे में सीख के आएगी और अंत में उसको पैकेज फूड ऑर्डर नहीं करना पड़ेगा।
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