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परांस-15 : अशोक कुमार की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  जीवन की अन्तिम कड़ी मृत्यु है। भारतीय परम्परा में हर पिता यह चाहता है कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी सन्तान मुखाग्नि दे। सामान्य तौर पर इस जिम्मेदारी का निर्वहन पुत्र करता है। लेकिन बदलते समय के साथ बेटियां भी आगे बढ़ कर यह दायित्व निभा रही है। अशोक कुमार की एक उम्दा कविता है 'बेटी से'। कविता की पंक्तियाँ हैं : 'मेरी चिता में उसी तरह अग्नि धर देना/ जैसे रोज़ सुबह-शाम थाली में/ चपाती धर जाती हो,/ जो प्यार दिया, तुमसे लिया/ उसका अंत अग्नि ही तो है'। अग्नि सब कुछ का अन्त कर डालती है। पार्थिव देह भी अग्नि में जल कर राख बन जाती है और इस तरह मिट्टी अपनी मूल मिट्टी में मिल जाती है। कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हैं 'बाप मरण तो कह पाया/ पर अपना जीना न कह सका/ जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त/ बहुत लम्बी होती है।' मृत्यु आसान है। जीना बहुत कठिन। जीवन में किसिम किसिम किसिम की जरूरतें पड़ती हैं। यानी जीने के लिए चीज़ों की फेहरिस्त बहुत लम्बी होती है। कवि अशोक कुमार जीवन की जरूरतों से वाकिफ हैं। हमारे इस बार के परांस के कवि अशोक कुमार हैं। अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौ...

दीनू भाई पंत की डोगरी कविताएँ

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दीनू भाई पंत  कवि परिचय: दीनू भाई पंत का जन्म 11 मई 1917 को जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले के पैंथल नामक गाँव में हुआ। इनके लेखन की शुरुआत हिन्दी कविता से हुई, मगर कुछ देर बाद इन्हें मातृभाषा डोगरी ने चुन लिया। यह डोगरी के पहले प्रगतिशील कवि हैं। इनकी कविताओं में मेहनतकश जन की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा अभिव्यक्त हुई है। दीनू भाई सामंतीय मानसिकता और अंधविश्वास के सख़्त विरोधी थे। इन्होंने 1946-47 में राजसत्ता के विरुद्ध हुए 'चनैनी आन्दोलन' में सक्रिय भूमिका निभाई। इनके यहाँ विद्रोह, प्रतिरोध, व्यंग्य और साम्यवादी चेतना है, और डुग्गर देस की सुन्दरता व संस्कृति के दिग्दर्शन होते हैं। 'गुत्तलू', 'मंगू दी छबील', 'वीर गुलाब', 'साढ़ा बापू', 'दादी ते माँ '(काव्य), और 'सरपंच', 'अयोध्या', 'नमां ग्रां' (नाटक) इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। इनका देहांत 23 मार्च 1992 को हुआ। कवि का दायित्व महज कविताएँ लिखना ही नहीं होता है। उसका दायित्व होता है अपने आस पास के बेहतर रचनाकारों को प्रकाश में लाना। कवि कमल जीत चौधरी यह काम बखूबी करते रहते हैं...

परांस - 13 : अरविंद शर्मा की कविताएँ

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कमल जीत चौधरी  आमतौर पर अन्तिम दिन का इंतजार करना कोई नहीं चाहता। किसी विद्यालय का अन्तिम दिन हो या नौकरी का, यह एक समूचे वृतान्त का पटाक्षेप होता है। अन्तिम दिन से कई बातों, कई रूढ़ियों से भी मुक्ति मिल जाती है। वही रूढ़ियां जिनके प्रति कभी एक चिढ़ जैसी होती थी अब अचानक ही मोहसक्त करने लगती हैं। बहरहाल मनुष्य की उस प्रवृत्ति का क्या कहा जा सकता है जिसमें वह हर बीते पल को आगे के लिए सुरक्षित संरक्षित कर लेना चाहता है। इन स्मृतियों के सहारे वह अपने आगे के सफर को बेहतर बनाना चाहता है। यही जीवन है जो विरोधाभासों के बीच भी कदम दर कदम आगे बढ़ता रहता है। जम्मू के कवि अरविन्द शर्मा अपनी कविता 'मोह' में लिखते हैं 'स्कूल के अंतिम दिन,/ आ कर,/ उतारनी थी वर्दी,/ फिर कभी न पहनने के लिए/ उस दिन,/ नहीं उतारी आते ही,/ उतारी ही नहीं गई/ देर शाम, बहुत बोझिल मन से,/ उतारी भी तो बहुत सहेज कर।/ जकड़ लेना उन्हीं बेड़ियों को/ जिनसे छूटने की चाह में जिए/ क्या ऐसा ही होता है/ अंतिम दिन?' अरविन्द की भाषा में टटकापन है। विषय भी अलग किस्म के हैं जो कवि की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। अपनी कविताओ...