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मनोज कुमार पांडेय की कहानी 'गाली रोड'

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  मनोज कुमार पाण्डेय  हमारे आस-पास  जीवन की विविधताएं इतनी अधिक होती हैं कि वे खुद में एक कहानी का रुपाकार ले लेती हैं। कहानी के पात्र हमारे इर्द गिर्द ही खड़े नजर आने लगते हैं और सारा घटना क्रम एक वास्तविक दृश्य की तरह हमारी नज़रों के सामने से गुजरने लगता है। मनोज पाण्डेय उस जमीन से जुड़े कथाकार हैं जिसकी जड़ें लोक में गहरे तक फैली हुई हैं। 'गाली रोड' इसी तरह की कहानी है जिसे पढ़ते हुए अपना परिवेश याद आता है। कहानी में स्वाभाविक तौर पर कई पात्र हैं। इन पात्रों एक लड़की है जो आधारहीन प्रेम प्रसंग को अपने सपनों के हकीकत में जीते हुए ही मुम्बई की अभिनेत्री बनने का ख्वाब संजोने लगती है। एक पत्र 'भंडाफोड़ टाइम्स' है, जो स्टिंग ऑपरेशन के हवाले से ऐसी चटपटी खबरें प्रकाशित करता है तो उसकी टी आर पी बढ़ा सके। एक बाबा है जिसकी गालियां लोगों के लिए आशीर्वाद जैसी हैं और इस आशीर्वाद को पाने के लिए समाज के कद्दावर लोग सक्रिय हैं। मनोज कहानी में लिखते हैं ' पूरा परिहासपुर बाबा की गालियों का ही तो दास है। हर कोई बाबा से गाली खाना चाहता है, इसलिए असली बात हैं गालियाँ। हो सकत...

मनोज कुमार पांडेय की कहानी 'उसी के पास जाओ जिसके कुत्ते हैं'

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  मनोज कुमार पाण्डेय  साहित्य में बातें कहने के लिए रचनाकार अक्सर रूपकों का इस्तेमाल करते हैं। ये रूपक उस घटना परिघटना को और पुष्ट तरीके से रुपायित करते हैं जिनके बारे में बात कही गई होती है। मनोज कुमार पाण्डेय अपनी कहानियों में इसका प्रयोग बेहतर तरीके से करते हैं। अपनी कहानियों में वे व्यंग्य का सहारा लेता हैं। ऐसा व्यंग्य जो अंतर्मन तक को बेध दे। उनकी यह कहानी पढ़ते हुए मुझे हरिशंकर परसाई की याद आई। आजकल अक्सर यह चिंताजनक खबर आम तौर पर देखने को मिलती है कि कुत्तों के झुण्ड द्वारा किसी आदमी पर अचानक हमला कर नोच नोच कर मार डाला गया। कुत्तों द्वारा अप्रत्याशित रूप से हमला अच्छे खासे निडर व्यक्ति को डरा देती है। कुत्तों को हमने पालतू तो बना लिया लेकिन उनके आक्रामक व्यवहार को आज तक हम कहां नियंत्रित कर पाए?  इस कहानी में मनोज कुत्तों के हवाले से उस पूरी व्यवस्था की आक्रामकता का जिक्र करते हैं, जिनको निर्बल आम आदमी को राहत देने के लिए बनाया गया था। पुलिस प्रशासन से हारा हुआ आम आदमी इस क्रम में अदालत जाता है लेकिन जान बचाने की गुहार लगाते आदमी को कोर्ट यह आदेश देती है कि 'वह प...

यादवेन्द्र का आलेख 'ऐसे अनेक कुत्तों से घिरे हुए हैं हम'

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  मनोज कुमार पाण्डेय  आजकल अक्सर यह चिंताजनक खबर आम तौर पर देखने को मिलती है कि कुत्तों के झुण्ड द्वारा किसी आदमी पर अचानक हमला कर नोच नोच कर मार डाला गया। कुत्तों द्वारा अप्रत्याशित रूप से हमला अच्छे खासे निडर व्यक्ति को डरा देती है। कुत्तों को हमने पालतू तो बना लिया लेकिन उनके आक्रामक व्यवहार को आज तक हम कहां नियंत्रित कर पाए? इस सन्दर्भ में अपने कॉलम के अन्तर्गत यादवेन्द्र जी ने मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी 'उसी के पास जाओ, जिसके कुत्ते हैं' का जिक्र किया है। इस कहानी में मनोज कुत्तों के हवाले से उस पूरी व्यवस्था की आक्रामकता का जिक्र करते हैं, जिनको निर्बल आम आदमी को राहत देने के लिए बनाया गया था। पुलिस प्रशासन से हारा हुआ आम आदमी इस क्रम में अदालत जाता है लेकिन जान बचाने की गुहार लगाते आदमी को कोर्ट यह आदेश देती है कि 'वह पहले कुत्तों के मालिक का पता करे। इसके बाद थ्रू प्रॉपर चैनल आए। वह तत्काल अदालत से जाए और कोर्ट का कीमती वक्त जाया मत करे।' वह आम आदमी पाता है कि वह चारो तरफ से उन आक्रामक कुत्तों से घिरा हुआ है जो उसे नोच खाने पर आमादा हैं। यह कहानी उस व्यवस्था पर...

मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी 'शहतूत'

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  मनोज कुमार पाण्डेय  मनोज कुमार पाण्डेय ऐसे कहानीकार हैं जिनके पास सामाजिक यथार्थ के सघन अनुभव हैं। वे हमारे इस समाज के दोहरे चरित्र से भलीभांति वाकिफ हैं। इस भारतीय समाज के पास ऐसे वर्ग हैं जिनके साथ भेदभाव आज भी आम है। कहा जा सकता है कि यह भेदभाव समाज के द्वारा निर्ममतापूर्वक उनके जीवन के साथ ही नत्थी कर दिया गया है। लेकिन मनोज यह नहीं भूलते कि इस वर्ग के पास भी अपना गुस्सा है। यह वर्ग के पास प्रतिशोध भी है। और अवसर मिलने पर वह अपना गुस्सा व्यक्त करने से नहीं चूकता। इस तरह मनोज के पास वह लेखकीय ईमानदारी है जिसकी अपेक्षा किसी भी सजग लेखक से की जाती है। 'शहतूत' मनोज की प्रारम्भिक कहानियों में से एक है। इसे कहानीकार की प्रतिनिधि कहानी माना जा सकता है। इसी शीर्षक से मनोज का एक कहानी संकलन 2009 में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ था। आज इस कहानीकार का जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से इस प्यारे कहानीकार को जन्मदिन की मुबारकबाद। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी 'शहतूत'। 'शहतूत' मनोज कुमार पाण्डेय  तुम्हारे पास बहुत सारी स्मृतियाँ हैं। तुम स...